25 साल पहले हरियाणा में कैसे टकरा गए थे सऊदी और कज़ाख़ विमान?

विमान हादसा

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    • Author, नियाज़ फ़ारूक़ी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

12 नवंबर, 1996 की उस शाम को, सऊदी एयरलाइंस की एक उड़ान ने हमेशा की तरह दिल्ली हवाई अड्डे से उड़ान भरी. मौसम साफ़ था और हवा भी शांत थी और कोई भी ऐसा संकेत नहीं था, जिससे पता चल सकता कि कुछ ही पल में हज़ारों फ़ीट की ऊंचाई पर लगभग 350 यात्रियों सहित ये विमान चकनाचूर हो जायेगा.

क़रीब 500 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ़्तार से उड़ते हुए बोइंग 747 कुछ ही मिनटों में 14 हज़ार फ़ीट की ऊंचाई पर पहुंच गया था और इसने दिल्ली एयरपोर्ट एयर ट्रैफिक कंट्रोल (एटीसी) से और भी ऊपर जाने की इजाज़त मांगी. लेकिन एटीसी ने उसे उसी ऊंचाई पर रहने का निर्देश दिया.

उन दिनों दिल्ली हवाई अड्डे का रनवे वन-वे था (यानी प्रस्थान और आगमन दोनों रनवे के एक ही तरफ़ से होता था). उसी समय, क़ज़ाकिस्तान का एक विमान आईएल-76 विपरीत दिशा से 15 हज़ार फ़ीट की ऊंचाई पर दिल्ली की तरफ़ आ रहा था. दिल्ली एटीसी ने उसे 'एफ़एल 150' यानी 15 हज़ार फ़ीट, पर बने रहने का निर्देश दिया.

एटीसी ने क़ज़ाकिस्तान के विमान को यह भी बताया कि बिलकुल विपरीत दिशा में सऊदी एयरलाइंस की उड़ान केवल दस मील दूर है और मुमकिन है कि अगले पांच मील में क़ज़ाकिस्तान के विमान को पार करेगी. एटीसी ने आगे निर्देश दिया कि 'रिपोर्ट, इफ़ इन साइट' यानी अगर ये विमान दिखाई दे तो एटीसी को इसकी सूचना दी जाए.

क़ज़ाकिस्तान के विमान ने दोबारा दूरी तय की. एटीसी ने जवाब दिया कि 'ट्रेफिक अब आठ मील दूर है और 14 हज़ार फ़ीट की ऊंचाई पर है."

क़ज़ाकिस्तान विमान के चालक दल को यह कहते हुए सुना जा सकता है, कि "150 यानी (15 हज़ार फ़ीट) पर पहुंचों क्योंकि 140 पर... आह वो रहा, आह एक...'

इस हुई दुर्घटना की जांच दिल्ली हाई कोर्ट के जज आरसी लाहोटी की अध्यक्षता में हुई, जांच में पता चाल कि क़ज़ाकिस्तान के विमान के कॉकपिट में जो बातचीत हुई, उसके अनुसार रेडियो अधिकारी ने दोनों विमानों के टकराने से ठीक चार सेकेंड पहले सऊदी विमान को सामने देखा था.

यह घटना विमानन इतिहास में सबसे भयानक दुर्घटनाओं में से एक है.

इस दुर्घटना में आठ देशों के कुल 351 लोग मारे गए थे, जिनमें सऊदी एयरलाइंस की फ़्लाइट में 312 यात्री और 23 चालक दल के सदस्य थे और क़ज़ाकिस्तान के विमान में 32 यात्री और चालक दल के पांच सदस्य शामिल थे.

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इसी तरह, सऊदी विमान चालक दल के अंतिम शब्दों से यही पता चलता है कि उन्होंने भी क़ज़ाकिस्तान विमान को आख़िरी समय में देखा था और वो समझ गए थे कि मौत उनके बहुत क़रीब है. लाहोटी आयोग के अनुसार उनके अंतिम शब्द थे: 'अस्तग़्फ़िरुल्लाह, अशहद, इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन.'

विमान के मलबे से ये अंदाजा लगाया गया कि क़ज़ाकिस्तान का विमान सऊदी विमान से नीचे आ चुका था और जैसे ही सऊदी विमान दिखाई दिया, उसने तुरंत अपनी सही ऊंचाई 15 हज़ार फ़ीट पर पहुंचने की कोशिश की और बिलकुल आख़िरी समय में उसका पिछला हिस्सा सऊदी विमान के दाएं 'पर' से टकरा गया.

