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खुले में शौच से क्या वाक़ई मुक्त हुआ ग्रामीण भारत
- Author, शादाब नज़्मी
- पदनाम, बीबीसी
2 अक्तूबर 2019 को पीएम नरेंद्र मोदी ने कहा था, ''आज ग्रामीण भारत के गांवों ने खुद को खुले में शौच से मुक्त कर दिया है.''
पीएम मोदी ने जब ये बात कही तो इस दावे का जमकर प्रचार हुआ. लेकिन एनएसओ सर्वे में इसी संदर्भ में कुछ नई बातें सामने आई हैं.
एनएसओ के नए सर्वे 'भारत में पेय जल, स्वच्छता और घरों की हालत' में दावा किया गया है कि ग्रामीण भारत के सिर्फ़ 71.3 फ़ीसदी घरों में शौचालय की सुविधा है. ये दावा सरकार के दावे से बिलकुल उलट है.
हालांकि यहां इस बात का ज़िक्र करना ज़रूरी है कि जुलाई-दिसंबर 2012 के एनएसओ सर्वे के मुकाबले इस बार शौचालयों की संख्या में इजाफ़ा हुआ है.
तब ग्रामीण भारत के सिर्फ़ 40.6 फ़ीसदी घरों की शौचालयों तक पहुंच थी. यानी बीते सात सालों में क़रीब 30 फ़ीसदी की वृद्धि.
सरकार के मुताबिक़, ओडीएफ में खुले में शौच से मुक्त किए जाने की प्रक्रिया के दो क़दम है.
पहला- स्थानीय निकायों का खुद से ऐलान करना. दूसरा- मंत्रालय के बनाए क्वालिटी काउंसिल ऑफ इंडिया की ओर से वेरिफ़िकेशन करना.
इस सर्वे में ऐसे शौचालयों वाले घरों की हालत को भी बताया गया है, जिनके कुछ सदस्यों ने कभी उस शौचालय का इस्तेमाल नहीं किया.
ग्रामीण इलाक़ों में 3.5 फ़ीसदी और शहरी इलाक़ों के 1.7 फ़ीसदी घर के सदस्यों ने कभी शौचालय का इस्तेमाल नहीं किया.
एनएसओ का सर्वे जुलाई और दिसंबर 2018 के बीच किया गया था, जिसमें ग्रामीण और शहरी इलाक़ों में घरों के शौचालयों की क्वालिटी, पहुंच और इस्तेमाल के बारे में बताया गया.
ये दिलचस्प है कि ग्रामीण भारत में पुरुषों के मुक़ाबले औरतों ने ज़्यादा टॉयलेट का इस्तेमाल किया. 94.7 फ़ीसदी पुरुषों की तुलना में ग्रामीण इलाक़ों में 95.7 फ़ीसदी औरतों ने टॉयलेट का लगातार इस्तेमाल किया.
स्वच्छ भारत मिशन के मुताबिक़, नवंबर 2016 से नवंबर 2019 तक सात करोड़ टॉयलेट बनाए गए.
हालांकि एनएसओ के नए सर्वे में ये बात सामने आई है कि गांवों में एक चौथाई से ज़्यादा घर अब भी टॉयलेट की पहुंच से दूर हैं.
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