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मोदी के 'आत्मनिर्भर भारत अभियान' में स्वदेशी कहां हैं?
- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने हालिया संबोधन में 'एक आत्मनिर्भर भारत के निर्माण' का वादा किया है.
पीएम मोदी का 'आत्मनिर्भर भारत अभियान', उनकी पार्टी की मूल अवधारणा के अनुसार एक महत्वकांक्षी परियोजना है जिसका उद्देश्य सिर्फ़ कोविड-19 महामारी के दुष्प्रभावों से लड़ना नहीं, बल्कि भविष्य के भारत का पुनर्निर्माण करना है.
मंगलवार शाम के अपने संबोधन में पीएम मोदी ने कहा, "अब एक नई प्राणशक्ति, नई संकल्पशक्ति के साथ हमें आगे बढ़ना है."
वे बोले, "हाल में सरकार ने कोरोना संकट से जुड़ी जो आर्थिक घोषणाएं की थीं, जो रिज़र्व बैंक के फ़ैसले थे और आज जिस आर्थिक पैकेज का ऐलान हो रहा है, उसे जोड़ दें तो ये क़रीब-क़रीब 20 लाख करोड़ रुपये का है. ये पैकेज भारत की जीडीपी का क़रीब-क़रीब 10 प्रतिशत है. 20 लाख करोड़ रुपये का ये पैकेज, 2020 में देश की विकास यात्रा को, आत्मनिर्भर भारत अभियान को एक नई गति देगा."
भारत में 'स्वदेशी' एक विचार के रूप में देखा जाता है, जो भारत की संरक्षणवादी अर्थव्यवस्था का आर्थिक मॉडल रहा और राष्ट्रवादी तबक़ा इस विचार की वकालत भी करता रहा है, लेकिन पीएम मोदी ने अपने भाषण में कहीं भी 'स्वदेशी' शब्द का इस्तेमाल नहीं किया.
जबकि आत्म-निर्भर भारत बनाने का पीएम मोदी का विचार 'स्वदेशी' के काफ़ी क़रीब दिखता है और उन्होंने अपने संबोधन में खादी ग्राम उद्योग के उत्पादों की अच्छी बिक्री का ज़िक्र भी किया.
दशकों तक, भारतीय अर्थव्यवस्था दुनिया के लिए खुली नहीं थी. बाहरी दुनिया पर संदेह और आत्मविश्वास में कमी भी थी. पिछली शताब्दी के अंतिम चार दशकों के भारत ने स्वदेशी मॉडल पर भरोसा करते हुए पाँच साल की नियोजित अर्थव्यवस्था का अनुसरण किया और 2.5 से 3 प्रतिशत विकास दर के साथ वृद्धि की जिसे कभी 'विकास की हिंदू दर' के रूप में भी जाना जाता था.
अंत में, भारत को अपने आर्थिक संकटों की वजह से साल 1991 में बाहरी दुनिया के लिए अपने दरवाज़े खोलने पर मजबूर होना पड़ा.
आज भारत एक बार फिर 'आत्म-निर्भर' बनने के लिए भीतर की ओर देख रहा है. भले ही मोदी ने दावा किया है कि उनकी आत्म-निर्भरता वाली बात का मतलब दुनिया से कनेक्शन तोड़ लेना नहीं है, पर मोदी जो कह रहे हैं उसे निभा पाना आसान नहीं होगा, ख़ासतौर पर वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं के ऐसे दौर में, जब अमरीका के स्टॉक मार्केट की हर एक हलचल चीन और भारत के बाज़ारों पर सीधा असर डालती है.
इसके अलावा, स्थानीय उत्पादों का उत्पादन करने और उन्हें प्रतिस्पर्धा में खड़ा करने के लिए स्थानीय उद्यमियों और निर्माताओं को कुछ सुरक्षा राशि भी देनी होगी जिससे विश्व व्यापार संगठन के सदस्यों के साथ भारत का सीधा टकराव होगा.
