जियो फ़ेसबुक डील: टेलिकॉम और रीटेल सेक्टर पर कितना असर

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    • Author, सरोज सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

सोशल मीडिया साइट फ़ेसबुक ने भारतीय कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज़ के डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म रिलायंस जियो में 43,574 करोड़ रुपए का निवेश किया है.

इस डील के साथ ही फ़ेसबुक रिलायंस जियो में 9.99 प्रतिशत का हिस्सेदार बन गया है.

फ़ेसबुक ने अपने न्यूज़रूम पन्ने पर इस डील से जुड़ी जानकारी शेयर करते हुए लिखा है कि यह निवेश भारत के प्रति हमारी प्रतिबद्धता को दिखाता है.

फ़ेसबुक न्यूज़रूम के पन्ने पर मौजूद जानकारी के अनुसार, 'भारत डिजिटल टेक्नॉलजी को अपनाते हुए सामाजिक और आर्थिक रूप से बहुत तेज़ी से बदल रहा है. बीते पाँच सालों में भारत में क़रीब 560 मिलियन लोग इंटरनेट का इस्तेमाल करने लगे हैं.'

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इस डील के बारे में जानकारी साझा करते हुए रिलायंस जियो कंपनी के मालिक मुकेश अंबानी ने एक वीडियो संदेश जारी किया है.

मुकेश अंबानी ने अपने संदेश में कहा कि भारत के डिजिटल टांसफ़ॉर्मेशन की दिशा में ये डील एक बहुत महत्वपूर्ण क़दम है. डिजिटल इकोनॉमी के ज़रिए लोगों को सशक्त, सक्षम और ज्यादा समृद्ध बनाने में ये डील महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी. हमारी पार्टनरशिप से भारत को दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण डिजिटल सोसाइटी बनाने में बड़ा योगदान मिलेगा.

उन्होंने ये भी कहा कि फ़ेसबुक व्हाट्सऐप आज भारत ही नहीं दुनिया में सबकी ज़िंदगी में अहम दोस्त बन गया है जो ना सिर्फ़ परिवार बल्कि रिश्तेदारों, दोस्तों और बिज़नेस को साथ ला रहा है. उसी तरह जियो, भारत में सबसे बड़े कनेक्टिविटी प्लेटफ़ॉर्म के तौर पर देखा जाता है.

जानकारों की राय है कि दो परस्पर अलग-अलग क्षेत्र की बड़ी कंपनियाँ, जब एक दूसरे के साथ आएँगी तो एक दूसरे को फ़ायदा और मज़बूती तो प्रदान करेंगी साथ ही मार्केट में एक बड़ा असर भी छोड़ेंगी.

इस मज़बूती और असर को समझने के लिए बहुत ज़रूरी है ये समझना कि दोनों ही कंपनियों का भारत में कितना विस्तार है.

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भारत में जियो और फ़ेसबुक यूज़र

चार साल से कम समय में ही रिलायंस जियो 38.8 करोड़ लोगों को इंटरनेट पर लाने में कामयाब रहा है.

मौजूदा समय में फ़ेसबुक के उपभोक्ता भारत में किसी भी दूसरे देश की तुलना में अधिक हैं. वहीं अगर इसके चैट-ऐप वॉट्सऐप की बात करें तो इसके 30 करोड़ से अधिक सब्सक्राइबर हैं.

इसलिए इस पार्टनरशिप की अहमियत ज़्यादा बढ़ जाती है. चूंकि रिलायंस जियो टेलिकॉम सेक्टर का नंबर एक खिलाड़ी है, इस पार्टनरशिप का टेलिकॉम पर असर पड़ना भी लाज़मी है.

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टेलिकॉम क्षेत्र पर असर

भारत के टेलिकॉम सेक्टर में चार अहम खिलाड़ी हैं - रिलायंस जियो, एयरटेल, वोडाफ़ोन और बीएसएनएल.

बीएसएनएल सरकारी कंपनी है, इसलिए पहले बात प्राइवेट कंपनियों की करते हैं. इस क्षेत्र के जानकार मानते हैं कि अब इस इंवेस्टमेंट से टेलिकॉम में एक दूसरी तरह की स्वस्थ प्रतिस्पर्धा देखने को मिलेगी.

टेलिकॉम एक्सपर्ट महेश उप्पल से पूरे मामले पर बीबीसी ने बात की. उनका कहना है, "ये इंवेस्टमेंट एक तरह से जियो को मार्केट में एक मज़बूत प्लेयर के तौर पर खड़ा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा. अब पहले के मुक़ाबले जियो को लोग टेलिकॉम क्षेत्र में ज़्यादा बड़ा खिलाड़ी समझेंगे."

जियो

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महेश इसे भारत के ब्रॉडबैंड क्षेत्र के लिए अच्छा मानते हैं. उनकी राय में ये पार्टनरशिप ना सिर्फ़ फे़सबुक और रिलायंस जियो के लिए 'विन-विन' समझौता है बल्कि एयरटेल और वोडाफ़ोन को भी इससे ज़्यादा नुक़सान नहीं है.

