बेबाक राहुल बजाज, वो उद्योगपति जो ख़ुद को सत्ता विरोधी कहता था

इमेज स्रोत, Getty Images
देश के दिग्गज उद्योगपति राहुल बजाज का शनिवार को पुणे में निधन हो गया. वह 83 वर्ष के थे. उन्होंने दोपहर ढाई बजे अंतिम सांसें लीं.
न्यूज़ एजेंसी पीटीआई ने उनके निधन की पुष्टि की है. एजेंसी के मुताबिक राहुल बजाज को न्यूमोनिया और हृदय संबंध बीमारी थी. हालत बिगड़ने की वजह से पिछले एक महीने से वह अस्पताल में भर्ती थे.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनके निधन पर लिखा कि कॉमर्स और इंडस्ट्री के क्षेत्र में उनके योगदान को याद रखा जाएगा साथ ही वो कम्युनिटी सर्विस के लिए भी याद रखे जाएंगे.
इस लेख में Google YouTube से मिली सामग्री शामिल है. कुछ भी लोड होने से पहले हम आपकी इजाज़त मांगते हैं क्योंकि उनमें कुकीज़ और दूसरी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया हो सकता है. आप स्वीकार करने से पहले Google YouTube cookie policy और को पढ़ना चाहेंगे. इस सामग्री को देखने के लिए 'अनुमति देंऔर जारी रखें' को चुनें.
पोस्ट YouTube समाप्त
राहुल बजाज ने लंबे समय तक देश के सबसे पुराने औद्योगिक घरानों में से एक बजाज ग्रुप का नेतृत्व किया. वह उद्योग जगत की बेबाक आवाज़ के तौर पर जाने जाते थे. तमाम मुद्दों पर वह खरी-खरी बोलने में विश्वास करते थे.
राहुल बजाज का जन्म 30 जून, 1938 को कोलकाता में हुआ था. वह 40 साल से अधिक समय तक बजाज ग्रुप के चेयरमैन रहे. पिछले साल अप्रैल में चेयरमैन पद से इस्तीफ़ा देने के बाद उन्हें चेयरमैन एमिरेटस बनाया गया था. 2001 में उन्हें पद्मभूमषण से नवाजा गया था. वह राज्यसभा के सांसद भी रह चुके थे.
राहुल बजाज अपनी बेबाकी के लिए जाने जाते थे. कॉरपोरेट इंडिया की चिंता हो या देशहित से जुड़ा मुद्दा उन्होंने कभी भी खुल कर बोलने से गुरेज नहीं किया. 'बिजनेस स्टैंडर्ड' की एक ख़बर के मुताबिक राहुल बजाज ने इकोनॉमिक्स टाइम्स की ओर से आयोजित एक समारोह में कहा था कि वह जन्मजात सत्ता-प्रतिष्ठान विरोधी हैं. बीजेपी, एनसीपी और शिवसेना के समर्थन से वर्ष 2006 में राहुल बजाज निर्दलीय सदस्य के तौर पर राज्यसभा पहुंचे. लेकिन उन्होंने गृह मंत्री अमित शाह के सामने कहा, "लोग (उद्योगपति) आपसे (मोदी सरकार) डरते हैं. जब यूपीए-2 की सरकार थी, तो हम किसी की भी आलोचना कर सकते थे. पर अब हमें यह विश्वास नहीं है कि अगर हम खुले तौर पर आलोचना करें तो आप इसे पसंद करेंगे."
जब नेशनल एंथम जैसा बन गया था ' हमारा बजाज'
राहुल बजाज ने अपने कारोबारी दक्षता से अपने ग्रुप बजाज को देश की ऑटो इंडस्ट्री का सिरमौर बना दिया था. उनके नेतृत्व में बजाज स्कूटर को अपार लोकप्रियता मिली. इस स्कूटर का विज्ञापन ' हमारा बजाज' नेशनल एंथम जैसा बन गया. यह भारत की आत्मनिर्भरता का प्रतीक बन गया था.
बिजनेस-स्टैंडर्ड के मुताबिक 1970 के दशक में जब इटली की कंपनी पियाजियो ने बजाज का लाइसेंस रीन्यू ने नहीं किया तो उन्होंने अपने ब्रांड चेतक और सुपर के तहत स्कूटर बनाना शुरू किया.

