वोडाफ़ोन-आइडिया और एयरटेल की 'दुकान बंद' हुई तो क्या होगा?

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- Author, निधि राय
- पदनाम, बिज़नेस संवाददाता, मुंबई
दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती स्मार्टफ़ोन मार्केट का ताज लंबे समय तक भारत के सिर रहा मगर देश की टेलिकॉम कंपनियां अब एक नई चुनौती का सामना कर रही हैं.
भारत के सुप्रीम कोर्ट ने वोडाफ़ोन-आइडिया और एयरटेल से कहा है कि वे लाइसेंस फ़ीस और ब्याज़ के रूप में 13 अरब डॉलर यानी लगभग 83,000 करोड़ रुपये की रकम अदा करें.
इस फ़ीस को एडजस्टेड ग्रॉस रेवेन्यू या एजीआर कहा जाता है. टेलिकॉम डिपार्टमेंट और टेलिकॉम कंपनियों के बीच 2005 से ही एजीआर को लेकर विवाद है.
टेलिकॉम कंपनियां जो पैसा कमा रही हैं, उनका एक हिस्सा उन्हें टेलिकॉम विभाग को देना है. यही एडजस्टेड ग्रॉस रेवेन्यू या एजीआर है.
कंपनियां चाहती हैं कि केवल टेलिकॉम बिज़नेस से होने वाली कमाई को एजीआर माना जाए जबकि सरकार का कहना है कि ग़ैर टेलिकॉम बिज़नेस जैसे परिसंपत्तियों की बिक्री या डिपाजिट्स पर मिलने वाले ब्याज़ को भी इसमें गिना जाए.
24 अक्तूबर, 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने एजीआर को लेकर टेलिकॉम डिपार्टमेंट की दी गई परिभाषा को बरक़रार रखा और कंपनियों को कहा कि अपना बकाया चुकाएं.

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कैसे हैं हालात
टेलिकॉम कंपनियां अभी भी कोशिश में हैं कि इस रकम को अदा करने के लिए सुप्रीम कोर्ट से और मोहलत ली जाए.
उन्होंने वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की लॉबीइंग की है. वोडाफ़ोन आइडिया और एयरटेल दोनों ने कहा है कि उनके पास फ़ीस जमा करने लायक पैसे नहीं हैं.
वोडाफ़ोन आइडिया के चेयरमैन कुमार मंगलम बिड़ला ने तो यह कह दिया कि अगर सरकार से कोई मदद नहीं मिली तो उसे 'दुकान बंद' करनी पड़ेगी.
दूरसंचार मंत्री से मिलने के बाद भारती एंटरप्राइज़ेज़ के चेयरमैन सुनील भारती मित्तल ने पत्रकारों से कहा, "एजीआर की बकाया रकम अभूतपूर्व संकट है."
हालांकि, उन्होंने दूसरंचार विभाग को आश्वस्त किया है कि कंपनी 17 मार्च तक अपना बकाया चुका देगी.

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किसका कितना बकाया
वोडाफ़ोन को लगभग 283 अरब रुपये लाइसेंस फ़ीस के चुकाने हैं. वोडाफ़ोन आइडिया ने 17 फ़रवरी तक 35 अरब रुपये चुका दिए थे.
एक्सपर्ट कहते हैं कि वोडाफ़ोन-आइडिया के लिए पूरी रकम चुकाना बहुत मुश्किल रह सकता है. इसकी पैरंट कंपनियों, वोडाफ़ोन और आदित्य बिड़ला ग्रुप, ने कहा है कि वे भारत में और निवेश नहीं करेंगी.
एयरटेल को लाइसेंस फ़ीस के रूप में 216 अरब रुपये चुकाने हैं. उसने भी कुछ पैसे 17 फ़रवरी तक दिए हैं. एयरटेल का कहना है कि वह बकाया रकम का ख़ुद आकलन कर रहा है और 17 मार्च तक चुका देगा.
टाटा टेलिसर्विसेज को भी काफ़ी रकम देनी है मगर उसके ग्राहक काफ़ी कम हैं. जियो की देनदारी भी कम है क्योंकि उसने 2016 से ही कारोबार शुरू किया है.

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ग्राहकों पर असर
असल चिंता यह है कि कहीं इस फ़ीस के चक्कर में कोई कंपनी बंद न हो जाए. वोडाफ़ोन आइडिया आर्थिक तौर पर ज़्यादा संवेदनशील है क्योंकि इसके 33 करोड़ 60 लाख ग्राहकों पर असर पड़ेगा. इसकी तुलना में एयरटेल के पास 32 करोड़ 70 लाख ग्राहक हैं जबकि जियो के पास 36 करोड़ 90 लाख.
केयर रेटिंग्स के डिप्टी जनरल मैनेजर गौरव दीक्षित कहते हैं, "ग्राहकों के पास अन्य टेलिकॉम कंपनियों में अपना नंबर पोर्ट करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं होगा. और फिर इन ग्राहकों को लेने वाली दूसरी कंपनियों पर अतिरिक्त दबाव पड़ेगा. इससे उनकी सर्विस की क्वॉलिटी प्रभावित होगी."
इस पूरे प्रकरण ने इन कंपनियों की वित्तीय हालत पर रोशनी डाली है. विशेषज्ञों का कहना है कि टेलिकॉम कंपनियों को अपनी सेवाओं का दाम बढ़ाने पर मजबूर होना पड़ेगा.

