कश्मीर: अल्पसंख्यक बन रहे निशाना, एक सप्ताह में सात मौतों से बढ़ा ख़ौफ़

कश्मीर

इमेज स्रोत, EPA

इमेज कैप्शन, हमले में मारी गई सरकारी स्कूल की प्रिंसिपल सुपिंदर कौर के परिजन शोक में हैं

भारत प्रशासित कश्मीर में गुरुवार को श्रीनगर में दो और लोगों की दिन दहाड़े हत्या कर दी गई जिसमें एक सरकारी स्कूल की प्रिंसिपल और एक अध्यापक शामिल हैं.

अंग्रेज़ी अख़बार टाइम्स ऑफ़ इंडिया लिखता है कि इस घटना के बाद लोगों में गुस्सा है और ट्विटर, सोशल मीडिया के ज़रिए लोग अपना आक्रोश ज़ाहिर कर रहे हैं.

इससे पहले मंगलवार को शहर में एक मशहूर केमिस्ट मखन लाल बिंद्रू के अलावा दो अन्य लोगों की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी.

शहर के ईदगाह इलाके के स्कूल के पास रहने वालों ने सुबह स्कूल की तरफ़ से गोलियों की आवाज़ सुनी थी. इस घटना में स्कूल की 44 वर्षीय प्रिंसिपल सुपिंदर कौर और अध्यापक दीपक चंद की मौत हो गई है.

गोली लगने के बाद दोनों को अस्पताल ले जाया गया था जहां उन्हें मृत घोषित कर दिया गया. सतिंदर कौर कश्मीरी सिख थीं और दीपक चंद कश्मीरी पंडित थे जो हाल ही में स्कूल में नौकरी लगने के बाद घाटी में लौटे थे.

एक सप्ताह में सात लोगों की मौत

कश्मीर

इमेज स्रोत, EPA

हिंदुस्तान टाइम्स लिखता है कि पुलिस के मुताबिक़ इस साल विभिन्न घटनाओं में अब तक 28 लोग मारे गए हैं. इनमें पांच लोग कश्मीरी हिंदू, सिख थे और दो हिंदू प्रवासी मज़दूर थे.

बीते एक सप्ताह में सात मौतों के कारण कश्मीर में रहने वाले अल्पसंख्यकों के बीच डर बढ़ गया है.

शहरों में पुलिस हाई एलर्ट पर है और जगह-जगह तलाशी ली जा रही है.

रिपोर्ट कहती है कि पुलिस सूत्रों के मुताबिक़ शहर में हमलों के बारे में ख़ुफ़िया इनपुट थे और कई जगहों पर अतिरिक्त नाके भी लगाए गए थे.

मखन लाल बिंद्रू

एक हफ़्ते के भीतर मरने वालों में तीन कश्मीरी मुसलमान भी हैं, लेकिन मंगलवार को मखन लाल बिंद्रू, बिहार के एक रेहड़ी वाले और गुरुवार को दो अध्यापकों की मौत ने 1990 के दशक जैसे हालात की याद दिला दी है.

1990 के दशक में हज़ारों कश्मीरी पंडितों को हिंसा की वजह से घाटी छोड़कर देश के कई हिस्सों में रिफ्यूज़ी कैंपों में जाना पड़ता था.

हाल ही में कश्मीरी पंडितों को सरकार ने घाटी में नौकरियां दी हैं जिसकी वजह से कई लोग वापस लौटे हैं. ताज़ा हत्याओं ने उन कश्मीरी पंडितों की सुरक्षा भी ख़तरे में डाल दी है जो 1990 के दशक में चरमपंथी के ख़तरे के बावजूद घाटी में ही डटे रहे थे.