इमेज स्रोत, Getty Images
लाइसेंस-परमिट राज का विरोध
उन्होंने लाइसेंस-परमिट सिस्टम भी विरोध किया. लाइसेंस की वजह से सत्तर-अस्सी के दशक में स्कूटर बुक कराने के बाद डिलीवरी के लिए वर्षों इंतजार करना पड़ता था. राहुल बजाज इसके ख़िलाफ़ बोले.
उन्होंने कहा, "अगर देशवासियों की ज़रूरत का सामान बनाने के लिए मुझे जेल भी जाना पड़ा तो जाऊंगा."
वरिष्ठ पत्रकार टीके अरुण ने बीबीसी हिंदी को बताया था कि भले ही बजाज ने लाइसेंस परमिट राज का विरोध किया हो लेकिन वह देशी उद्योग के उतने ही बड़े पैरोकार थे.
अरुण कहते हैं "1992-94 में हुए इंडस्ट्री रिफ़ॉर्म के ख़िलाफ़ भी राहुल बजाज खुलकर बोले थे. उनका तर्क था कि इससे भारतीय इंडस्ट्री को धक्का लगेगा और देसी कंपनियों के लिए प्रतिस्पर्धा मुश्किल हो जाएगी."

इमेज स्रोत, Getty Images
राहुल का नाम और इंदिरा गांधी
जब राहुल बजाज का जन्म हुआ तो इंदिरा गांधी कांग्रेस नेता कमलनयन बजाज (राहुल के पिता) के घर पहुँची और उनकी पत्नी से शिकायत की कि उन्होंने उनकी एक क़ीमती चीज़ ले ली है. ये था नाम 'राहुल' जो जवाहर लाल नेहरू को बहुत पसंद था और उन्होंने इसे इंदिरा के बेटे के लिए सोच रखा था. लेकिन नेहरू ने यह नाम अपने सामने जन्मे कमलनयन बजाज के बेटे को दे दिया.
कहा जाता है कि बाद में इंदिरा गांधी ने राजीव गांधी के बेटे का नाम राहुल इसी वजह से रखा था कि ये नाम उनके पिता को बहुत पसंद था.
सीईओ का मुकाम हासिल करने वाले सबसे युवा भारतीय
अपने पिता कमलनयन बजाज की तरह राहुल बजाज ने भी विदेश से पढ़ाई की.
दिल्ली विश्वविद्यालय के सेंट स्टीफ़न कॉलेज से इकोनॉमिक ऑनर्स करने के बाद राहुल बजाज ने क़रीब तीन साल तक बजाज इलेक्ट्रिकल्स कंपनी में ट्रेनिंग की. इसी दौरान उन्होंने बॉम्बे यूनिवर्सिटी से वक़ालत की पढ़ाई भी की.
राहुल बजाज ने 60 के दशक में अमरीका के हार्वर्ड बिज़नेस स्कूल से एमबीए की डिग्री ली थी.
पढ़ाई पूरी करने के बाद वर्ष 1968 में 30 वर्ष की उम्र में जब राहुल बजाज ने 'बजाज ऑटो लिमिटेड' के सीईओ का पद संभाला तो कहा गया कि ये मुक़ाम हासिल करने वाले वो सबसे युवा भारतीय हैं.
वो ये दावा करते आए हैं कि बजाज चेतक (स्कूटर) और फिर बजाज पल्सर (मोटरसाइकिल) जैसे उत्पादों ने बाज़ार में उनके ब्रांड की विश्वसनीयता को बढ़ाया और इसी वजह से कंपनी 1965 में तीन करोड़ के टर्नओवर से 2008 में क़रीब दस हज़ार करोड़ के टर्नओवर तक पहुंच पाई.
राहुल बजाज न सिर्फ़ एक बार राज्यसभा के सांसद रह चुके हैं, बल्कि भारतीय उद्योग परिसंघ यानी सीआईआई के अध्यक्ष रहे हैं, सोसायटी ऑफ़ इंडियन ऑटोमोबिल मैन्युफ़ैक्चरर्स (सियाम) के अध्यक्ष रहे हैं, इंडियन एयरलाइंस के चेयरमैन रह चुके हैं और भारत का तीसरा सबसे बड़ा नागरिक सम्मान 'पद्म भूषण' प्राप्त कर चुके हैं.

इमेज स्रोत, Getty Images
सफलता का श्रेय पत्नी को देते थे बजाज
वरिष्ठ पत्रकार करण थापर को वर्ष 2016 में दिए एक इंटरव्यू में राहुल बजाज ने कहा था कि 1961 में जब रूपा और मेरी शादी हुई तो भारत के पूरे मारवाड़ी-राजस्थानी उद्योगपति घरानों में वो पहली लव-मैरिज थी.
रूपा महाराष्ट्र की ब्राह्मण थीं. उनके पिता सिविल सर्वेंट थे और हमारा व्यापारी परिवार था तो दोनों परिवारों में तालमेल बैठाना थोड़ा मुश्किल था. पर मैं रूपा का बहुत सम्मान करता हूँ क्योंकि उनसे मुझे काफ़ी कुछ सीखने को मिला.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)