इकलौता गवाह

ज़मीन पर दो विमानों के दुर्घटनाग्रस्त होने का कोई चश्मदीद गवाह नहीं था, लेकिन हवा में एक आदमी था जिसने दुर्घटना के कुछ ही क्षण बाद का हाल एटीसी को बताया.

दिल्ली से आठ मिनट की दूरी पर अमेरिकी वायुसेना का एक विमान इस्लामाबाद से अमेरिकी दूतावास का सामान लेकर दिल्ली पहुंचने ही वाला था. टकराव के दो मिनट बाद, उसने दिल्ली एटीसी को सूचना दी कि उसने आग का एक बड़ा गोला देखा है जो कुछ ही पल में ज़मीन पर दो अलग दिशाओं में गिरते हुए दिखा है.

इसके पायलट ने एटीसी को बताया, कि "हमने अपनी दाहिनी ओर एक विशाल आग के गोले जैसा कुछ देखा है. यह एक बड़े विस्फ़ोट की तरह लग रहा है.'

एटीसी ने तुरंत दोनों विमानों से कई बार संपर्क करने की कोशिश की लेकिन कोई जवाब नहीं मिला. ज़ाहिर है कि बहुत देर हो चुकी थी.

इसके एक मिनट बाद अमेरिकी विमान ने दोबारा से इस ख़बर की पुष्टि की. उन्होंने पहले इसे बिजली चमकने की कोई घटना समझा था, लेकिन उन्होंने स्पष्ट किया कि "हमें इस समय आपके उत्तर पश्चिम में लगभग 44 मील दूर दाईं और दो आग के गोले दिखाई दे रहे हैं."

उन्होंने और भी स्पष्ट किया कि "गुज़रते हुए, हमने बादलों में आग का एक बड़ा गोला देखा और मुझे मलबा दिखाई दिया. ज़मीन पर दो अलग-अलग जगहों पर आग है. ओवर.'

ये आग के गोले दिल्ली एयरपोर्ट से क़रीब 100 किलोमीटर दूर हरियाणा राज्य के चरखी दादरी गांव में गिरे थे.

उन दिनों अख़बारों की सुर्ख़ियां कुछ इस तरह थी: "257 शव बहुत हद तक शनाख़्त के क़ाबिल, 62 इतनी जली हुई हैं कि शनाख़्त नामुमकिन, 32 पूरी तरह से क्षत-विक्षत."

मृतकों की राष्ट्रीयता: 331 भारतीय, 18 सउदी, नौ नेपाली, तीन पाकिस्तानी, दो अमेरिकी, एक ब्रिटिश और एक बांग्लादेशी.

घटनास्थल का दृशय

सऊदी एयरलाइंस का दुर्घटानग्रस्त विमान

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गांव वालों ने भी मीडिया को बताया कि उन्होंने ऊपर से आग के गोले गिरते और नीचे से काला धुंआ उठते हुए देखा.

आयोग ने गांव वालों के हवाले से कहा, कि ''पहले तो एक ख़तरनाक आवाज़ आई जिसने पूरे गांव को हिला कर रख दिया. घरों के दरवाज़े और खिड़कियां टूट गए और हर तरफ़ कांच के टुकड़े बिखर गए. लोग इसे भूकंप समझ कर डर कर अपने घरों से बाहर निकल आए.

जब ये पता चला कि ये विमान है, तो लोग आग और धुंए की तरफ़ दौड़ पड़े, क्योंकि विमान गांव के बाहर एक खेत में गिरा था. उनका मानना था कि सऊदी पायलट ने गांव को बचाने की कोशिश की थी और विमान को खेत की तरफ़ ले गए थे, हालांकि जांच में इसका कोई सबूत नहीं मिला.

जब तक यह ख़बर दिल्ली के मीडिया कार्यालयों में पहुंची, तब तक शाम के न्यूज़ बुलेटिन रिकॉर्ड किए जा चुके थे.

दुर्घटना की अधूरी जानकारी के साथ पत्रकार घटना स्थल की तरफ़ रवाना हो गए, लेकिन जानकारी अधूरी होने की वजह से अफ़रातफ़री में कुछ हरियाणा के चरखी दादरी की बजाय उत्तर प्रदेश के दादरी गांव में पहुंच गए, जबकि दोनों विपरीत दिशाओं में लगभग 150 किमी की दूरी पर हैं.