लखीमपुर हिंसा पर प्रधानमंत्री की चुप्पी पर उठ रहे सवाल

प्रधानमंत्री

इमेज स्रोत, MEA INDIA

गुरुवार को प्रधानमंत्री ने उत्तर प्रदेश की एक घटना पर दुख और संवेदना प्रकट की, लेकिन ये घटना लखीमपुर खीरी में हुई हिंसा नहीं थी. वह राज्य के बाराबंकी ज़िले में हुई एक सड़क दुर्घटना पर अपनी संवेदना प्रकट कर रहे थे जिसमें 15 लोगों की मौत हो गई.

द टेलीग्राफ़ में छपी इस रिपोर्ट में लिखा है, 'पांच दिन बीत चुके हैं लेकिन प्रधानमंत्री ने लखीमपुर खीरी की हिंसा, जिसमें किसानों को एसयूवी कार से कुचला गया, उस पर चुप्पी साधे हुए हैं. इस घटना का आरोप उनकी सरकार के गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा टेनी पर लगाया जा रहा है.'

एक अन्य ट्वीट के ज़रिए प्रधानमंत्री ने कर्नाटक में एक घर के ढह जाने से हुई मौतों पर भी दुख प्रकट किया, लेकिन लखीमपुर पर कोई ट्वीट तक नहीं आया.

गुरुवार को प्रधानमंत्री के आधिकारिक ट्विटर हैंडल से ट्वीट किया गया, ''उत्तर प्रदेश के बाराबंकी में हुए सड़क हादसे से दुखी हूं. जान गंवाने वालों के परिवारों के प्रति मेरी संवेदनाएं ''

छोड़िए X पोस्ट, 1
X सामग्री की इजाज़त?

इस लेख में X से मिली सामग्री शामिल है. कुछ भी लोड होने से पहले हम आपकी इजाज़त मांगते हैं क्योंकि उनमें कुकीज़ और दूसरी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया हो सकता है. आप स्वीकार करने से पहले X cookie policy और को पढ़ना चाहेंगे. इस सामग्री को देखने के लिए 'अनुमति देंऔर जारी रखें' को चुनें.

चेतावनी: तीसरे पक्ष की सामग्री में विज्ञापन हो सकते हैं.

पोस्ट X समाप्त, 1

गुरुवार को बाराबंकी के एक गांव में एक बस और बालू से भरे ट्रक के बीच हुई टक्कर में 15 लोगों की मौत हो गई और 21 लोग ज़ख़्मी हो गए. इसके बाद पीएमओ ने ट्वीट के ज़रिए मृतकों के परिवार को दो लाख रुपये और हादसे में घायल हुए परिवार को 50 हज़ार रुपये के मुआवज़ा का एलान किया.

लेकिन ये बयान लखीमपुर हिंसा में मारे गए लोगों के पाड़ित परिवारों को 'नाराज़' कर रहा है. वह पूछ रहे हैं कि ''प्रधानमंत्री लखीमपुर की घटना पर चुप्पी साधे हुए हैं और इसके अलावा हर घटना पर प्रतिक्रिया दे रहे हैं, वो हिंसा जिसके लिए उनके ही गृह राज्य मंत्री ज़िम्मेदार है, उसे लेकर वह चुप हैं.''

अख़बार के मुताबिक पीएम मोदी कहते हैं कि उनकी सरकार ''लोगों के उन तक पहुंचने का इंतज़ार नहीं करती, बल्कि ख़ुद लोगों तक पहुंचती है,'' लेकिन लखीमपुर के पीड़ित परिवार पूछ रहे हैं कि क्यों मोदी और मोदी के मंत्री '' उन तक (पीड़ित परिवारों) नहीं पहुंच रहे हैं.''

प्रधानमंत्री मोदी के आधिकारिक ट्विटर हैंडल से जो दूसरा ट्वीट किया गया है वह कर्नाटक की एक दुर्घटना को लेकर है जिसमें वो लिखते हैं, '' कर्नाटक के बेलगाम में मकान ढहने से लोगों की मौत दुखद है. दुख की इस घड़ी में मेरी संवेदनाएं शोक संतप्त परिजनों के साथ हैं.''

छोड़िए X पोस्ट, 2
X सामग्री की इजाज़त?

