लखीमपुर खीरीः किन परिस्थितियों में हुई पत्रकार रमन कश्यप की मौत? - बीबीसी ग्राउंड रिपोर्ट

- Author, दिलनवाज़ पाशा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, लखीमपुर खीरी से
उत्तर प्रदेश के लखीमपुर के तिकुनिया में हुई हिंसा में मारे गए 8 लोगों में 35 वर्षीय स्थानीय पत्रकार रमन कश्यप भी शामिल हैं.
पेशे से शिक्षक रमन कश्यप ने हाल ही में स्थानीय स्तर पर पत्रकारिता शुरू की थी. रविवार को वो केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्र और उत्तर प्रदेश के उप-मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के ख़िलाफ़ किसानों का प्रदर्शन कवर करने गए थे.
इस दौरान संदिग्ध परिस्थितियों में उनकी मौत हो गई. उनके परिवार को उनका शव अगले दिन सुबह लखीमपुर खीरी अस्पताल की मोर्चरी में मिला. रमन कश्यप की मौत को लेकर मीडिया रिपोर्टों में कई तरह के दावे किए जा रहे हैं. हालांकि उनकी पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट से स्पष्ट हुआ है कि ना ही उन्हें गोली लगी थी और ना ही डंडों से पीटा गया था.
बीबीसी ने उनकी पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट देखी है जिसके मुताबिक़ उनके शरीर पर खरोंच और रगड़ के निशान थे. रिपोर्ट के मुताबिक़ उनकी मौत पोस्टमॉर्टम से क़रीब आधा दिन पहले हुई थी. उनके माथे पर भी चोट का निशान था. रमन कश्यप का पोस्टमॉर्टम चार अक्तूबर को सुबह पाँच बजे शुरू हुआ था.
रिपोर्ट के मुताबिक़ उनकी मौत अत्यधिक ख़ून बहने की वजह से हुई थी. बीबीसी ने उनके शव की जो तस्वीरें देखी हैं, उनमें उनके शरीर पर रगड़ और छिलने के निशान हैं.

किन परिस्थितियों में हुई रमन कश्यप की मौत?
लखीमपुर खीरी के निघासन क़स्बे के रहने वाले रमन कश्यप ने कुछ महीने पहले ही स्थानीय स्तर पर पत्रकारिता शुरू की थी. तिकुनिया में किसानों के प्रदर्शन को कवर करने के लिए वो निघासन के अन्य पत्रकारों के साथ दिन में क़रीब बारह बजे तिकुनिया पहुंचे थे.
बीबीसी ने उनके फ़ोन से कवरेज के दौरान रिकॉर्ड किए गए वीडियो देखे हैं. उन्होंने किसानों के पैदल मार्च, हेलीपैड पर किसानों के क़ब्ज़े और पुलिस की मौजूदगी के वीडियो बनाए हैं. उनके फ़ोन में गाड़ी के किसानों पर चढ़ने या इसके बाद का कोई वीडियो रिकॉर्ड नहीं है.
घटनास्थल पर उनके साथ मौजूद स्थानीय पत्रकार योगेश के मुताबिक़, जब किसानों पर गाड़ी चढ़ी उस समय रमन कश्यप बिलकुल उनके पास ही खड़े थे. योगेश बताते हैं, ''मैं, मेरे सहयोगी पत्रकार सुरजीत सिंह चानी एक साथ खड़े थे और रमन हमारे पीछे थे. जैसे ही गाड़ी आई पत्रकार साथी सुरजीत घायल हो गए. मेरा पूरा ध्यान उन पर चला गया. मैंने पीछे पलटकर देखा तो रमन दिखाई नहीं दिए.''

योगेश कहते हैं, 'सबकुछ इतनी तेज़ी से हुआ कि अफ़रा-तफ़री मच गई. जब रमन नहीं दिखे तो मैंने तीन बजकर आठ मिनट पर उनको फ़ोन किया तो फोन नहीं उठा. मैंने फिर फ़ोन किया तो किसी व्यक्ति ने फ़ोन उठाया और बताया कि ये फ़ोन उन्हें मिला है और उनसे लिया जा सकता है.''
रमन के साथ कवरेज पर मौजूद एक अन्य स्थानीय पत्रकार के मुताबिक़, जब वो नहीं दिखे तो उन्हें खोजने की कोशिश की. लेकिन वो नहीं मिले. बीबीसी ने घटना के समय के जो वीडियो देखे हैं उनके मुताबिक किसानों के बीच कारें दोपहर में तीन बजकर एक मिनट पर आई हैं.
योगेश ने अपने फ़ोन से रिकॉर्ड एक वीडियो दिखाया जिसमें प्रदर्शनकारी किसान उनके हाथ से मोबाइल छीन रहे हैं. ये वीडियो ठीक तीन बजे का है.
योगेश कहते हैं, ''मैंने किसानों से अपना फ़ोन लेकर जेब में रखा ही था कि गाड़ियां आ गईं और मेरे बगल में खड़े चानी घायल हो गए. रमन इस समय तक ठीक मेरे पीछे खड़े थे. लेकिन इसके बाद वो हमें दिखाई नहीं दिए.''