लेखिका नताशा बुधवार, जो उस समय एनडीटीवी के लिए काम करती थीं, वहां पहुंचने वाले पहले पत्रकारों में से एक थीं. वह बताती हैं कि जब वह मौके पर पहुंची तब तक रात के क़रीब साढ़े ग्यारह बज चुके थे और उन्होंने दूर से ही देखा कि विमान का मलबा जल रहा है.

वह कहती है कि क़रीब जाते हुए वह ये सोच रही थी कि वह मलबे पर चल रही है, तभी उनका पैर एक लाश से टकरा गया. जब उनके साथी कैमरामेन ने कैमरा लाइट ऑन की तो ये दृश्य देखने को मिले. वो कहती हैं कि "मुझे आज भी उसका चेहरा, उसके चेहरे के भाव, उसके शरीर का आकार याद है." ऐसा लग रहा था जैसे वह सो रहा हो."

वीडियो कैप्शन, ये विमान शनिवार को समंदर में गिर गया था.

जैसा कि नताशा ने महसूस किया और उस दुर्घटना को कवर करने वाले ज़्यादातर पत्रकार जलती हुई लाशों की गंध पर टिप्पणी करते हुए कहते हैं, कि वहां आस-पास हर खेत में शरीर के अंग बिखरे हुए थे और वो अँधेरे में खेत की मिटटी या गोबर समझ कर उन पर चल रहे थे.

नताशा भी दूसरे पत्रकारों की तरह, रात को वहीं रुकी, और जब सुबह हुई, तब उन्हें एहसास हुआ कि ये दुर्घटना वास्तव में कितनी भयावह थी. हर तरफ़ शव, घड़ियां, ज़ेवर, चश्में, साड़ियां, मसाले के पैकेट और खिलौने बिखरे पड़े थे.

वहां बिखरे हुए शरीर और उनका सामान उनके सुख-दुःख की कहानी बता रहे थे. नताशा याद करती हैं कि "मैंने वहां गुड़िया, टेडी बियर और बैग पड़े हुए देखे."

वह कहती हैं कि वहां कुछ आधी लाशें थी जिनमे किसी का ऊपरी हिस्सा ग़ायब था, तो किसी का निचला हिस्सा और कुछ शव जले हुए थे.

वो कहती हैं कि "यह एक दिमाग़ हिला देने वाली दुर्घटना थी. यह अकल्पनीय था कि दो विमान हवा में टकरा जाएंगे.

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हज़ारों फ़ीट की ऊंचाई से तेज़ी से गिरने के बाद सऊदी विमान का इंजन जहां गिरा वहां 20 फ़ीट गहरा गड्ढा हो गया था. जहाज का ढांचा पहचान में नहीं आ रहा था केवल उसकी पूंछ का एक हिस्सा ही कुछ हद तक पहचान में आ रहा था.

उस समय के अख़बारों की रिपोर्ट के मुताबिक़, लोगों ने शवों से घड़ियां, गहने और कपड़े उतार लिए थे. इसके विपरीत, कई स्थानीय लोगों ने मृतकों और उनके सामान को बरामद करने में सराहनीय मदद की थी, और उन्होंने स्थानीय अधिकारियों के साथ मिलकर शवों को पास के अस्पताल में पहुंचाने का काम किया था.

न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, "जब शवों को चरखी दादरी अस्पताल ले जाया गया, तो उन्हें अस्पताल के कॉरिडोर और वार्डों में बर्फ़ के ढेर पर फेंक दिया गया, जिससे वहां बहुत ख़ून बहने लगा."

क्योंकि स्थानीय अस्पताल में शवों को सुरक्षित रखना आसान नहीं था और कई शव इस हद तक जल चुके थी या इस हद तक बिखर गए थे, कि उनकी पहचान करना नामुमकिन था और तुरंत उनका अंतिम संस्कार करना या दफ़नाना ज़रूरी था.

लेकिन कुछ ही क्षणों में इस मामूली से काम ने भारतीय समाज के पुराने संघर्षों को स्पष्ट कर दिया.

एक हिंदू संगठन ने मांग की, कि जिन जले शवों की पहचान नहीं हो सकती उन शवों का अंतिम संस्कार हिंदू रीति-रिवाज़ से किया जाए. मुसलमानों ने इसका विरोध किया. कई घंटों की बातचीत के बाद, आख़िरकार यह तय हुआ कि विमान में यात्रा कर रहे मुसलामानों और हिन्दुओं में से जितने शवों की पहचान नहीं हो पाई है उनके अनुपात के हिसाब से इन शवों का बंटवारा किया जाएगा.