हालांकि, बीजेपी के एक अंदरूनी सूत्र ने पीएम मोदी के आत्म-निर्भरता के दृष्टिकोण को बहुत अलग बताया.
उन्होंने कहा, "भारत के लिए पीएम मोदी के दृष्टिकोण में आत्मनिर्भरता ना तो बहिष्करण है और ना ही अलगाववादी रवैया. ज़ोर इस बात पर है कि दक्षता में सुधार किया जाये. इसके अलावा दुनिया के साथ प्रतिस्पर्धा करते हुए दुनिया की मदद करना मोदी सरकार का विचार है."
लेकिन 'स्वदेशी जागरण मंच' के अरुण ओझा कहते हैं कि "कोरोना महामारी के बाद आर्थिक राष्ट्रवाद' सभी देशों में आएगा."
आरएसएस से जुड़ी इस संस्था ने पीएम मोदी के आत्म-निर्भर बनने के विचार का स्वागत किया है.
अरुण ओझा ने कहा, "हम तो वर्षों से आत्म-निर्भरता और स्वदेशी मॉडल की वकालत कर रहे हैं."
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पहले से ही 'अमरीका फ़र्स्ट' यानी 'अमरीका को प्राथमिकता' की नीति का पालन कर रहे हैं और भारत अमरीका के साथ व्यापार या शुल्क आदि से संबंधित विवाद का सामना नहीं कर सकता.
डोनाल्ड ट्रंप 25 फ़रवरी को अपनी पहली भारत यात्रा के दौरान भारत की सीमा-शुल्क की दरों के बारे में सीधी बात कह चुके हैं. उन्होंने कहा था, "भारत में शायद दुनिया में सबसे अधिक टैरिफ़ हैं और इन्हें कम से कम अमरीका के साथ रोका जाना चाहिए."
चौंतीस मिनट के अपने संबोधन में मंगलवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि 'हमें लोकल चीज़ों को लेकर वोकल होना चाहिए.' यानी भारतीयों को स्थानीय चीज़ों के बारे में ज़्यादा बात करनी चाहिए, खुलकर बात करनी चाहिए.
एक नारे के रूप में यह सुनना बहुत अच्छा लगता है. आत्म-निर्भरता वैसे भी हर देश का एक वांछित सपना है. लेकिन इस काम के क्रियान्वयन में मोदी लड़खड़ा सकते हैं, जैसे उनके ख़ास प्रोजेक्ट 'मेक इन इंडिया' के संबंध में देखा गया.
भारत सरकार का 'मेक इन इंडिया' प्रोजेक्ट भारत को मैन्युफ़ैक्चरिंग का हब बनाने में विफल रहा है जो इस प्रोजेक्ट का घोषित उद्देश्य था.
जैसा कि कुछ आलोचकों ने कहा भी है कि "मोदी वादा कुछ ज़्यादा और डिलीवरी थोड़ी कम करते हैं."
प्रधानमंत्री ने अपने पूरे भाषण में 'देश को आत्मनिर्भर बनाने' पर सारा ज़ोर दिया, लेकिन उन्होंने इस बारे में कुछ स्पष्ट नहीं बताया कि इसे संभव कैसे किया जाएगा. उन्होंने कुछ संकेत ज़रूर दिये, जैसे उन्होंने कहा कि ये पाँच स्तंभों पर आधारित होगा: अर्थव्यवस्था, बुनियादी ढाँचा, प्रणाली, जीवंत लोकतंत्र और माँग.
पर क्या भारत में ये स्तंभ अच्छी स्थिति में हैं? क्या वे मज़बूत हैं?