कैसे मिला रमन का शव?
तिकुनिया थाने की पुलिस ने रमन के शव को लखीमपुर खीरी ज़िला अस्पताल की मोर्चरी भिजवाया था. तिकुनिया के एसएचओ बालेंदु के मुताबिक पुलिस को जो भी घायल मिले उन्हें अस्पताल भेजा गया और जो मृत थे उन्हें मोर्चरी भेजा गया.
अलग-अलग सूत्रों से जो जानकारी बीबीसी को मिली है उसके मुताबिक़ शवों को 6 बजे के क़रीब तिकुनिया से मोर्चरी के लिए भेजा गया. घटना के बाद और शव मिलने तक रमन कश्यप के साथ क्या हुआ ये स्पष्ट नहीं हो सका है.
लेकिन बीबीसी ने रमन कश्यप के साथ कवरेज कर रहे जितने भी पत्रकारों से बात की सभी का यही कहना था कि घटना के बाद वो मिल नहीं रहे थे और उन्हें खोजने की कोशिश की गई थी.
सुरजीत चानी बताते हैं, ''मुझे हल्की चोट लगी थी, जहां मैं खड़ा था वहां दो लोग घायल पड़े थे, मैं अपनी कार से उन्हें लेकर तिकुनिया अस्पताल पहुंचा और वहां अपना भी इलाज कराया. बाद में मुझे पता चला कि घटना में लोगों की मौत हुई है और गाड़ियों को फूंक दिया गया है. रमन कश्यप के लापता होने का पता मुझे शाम को चल पाया.''
रमन के परिवार को ये तो पता था कि वो कवरेज के लिए गए हैं, लेकिन उनके लापता होने के बारे में जानकारी नहीं थी. रमन के छोटे भाई पवन बताते हैं, "मैं नैनीताल से लौट रहा था जब मुझे तिकुनिया में हुई घटना की ख़बर मिली. मैंने तुरंत रमन को फ़ोन लगाया, लेकिन नहीं लगा. उनके बारे में जानकारी जुटाने की कोशिश की तो नहीं मिली."
जब रमन के लापता होने का पता उनके परिवार को चला तो उन्हें खोजने की कोशिश की गई. लेकिन घटना के बाद घटनास्थल को पुलिस ने अपने नियंत्रण में ले लिया था और वहां किसी को जाने नहीं दिया जा रहा था.

रमन के पिता राम दुलारे कहते हैं कि उन्हें भी घटनास्थल के क़रीब नहीं जाने दिया गया था. रामदुलारे कहते हैं, ''जब हमारा बेटा नहीं मिला तो हम यही दुआ कर रहे थे कि वो घायल हो और अस्पताल में हो. हमने उसे देर रात तक खोजा, लेकिन कोई जानकारी हमें नहीं मिली.''
इसी बीच परिवार ने उनके लापता होने की अपील सोशल मीडिया पर जारी कर दी थी और फ़ेसबुक पर भी उनके बारे में पोस्ट किए जाने लगे थे.
परिवार को उनकी मौत का पता कैसे चला?
रमन के छोटे भाई पवन कश्यप के मुताबिक रात को तीन बजे के क़रीब उनके फ़ोन पर तिकुनिया थाने की पुलिस की कॉल आई थी, लेकिन वो कॉल उठा नहीं पाए. कुछ देर बाद पुलिस ने उनके चाचा को फ़ोन किया और लखीमपुर खीरी मोर्चरी पहुंचने के लिए कहा गया.
पवन कहते हैं, ''हम लोग सुबह चार बजे के क़रीब मोर्चरी पहुंचे. मेरे भाई पवन का शव घटना में मारे गए बीजेपी समर्थकों के साथ ज़मीन पर रखा था. परिवार ने उनके कपड़ों से उनकी पहचान की.''
पवन कहते हैं, ''भैया मोर्चरी में ज़मीन पर पड़े हुए थे. उनके शरीर से ताज़ा ख़ून बह रहा था. पुलिस ने उन्हें अस्पताल नहीं पहुंचाया बल्कि सीधे मोर्चरी पहुंचाया. उनके शरीर पर चोटें इतनी गंभीर नहीं थीं कि उनकी मौत हो जाए, यदि उन्हें डॉक्टरों को दिखाया गया होता तो वो बच जाते.''
उनके शव की तस्वीरें दिखाते हुए पवन कहते हैं, ''मैंने उनके शरीर की एक-एक चोट देखी. कहीं भी पीटे जाने का निशान नहीं था. सड़क पर घिसटने की खरोंचे थीं. उनकी बांह से कोलतार चिपका था, शरीर में कई जगह बजरी लगी थी जैसे वो कार के साथ दूर तक घिसटे हों. कोई भी चोट गंभीर नहीं थी."
कई मीडिया रिपोर्टों में ये दावा किया गया था कि रमन कश्यप को घटना के बाद प्रदर्शनकारी किसानों ने पीट-पीटकर मारा था. इस सवाल पर पवन कहते हैं, "हमने उनके शव को बहुत ध्यान से देखा था. शरीर पर कहीं भी ऐसी चोट नहीं थी जिससे लगे कि उन्हें पीटा गया हो. हमें लगता है कि उन पर गाड़ी चढ़ी है और हमने उनकी मौत के संबंध में तहरीर भी गाड़ी मालिक के ख़िलाफ़ ही दी है."