कुल मिलाकर, 76 मुसलमानों, 15 हिंदुओं और तीन ईसाइयों के शवों की पहचान नहीं हो सकी थी या उनके शरीर के कुछ अंग मिले थे और उनके अवशेषों को दफ़नाया गया या उनका अंतिम संस्कार किया गया.

नताशा बहुत से शवों के पीछे दिल्ली में उनके कब्रिस्तान और श्मशान घाट तक गई.

उन्होंने देखा कि ताबूतों से लाशों के हिस्से झूल रहे हैं और उनमें से चूहे निकल रहे हैं. वह कहती हैं कि यह उन कहानियों में से एक है, जिस पर और अधिक पढ़ने और लिखने की ज़रुरत है, क्योंकि लोग इसे बहुत जल्दी भूल गए. क्योंकि उनमें से बहुत कम लोग शहर से या समाज के उच्च वर्गों से थे.

उम्मीदों की सवारी

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दोनों विमानों में ऐसे लोग सवार थे जो अपने जीवन को बेहतर बनाने की उम्मीदें लिए अपनी अस्थायी मंज़िल की तरफ़ जा रहे थे.

क़ज़ाकिस्तान के विमान को किर्गिज़ के कुछ व्यापारियों ने चार्टर किया हुआ था जो आने वाली सर्दियों के लिए सस्ते कपड़े ख़रीदने के लिए दिल्ली आ रहे थे. सऊदी विमान में ज़्यादातर मजदूर थे, जो सऊदी अरब में तेज़ी से बढ़ते कंस्ट्रक्शन के क्षेत्र में काम करने जा रहे थे.

25 साल बाद मृतकों के परिजन हिचकिचाते हुए, टुकड़ों में अपनी दास्तां बयाना करते हैं.

बिहार के गोपालगंज जिले के ख़ुर्शीद आलम कई बार सऊदी अरब जा चुके थे. उनकी पत्नी सफ़िया ख़ातून के लिए उनका लंबे समय तक दूर रहना अब एक सामान्य बात बन चुकी थी.

वह जानती थी कि उनके सऊदी अरब जाने का मतलब है कि वह अब सिर्फ़ दो साल बाद ही एक महीने के लिए वापस आएंगे, लेकिन बच्चों और परिवार की भलाई के लिए, जाना ज़रूरी था.

उन्हें इस हादसे की ख़बर अगली शाम को मिली.

वीडियो कैप्शन, पाकिस्तान: विमान दुर्घटना का सीसीटीवी फ़ुटेज आया सामने

उन दिनों पल-पल की ख़बर पाने के लिए आसपास कोई फ़ोन नहीं था. वह उस दिन अपनी उदासी और अकेलेपन को दूर करने की कोशिश कर रही थी, कि शाम 4 बजे उसके गांव का एक आदमी आया और ख़ुर्शीद की फ़्लाइट के बारे में पूछा. उसने रेडियो पर ख़बर सुनी थी कि दिल्ली के बाहर एक विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया है. उनका डर सही था.

परिवार की मामूली सी बचत लेकर उनका भाई समीउल्लाह तुरंत दिल्ली के लिए रवाना हो गया. लंबी दूरी और रास्तों की मुश्किलों के चलते वो तीसरे दिन चरखी दादरी पहुंचे. वहां उन्हें बताया गया कि शवों को दिल्ली के एम्स अस्पताल में भेज दिया गया है.

उनका और दूसरे पीड़ितों का कहना है कि हर जगह अराजकता का माहौल था. परिजन अपने रिश्तेदारों की तलाश में दुर्घटनास्थल, दिल्ली हवाईअड्डे और अस्पतालों में भटक रहे थे. अधिकारियों के पास संतोषजनक जवाब नहीं थे और दूर-दूर से आने वाले रिश्तेदारों को नहीं पता था कि उन्हें किससे संपर्क करना चाहिए.

उस समय के अख़बारों की रिपोर्ट उस स्थिति के बारे में बताती हैं.

मुसाफ़िरों की सूची

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इंडियन एक्सप्रेस ने स्थिति को अधिकारियों की ओर से "सुस्ती और उदासीनता" का प्रदर्शन कहा. टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने लिखा, 'दिल्ली पहुंचने के 12 घंटे बाद भी शवों को ताबूतों में नहीं रखा गया था. उनमें से कुछ धूप में पड़े हुए थे और उनके ऊपर कौवे मंडरा रहे थे.'

