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भारत में लोगों की कहीं भी थूक देने की आदत क्या कभी दूर हो सकती है?
- Author, अपर्णा अल्लूरी
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
इस गुज़रते साल की शुरुआत में राजा और प्रीति नरसिम्हा ने सड़क के रास्ते पूरा भारत घूमने की शुरुआत की थी. लेकिन वो सिर्फ़ घूमने के लिए नहीं निकले थे, उनके पास एक लक्ष्य भी था. लक्ष्य... एक ज़रूरी संदेश को देश के हर कोने तक फैलाने का.
'सार्वजनिक जगहों पर थूकना बंद करें', यही संदेश लेकर वह भारत की सड़कों पर निकल पड़े थे.
ये संदेश ज़्यादा से ज़्यादा लोगों के कानों तक पहुंचे इसके लिए उन्होंने एक लाउडस्पीकर भी साथ रखा था. जिस कार में बैठकर वो भारत को यह संदेश देने निकले थे, वो कार भी एंटी-स्पिटिंग स्लोगन्स (सार्वजनिक जगहों पर थूकने के विरोध में लिखे स्लोगन्स) से कवर थी.
अगर आपने कभी भी भारत में समय गुज़ारा है या अगर आप भारत के ही रहने वाले हैं तो आपको यह समझने में देर नहीं लगेगी कि यह जोड़ा कितने ज़रूरी संदेश को लेकर निकला.
भारत में थूक से लाल हुई दीवारें और सड़कें बहुत सामान्य बात है. कई बार सामान्य पीक, कभी पान-गुटका-सुपारी खाकर थूकी गई पीक दीवारों और भवनों की शोभा बढ़ाते दिखते हैं. लेकिन ये सिर्फ़ दीवारों और सड़कों तक सीमित नहीं है. कोलकाता का ऐतिहासिक हावड़ा ब्रिज भी इससे अछूता नहीं है.
इन लाल रंगी इमारतों, सड़कों और दीवारों की हालत देखने के बाद ही इस जोड़े ने इस यात्रा को करने की ठानी. ताकि लोगों को जागरूक किया जा सके.
नरसिम्हा पुणे शहर में रहते हैं. वे साल 2010 से ही सार्वजनिक जगहों पर थूकने की इस समस्या से निपटने के लिए काम कर रहे हैं.
वे किसी संस्था से नहीं जुड़े हैं, वे सेल्फ़-अप्वॉयंटेड वॉरियर्स हैं. वे लोगों को जागरूक करने के लिए वर्कशॉप करते हैं, ऑनलाइन और ऑफ़लाइन कैंपेन चलाते हैं, स्थानीय नगर पालिका के साथ मिलकर साफ़-सफ़ाई के काम में सहयोग करते हैं.
नरसिम्हा भारत में थूकने की आदत का ज़िक्र करते हुए कहते हैं कि यह समस्या इतनी बड़ी है कि एक बार उन लोगों ने पुणे रेलवे स्टेशन पर पीक से लाल हो चुकी दीवार को रंगा ताकि वो जगह साफ़ दिखने लगे लेकिन महज़ तीन दिन बाद लोगों ने दोबारा उस दीवार को थूक-थूककर पहले जैसा कर दिया.
कोरोना महामारी की लहर
वह कहते हैं, दीवार पर थूकने की कोई वजह नहीं है लेकिन फिर ना जाने लोग क्यों...
वह बताते हैं कि उनकी नसीहतों पर कई तरह की प्रतिक्रियाएं उन्हें मिलती हैं. कुछ लोग उनकी नसीहतों के प्रति उदासीन बने रहते हैं और कुछ लोग कभी-कभी नाराज़ तक हो जाते हैं.
राजा नरसिम्हा एक शख़्स का ज़िक्र करते हुए कहते हैं कि एक बार एक आदमी इस क़दर नाराज़ हो गया था कि उसने मुझे कहा था, "तुम्हारी दिक़्क़त क्या है? क्या यह तुम्हारे पिता की सड़क है?"
