उत्तराखंड चुनाव में क्या कांग्रेस की राह मुश्किल करेगी आम आदमी पार्टी?

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- Author, राजेश डोबरियाल
- पदनाम, उत्तराखंड से, बीबीसी हिंदी के लिए
उत्तराखंड में पाँचवीं विधानसभा के लिए हो रहे चुनाव में इस बार मुक़ाबला त्रिकोणीय नज़र आ रहा है.
आम आदमी पार्टी प्रदेश के विधानसभा चुनाव में पहली बार मैदान में उतरी है और तीसरी शक्ति के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज करवा रही.
हालांकि क़रीब डेढ़ साल पहले जैसी उम्मीद आम आदमी पार्टी ने जगाई थी, मतदान की तारीख़ नज़दीक आते-आते वह कम होती जा रही है.
खेल बनाएगी या बिगाड़ेगी
वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक पर्यवेक्षक योगेश भट्ट कहते हैं कि उत्तराखंड में हमेशा से तीसरे विकल्प की ज़रूरत रही है.
क़रीब डेढ़ साल पहले जब आम आदमी पार्टी ने उत्तराखंड के विधानसभा चुनाव लड़ने का एलान किया तो उसने लोगों में एक उम्मीद तो जगाई ही थी, हालांकि बाद में वह कन्फ़्यूज़ हो गई. बहरहाल आम आदमी पार्टी इन चुनावों में एक तीसरी शक्ति के रूप में मौजूद है.
वरिष्ठ पत्रकार डॉक्टर अजय ढौंडियाल कहते हैं कि आम आदमी पार्टी इस बार कुल 6 फ़ीसदी तक वोट ले सकती है. इसकी वजह से वह कई सीटों पर खेल बना या बिगाड़ सकती है.

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डॉक्टर ढौंडियाल के अनुसार आम आदमी पार्टी जितना अच्छा प्रदर्शन करेगी, उतना कांग्रेस को नुकसान होने की आशंका है क्योंकि वह मुख्यतः सत्ता विरोधी लहर वाले वोट को काटेगी.
अगर आम आदमी पार्टी मौजूद नहीं रहती तो यह वोट कांग्रेस को जाता. इससे ऐसी कई सीटों पर फ़र्क़ पड़ सकता है, जहाँ जीत का मार्जिन बहुत कम रहा है या रह सकता है. हालांकि कई सीटों पर बीजेपी को भी नुक़सान हो सकता है.
ढौंडियाल कहते हैं कि आप के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार कर्नल (रिटायर्ड) कोठियाल समेत ज़्यादातर प्रत्याशियों के जीतने की कोई संभावना नहीं है लेकिन ऊधम सिंह नगर की रुद्रपुर और काशीपुर सीट पर आप के उम्मीदवार मुक़ाबले में हैं और रिज़ल्ट चौंकाने वाले हो सकते हैं.

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बीएसपी के वोट बैंक पर नज़र
उत्तराखंड की राजनीति में बीजेपी और कांग्रेस का ही दबदबा रहा है. 2000 में राज्य गठन के बाद से दोनों बारी-बारी से सत्ता में आती रही हैं. कभी स्पष्ट बहुमत के साथ, तो कभी जोड़-जुगाड़ के साथ बीजेपी या कांग्रेस ने ही सरकार बनाई.
पहले और दूसरे चुनावों में तो बीएसपी ने क्रमशः आठ और सात सीटें जीतकर प्रदेश में तीसरी ताक़त के रूप में अपनी मौजूदगी दर्ज की थी. लेकिन 2012 के चुनावों में पार्टी की सीटें घटकर तीन रह गईं और 2017 में यह शून्य पर पहुंच गई.
उत्तराखंड में बीएसपी का वोट शेयर भी गिरा ही है. 2002 के चुनावों में यह 10.9 फ़ीसदी था तो 2017 के विधानसभा चुनावों में यह घटकर 7.1 फ़ीसदी हो गया. 2019 के लोकसभा चुनावों में बीएसपी को 4.5 फ़ीसदी वोट मिले.
योगेश भट्ट कहते हैं कि आम आदमी पार्टी की नज़र इसी वोट पर है.