इसी रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि ताबूतों को लेकर रिश्तेदारों के बीच लड़ाई हो रही थी और उन्हें ताबूत लेने के लिए रिश्वत देनी पड़ रही थी.

समीउल्लाह एम्स पहुंचे लेकिन वहां भी शव नहीं मिला. उदासी और उलझन में, वह हर किसी से अपने भाई के शव के बारे में पूछ रहे थे, तभी किसी ने उन्हें बताया कि दिल्ली में एक और अस्पताल है जहां इस दुर्घटना में मारे गए लोगों के शव भेजे गए हैं.

आख़िरकार कई ट्रकों में तलाश करने के बाद चौथे दिन रात के 11 बजे शव मिला.

पांचवें दिन जब वे अपने गांव पहुंचे, तो शरीर से असहनीय बदबू आ रही थी, लेकिन उन्हें इस बात का सकून था कि उनके भाई का शरीर पूरी तरह से ठीक है. वो कहते हैं कि "हमें शरीर पर एक भी ख़रोंच नहीं दिखी. हां, उनकी जेब में जो पैसे थे वो ग़ायब थे."

ख़ुर्शीद आलम और उनकी पत्नी सफ़िया ख़ातून

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ख़ुर्शीद के साथ इसी दुर्घटना में उनके गांव के एक और व्यक्ति की मौत हुई थी, लेकिन उनका शव नहीं मिल सका. गांव वालों ने शव न मिलने पर उनका ग़ायबाना जनाज़ा अदा किया.

असलम एजाज़ शादी के कुछ हफ़्ते बाद ही सऊदी अरब चले गए थे.

अक्सर ऐसा होता है कि इन देशों में कंपनियां छुट्टी का शिड्यूल इस तरह से जारी करती हैं, कि छुट्टी समाप्त होने के साथ ही कर्मचारी का वीज़ा भी समाप्त हो जाए. यह सुनिश्चित करने के लिए एक प्रभावी रणनीति है कि कर्मचारी अपनी छुट्टी न बढ़ा सकें.

असलम वीज़ा को लेकर सतर्क रहते थे. छुट्टियां बची होने के बावजूद उन्होंने सावधानी के तौर पर छुट्टियां ख़त्म होने से पहले ही वापस लौटने का फ़ैसला किया था. दिल्ली में उनके क़रीबी रिश्तेदार अमीरुल हक़ उन्हें विदा करने एयरपोर्ट गए थे. औपचारिकताएं पूरी करने के बाद असलम ने एयरपोर्ट के शीशे के अंदर से इशारा किया कि सब कुछ ठीक है, आप जा सकते हैं.

उन्हें घर वापस आये हुए अभी लगभग डेढ़ घंटा ही हुआ था, कि उनके पड़ोसी, किरायेदार ने उन्हें बताया कि उसने टीवी पर ख़बर सुनी है कि सऊदी अरब की एक फ़्लाइट दुर्घटनाग्रस्त हो गई है. उन्होंने फ़ौरन अपने गांव के इकलौते फ़ोन पर कॉल की और इसकी सूचना दी. परिवार वालों को यक़ीन नहीं हो रहा था कि ऐसा हुआ है. इसके बाद उन्होंने अगले दिन अख़बारों में छपे हेल्पलाइन नंबर पर कॉल किया.

घरवालों ने पूछा कि क्या आपकी लिस्ट में असलम एजाज़ नाम का कोई यात्री है.

उन्होंने कहा कि असलम एजाज़ नहीं बल्कि असलमज़ाद हैं. परिवार के लिए ख़बर की पुष्टि करने के लिए इतना ही काफ़ी था.

साफ़िया ख़ातून का जनाजा

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दिल्ली में असलम के क़रीबी रिश्तेदार तुरंत घटनास्थल पर पहुंचे. वे भी हरियाणा में चरखी दादरी के बजाय उत्तर प्रदेश के दादरी गांव पहुंचे और जब तक वे चरखी दादरी पहुँचे, तब तक दोपहर हो चुकी थी.

तब तक, अधिकारियों ने स्थानीय लोगों की मदद से पहचान में आने वाले शवों को स्थानीय अस्पताल पहुंचा दिया था. अस्पताल में लाशों के ढेर में उन्होंने बहनोई की क़मीज़ से उनको पहचान लिया. उनके कान से ख़ून बह रहा था और उनका एक पैर टूट गया था इसके अलावा उनका शरीर ठीक था.