महेश इस पूरे इंवेस्मेंट को दो नज़रिए से देखने की बात कहते हैं. पहला ब्रॉडबैंड मार्केट और दूसरा कंपनियों की आर्थिक सेहत.

उनके मुताबिक़ ये इंवेस्टमेंट एयरटेल या वोडाफ़ोन में होता तो उनकी आर्थिक स्थिति ज़्यादा मज़बूत होती. ख़ास तौर पर अब जब दोनों कंपनियों को सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर एक बड़ी रक़म चुकानी है, ये उनके लिए अच्छी ख़बर नहीं है कि उनके प्रतिद्वंद्वी के पास इंवेस्टमेंट आ रहा है. लेकिन ध्यान ये देना होगा कि हाल में उनके सर्विस के रेट बढ़ने के बाद दोनो कंपनियों के रेवेन्यू भी बढ़े हैं.

लेकिन मार्केट के लिहाज़ से देखें तो तीनों कंपनियों में अब प्रतिस्पर्धा और बढ़ेगी. एयरटेल और वोडाफ़ोन के पास भी अच्छा यूज़र बेस और इंफ्रास्ट्रक्चर है. भविष्य में वो भी ऐसे पार्टनर की तलाश करेंगे. ऐसा होने पर देश की अर्थव्यवस्था जो कोविड-19 काल में डिजिटल की तरफ़ बढ़ रही है उसमें फ़ायदा मिलेगा.

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लेकिन आशु सिन्हा इससे अलग राय रखते हैं. आशु टेलिकॉम सेक्टर पर लंबे समय से लिखते आए हैं और वरिष्ठ पत्रकार हैं.

उनके मुताबिक़ वोडाफ़ोन अब भारत में टेलिकॉम गेम से बाहर निकल चुका है. ये सच है कि केंद्र सरकार उसे मरने नहीं देगी. इससे देश के बाहर संदेश अच्छा नहीं जाएगा. कंपनी की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है. अब पूरी तरह से केंद्र सरकार पर निर्भर करता है कि वो उन्हें कितने दिन की मोहलत देती है.

भारत के सुप्रीम कोर्ट ने वोडाफ़ोन और एयरटेल से कहा है कि वे लाइसेंस फ़ीस और ब्याज के रूप में लगभग 83,000 करोड़ रुपए की रक़म अदा करें.

एयरटेल के बारे में आशु कहते हैं, "एयरटेल ने अफ़्रीका में प्रसार के लिए तैयारियां कर ली है. उनका रनवे तैयार है, बस टेकऑफ़ करने की देर है. अफ़्रीका में विस्तार ही उनका सबसे बड़ा ग्रोथ फ़ैक्टर होने वाला है."

फ़ेसबुक और रिलांयस की ख़बर आने के बाद से शेयर बाज़ार की बात करें तो रिलायंस जियो, जो रिलायंस इडंस्ट्री का हिस्सा है, उसके शेयर 10 फ़ीसदी ऊपर है. आइडिया का 5.50 फ़ीसदी ऊपर है और भारती एयरटेल का तक़रीबन 2 फ़ीसदी ऊपर खुला है.

जाहिर है इस ख़बर को शेयर बाज़ार से अच्छा रेस्पॉंस मिला है.

वोडाफ़ोन आइडिया

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रीटेल सेक्टर पर असर

मुकेश अंबानी ने इस मौक़े पर जारी किए गए वीडियो बयान में ये भी कहा है कि जियो मार्ट- जियो का नया ई-कॉमर्स प्लेटफ़ॉर्म है. ये वॉट्सऐप के साथ मिल कर तक़रीबन 3 करोड़ लोकल किराना दुकानों की आने वाले दिनों में तस्वीर बदल कर रख देंगे.

अब आसानी से आप रोज़मर्रा के इस्तेमाल की चीज़ों को इन दुकानों से ना सिर्फ़ ऑर्डर कर पाएंगे, बल्कि ख़रीद पाएंगे और भुगतान भी कर पाएंगे. इससे डिलीवरी भी जल्दी होगी, दुकानों पर जाने की झंझट भी नहीं होगी. लोकल किराना स्टोर को भी अपना बिज़नेस बढ़ाने में मदद मिलेगी.

फ़ेसबुक ने भी अपने बयान में कहा है कि हमारा लक्ष्य सभी तरह के व्यवसाय के लिए नए अवसर मुहैया कराना है लेकिन ख़ासतौर पर पूरे भारत में फैले 6 करोड़ से अधिक छोटे व्यवसायों को सक्षम बनाना. क्योंकि ये छोटे व्यवसाय ही देश में ज़्यादातर नौकरियों के लिए उत्तरदायी होते हैं.

ज़ाहिर है जब दुनिया में हर जगह नौकरी जाने की बात चल रही है उस पर कोई कंपनी नौकरी के नए अवसर खोलने की बात कर रही है, तो इससे मार्केट को गति मिलेगी.