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ट्विमबिट में टेलिकॉम एनालिस्ट मीनाक्षी कहती हैं, "2019 के दिसंबर की शुरुआत में एयरटेल, वोडाफ़ोन आइडिया और जियो ने अपने बंडल वाले प्रीपेड पैक की दरों में 14 से 33 प्रतिशत की बढ़ोतरी की थी. यह पिछले तीन सालों में पहला मौक़ा था जब कंपनियों ने टैरिफ़ बढ़ाए."
"दाम बढ़ाने की यह रणनीति सेल्यूलर ऑपरेटर्स एसिसिएशन ऑफ़ इंडिया (COAI) के सुझाव के अनुरूप है. COAI का कहना है कि अगर इंडस्ट्री को अपनी वित्तीय हालत ठीक रखनी है तो प्रति यूज़र मिलने वाला राजस्व बढ़ाकर 300 रुपये तक करना होगा."
COAI के महानिदेशक राजन मैथ्यूज़ ने बीबीसी से कहा, "कई ग्राहक अभी भी 2जी नेटवर्क इस्तेमाल कर रहे हैं. अगर वोडाफ़ोन को मार्केट से हटना पड़ा तो वे 4जी डेटा इस्तेमाल करेंगे. जियो के पास 2G नहीं है और एयरटेल के पास इतनी संख्या में ग्राहकों को अपने यहां जगह लायक संसाधन नहीं हैं."

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नौकरियों पर असर
इन कंपनियों में जो लोग काम कर रहे हैं, उनपर भी असर होने वाला है. अभी वोडाफ़ोन आइडिया में 14 हज़ार लोग काम कर रहे हैं. रिपोर्ट्स के अनुसार, इससे छह गुना ज़्यादा लोग कंपनियों के लिए अप्रत्यक्ष तौर पर काम करते हैं.
टेलिकॉम कंपनियों पर मंडरा रहा ख़तरा भारत के बैंकिंग सेक्टर के लिए भी चिंता का विषय है जो कि डूब चुके कर्जों के कारण पहले से ही दिक्कत में हैं.
एसबीआई के चेयरमैन रजनीश कुमार ने भी कहा है, "अगर कोई टेलिकॉम कंपनी बंद होती है तो इसका असर होगा. जब ऐसा होगा तो हमें भी क़ीमत चुकानी होगी."

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सरकार के पास क्या हैं विकल्प
विशेषज्ञों के अनुसार, सरकार के पास कुछ विकल्प मौजूद हैं. इनमें से एक 'टर्म डेट' है.
COAI के महानिदेशक राजन मैथ्यूज़ कहते हैं, "कंपनियों को बकाया पैसे चुकाने के लिए ब्याज़ दरों के साथ एक अवधि देनी चाहिए ताकि उन्हें सुविधा हो. फिर इंडस्ट्री और टेलिकॉम विभाग को मिलकर एजीआर की परिषाभा पर सहमति बनानी चाहिए. उन्हें लाइसेंस फ़ीस घटानी चाहिए और स्पेक्ट्रम यूज़ेस चार्ज भी कम करना चाहिए ताकि कंपनियों के पास कुछ कैश रह सके."
अन्य का भी मानना है कि सरकार इस सेक्टर को संभालने के लिए काफ़ी कुछ कर सकती है.

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टेलिकॉम एक्सपर्ट महेश उप्पल कहते हैं, "सरकार इस सेक्टर को तुरंत फ़ायदा लेने के लिए मनमाने तरीके से इस्तेमाल करती है. जबकि इस सेक्टर को अर्थव्यवस्ता के लिए अहम सेक्टर समझा जाना चाहिए."
सरकार के पास उन कंपनियों का लाइसेंस रद्द करने का भी विकल्प है जो देय राशि चुका पाने में असमर्थ रहती हैं. ऐसी कंपनी के इन्फ्रास्ट्रक्चर को बाक़ी कंपनियों में बांटा जा सकता है.
ये क़दम कड़ा लग सकता है मगर कुछ विशेषज्ञ इसे कंपनियों द्वारा किए गए समझौते के हिसाब से उचित मानते हैं.
केयर रेटिंग्स के गौरव दीक्षित बताते हैं, "टेलिकॉम विभाग ने स्पेक्ट्रम देते समय कंपनियों के साथ परफॉर्मेंस अग्रीमेंट किया है. अगर इन समझौतों का उल्लंघन होता है तो कार्रवाई हो सकती है जिसमें बैंक गारंटी जब्त करने या ऐसे ही अन्य क़दम उठाए जा सकते हैं.'
"हालांकि, टेलिकॉम लाइसेंस को कैंसल करना टेलिकॉम डिपार्टमेंट का आख़िरी विकल्प हो सकता है. गतिरोध बना रहा तो ऐसा हो सकता है."

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अगर एक टेलिकॉम कंपनी भी बंद होती है तो इससे मार्केट में मात्र दो ही कंपनियां बचेंगी. जानकारों का कहना है कि इससे न सिर्फ़ प्रतियोगिता ख़त्म होने के कारण नुक़सान होगा बल्कि और दुष्प्रभाव भी होंगे.
टेलिकॉम एनालिस्ट मीनाक्षी घोष कहती हैं, "टेलिकॉम का भविष्य 5G में है. इसके लिए मज़बूत नेटवर्क और बिज़नस में बने रहने लायक अच्छे संसाधन होना ज़रूरी होंगे. डूओपली यानी दो कंपनियां का ही वर्चस्व रहना भारत जैसे बड़े देश के लिए इनोवेशन और प्रगति के लिए ठीक नहीं होगा."
भारत के टेलिकॉम सेक्टर की ख़राब हालत अन्य कारोबारों के लिए भी चिंता की बात है. जब तक कि कंपनियों और सरकार के बीच भारी भरकम फ़ीस को लेकर बने गतिरोध का हल नहीं निकलता, तब तक अर्थव्यवस्था और ग्राहकों पर गहरा असर होने की आशंका बनी रहेगी.
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