ART बिल कैसे करेगा नि:संतान कपल की मदद

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- Author, सुशीला सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
लोकसभा के बाद बुधवार को असिस्टेंट रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी (रेगुलेशन) बिल 2021 राज्यसभा में भी पारित हो गया है.
सरकार का कहना है कि महिलाओं के प्रजनन अधिकारों के सरंक्षण के मकसद से ये बिल लाया गया है.
सरकार के अनुसार भारत में ART सेंटरों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है.
ART सेंटर ने जहां इनफ़र्टिलिटी या बांझपन से जूझ रहे लोगों को उम्मीद दी है वहीं कई सामाजिक और वैधानिक सवाल भी उठाए हैं.
ART यानी कृत्रिम तकनीक की सहायता से प्रजनन. इसकी सहायता ऐसे दंपति लेते हैं जिन्हें सामान्यतौर पर बच्चा पैदा करने में परेशानियां आती हैं.
ART तकनीक में आईवीएफ़, इन्ट्रासाइटोप्लास्मिक स्पर्म इंजेक्शन यानी अण्डाणु में शुक्राणु का इंजेक्शन देकर फ़र्टिलाइज़ करना, शुक्राणु और ओवम (अण्डाणु) से प्रयोगशाला में भ्रूण तैयार करना और महिला के शरीर में इम्पलांट या डालना जैसी प्रक्रिया शामिल है.
वहीं इस बिल को लेकर चर्चा इसलिए भी है कि इसमें LGBTQ या समलैंगिक समुदाय के बारे में नहीं सोचा गया है.
इस बिल पर लोकसभा में तीन घंटे तक बहस चली और फिर ये ध्वनि मत से पारित हो गया.
इस बिल पर बोलते हुए केंद्रीय स्वास्थ्य और कल्याण मंत्री डॉक्टर मनसुख मांडविया ने कहा कि इससे पहले ये बिल सिंतबर 14, 2020 में लोकसभा में लाया गया था जिसके बाद इस बिल को स्टेंडिंग कमेटी के पास भेजा गया था.
बिल की आवश्यकता क्यों?

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इस बिल पर विचार-विमर्श करने के बाद कमेटी ने सुझाव दिए जिन्हें बिल में शामिल किया गया है.
केंद्रीय मंत्री मांडविया ने कहा कि इस बिल के कई पहलू हैं और इसे लाना ज़रूरी था.
उनका कहना था, ''इस बिल को लाने की आवश्यकता इसलिए हुई क्योंकि देश में कई ऐसे क्लीनिक चल रहे हैं जिन्हें रेगुलेट करने की ज़रूरत थी क्योंकि कई बार महिला को ओवेरियन स्टीमूलेशन यानी ज़्यादा अण्डाणु बनाने के लिए इंजेक्शन दिए जाते हैं जिससे महिला के स्वास्थ्य पर भी प्रभाव पड़ता है. साथ ही एग रिट्रिवल की प्रक्रिया, आईवीएफ़ और इंट्रायूटरिन या अंतर्गर्भाशयी, इन्सेमनेशन या वीर्य सेचन की प्रक्रिया होती है. वहीं भ्रूण हस्तांतरण और भ्रूण को रखने के लिए बैंकिंग की व्यवस्था होती है. और इन सभी को रेगुलेट करने के लिए ये बिल लाया गया है.