प्रीति नरसिम्हा कहती हैं, "हालांकि भारत में कोरोना महामारी की लहर ने काफी कुछ चीज़ें बदल दी हैं. जो लोग सड़कों पर और सार्वजनिक जगहों पर थूका करते थे, उनमें से कुछ ने माफ़ी तक मांगी है."
उनका कहना है, "महामारी के डर ने लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया है."
'एक थूकने वाला देश'
भारत में सड़कों पर थूकने के ख़िलाफ़ अभियान और प्रयास तो कई बार हुए लेकिन उनमें हमेशा ही कुछ ना कुछ कमी रही ही. मुंबई शहर ने इस दिशा में सबसे सख़्त क़दम उठाकर इसे रोकने की कोशिश की है.
उन्होंने लोगों से आगे आकर वॉलेंटियर करने को कहा और 'उपद्रव-निरीक्षकों' की नियुक्ति की.
ये निरीक्षक लोगों को सड़क पर या सार्वजनिक जगहों पर ना थूकने, कूड़ा ना फेंकने और पेशाब नहीं करने के लिए समझाते हैं और ऐसा करने वालों को रोकते हैं.
लेकिन इस सच्चाई से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता है कि सार्वजनिक जगहों पर थूकने के अपराध को लंबे समय से नज़रअंदाज़ किया जाता रहा है.
कोविड महामारी ने काफी कुछ बदल दिया
बीते साल जब महामारी ने भारत में दस्तक दी और ये कहा गया है कि कोरोना एयरबोर्न है तो भारतीयों के जहां-तहां थूकने की आदत पर ख़तरा सा मंडराने लगा.
आपदा प्रबंधन अधिनियम के तहत तमाम तरह के नियम बनाए गए और अधिकारियों ने सार्वजनिक जगहों पर थूकने वालों के ख़िलाफ़ कठोर कार्रवाई का प्रावधान कर दिया, जुर्माना लगाया गया और थूकने पर जेल तक जाने का नियम बना दिया गया.
यहां तक की ख़ुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों को अपने संबोधन में कहा कि वे सार्वजनिक जगहों को साफ़ रखें और इधर-उधर थूकें नहीं.
उन्होंने यह भी कहा कि ये ऐसा कुछ नहीं है जिसके बारे में हमें पहले से पता नहीं था. "हम हमेशा से जानते थे कि गलत था."
यह साल 2016 में स्वास्थ्य मंत्री के दिये एक बयान का बिल्कुल उलट था.
जब तत्कालिक स्वास्थ्य मंत्री ने थूकने की आदत से जुड़े एक सवाल का जवाब देते हुए संसद को बताया था, "सर, भारत एक थूकने वाला देश है. जब हम ऊब जाते हैं तो हम थूकते हैं, जब हम थक जाते हैं तब हम थूकते हैं, जब हम गुस्से में होते हैं तब हम थूकते हैं और हम जब कुछ नहीं भी होता है तब भी थूकते हैं. हम जहां कहीं भी थूकते हैं और हम हर समय यहां तक की वक़्त-बेवक़्त भी थूकते हैं."
उनका यह जवाब बिल्कुल सही भी था.
भारत की सड़कों पर थूका जाना बहुत सामान्य सी बात है. सड़क किनारे मौज-मस्ती कर रहे या सड़क पर चल रहे मर्द बेहद सामान्य और लापरवाही भरे अंदाज़ में अपना सिर कुछ इंच नीचे झुकाते हैं और मुंह में उस समय भरी सामग्री को लार समेत झटके से सड़क पर उगल देते हैं.
कार चलाने वाले, बाइक चलाने वाले, ऑटो रिक्शा चलाने वाले और हर वो वाहन जो सड़क पर चलते है, उसे चलाने वाले ज़्यादातर लोग ऐसा ही व्यवहार करते हैं और सबसे अजीब यह है कि ऐसा करते समय उन्हें ज़रा सी भी हिचकिचाहट नहीं होती है.
अच्छा थूकने से पहले वो अपना गला साफ़ करते हैं और वो भी खखारने की आवाज़ के साथ, मानो थूक को न्योता दे रहे हों कि आओ श्रीमान अब तुम्हें तुम्हारी आख़िरी मंज़िल पर छोड़ने का समय आ गया है.