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लेकिन आशु के मुताबिक़ दोनों कंपनियों ने ये नहीं बताया कि इसके लिए उपभोक्ता से वो कितना चार्ज करेंगे. ज़ाहिर है जब दो कंपनियां आपका सामान घर तक पहुंचाएँगी, किराना वालों को ऐप देंगी, तो उसकी एवज़ में आपसे कुछ लेंगी भी.

इसलिए पूरी प्रक्रिया जब तक सामने नहीं आ जाती, थोड़ा इंतज़ार करने की ज़रूरत है.

आशु के मुताबिक़ पूरी डील को कुछ इस तरीक़े से समझा जा सकता है. "कल के डेटा प्लेटफ़ॉर्म के लिए, जहां सभी छोटी और बड़ी कंपनी बिज़नेस कर सकती है उसकी ये तैयारी है. जियो चाहता है कि चाहे आपके पड़ोस का किराना शॉप हो या फिर मॉल की बड़ी दुकान, सब उसके प्लेटफ़ॉर्म का इस्तेमाल करें, जिससे वो सब से एक-एक रुपए कमाई कर सके और मुनाफ़ा कमा सके."

रोज़गार के अवसर

तो क्या इस इंवेस्टमेंट से रोज़गार के नए अवसर खुलेंगे?

महेश उप्पल का मानना है कि नए स्टार्ट अप इस डील का सबसे बेहतर फ़ायदा उठा पाएंगे. आने वाले दिनों में शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र में डिजिटल तकनीक का इस्तेमाल कर लोगों को फ़ायदा पहुंचाने वाले कई नए स्टार्ट-अप मार्केट में आएंगे. और इस डील से उन्हें फ़ायदा पहुंचेगा.

कोरोना वायरस के इस दौर में जब स्कूल कॉलेज पढ़ाई के लिए टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल शुरू कर रहे हैं, एक्स-रे जैसे काम में, डॉक्टरों को ट्रेनिंग देने में जब तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है, ज़्यादा से ज़्यादा लोग वर्क फ़रॉम होम कर रहें हैं, और इन सबमें डेटा और नेटवर्क का इस्तेमाल हो रहा है. साफ़ है भारत ही नहीं पूरी दुनिया अब 'डिजिटल सोसाइटी' की तरफ़ बढ़ रही है. इस सोसाइटी की ज़मीन तैयार करने में ये डील एक अहम पड़ाव साबित होगा.

प्रतीकात्मक तस्वीर

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अर्थव्यव्स्था के जानकार प्रांजल शर्मा मानते हैं कि इस समय ये कहना मुश्किल है कि इससे कितने रोज़गार के नए अवसर खुलेंगे. अभी दोनों कंपनियों ने केवल एक बड़ा ख़ाका ही तैयार किया है.

प्रांजल के मुताबिक़ ये स्पष्ट है कि छोटे और मध्यम वर्ग के व्यापारियों को इससे राहत और सहूलियत मिलेगी. कई लोग कोविड-19 की वजह से परेशान हैं और माली हालात ख़राब है. उन कंपनियों को इस नई पहल से फ़ायदा पहुंचेगा.

लेकिन वो साथ ही जोड़ते हैं कि लोगों को डिजिटाइज़ेशन के लिए तैयार होने की ज़रूरत होगी. ये आवश्यक बदलाव है, इसके लिए हमें भी टेक्नोलॉजी के साथ ख़ुद को भी बदलने की ज़रूरत होगी. थोड़ा समय लगेगा. लेकिन समय कम है, इसको जल्दी करना होगा और बड़े पैमाने पर करना होगा. नहीं तो काफ़ी लोग पीछे छूट जाएंगे.

प्रांजल इस पूरे इंवेस्टमेंट को दो तरीक़ों से देखने की बात करते हैं. उनके मुताबिक़ किराना वाले ख़ुद सामान ख़रीदते हैं और दूसरो को बेचते हैं. अगर ख़रीदने में वो पैसे बचाएंगे, तो मुनाफ़ा ज़्यादा कमा पाएंगे. उस लिहाज़ से ये इंवेस्टमेंट उनके लिए मददगार साबित होगा.

डील से चिंता

स्मार्टफ़ोन

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टेलिकॉम और रीटेल सेक्टर में तमाम अच्छी ख़बरों के बीच जानकार मानते हैं कि इस इंवेस्टमेंट से थोड़ा चिंतित होने की भी ज़रूरत है.

भारत में डेटा प्रोटेक्शन पर कोई ठोस क़ानून नहीं हैं और ना ही प्राइवेसी के मसले पर. दोनों कंपनियां जब साथ में भारत में किसी एक क्षेत्र में बड़ी क्रांति लाने की बात कर रही हैं, तो सवाल ये भी उठता है कि जो भी जानकारियां उपभोगताओं द्वारा कंपनी से साझा की जाएंगी, उसका इस्तेमाल कब, कहां और किस तरीक़े से होगा - इसमें भी पारदर्शिता लाई जाए.

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