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साथ ही उनका कहना था कि महिलाओं के अण्डाणु का व्यावसायिक इस्तेमाल करने की शिकायतें आ रही थीं. उन्होंने आगे संसद में बताया कि एक ऐसा मामला भी आया जिसमें इस तकनीक से 74 साल की महिला ने बच्चे को जन्म दिया, लेकिन ऐसी प्रैक्टिस न हो और ये एक उद्योग का रूप ना ले इसलिए इस बिल को लाना ज़रूरी था.
उनका कहना था कि सेक्स सिलेक्शन और गेमेट की मिक्सिंग की ख़बरें आ रही थीं जैसे गोरा बच्चा चाहना आदि, ऐसी चीज़ों को रोकना ज़रूरी है.
इस बिल पर डॉक्टर एस एन बसु का कहना है,'' इस क्षेत्र में काम काफ़ी अनियंत्रित तरीके से चल रहा था, ऐसे अनुभव सामने आ रहे थे और कोई दिशानिर्देश नहीं थे. इस बिल को लाना इसलिए भी अहम था ताकि नीतिपरक प्रैक्टिस हो और क्लीनिक सही तरह से काम करें ताकि संतान के इच्छुक माता-पिता, होने वाले बच्चे और समाज को फ़ायदा हो.''
डॉक्टर बसु, आईसीएमआर की विशेषज्ञ निगरानी कमेटी की सदस्य रही हैं जो ART क्लीनिक और बैंक की राष्ट्रीय रजिस्ट्री के लिए बनाई गई थी.
इस बिल में कमीशनिंग कपल या इच्छुक माता-पिता और डोनर या दाता के लिए भी कई प्रावधान किए गए हैं.
क्या हैं प्रावधान?
ART की सेवाएं लेने के लिए महिलाओं और पुरुषों के लिए उम्र की सीमा भी तय की गई है. महिलाओं के लिए विवाह की क़ानूनी आयु 18 वर्ष और पुरुष की 21 वर्ष से अधिक होनी चाहिए और दोनों की ही उम्र 55 साल से कम होना ज़रूरी है.
वहीं दाता के लिए बिल में कहा गया है कि केवल 21-55 वर्ष की आयु के पुरुष का शुक्राणु लिया जा सकता है और 23-35 वर्ष की महिलाओं से अण्डाणु एकत्र किए जा सकते हैं.
एक अण्डाणु दाता विवाहित महिला होगी और उसका कम से कम तीन साल की उम्र का एक जीवित बच्चा होना चाहिए.
डोनर केवल एक बार दान दे सकता है और यहां डोनर से सात से ज़्यादा अण्डाणु नहीं लिए जा सकते हैं.
इस विधेयक में पहले से मौजूद आनुवंशिक रोगों के लिए भ्रूण जांच का प्रावधान है. साथ ही जांच भ्रूण प्रत्यारोपण से पहले भी की जा सकती है.

वकील राधिका थापर फ़र्टिलिटी लॉ केयर नाम का फ़र्म चलाती हैं जो फ़र्टिलिटी, महिला और बच्चों से जुड़े मुद्दों को देखती है.
वे मानती हैं कि इस क़ानून में अच्छाई और ख़ामियां दोनों हैं.
वे बताती हैं, ''ये बिल इनफ़र्टिलिटी पर केंद्रित है लेकिन इसका दायरा बढ़ाया जाना चाहिए जैसे अगर कोई महिला बाद में बच्चा चाहती है तो उसे एग फ़्रीज़ कराने की सुविधा होनी चाहिए या अगर कोई किसी बीमारी से पीड़ित है जैसे कैंसर तो उन्हें अपने एग या स्पर्म को संरक्षित करने का प्रावधान दिया जाना चाहिए. साथ ही अगर सात से ज़्यादा अण्डाणु निकाल लिए जाते हैं तो क्या सज़ा होगी?''
वे आगे कहती हैं जिस तरह से हम देख रहे हैं कि देर से शादी करने का चलन बढ़ा है या लोग देर से बच्चा चाहते हैं तो ऐसे में उनके लिए भी विकल्प खुले रहने चाहिए ताकि वो जब चाहे अभिभावक बन सकें.
सरोगेसी और ART में अंतर
सरोगेसी में एक दंपति जो नि:संतान हो या बच्चा पैदा करने में अक्षम हो, वे एक दूसरी महिला से मदद लेते हैं जिसे सरोगेट मदर कहा जाता है. ये सरोगेट मदर आईवीएफ़ तकनीक से इस दंपति का बच्चा पैदा करती है. सरोगेसी बिल भी लोकसभा में पारित हो चुका है. सरोगेसी बिल के अनुसार केवल एक शादीशुदा दंपति इसका लाभ ले सकता है. ये ART का ही एक विस्तार है.
वहीं ART में नि:संतान दंपति भी माता-पिता बन सकते हैं लेकिन यहां कोई तीसरा व्यक्ति अण्डाणु या शुक्राणु दान करता है. इसके बाद कमीशनिंग कपल या इच्छुक दंपति को बच्चा हो सकता है. लेकिन यहां उसी महिला के गर्भाशय का इस्तेमाल होता है जो इच्छुक माता-पिता हों.

