भारत की हार, पाकिस्तान की जीत पर जश्न मनाने वालों की नागरिकता ख़त्म होः बीजेपी नेता- प्रेस रिव्यू

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जम्मू और कश्मीर में बीजेपी नेता और पूर्व एमएलसी विक्रम रंधावा के टी20 विश्वकप में भारत की हार पर जश्न मनाने वालों के ख़िलाफ़ दिए गए बयान पर विवाद छिड़ गया है.
अंग्रेज़ी अख़बार इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक विक्रम रंधावा ने कहा कि भारत की हार पर जश्न मनाने वालों की ना सिर्फ़ मार-मार कर चमड़ी उधेड़ देनी चाहिए बल्कि उनकी भारतीय नागरिकता भी ख़त्म कर देनी चाहिए.
विक्रम रंधावा का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया है जिसमें वो ये बयान देते नज़र आ रहे हैं.
रंधावा ने कहा, "22-23 साल की लड़कियां जो जम्मू में बुरके में घूमती हैं और कश्मीर में जैकेट हवा में उछाल-उछाल कर पाकिस्तान ज़िंदाबाद के नारे लगा रही हैं. ये 21-22 साल की लड़कियों ने रगों में पाकिस्तान के प्रति स्नेह पाला हुआ है. इन्होंने पाकिस्तान की दूसरी जीत पर जश्न क्यों नहीं मनाया."
"इनकी वो दुर्दशा करें कि आने वाली नस्लें भी याद रखें कि हिंदुस्तान में रहकर हिंदुस्तान के ख़िलाफ़ नारेबाज़ी करने या दूसरे मुल्क के पक्ष में हुल्लड़बाजी करने का क्या नतीजा हो सकता है. उनके माता-पिता को भी अहसास होना चाहिए कि उन्होंने कैसी औलादें पैदा की हैं."
इस वीडियो में रंधावा ये भी कह रहे हैं, "अगर तीन तलाक़ व्हाट्सएप पर दे देते थे तो नमाज़ भी व्हाट्सएप पर पढ़ लिया करें, सड़क पर क्यों पढ़ते हैं."
उनके इस बयान का मुस्लिम समुदाय ने कड़ा विरोध किया है. कई लोगों ने पुलिस से उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई करने की मांग की है.
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विक्रम रंधावा ने इस वीडियो को लेकर अख़बार से कहा कि वीडियो से छेड़छाड़ की गई है और उनके बयान को गलत संदर्भ में दिखाया गया है.
वहीं, बीजेपी ने रंधावा के बयान से किनारा कर लिया है. बीजेपी प्रवक्ता सुनील सेठी ने कहा कि रंधावा का ये निजी बयान है. हम सभी क्षेत्रों का समावेशी विकास चाहते हैं.
उन्होंने कहा, "हमारे लिए जम्मू और कश्मीर के सभी इलाक़ों के लोग समान रूप से महत्वूपर्ण हैं और हम पूरे केंद्र शासित प्रदेश में शांति और प्रगति चाहते हैं."
इस संबंध में जम्मू के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक चंदन कोहली ने कहा, "मामले का संज्ञान लिया जा रहा है."

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खुले में नमाज़ नहीं पढ़ेंगे: हरियाणा वक़्फ बोर्ड
मुस्लिम समुदाय के लोगों ने सोमवार को कहा कि उन्होंने गुड़गांव के सेक्टर 12 में जुमे की नमाज़ खुले में ना पढ़ने का फ़ैसला लिया है.
अंग्रेज़ी अख़बार हिंदुस्तान टाइम्स लिखता है कि ये जगह ज़िला प्रशासन ने नमाज़ पढ़ने के लिए तय की थी लेकिन दक्षिणपंथी हिंदू समूहों से किसी तरह के टकराव से बचने और सभी धर्मों के 'सामंजस्यपूर्ण' सह-अस्तित्व के लिए वहां नमाज ना पढ़ने का फ़ैसला लिया गया है.
हरियाणा वक़्फ बोर्ड के सदस्य और समुदाय के नेताओं ने सोमवार को उपायुक्त से मुलाक़ात की और मुख्यमंत्री को एक ज्ञापन सौंपा जिसमें खुली जगहों पर नमाज़ बंद करने की पेशकश की गई है. साथ ही अनुरोध किया गया है कि संबंधित अधिकारियों को मस्जिदों और वक़्फ बोर्ड की ज़मीनों से अतिक्रमण हटाने का निर्देश दिया जाए.
हरियाणा वक़्फ बोर्ड के सदस्य और मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के अध्यक्ष खुर्शीद रज़ाक ने कहा कि हर शुक्रवार पुलिस की सुरक्षा में नमाज़ नहीं पढ़ी जा सकती. "विरोध के बीच और लोगों की इच्छा के ख़िलाफ़ की जा रही नमाज इस्लाम और राष्ट्रीय एकता के अनुरूप नहीं है. हम नहीं चाहते कि हमारे हिंदू भाई दुखी हों और हमारी नमाज को रोकने के लिए विरोध का सहारा लें."