कई लोग इसे मर्दाना व्यवहार भी मानते हैं.
स्तंभकार संतोष देसाई का मानना है कि भारतीय पुरुष अपने शरीर को लेकर बेहद सहज हैं और उस थूक को लेकर भी, जिसे वे बिना किसी असहजता के या फिर संकोच के अपने मुंह से उड़ेल देते हैं.
भारतीय समाचार पत्र द टेलीग्राफ़ के एसोसिएट एडिटर उद्दालक मुखर्जी कहते हैं, "थूक भी "स्वैग" का एक रूप है जो टॉक्सिस मस्क्युलिनिटी (विषाक्त मर्दानगी) को बढ़ावा देता है.
लेकिन सार्वजनिक जगहों पर थूकें ही क्यों?
नरसिम्हा कहते हैं कि उन्हें जो लगता है इसके पीछे गुस्से से लेकर टाइम-पास तक के कई कारण हो सकते हैं. क्योंकि उनके पास कई बार करने के लिए कुछ विशेष नहीं होता है तो भी मुंह में पान-गुटका-सुपारी जैसा कुछ डाल, चबाया और थूका. इसके अलावा एक वजह ये भी हो सकती है कि "उन्हें लगता है कि थूकना उनका अधिकार है."
कुछ इतिहासकार यह भी मानते हैं कि इस जुनून का पता हिंदू और उसमें भी ख़ासतौर पर उच्च जाति के लोगों में व्याप्त इस धारणा से लगाया जा सकता है कि जो कुछ भी गंदा है उसे बाहर ही त्याग करके घर में प्रवेश करना है.
मुखर्जी के मुताबिक़, "थूकने की आदत का संबंध सिर्फ़ स्वच्छता से कहीं बढ़कर है."
वह बताते हैं कि एक बार एक टैक्सी ड्राइवर ने इसके पीछे वजह देते हुए कहा था कि उसका दिन ख़राब गया था और वो उस दिन के बुरे अनुभव को अपने मन में नहीं रखना चाहता था, इसलिए थूक दिया.
थूकने के ख़िलाफ़ मुहिम
ऐसा पता चलता है कि एक ऐसा दौर भी था जब हर जगह के लोग, हर ओर थूका करते थे. भारत में शाही दरबारों में थूका जाता था और कई घरों में भी पीक दान या थूकदान का चलन हुआ करता था.
यूरोप में मध्य युग में, आप भोजन के दौरान थूक सकते थे लेकिन तभी तक जब तक वह मेज़ के नीचे रहे.
इरास्मस लिखते हैं कि अपने स्लाइवा को दोबारा खींचना अशिष्ट और असभ्य माना जाता था.
साल 1903 में ब्रिटश मेडिकल जरनल ने अमेरिका को दुनिया के उन देशों की सूची में रखा जहां सबसे अधिक थूका जाता हो.
मैसाचुसेट्स के एक स्वास्थ्य निरीक्षक ने 1908 में यह पूछने पर कि जिन भी फ़ैक्ट्रियों का उन्होंने निरीक्षण किया है उनमें से प्रत्येक फ़ैक्ट्री में दर्जी फ़र्श पर क्यों थूकते हैं, तो इसके जवाब में उन्होंने कहा था कि "बेशक वे फ़र्श पर थूकते हैं तो क्या आप उनसे उम्मीद करते हैं कि वे अपनी जेब में थूकें?"
लेकिन यह आदत सुधरना कैसे शुरू हुई
लेकिन ऐसा नहीं है कि ब्रिटेन में चीज़ें अपने शानदार स्वरूप में थीं. वहां भी ट्राम कारों में थूका जाना सामान्य था. हालांकि इसके लिए जुर्माने का प्रावधान था और स्वास्थ्य समुदाय लगातार इसके ख़िलाफ़ क़ानून लाने की मांग कर रहा था.
