वोडाफ़ोन ने क्या भारत के बाज़ार से अपनी उम्मीदें छोड़ दी हैं?

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- Author, सौतिक विश्वास
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा टेलीकॉम बाज़ार भारत इस समय शानदार प्रदर्शन कर रहा है.
भारत में चीन के बाद सबसे ज़्यादा 118 करोड़ लोग फोन इस्तेमाल करते हैं. भारत के मार्केट में 76.5 करोड़ ब्रॉडबैंड उपभोक्ता हैं. यह दुनिया के सबसे बड़े डेटा बाज़ार में से एक है. सस्ते दाम और पर्याप्त उपलब्धता के चलते भारतीय टेलकॉम बाज़ार का विकास धमाकेदार रहा है.
हालांकि, इन आंकड़ों से भारतीय टेलीकॉम बाज़ार की अंदर की समस्याओं का पता नहीं चलता. इस हफ़्ते, भारत की सबसे पुरानी कंपनियों में से एक और देश की तीसरी सबसे बड़ी कंपनी, वोडाफ़ोन आइडिया ने अपने को डूबने से बचाने के लिए सरकारी मदद हासिल करने को अपनी मंजूरी दे दी.
सरकार को इस कंपनी में एक तिहाई से अधिक (35.8 फ़ीसदी) शेयर मिलने की उम्मीद है. उसके बाद बचे शेयरों में ब्रिटेन के वोडाफ़ोन समूह (28.5 फ़ीसदी) और भारत की आदित्य बिरला (17.8 फ़ीसदी) की हिस्सेदारी होगी.
वोडाफ़ोन आइडिया का पैसा और उसके ग्राहक उससे लगातार दूर हो रहे हैं. मालूम हो कि कंपनी ने पिछले पांच सालों में इस उपक्रम से कोई लाभ नहीं कमाया है. वहीं केवल पिछले साल कंपनी के 10 फ़ीसदी उपभोक्ता उससे दूर हो गए. अब उसके उपभोक्ताओं की संख्या घटकर 25.3 करोड़ रह गई है.
पिछले साल, कंपनी के चेयरमैन कुमार मंगलम बिरला ने कहा कि यदि उन्हें अदालत से राहत नहीं मिली तो वो अपना कारोबार समेट सकते हैं.

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'निर्णायक हिस्सेदारी छोड़ना मजबूरी थी'
सलाहाकार संस्था कन्वर्जेन्स कैटेलिस्ट के पार्टनर जयनाथ कोल्ला कहते हैं, "कंपनी की निर्णायक हिस्सेदारी छोड़ना ही आख़िरी विकल्प था. फ़ैसला भारतीय बाज़ार छोड़ने के बारे में भी था."
भारत के सेल्युलर फोन बाज़ार में तीन निजी कंपनियों जैसे कि रिलायंस जियो, एयरटेल और वोडाफ़ोन आइडिया के पास क़रीब 90 फ़ीसदी हिस्सेदारी है. वहीं बाक़ी 10 फ़ीसदी हिस्सा सरकारी कंपनी भारत संचार निगम लिमिटेड यानी बीएसएनएल के पास है.
अर्थशास्त्री विवेक कौल ने बताया, "यदि वोडाफ़ोन कोई बैंक या वित्तीय संस्था होती, तो उसे अब तक सरकारी मदद मिल गई होती. लेकिन अभी तक वोडाफ़ोन को यह मदद नहीं मिल सकी है."
वोडाफ़ोन आइडिया का पतन आसानी से चीज़ों को और भी ख़राब कर सकता था. तब फंसे हुए कर्ज़ से जूझ रहे भारत के बैंकों को बैड लोन के नए दौर से जूझना पड़ता. सबसे अहम चीज़ ये होती कि भारत के टेलीकॉम बाज़ार में दो ही कंपनी रह जातीं और इन दोनों का बाज़ार पर दबदबा होता.
निवेश और क्रेडिट रेटिंग एजेंसी इकरा के असिस्टेंट वाइस प्रेसिडेंट अंकित जैन के अनुसार, "एक अरब से अधिक उपभोक्ता वाले देश में चार कंपनियों का होना आदर्श स्थिति है. कंपनी में सरकार के हिस्सा खरीद लेने से इस इंडस्ट्री का ढांचा बचाए रखने के रूप में एक राहत पैकेज मिला है. साथ ही इससे विदेशी निवेशकों के बीच एक सकारात्मक संदेश भी गया है."