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वह कहते हैं कि शुरुआत में आम आदमी पार्टी को लगा कि वह चूंकि कांग्रेस की हालत पूरे देश में ही पतली है, इसलिए वह उसे उत्तराखंड से साफ़ कर देंगे और बीजेपी से सीधे मुकाबले में आ जाएंगे. लेकिन जब ऐसा होता नहीं दिखा तो उन्होंने तीसरा विकल्प बनने और चुनाव को त्रिकोणीय बनाने की रणनीति पर ध्यान केंद्रित किया.
भट्ट ध्यान दिलाते हैं कि शुरुआत में आम आदमी पार्टी के प्रचार में बैकग्राउंड सफ़ेद होता था. रणनीति के साथ ही इसने अपना बैकग्राउंड भी बदलकर नीला कर दिया. आप ने जो पार्टी का जो सांगठनिक ढांचा तैयार किया उसमें दलितों और मुस्लिमों को जगह दी गई.
तीसरे चरण में आप को लगा कि ब्राह्मण बीजेपी से नाराज़ हैं तो पार्टी ने बड़ी संख्या में ब्राह्मणों को पार्टी में शामिल किया हालांकि बाद में ज़्यादातर छोड़कर चले गए. कर्नल (रिटायर्ड) कोठियाल को सीएम पद का उम्मीदवार बनाने के पीछे एक वजह यह भी है कि वह ब्राह्मण हैं.

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कोठियाल की राजनीतिक महत्वाकांक्षा
आम आदमी पार्टी के उत्तराखंड में सबसे पहले मुख्यमंत्री पद के दावेदार का एलान कर दिया था. आप ने कर्नल (रिटायर्ड) अजय कोठियाल को अपना सीएम पद का उम्मीदवार बनाया और गंगोत्री से चुनाव मैदान में उतारा. बता दें कि उत्तराखंड में चुनावों से जुड़ा एक मिथक यह है कि जो गंगोत्री से जीतता है, उसी की पार्टी सरकार बनाती है.
योगेश भट्ट कहते हैं कि कर्नल (कोठियाल) ने अपने कार्यकाल के दौरान ही अपनी एक इमेज बना ली थी (जिसमें उनके अपने प्रचार तंत्र की भूमिका रही है). वह सेना के अधिकारी रहे, निम के प्रिंसिपल रहे और केदारनाथ पुनर्निर्माण के दौरान उन्होंने ख्याति भी अर्जित की है.
भट्ट कहते हैं कि कर्नल (रिटायर्ड) कोठियाल की राजनीतिक महत्वाकांक्षा भी किसी से छुपी नहीं रही है. 2019 में लोकसभा चुनाव के दौरान वह कोशिश करते रहे कि बीजेपी से टिकट मिल जाए या कांग्रेस ही उन्हें उम्मीदवार बना दे लेकिन वह इसमें सफल नहीं हुए.
इसके बाद न तो वह निर्दलीय मैदान में उतरने की हिम्मत जुटा पाए और न ही कोई राजनीतिक पार्टी खड़ी कर पाए जबकि अपने ग़ैर सरकारी संगठन यूथ फ़ाउंडेशन की वजह से युवाओं में उनकी स्वीकार्यता है. बता दें कि यूथ फ़ाइंडेशन सेना में भर्ती होने के इच्छुक युवाओं को ट्रेनिंग देकर उनकी भर्ती में मदद करता है.
योगेश भट्ट के अनुसार कर्नल (रिटायर्ड) कोठियाल से जुड़े लोग भी यह अपेक्षा कर रहे थे कि कर्नल कोठियाल बीजेपी-कांग्रेस से अलग रास्ता लें और युवाओं को साथ लेकर कोई राजनीतिक दल बनाएं.
उनसे जुड़े बहुत से लोग उनके आम आदमी पार्टी में जाने के फ़ैसले से सहमत नहीं हैं. यह हो सकता है कि आप को कर्नल कोठियाल के आने से फ़ायदा मिला हो लेकिन कर्नल कोठियाल के लिए यह कदम फ़ायदे का नहीं रहा.
उत्तरकाशी के स्थानीय पत्रकार हरीश थपलियाल भी यही बात कहते हैं.