इस लेख में X से मिली सामग्री शामिल है. कुछ भी लोड होने से पहले हम आपकी इजाज़त मांगते हैं क्योंकि उनमें कुकीज़ और दूसरी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया हो सकता है. आप स्वीकार करने से पहले X cookie policy और को पढ़ना चाहेंगे. इस सामग्री को देखने के लिए 'अनुमति देंऔर जारी रखें' को चुनें.

चेतावनी: तीसरे पक्ष की सामग्री में विज्ञापन हो सकते हैं.

पोस्ट X समाप्त, 2

इसके अलावा पीड़ितों को वित्तीय सहायता देने का भी एलान किया गया.

लखीमपुर

इमेज स्रोत, HINDUSTAN TIMES/GETTYIMAGES

बीते रविवार को लखीमपुर खीरी में कार से प्रदर्शन कर रहे किसानों को रौंदा गया. आरोप है कि ये कार मोदी सरकार में गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा टेनी की है और इनमें से एक कार में उनके बेटे भी थे. हालांकि अजय मिश्रा टेनी का दावा है कि वह और उनके बेटे घटना स्थल पर मौजूद नहीं थे.

अख़बार के मुताबिक़, इस घटना के बाद लखनऊ दौरे पर पहुंचे प्रधानमंत्री ने इसे लेकर चुप्पी साधे रखी. यही नहीं उत्तराखंड के ऋषिकेश में वह सत्ता में अपने 20 साल पूरे होने पर ख़ुद की ही पीठ थपथपाते दिखे.

उन्होंने कहा, '' मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं राज्य के मुख्यमंत्री से प्रधानमंत्री तक का सफ़र तय करूंगा. आज से ठीक 20 साल पहले मुझे लोगों की सेवा करने का एक नया मौका मिला था. ''

7 अक्टूबर, 2001 को वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बतौर गुजरात सीएम पद संभाला था.

ब्रिटेन

इमेज स्रोत, Getty Images

EWS कोटा के लिए आठ लाख की सालाना आमदनी केंद्र ने कैसे तय की-SC

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को केंद्र सरकार से पूछा है कि उसने मेडिकल प्रवेश में 10% आरक्षण के लिए आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (ईडब्ल्यूएस) के लिए 8 लाख सालाना आमदनी की रक़म को किस आधार पर तय किया है.

द हिंदू में छपी ख़बर के मुताबिक़ सुप्रीम कोर्ट का सवाल महत्वपूर्ण है क्योंकि साल 2019 में 103वां संवैधानिक संशोधन करके 10% ईडब्ल्यूएस कोटा पेश किया गया था, जो सवर्ण वर्ग के आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों को आरक्षण देता है. आरक्षण के लिए आर्थिक मानदंड को एकमात्र आधार बनाने को लेकर किया गया ये संशोधन सवालों के घेरे में है.

इस आरक्षण को लेकर सवाल उठाए गए कि आर्थिक आधार पर आरक्षण का लाभ देना कैसे उचित है, इस आरक्षण को चुनौती देता एक मामला सुप्रीम कोर्ट की एक बड़ी बेंच के अधीन है.

अदालत ने ये बात नीट उम्मीदवारों की दायर याचिका की सुनवाई के दौरान कहा, इस याचिका में केंद्र सरकार की इस साल 29 जुलाई लिए गए उस फ़ैसले को चुनौती दी गई है, जिसमें ओबीसी को 27% कोटा और अखिल भारतीय कोटा श्रेणी में ईडब्ल्यूएस को 10% आरक्षण देने की घोषणा की गई है.

ब्रिटेन ने कहा- दो डोज़ लेने वाले भारतीयों को नहीं करना होगा क्वारंटीन

ब्रितानी सरकार सरकार ने 11 अक्टूबर से भारतीय यात्रियों पर ब्रिटेन पहुंचने के बाद लगाई जाने वाली पाबंदी को वापस ले लिया है. अगर भारतीयों ने कोविशील्ड या यूके की मंज़ूरी वाली किसी भी वैक्सीन की दो डोज़ ली है तो उन्हें क्वारंटीन नहीं करना होगा.