यह वो समय था जब टीबी का प्रकोप बढ़ता जा रहा था और यही वो वजह बनी जिसके कारण पश्चिमी देशों में इस आदत को झटका लगा.
आने वाली किताब फ़ैंटम प्लेग: हाऊ ट्यूबरक्युलोसिस शेप्ड हिस्ट्री की लेखिका और पत्रकार विद्या कृष्णन कहती हैं कि 19वीं सदी के आख़िरी दौर से 20वीं सदी के शुरुआती समय में रोगाणु सिद्धांत के बारे में लोगों में बढ़ी जागरूकता ने इस संबंध में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
"रोगाणुओं का प्रसार कैसे होता है और उनके जुड़ी जागरूकता ने नई सामाजिक आदतों को बढ़ावा दिया. लोगों ने छींकने से पहले मुंह पर हाथ रखना या रूमाल रखना जैसी आदतें अपनायीं, हाथ मिलाने की जगह वेव करना शुरू किया और बच्चों को ना चूमने जैसी सामान्य बातों को आदत में शुमार किया. स्वच्छता को लेकर जो आदतें एक समय तक घर तक ही सीमित थीं वे सार्वजनिक जगहों पर भी अपनायी जाने लगीं."
विद्या कृष्णन कहती हैं कि इस जागरूकता ने पुरुषों में व्यवहार परिवर्तन को बढ़ाया. क्योंकि उस समय और आज भी सार्वजनिक रूप से जो लोग थूकते हैं वे कई तरह के रोगाणुओं के प्रसार के कारण बनते थे औऱ आज भी ऐसे लोग कई संक्रामक रोगों के रोगाणुओं के प्रसारक होते हैं.
भारत में क्या हैं चुनौतियां
लेकिन भारत में समस्या सिर्फ़ इतनी नहीं है. यहां चुनौतियां कई हैं.
विद्या कृष्णन कहती हैं कि भारत के राज्यों ने अपने स्तर पर इस बुरी आदत को ख़त्म करने के लिए बहुत कोशिश कभी नहीं की और यहां सार्वजनिक तौर पर थूकना अभी भी स्वीकार्य है.
नरसिम्हा आधुनिक स्पिटून्स (पाकदान) की कमी पर अफ़सोस जताते हैं.
वह कहते हैं, "मान लीजिए अगर मुझे थूकना भी है तो कहाँ थूकूँ?"
वह अपने बचपन के दिनों को याद करते हुए कहते हैं, "मुझे याद है मेरे बचपन के समय में कोलकाता में थूकने के लिए रेत से भरे लैम्पपोस्ट हुआ करते थे, जो अब नज़र नहीं आते हैं और ऐसे में लोग भी जहां दिल किया थूक देते हैं."
लेकिन यह एकमात्र चुनौती नहीं है. इसके ख़ात्में के रास्ते में और भी कई और बड़ी चुनौतियां हैं.
विद्या कृष्णन कहती हैं, "वो चाहे बड़े पैमाने पर व्यवहार परिवर्तन की बात हो या फिर सार्वजनिक स्वास्थ्य हस्तक्षेप की हम जाति, वर्ग और लिंग को दरकिनार नहीं कर सकते हैं."
वह कहती हैं, "भारत में, बाथरूम मिल जाना, नल में पानी मिल जाना और जल-निकासी की समुचित व्यवस्था मिल जाना बहुत बड़ी बात है."
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि सार्वजनिक तौर पर थूकने वालों को दंडित करके इस जंग को नहीं जीता जा सकता है जब तक कि हम यह नहीं समझ लें कि वे थूकते क्यों हैं. जब तक कारण का पता नहीं चलेगा तब तक यह लड़ाई नहीं जीती जा सकती है.
हालांकि राजा और प्रीति अपने मिशन को लेकर अडिग हैं.
राजा नरसिम्हा कहते हैं, "हो सकता है कि कुछ लोगों को लगता हो कि हम समय बर्बाद कर रहे हैं लेकिन हम कोशिश जारी रखेंगे. अगर हम दो फ़ीसद लोगों की सोच में भी बदलाव ला सके तो यह एक बड़ी कामयाबी होगी."
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