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वहीं सिंगल वुमेन और भारतीय नागरिक भी ART का उपयोग कर अभिभावक बन सकते हैं.
इस बिल पर चर्चा के दौरान सांसदों ने ये सवाल भी उठाए कि ये बिल सिंगल मेन और LGBTQ कपल से भेदभाव करता है जो अभिभावक बनना चाहते हैं.
कांग्रेस के सांसद कार्ति चिदंबरम ने कहा था, ''ऐसे कई लोग हैं जिन्हें बच्चे नहीं हो पा रहे हैं, हम उन्हें वंचित क्यों कर रहे हैं? ये बिल सिंगल मेन, LQBTQ समुदाय के साथ भेदभाव करता है. तकनीक के इस्तेमाल में उनकी पहुंच होनी चाहिए.''
इस पर स्वास्थ्य मंत्री मनसुख मांडविया का कहना था, ''कई सदस्यों ने कहा कि इस बिल में LQBTQ समुदाय को बाहर रखा गया है. ये विषय समाजिक, बच्चों के विकास और मातृत्व से भी जुड़ा हुआ है. हमारा क़ानून भी पुरुष को गोद लेने से प्रतिबंधित करता है. एक सिंगल वुमेन ART का फ़ायदा उठा सकती है और अभिभावक बन सकती है.''
ये बिल भेदभाव करता है
राधिका थापर इस पर सवाल उठाते हुए कहती हैं कि जब भी ऐसे बिल आते हैं तो सरकार का ध्यान हमेशा ग़लत होने या शोषण पर चला जाता है, लेकिन देखा जाना चाहिए कि क़ानून संतुलित हो.
वो केंद्रीय मंत्री के तर्क से भी असहमति जताते हुए कहती हैं, ''बच्चा गोद लेने से एक बायोलॉजिकल लिंक नहीं बनता. जहां विज्ञान इतनी तरक़्क़ी कर रहा है तो एक सिंगल पुरुष अपने पेरेंट के अधिकार से क्यों महरूम रहे. एक सिंगल मेल भी अपने शुक्राणु देकर ART का फ़ायदा ले सकता है. इस बिल में कमीशनिंग कपल ही ART की सुविधा ले सकता है, लेकिन इसका दायरा बढ़ाना चाहिए और LQBTQ समुदाय की शादियों को मान्यता दी जानी चाहिए और उन्हें सिविल स्टेटस दिया जाना चाहिए. किसी से भी अभिभावक बनने का अधिकार नहीं छीना जाना चाहिए.''
इधर डॉक्टर एस एन बासु का कहना है कि एक सिंगल महिला ART का फ़ायदा उठा ही सकती है. साथ ही विधवा या ग़ैरशादीशुदा महिला भी इस प्रक्रिया का लाभ उठा सकती है. लेकिन पुरुषों की बात की जाए तो बच्चा गोद लेने के क़ानून में भी कहा गया है कि सिंगल मेल एक बच्ची को गोद नहीं ले सकता है. और वही बात यहां भी लागू की गई है.
तीन संस्थाओं का गठन
इस बिल में तीन संस्थाओं के गठन करने का प्रावधान किया गया है जिसमें राष्ट्रीय बोर्ड, राष्ट्रीय रजिस्ट्री और रजिस्ट्रेशन प्राधिकरण शामिल है.
राष्ट्रीय बोर्ड सरकार को नीतियों पर सलाह देगा, ART के मानदंडों को निर्धारित करेगा और राज्यों के बोर्ड से समन्वय स्थापित करेगा.

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राष्ट्रीय रजिस्ट्री ART क्लीनिक और ART बैंक एक केंद्रीय डेटाबेस का रिकॉर्ड रखेगा. रजिस्ट्रेशन प्राधिकरण का काम होगा कि अगर कहीं भी रेगुलेशन का उल्लंघन होता है तो वो जांच करेगा, किसी ART क्लीनिक को लाइसेंस देने या रद्द करने और बिल में मौजूदा प्रावधानों में संशोधन करने की सलाह देगा.
बच्चे के अधिकारइस बिल में ये प्रावधान किया गया कि ART से पैदा हुए बच्चे को कमीशनिंग दंपति यानि इच्छुक माता-पिता जैविक बच्चा मानेंगे और इसमें बच्चे को बायोलॉजिकल बच्चे को उपलब्ध होने वाले सभी अधिकार और विशेषाधिकार दिया जाना शामिल है.
एक डोनर का बच्चे पर कोई अधिकार नहीं होगा और ART से पैदा होने वाले सभी पक्षों की लिखित सहमति के बिना प्रक्रिया पूरी नहीं होगी.
यहां अण्डाणु देने वाले पक्ष को कमीशनिंग दंपति बीमा कवरेज भी देगा.
अपराध और दंड
ART के माध्यम से पैदा हुए बच्चे छोड़ना या उसका शोषण करना, मानव भ्रूण को बेचना-खरीदना, व्यापार या आयात करना, मानव भ्रूण को नर या जानवर में तब्दील करना अपराध की श्रेणी में आएगा.
इन अपराधों के लिए अलग-अलग सज़ा का प्रावधान किया गया है जिसमें 5 से 10 लाख रुपए के बीच जुर्माना, 8 से 12 साल की सज़ा और 10-20 लाख रुपए का जुर्माना देना शामिल है.
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