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करवाचौथ का विज्ञापन हटाने पर मजूबर करना असहिष्णुता: जस्टिस चंद्रचूड़
सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने डाबर के उस विज्ञापन को वापस लेने पर मजबूर करने को सार्वजनिक असहिष्णुता कहा है जिसमें एक समलैंगिक जोड़े को करवाचौथ का त्योहार मनाते दिखाया गया था.
दैनिक अख़ाबर अमर उजाला में ख़बर है कि न्यायाधीश चंद्रचूड़ ने कहा, "सिर्फ़ दो दिन पहले एक विज्ञापन को कंपनी को हटाना पड़ा था. वो समलैंगिक जोड़े के करवाचौथ मनाने को लेकर था. उसे सार्वजनिक असहिष्णुता के कारण हटाना पड़ा."
डाबर इंडिया को हाल ही में अपना एक विज्ञापन वापस लेना पड़ा था जिसमें एक समलैंगिक जोड़े को करवाचौथ मनाते दिखाया गया था. इस विज्ञापन का सोशल मीडिया पर कड़ा विरोध हुआ था. हालांकि, कई लोग विज्ञापन के समर्थन में भी आए थे.
न्यायाधीश चंद्रचूड़ ने इस विज्ञापन का जिक्र तब किया जब वो महिलाओं के अधिकारों के लिए कानूनी जागरूकता सुनिश्चित करने की ज़रूरत पर बात कर रहे थे.
उन्होंने ये भी कहा, "हमारा संविधान एक परिवर्तनकारी दस्तावेज है जो पितृसत्ता में निहित संरचनात्मक असमानताओं को दूर करने की मांग करता है. घरेलू हिंसा अधिनियम, कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न रोकथाम जैसे क़ानून महिलाओं के संवैधानिक अधिकारों को पूरा करने के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए ही बनाए गए हैं."

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जम्मू-कश्मीर में भेजे गए 5000 अतिरक्त जवान
अंग्रेज़ी अख़बार द टेलिग्राफ़ की ख़बर के अनुसार जम्मू-कश्मीर में हुईं प्रवासी मज़दूरों की हत्या को देखते हुए वहां अर्धसैनिक बलों के पांच हज़ार अतिरिक्त जवानों को भेजने का आदेश दिया गया है.
जम्मू और कश्मीर में हाल ही में कई प्रवासी मजदूरों पर हमले किए गए हैं. यहां कश्मीरी हिंदुओं और सिखों को भी निशाना बनाया गया है. जिसके बाद से सेना चरमपंथियों के ख़िलाफ़ बड़े स्तर पर अभियान चला रही है.
अख़बार ने गृह मंत्रालय के सूत्रों के हवाले से लिखा है कि केंद्र शासित प्रदेश की मौजूदा स्थिति को देखते हुए अतिरिक्त जवान भेजने का फ़ैसला लिया गया है.
मंत्रालय के एक अधिकारी ने कहा, "हाल ही में हुईं हत्याओं के कारण कश्मीर में सुरक्षा की स्थिति बहुत चुनौतीपूर्ण बनी हुई है. जम्मू-कश्मीर पुलिस को क़ानून व्यवस्था बनाए रखने और आंतकवाद-रोधी अभियानों में मदद के लिए अर्धसैनिक बलों की 50 कंपनियां भेजी जा रही हैं."
अधिकारी ने बताया कि 50 में से 30 कंपनियाँ केवल श्रीनगर में ही भेजी जा रही हैं.
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