असलम की सऊदी अरब की यह तीसरी यात्रा होती. जब वे पहली बार वहां से लौटे तो उनका इरादा था कि अबकी बार शादी करके वापिस जाएंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. हालांकि दूसरे दौरे में शादी कर ली, लेकिन शादी के 21 दिन बाद उनकी मौत हो गई.

इस दुर्घटना में मारे गए लोगों में से ज़्यादातर भारत के सबसे ग़रीब उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे क्षेत्रों से थे.

ख़ुर्शीद गोपालगंज के रहने वाले थे और उनके गांव के ही एक और व्यक्ति की मौत हुई थी. एक और व्यक्ति जिसकी मौत हुई थी उनके गांव से महज 12 किलोमीटर दूर जगमलवां गांव का रहने वाला था. जगमलवां से 35 किलोमीटर दूर सीवान जिले के ख़ालिसपुर गांव के भी एक व्यक्ति की मौत हुई थी और वहां से 20 किलोमीटर दूर जमाल अहाता गांव के छह युवकों की मौत हुई थी. वे सभी पहली बार देश से बाहर जा रहे थे, लेकिन लाश बनकर लौटे, वो भी सिर्फ़ तीन.

मरने वालों में राजस्थान, दिल्ली, केरल, जम्मू-कश्मीर, पंजाब, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, हरियाणा, असम, मध्य प्रदेश और पश्चिम बंगाल के लोग शामिल थे.

इस हादसे में अनिल माहेश्वरी नामक व्यक्ति के दो बेटों की मौत हो गई थी.

परिजन

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एक ख़ुशक़िस्मत व्यक्ति भी था, जिसे उसके विरोध के बावजूद भी किसी वजह से विमान में चढ़ने की अनुमति नहीं दी गई थी और वह दुर्घटना के लगभग एक सप्ताह बाद सऊदी अरब गया. एक परिवार ऐसा भी था जिसे दुर्घटना से पांच दिन पहले जाना था, लेकिन उनका बच्चा बीमार हो गया तो उन्हें देर से जाना पड़ा.

इस दुर्घटना में मरने वाली एक ब्रिटिश नर्स, सऊदी अरब शिफ़्ट होने वाली थी और अपने नए अस्पताल में काम शुरू करने से पहले भारत में छुट्टियां मना कर वापस लौट रही थी.

विमान में सवार यात्रियों की तरह पायलटों की भी अपनी कहानियां थी. कैप्टन ख़ालिद अल-शबीली के बड़े भाई शारजाह में थे, जब उन्होंने दुर्घटना की ख़बर सुनी, ख़बर की पुष्टि करने के बाद वह तुरंत नई दिल्ली के लिए रवाना हो गए और सीधे घटनास्थल पर पहुंचे.

सऊदी एयरलाइंस के एक पूर्व पायलट अनस अल-क़वाज़ ने अपनी किताब 'मवाक़िफ़ तय्यार' में लिखा है कि वह दुर्घटना के तीसरे दिन अपने भाई के शव को खोजने में कामयाब हुए.

अनस आगे लिखते हैं कि जब कैप्टन ख़ालिद अल-शबीली के बड़े भाई विमान के मलबे और जले हुए अवशेषों को देख रहे थे, तभी एक बचावकर्मी चिल्लाया, "यहां विमान के नीचे कुछ लाशें हैं."

अनस कैप्टन ख़ालिद अल-शबीली के भाई का हवाला दे कर लिखते हैं कि उन्होंने बताया "मैंने अपने भाई को देखा और मैंने उनकी छाती पर एयरलाइन के बैज और उनके कंधे पर लगे एपोलेट्स और उनके कुछ सरकारी काग़जों जो उनके सीने की जेब में थे, से पहचाना.'

परिजन

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उन्होंने क़वाज़ को आगे बताया कि "वह इतनी बुरी तरह से घायल थे कि उनके शरीर की अधिकतर ख़ासियतें ग़ायब हो गईं थी, लेकिन जब मैंने उन्हें साफ़ किया, तो मैंने कुछ अजीब देखा. उनकी त्वचा उनके प्राकृतिक भूरे रंग के विपरीत बहुत सफ़ेद थी और अभी भी बिलकुल लाल ख़ून बह रहा था ... हाँ, अभी भी ख़ून बह रहा था और वह दुर्घटना का तीसरा दिन था.'