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गंगोत्री में जीत पाएंगे कोठियाल?
हरीश थपलियाल के अनुसार गंगोत्री से कर्नल कोठियाल के जीतने की संभावना तो नज़र नहीं आ रही लेकिन वह बीजेपी को तीसरे नंबर पर धकेलकर रनर-अप बन सकते हैं. उन्हें वोट यूथ-फ़ाउंडेशन के ज़रिए किए गए काम के लिए मिलेंगे, आम आदमी पार्टी की वजह से नहीं.
थपलियाल बताते हैं कि यूथ-फ़ाउंडेशन के माध्यम से उत्तरकाशी के ही दो से तीन हज़ार युवक सेना में भर्ती होने में सफल रहे हैं. दरअसल यूथ-फ़ाउंडेशन में उन्हीं युवकों को ट्रेनिंग दी जाती है जो सेना में भर्ती होने के लायक़ होते हैं. कड़े प्रशिक्षण के बाद अधिकांश सेना में भर्ती हो ही जाते हैं.
वह कहते हैं कि गंगोत्री में लोगों का मानना है कि कर्नल (रिटायर्ड) कोठियाल अगर कांग्रेस से बीजेपी से लड़ते तो जीत जाते. अगर वह निर्दलीय भी लड़ते तो जीत जाते लेकिन आप से नहीं. आप को स्थानीय लोग अब भी बाहरी पार्टी ही मानते हैं.
डॉक्टर अजय ढौंडियाल कहते हैं कि कर्नल (रिटायर्ड) कोठियाल ने ग़लत सीट का चुनाव कर लिया. अगर वह केदारनाथ से लड़ते और 10 हज़ार वोट भी निकाल ले जाते तो उनके जीतने की संभावना थी, गंगोत्री में तो हार तय है.

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न प्रदेश अध्यक्ष, न कार्यकर्ता
लेकिन सवाल यह भी है कि आम आदमी पार्टी को लोग बाहरी क्यों मान रहे हैं?
दरअसल, आप उत्तराखंड में भी दिल्ली मॉडल पर ही चुनाव लड़ रही है. पार्टी का मुख्य चेहरा अरविंद केजरीवाल हैं और उसके बाद हैं प्रदेश में मुख्यमंत्री पद के घोषित उम्मीदवार कर्नल (रिटायर्ड) अजय कोठियाल. सारे प्रचार तंत्र में पहले केजरीवाल को मौक़ा देने की बात कही जा रही है, फिर कोठियाल को.
योगेश भट्ट कहते हैं कि यह ऐसी ग़लती है, जिसे आम आदमी पार्टी समझ नहीं पा रही. उत्तराखंड राज्य बहुत डाइवर्स है, यह दिल्ली नहीं है.
उत्तराखंड में छोटी सी यात्रा में पार्टी का कन्फ़्यूज़न नज़र भी आता है. वह अलग विकल्प देने का वादा करती है और बीजेपी-कांग्रेस की तरह उत्तराखंड में पार्टी को कठपुतली की तरह दिल्ली से चलाती है.
क़रीब डेढ़ साल पहले चुनाव मैदान में उतरी आम आदमी पार्टी ने प्रदेश में तीसरे विकल्प की उम्मीद जगाई और बहुत से युवा और प्रबुद्ध वर्ग के लोग आप में शामिल भी हुए लेकिन धीरे-धीरे कर वह इसे छोड़कर जाते रहे.
मतदान से 10 दिन पहले चार फरवरी को ही रिटायर्ड मेजर जनरल जखमोला और पार्टी के प्रदेश सचिव राजेश शर्मा ने आप का साथ छोड़ दिया.
एक कांग्रेस में शामिल हो गए तो दूसरे बीजेपी में. कुछ समय पहले पूर्व आईएएस सुवर्द्धन ने भी क़रीब साल भर आप में बिताने के बाद इसे छोड़ दिया था तो पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष रहे पूर्व आईपीएस अधिकारी अनंत राम चौहान उनसे पहले ही आप से नाता तोड़ चुके हैं.
बता दें कि पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष एसएस कलेर ने पिछले साल सितंबर में अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया था क्योंकि वह खटीमा से चुनाव लड़ने के लिए समय देना चाहते थे. इसके बाद पार्टी ने तीन कार्यकारी अध्यक्ष बनाए थे जिनमें से एक अनंत राम चौहान इस साल की शुरुआत में कांग्रेस में शामिल हो गए.
आम आदमी पार्टी के मीडिया प्रभारी अमित रावत दावा करते हैं कि पार्टी की पांच गारंटियों के लिए कुल 28 लाख रजिस्ट्रेशन हुए हैं. इनमें से 17 लाख यूनीक हैं यानी कि 17 लाख लोगों ने इन गारंटियों के लिए रजिस्ट्रेशन करवाया है.
हालांकि पार्टी कार्यकर्ता कितने हैं, इस सवाल के जवाब में अमित कहते हैं कि आप ने उत्तराखंड में कार्यकर्ता बनाने के लिए अभियान चलाया ही नहीं था इसलिए इस बारे में वह नहीं बता सकते.
इस तरह आम आदमी पार्टी उत्तराखंड की और शायद देश की अकेली पार्टी होगी जिसके पास प्रदेश में न कोई स्थायी अध्यक्ष है और न ही कार्यकर्ताओं की जानकारी.