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जियो के आने से पैदा हुई समस्या
भारत का टेलीकॉम उद्योग 2016 से जूझ रहा है. उस समय मुकेश अंबानी के नेतृत्व में रिलायंस जियो ने बाज़ार में क़दम रखा. जियो के बाज़ार में आते ही सेवाओं की क़ीमतें कम रखने की एक जंग सी शुरू हो गई. उन्होंने टेलीकॉम उद्योग को वॉयस मार्केट से डेटा मार्केट में बदल दिया.
क़ीमतें कम रखने की अंतहीन जंग और सरकार के बक़ाए ने बाक़ी टेलीकॉम कंपनियों की कमर तोड़कर रख दी. उस पर ये बक़ाया सरकार से स्पेक्ट्रम ख़रीदने और राजस्व में सरकार के तय हिस्से के चलते हुआ था. इसका नतीज़ा ये हुआ कि कंपनी मुनाफ़े से घाटे में चली गई.
अंकित जैन कहते हैं कि सेवाओं की क़ीमतें कम रहने और ज़्यादा कर्ज़ के चलते कंपनी का लाभ घटता गया और चीज़ें ख़राब होती चली गईं.
पिछले साल सितंबर में, नगदी संकट से जूझ रही वोडाफ़ोन आइडिया को सरकार ने अपने बक़ाए के भुगतान के लिए चार साल की छूट देने की पेशकश की. ऐसा होने से कंपनी को पैसा जुटाने, नेटवर्क बढ़ाने और स्पेक्ट्रम ख़रीदने में मदद मिलेगी.

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सस्ती सेवाओं के दिन लद गए
दो महीने पहले नवंबर में वोडाफ़ोन ने 'प्राइस वॉर' को थोड़ा ढीला करते हुए अपनी कई सेवाओं को 20 फ़ीसदी तक महंगा करने का एलान किया. अब गेंद फिर से कंपनी के पाले में है.
वोडाफ़ोन आइडिया के शेयर सरकार द्वारा ख़रीदने की ख़बर सामने आने के बाद शेयर बाज़ार में कंपनी के शेयर तेज़ी से 21 फ़ीसदी लुढ़क गए. निवेशकों को लगता है कि यह सरकारी कंपनियों का विनिवेश करने की नीति को पलटने वाला फ़ैसला है.
सरकार ने क़रीब तीन महीने पहले घाटे में चल रही सरकारी विमानन कंपनी एयर इंडिया को टाटा के हाथों बेचने का फ़ैसला किया था.
कइयों को इस बात की हैरानी है कि जब सरकार की पहले से एक टेलीकॉम कंपनी है, जो घाटे में चल रही है, तो इस कंपनी का क्या होगा. वहीं दूसरों का मानना है कि वोडाफ़ोन की मदद करने से सरकार का टेलीकॉम पोर्टफ़ोलियो और संपत्ति मजबूत होगी. यह भी हो सकता है कि आने वाले वक़्त में सरकार बढ़िया माहौल देखकर इस हिस्से को किसी और निवेशक को बेच सकती है.
इस तरह वोडाफ़ोन की कहानी से हमें कई चीज़ों का पता चलता है. पहला ये कि अब सस्ती सेवाओं के दिन लद गए हैं. हालांकि क़ीमत के लिहाज से भारत अभी भी संवेदनशील है. यदि कोई नई कंपनी पूरे देश में फैलने के इरादे से बाज़ार में उतरती है, तो उसे दाम घटाने के लिए भारी निवेश करने के साथ शेयरधारकों का पूरा समर्थन भी हासिल करना होगा.
ये याद रखना चाहिए कि क़रीब एक दशक पहले भारत में क़रीब 15 टेलीकॉम कंपनियां थीं, लेकिन अब इनकी संख्या घटकर चार रह गई है.
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