अख़बारों ने यह भी बताया कि चार यात्री ऐसे थे, जिनकी ज़मीन पर गिरने के बाद तक सांस चल रही थी, लेकिन अस्पताल पहुंचने से पहले ही उनकी मौत हो गई. अमीरुल-हक़ कहते हैं, कि ''वहां के लोगों ने बताया कि मेरे बहनोई भी ज़मीन पर गिरने तक जीवित थे, लेकिन हमने तो देखा नहीं था, इसलिए हमें नहीं पता कि यह बात सच है या नहीं.''

हादसे का ज़िम्मेदार कौन?

हादसे के बाद अटकलों का दौर जारी था. कुछ लोगों ने विमान के उपकरण में अचानक ख़राबी को दुर्घटना की वजह बताया, किसी ने दिल्ली एटीसी के उपकरण को 'आउट डेटेड' कहा, तो कुछ ने पायलटों को दोषी ठहराया.

जब 'ब्लैक बॉक्स' की जांच करने की बारी आई, तो पक्षकार इसे भारत में खोलने के लिए सहमत नहीं हुए. लाहोटी आयोग ने भारत की नेशनल ऐरोनॉटिकल लेबोरेट्री में रिकॉर्ड हासिल करने का सुझाव दिया था, लेकिन दोनों एयरलाइनों ने लैब की क्षमताओं पर संदेह व्यक्त किया और भारत के बाहर "डिकोडिंग" पर ज़ोर दिया.

आख़िरकार यह फ़ैसला हुआ कि क़ज़ाकिस्तान एयरलाइंस अपने ब्लैक बॉक्स की जांच मॉस्को की एक लैब में कराएगी और सऊदी एयरलाइंस ब्रिटेन की लैब में जांच कराएगी. लाहोटी आयोग और पक्षकारों को इस प्रक्रिया के प्रयवेक्षण के लिए दोनों जगहों पर मौजूद रहने की इजाज़त थी.

घटनास्थल का दौरा करने, एटीसी के स्टाफ़ से मुलाक़ात करने और फ़्लाइट रिकॉर्ड डेटा और वॉइस रिकॉर्ड यानी ब्लैक बॉक्स की जांच के बाद, लाहोटी आयोग ने यह निष्कर्ष निकाला कि "टकराव का मूल और अनुमानित कारण क़ज़ाकिस्तान के विमान का बिना अनुमति के 14 हज़ार फ़ीट से कम ऊंचाई पर आना और निर्देश के अनुसार 15 हज़ार फ़ीट पर न बने रहना है.

कुल मिलाकर, आयोग ने 15 सिफ़ारिशें कीं.

घटनासथल पर पहुंचे लोग

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आयोग ने स्पष्ट किया कि क़ज़ाकिस्तान विमान की दुर्घटना की एक वजह "क़ज़ाकिस्तान के पायलट को अंग्रेज़ी भाषा का ज्ञान कम था, जिसके कारण एटीसी के निर्देशों की ग़लत व्याख्या की गई थी."

आयोग ने कहा कि दोनों विमानों को एटीसी की तरफ़ से स्पष्ट और उचित निर्देश दिए गए थे जो तय शुदा प्रक्रिया के अनुसार थे और दिल्ली हवाई अड्डे के वन-वे एयर कॉरिडोर ने दुर्घटना में कोई भूमिका नहीं निभाई.

आयोग ने यह भी कहा कि दुर्घटना से क़रीब 30 सेकेंड पहले दोनों विमान बादलों की परत में दाख़िल हुए थे और उनमें कुछ हल्का सा 'टर्बुलेन्स' हुआ था, लेकिन इससे कोई आपात स्थिति पैदा नहीं हुई थी.

यह भी निष्कर्ष निकाला कि ये दुर्घटना किसी भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तोड़फोड़, आंतरिक विस्फोट या दोनों विमानों में से किसी एक की यांत्रिक ख़राबी का परिणाम नहीं थी.

आयोग ने आगे कहा कि हालांकि हवाई अड्डे के आधुनिकीकरण का काम चल रहा है, लेकिन कोई सेकंडरी रडार उपलब्ध नहीं, जो विमान की दूरी के अलावा ऊंचाई को भी बता सके.

आमतौर पर यह माना जाता है कि उस समय दिल्ली एयरपोर्ट का रडार सिस्टम पुराना था जो दूरी को तो बता सकता था, लेकिन ऊंचाई को नहीं.