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राजनीतिक दल या कॉर्पोरेट कंपनी?
योगेश भट्ट को तो आम आदमी पार्टी दरअसल राजनीतिक दल लगती भी नहीं है. वह कहते हैं कि आम आदमी पार्टी एक कॉर्पोरेट कंपनी है, जिसके सीईओ अरविंद केजरीवाल हैं और वाइस चेयरमैन मनीष सिसोदिया हैं. उनके लिए न कार्यकर्ता का कोई मतलब है, न नेताओं का और न ही संगठन का.
देहरादून स्थित आम आदमी पार्टी के प्रदेश मुख्यालय में जाकर यह बात समझ भी आती है. चुनाव प्रचार की सरगर्मियों के बीच दो मंजिला इमारत ज़्यादातर खाली ही नज़र आती है. वैसे सवालों के जवाब देने के लिए आप के मीडिया प्रभारी अमित रावत मौजूद रहते हैं.
आम आदमी पार्टी उत्तराखंड में चुनाव लड़ने के लिए सिर्फ़ प्रोफ़ेशनल कंसल्टेंसी फ़र्म्स की मदद तो ले ही रही है, पार्टी ने खुद भी चुनाव अभियान के लिए कई युवाओं को कांट्रेक्ट पर रखा है. इनमें कई पत्रकार भी शामिल हैं जिनके लिए मेनस्ट्रीम मीडिया में सिकुड़ती नौकरियों के दौर में यह मौका बड़ी राहत जैसा है.
हालांकि इनमें से अब बहुत से चिंतित भी हैं कि 14 फ़रवरी को मतदान के बाद क्या होगा, जब उनकी यहां से भी छुट्टी हो जाएगी?
सवाल यह भी है कि कंसल्टेंसी फ़र्मों और कांट्रेक्ट पर रखे लोगों के सहारे चुनाव लड़ रही आम आदमी पार्टी का चुनाव के बाद क्या होगा? और क्या चुनाव परिणाम आने के बाद भी कर्नल (रिटायर्ड) कोठियाल आम आदमी पार्टी के सर्वमान्य नेता बने रहेंगे?
डॉक्टर अजय ढौंडियाल कहते हैं कि अगर दूसरे विधायक चुनाव में कर्नल कोठियाल से अच्छा प्रदर्शन करते हैं, जीत जाते हैं तो फिर उनका नेता बना रहना आसान नहीं होगा. वैसे भी चुनाव परिणाम के बाद तो आम आदमी पार्टी को प्रदेश में नेतृत्व ही नहीं, पूरी पार्टी के बारे में पुनर्विचार करने की ज़रूरत पड़ने वाली है.
योगेश भट्ट कहते हैं कि कर्नल कोठियाल को राजनीति में आने की प्रेरणा प्रदेश के लोगों से ही मिली है. केदारनाथ में किए पुनर्निर्माण के काम और फिर यूथ फ़ाउंडेशन के ज़रिये युवाओं को नौकरी में भर्ती करवाने से जो प्रशंसा उन्हें मिली, उसी ने उन्हें राजनीति में आने को प्रेरित किया. ऐसा व्यक्ति बहुत समय तक आम आदमी पार्टी जैसे दल में नहीं रह पाएगा जो उन्हें कठपुतली की तरह उसका इस्तेमाल करना चाहता हो.
10 मार्च को चुनाव परिणाम के बाद राज्य में सरकार बदले न बदले, एक बात तो तय है कि उत्तराखंड में आम आदमी पार्टी में बहुत कुछ बदलेगा.
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