अर्थव्यवस्था
आलोचक इन पाँच स्तंभों के स्वास्थ्य को लेकर बहुत उत्साहित नहीं हैं. 2.7 ट्रिलियन डॉलर की भारत की अर्थव्यवस्था 2 प्रतिशत से भी कम पर बढ़ रही है जो इस पीढ़ी की अब तक की सबसे कम वृद्धि दर है. ग्लोबल सप्लाई चेन कमज़ोर पड़ी है. वैल्यू चेन हैं लेकिन ऐसी नहीं है जो चीन के साथ प्रतिस्पर्धा कर सकें.
अर्थशास्त्रियों का कहना है कि भारत के पास करोड़ों ग़रीब लोगों को फिर खड़े करने का बहुत बड़ा काम है जो लॉकडाउन की वजह से वापस ग़रीबी-रेखा के नीचे चले गए हैं.
इन्फ़्रास्ट्रक्चर यानी बुनियादी ढाँचा
चीन के साथ प्रतिस्पर्धा करने के लिए या भारत में निवेश करने के लिए चीन स्थित विदेशी कंपनियों को आकर्षित करने के लिए भारत को विश्व स्तर के बुनियादी ढांचे का निर्माण करना होगा. भूमि, पानी और बिजली में सुधारों की ज़रूरत है.
भारत में विदेशी कंपनियों के लिए हमेशा से एक बाधा बुनियादी ढांचे की कमी रही है. आलोचकों का कहना है कि मोदी सरकार को अब तक 6 साल हो चुके हैं लेकिन इन्फ़्रास्ट्रक्चर के प्रोजेक्ट्स अभी भी पर्याप्त नहीं हैं. इन्फ़्रास्ट्रक्चर के प्रोजेक्ट्स में सालों लग जाते हैं और भारत के पास अब इतना समय नहीं है.
सिस्टम यानी प्रणाली
पीएम ने प्रौद्योगिकी के इष्टतम उपयोग की बात कही है. उनकी सरकार ने कुछ सही क़दम उठाये हैं जिसमें अत्याधुनिक तकनीक को अपनाना और समाज में डिजिटल तकनीक का उपयोग बढ़ाना शामिल है. यह अर्थव्यवस्था का चालक साबित हो सकता है.
वाइब्रेंट डेमोक्रेसी यानी जीवंत लोकतंत्र
विश्लेषकों का दावा है कि मोदी-काल में लोकतांत्रिक मूल्य बहुत हद तक मिट चुके हैं.
लेकिन लोकतंत्र भारत की मुख्य ताक़त है और जहाँ चीन भारत का मुक़ाबला नहीं कर सकता है.
वो उद्यमी और निर्माता जो लोकतंत्र, मानवाधिकार और बाल शोषण के उन्मूलन को महत्व देते हैं, वो साम्यवादी चीन के स्थान पर भारत के साथ डील करना चाहेंगे.
डिमांड यानी मांग
वास्तव में, भारत का घरेलू बाज़ार निवेशकों के लिए सबसे आकर्षक पेशकशों में से एक है.
वर्तमान में डिमांड हल्की है, लेकिन विश्लेषकों का कहना है कि कोविड-19 के बाद की दुनिया में एक बार फिर भारत को शुरुआत करनी होगी जिसके लिए कई छोटे और मध्यम उद्यमियों को सरकारी प्रोत्साहन की आवश्यकता होगी.
और अच्छी ख़बर ये है कि पीएम मोदी भी इस बात को मान रहे हैं कि आत्म-निर्भरता केवल एसएमई (छोटे और मझौले उद्योगों) की मदद से ही हासिल की जा सकती है.
मोदी सरकार 'देश के आत्म-निर्भरता' के लक्ष्य को हासिल करने के लिए बुधवार से एक अभियान शुरू कर रही है.
इसमें बड़े नेताओं के साथ-साथ तालुक़ा स्तर के पार्टी सदस्यों को भी शामिल किया जा रहा है जो सोशल मीडिया पर पीएम के संदेश को प्रसारित करने और टीवी समाचार चैनलों पर साक्षात्कारों में दिखाई देंगे.
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