You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
कर्नाटक चुनाव: घोषणापत्र में सैनिटरी नैपकिन पर क्यों उठ रहे हैं सवाल?
- Author, इमरान कुरैशी
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
कर्नाटक में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं. कांग्रेस-भाजपा दोनों ही पार्टियों ने अपने घोषणापत्र में मुफ़्त सैनिटरी नैपकिन देने का वादा किया है.
ऐसा लग रहा है जैसे मुफ़्त सैनिटरी नैपकिन देने का वादा करके पार्टियां ग्रामीण इलाक़े की महिलाओं को लुभाने की कोशिश कर रही हैं.
पहले कांग्रेस और अब बीजेपी ने अपने घोषणापत्र में ग़रीबी रेखा से नीचे रहने वाले परिवार की महिलाओं और छात्राओं को फ्री में सैनिटरी पैड देने का वादा किया है.
सैनिटरी नैपकिन पर जीएसटी
एक ओर जहां बीजेपी मुफ़्त सैनिटरी नैपकिन देने की घोषणा कर रही है वहीं केंद्र की बीजेपी सरकार ने जब सैनिटरी नैपकिन पर 12 प्रतिशत जीएसटी लगाया था, तो उसके इस फ़ैसले का देशभर में विरोध हुआ था.
हालांकि कर्नाटक के ग्रामीण इलाकों में ज़मीनी स्तर पर महिलाओं और स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम करने वाले लोग मानते हैं कि ये बेदह हास्यास्पद है.
कर्नाटक में हेल्थ मूवमेंट की सह-संयोजक डॉ. अखिला कहती हैं, "घोषणापत्र का हिस्सा होने पर भी इसमें खुशी मनाने जैसा कुछ नहीं. पहले आप सैनिटरी नैपकिन पर जीएसटी लगाते हैं और फिर इसे मुफ़्त में देते हैं. इससे महिलाओं की स्वच्छता के प्रति आपके निरर्थक वादों का पता चलता है."
चलो इसी बहाने
कोपल में स्थित एनजीओ अंगदा के लिए काम करने वाली ज्योति हितनल का कहना है, ''ये सब हास्यास्पद लगता है कि अचानक राजनीतिक पार्टी सैनिटरी नैपकिन को लेकर इतनी सक्रिय हो गई है. ये एक ऐसा विषय है जो आज भी टैबू बना हुआ है. महिलाओं के लिए क्या स्वास्थ्यवर्धक है, इसे जाने बिना ही आप किसी चीज़ का वादा कर रहे हैं.''
डॉ अखिला कहती हैं, ''सैनिटरी पैड की पेशकश करना एक बात है. लेकिन क्या सरकार ने सरकारी स्कूलों के टॉयलेट में पानी की उपलब्धता को सुनिश्चित किया है. सत्ता में लोग मासिक धर्म जैसे विषय पर संरचनात्मक और सांस्कृतिक मुद्दों पर बात ही नहीं करते हैं. इसके साथ ही सैनिटरी पैड के डिस्पोज़ल का भी सवाल उठता है.''
हितनल ने सरकारी स्कूल में कर्नाटक सरकार के मुफ़्त में सैनिटरी पैड बांटने की शुरुआत पर ध्यान दिलाया. ''सरकार इस निष्कर्ष पर कैसे पहुंची कि एक लड़की को केवल 10 ही पैड की जरूरत होती है. और वे सारे पैड हैं कहां? ये सब किसी स्टोर रूम या सरकारी स्कूल के कमरे में पड़े होंगे.''
'लुभाने की कोशिश'
लेकिन कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) की एम. नीला इन मुद्दों पर कुछ अलग राय रखती हैं.
वे कहती हैं, ''जीएसटी के बाद ही सही लेकिन इस मुद्दे को टैबू की तरह मानने और बात न करने के बजाय ये अच्छा है. राजनीतिक दलों को कम से कम लगा तो सही कि ये भी एक मुद्दा है. कम से कम अब उनको अकल तो आई.''
डॉ. अखिला का भी मानना है कि इससे कम से कम कुछ अच्छा हो सकता है.
वे कहती हैं, ''कई जगह महिलाओं और लड़कियों के लिए ये एक हाइजीन प्रॉजक्ट है. शायद हमें इसे अर्थपूर्ण बनाना चाहिए.''
अखिल भारत जनवादी महिला संगठन की केएस विमला का कहना है, "हर बार जब वे एक घोषणापत्र तैयार करते हैं, तो वे महिला मतदाताओं को लुभाने के लिए कुछ नया सोचते हैं."
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)