इंडियन एक्सप्रेस में छपी ख़बर के मुताबिक़, गुरुवार को इसका एलान करते हुए भारत में ब्रिटेन के राजदूत एलेक्सी एलिस ने कहा, ''सोमवार, 11 अक्टूबर से, भारत से ब्रिटेन जाने वाले यात्रियों को कोविशील्ड या यूके के नियामक द्वारा मान्यता प्राप्त किसी वैक्सीन की दो ख़ुराक़ लगने के बाद क्वारंटीन करने की ज़रूरत नहीं है. अब ब्रिटेन जाना आसान और सस्ता होगा. यह अच्छी ख़बर है ''

माना जा रहा है कि ब्रिटेन के इस फ़ैसले के बाद भारत भी ब्रिटिश नागरिकों पर लगाए जाने वाले प्रतिबंधों को वापस ले लेगा. हालांकि अब तक सरकार की ओर से इसपर कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है.

हाल ही में भारत ने ब्रिटेन के ख़िलाफ़ जवाबी क़दम उठाते हुए भारत की यात्रा करने वाले ब्रिटिश नागरिकों के लिए भी कोविड-19 को लेकर सख़्ती बरतने का फ़ैसला किया था. इसके तहत भारत आने वाले सभी ब्रिटिश नागरिकों को, चाहे उनकी वैक्सीन की स्थिति जो भी हो, इनका पालन करना होगा.

ब्रिटिश नागरिकों को भारत यात्रा के लिए प्रस्थान से 72 घंटे पहले तक की आरटीपीसीआर निगेटिव रिपोर्ट साथ रखनी होगी. भारत में उनके आगमन के बाद हवाईअड्डे पर उनकी कोविड-19 आरटीपीसीआर जांच की जाएगी. वैक्सीन की डोज़ लगे होने के बाद भी ब्रिटेन से आने वाले यात्रियों को 10 दिनों के लिए होम क्वारंटीन या उनके गंतव्य पर क्वारंटीन में रहना होगा.

वरूण

इमेज स्रोत, Getty Images

बीजेपी ने राष्ट्रीय कार्यकारिणी से वरुण गांधी को हटाया

बीजेपी ने हाल के हफ्तों में सरकार की नीतियों की आलोचना करने वाले कुछ नेताओं को पार्टी के महत्वपूर्ण निर्णय लेने वाली राष्ट्रीय कार्यकारी समिति से हटा दिया है. पार्टी ने इस समिति के सदस्यों की एक नई लिस्ट जारी की है.

हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, तीन कृषि क़ानूनों को लेकर सरकार की आलोचना करने वाले पीलीभीत के सांसद वरुण गांधी और उनकी मां मेनका गांधी को राष्ट्रीय कार्यकारी समिति से हटा दिया गया है.

इसके अलावा पूर्व केंद्रीय मंत्री रहे चौधरी वीरेंद्र सिंह को भी नई लिस्ट में जगह नहीं दी गई है. वीरेंद्र सिंह बीते साल रोहतक में कृषि क़ानून के ख़िलाफ़ किसानों के प्रदर्शन में शामिल हुए थे.

इन नेताओं को हटा कर उनकी जगह कांग्रेस से बीजेपी में आए ज्योतिरादित्य सिंधिया, एस. जयशंकर और अनुराग ठाकुर को राष्ट्रीय कार्यकारी सदस्य चुना गया है.

राष्ट्रीय कार्यकारिणी में 80 सदस्य होते हैं और पार्टी के अंदर और बाहर कोई भी फ़ैसले लेने में इसकी अहम भूमिका होती है. लखीमपुर हिंसा के बाद वरुण गांधी सरकार के रवैये को लेकर लागातार ट्वीट कर रहे थे. माना जा रहा है कि इससे नाराज़ पार्टी ने उन्हें बाहर का रास्ता दिखाया है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)