वीडियो कैप्शन, यूक्रेन विमान हादसा: 176 लोगों की मौत

पायलट एसोसिएशन के तत्कालीन अध्यक्ष वीके भल्ला का कहना है कि उन्होंने दुर्घटना से कुछ महीने पहले भारत सरकार को एक पत्र लिखा था, जिसमें चेताया गया था कि अगर नए उपकरण नहीं लाए गए तो इस तरह की घटनाएं हो सकती हैं. उनका कहना है कि उस समय पूरे देश में विमानों को उसके आसपास के विमानों के बारे में बताने के लिए कोई रडार नहीं था.

उन्होंने कहा, कि "मैंने तीन घटनाओं का उदाहरण दिया था जिनमें हवा में पायलट की होशियारी की वजह से दुर्घटना होने से बच गयी थी. मैंने लिखा था कि अगर ये क़दम नहीं उठाए गए, तो हवा में टकराव होना लाज़मी है.

वो कहते हैं कि "मैंने केवल समस्या का उल्लेख नहीं किया था, मैंने उसके समाधान का भी सुझाव दिया था, लेकिन उनपर अमल दुर्घटना के बाद हुआ.

इस दुर्घटना के बाद दिल्ली के रडार सिस्टम को आख़िरकार 'आधुनिक' कर दिया गया. नागरिक उड्डयन महानिदेशालय ने भारत के अंदर और बाहर जाने वाले सभी विमानों में हवाई टकराव से बचने वाले सिस्टम को लगाना ज़रूरी क़रार दिया. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसका असर यह हुआ कि पायलटों के लिए अंग्रेज़ी का एक मानक अनिवार्य कर दिया गया.

25 साल बाद स्मारक और पर्यटन केंद्र के लिए ज़मीन की तलाश

मलबा

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इस दुर्घटना में ज़्यादातर लोग समाज के कमज़ोर वर्गों से थे. पीड़ितों के अनुसार, भारत सरकार ने उन्हें कोई मुआवज़ा नहीं दिया.

जुलाई 1998 में एक सांसद ने सरकार से पूछा कि क्या लाहोटी आयोग ने अपनी रिपोर्ट सौंप दी है. क्या उन्होंने विमान दुर्घटना के लिए क़ज़ाकिस्तान चालक दल को जिम्मेदार ठहराया? और अगर हां, तो क्या भारत सरकार ने क़ज़ाकिस्तान सरकार से जांच के सभी ख़र्चों और मुआवज़े की मांग की?

नागरिक उड्डयन मंत्री ने केवल इतना जवाब दिया कि हां, आयोग ने रिपोर्ट जमा कर दी है और रिपोर्ट पर विचार किया जा रहा है. हालांकि, सऊदी सरकार ने प्रत्येक मृतक व्यक्ति के परिवार को 12,000 पाउंड का भुगतान किया.

दुर्घटना के वर्षों बाद भी, विमानों का इस तरह हवा में टकरान अविश्वसनीय घतना लगती है, लेकिन 349 लोगों की मौत अंतिम सच है, कम से कम उन लोगों के लिए जिन्होंने दुर्घटना में अपने किसी क़रीबी को खो दिया है.

वीडियो कैप्शन, पाक विमान हादसा: अधूरे सफ़र की कहानी

परिस्थितियों ने कुछ को तो इतना मजबूर कर दिया कि उन्हें अपने मृत पति के भाई से शादी करनी पड़ी, कुछ को कम उम्र में रोज़गार तलाश करना पड़ा, और कुछ को किताबों की क़ुर्बानी देनी पड़ी.

कुछ ने अधिक मुआवज़े की मांग करते हुए मुक़दमा दायर किया लेकिन अदालत ने उसे यह कहते हुए ख़ारिज कर दिया कि वादी ने इस मुक़दमे के लिए सही समय पर भारत सरकार की इजाज़त नहीं ली थी, जोकि विदेशी राज्य या राजदूत के ख़िलाफ़ मुक़दमे के लिए ज़रूरी होती है.

इसी बीच, स्थानीय सरकार ने कथित तौर पर चरखी दादरी में मारे गए लोगों के लिए एक स्मारक बनाने की योजना की घोषणा की.

अख़बारों के मुताबिक़ इस परियोजना के तहत वहां एक स्मारक और पर्यटन केंद्र बनाया जाएगा. इसके लिए 15 से 20 एकड़ ज़मीन की तलाश अभी भी जारी है.'

(नोट - ये लेख मूल रूप से नवंबर 2021 में लिखा गया था)

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