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वहीं रामदुलारे कहते हैं, "हम ये बिल्कुल भी नहीं मानते कि हमारे बेटे के साथ मारपीट हुई. हमने उसकी चोटों को बहुत ध्यान से देखा. हमें लगता है कि वो गाड़ी की चपेट में आकर घायल हुआ और फिर किसी ने उसकी सुध नहीं ली. यदि उसे तब भी अस्पताल पहुंचा दिया गया होता तो वो ज़रूर बच जाता."
पवन कहते हैं, "मैं नहीं जानता कि मेरे भाई की मौत के बारे में अफ़वाहें क्यों फैलाई जा रही हैं. मेरा भाई पत्रकार था वो ना किसानों की तरफ़ था और ना ही गाढ़ी चढ़ाने वालों की तरफ़. वो वहां अपना काम कर रहा था. उसकी मौत किन परिस्थितियों में हुई इसकी गंभीरता से जांच होनी चाहिए और पूरा सच सामने आना चाहिए. हम ये जानना चाहते हैं कि मेरा भाई पुलिस को किन परिस्थितियों में मिला था और उसे अस्पताल क्यों नहीं पहुंचाया गया."
पवन सवाल करते हैं, "घटनास्थल से एक किलोमीटर दूर तिकुनिया सीएचसी (कम्युनिटी हेल्थ सेंटर) था, बीस किलोमीटर दूर निघासन सीएचसी था, लेकिन मेरे भाई को अस्पताल नहीं पहुंचाया गया बल्कि सीधे मोर्चरी भेजा गया. ऐसा क्यों किया गया हम इसका जवाब जानना चाहते हैं."
जिस एंबुलेंस से रमन की बॉडी को मोर्चरी भिजवाया गया उसका ड्राइवर उनका पारिवारिक दोस्त है. लेकिन उसने भी उनकी बॉडी की पहचान नहीं की थी. पवन कहते हैं, ''ड्राइवर ने हमें बताया है कि वो शाम को छह बजे के क़रीब बॉडी को लेकर निकले थे और पुलिस ने सीधे उनसे मोर्चरी पहुंचने के लिए कहा था.''

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बीबीसी ने इस एंबुलेंस ड्राइवर और पवन के बीच फ़ोन पर हुई बातचीत को सुना है जिसमें वो कह रहे हैं कि बिना किसी लिखा-पढ़ी के जल्दबाज़ी में बॉडी को एंबुलेंस में डाला गया था और सीधे मोर्चरी पहुंचने के लिए कहा गया था.
पवन तिकुनिया थाने के एसएचओ बालेंदु पर लापरवाही का आरोप लगाते हुए कहते हैं कि यदि पुलिस ने अपना काम ठीक से किया होता तो उनके भाई की जान बच जाती.
पवन कहते हैं, ''रमन हमेशा अपने साथ कमर से बांधकर एक बैग रखते थे जिसमें उनकी पहचान से जुड़े सभी दस्तावेज़ होते थे. उस दिन भी वो बैग उनके साथ था, लेकिन हमें शव के साथ वो बैग नहीं मिला. उनकी पहचान से जुड़े सभी दस्तावेज़ ग़ायब हैं.''
बीबीसी ने जब एसएचओ बालेंदु से पूछा कि उन्हें रमन किन परिस्थितयों में मिले थे तो उन्होंने कहा कि अभी ये पता नहीं चल पाया है कि उनकी बॉडी किस स्थिति में मिली थी. इस मामले के जांच अधिकारी भी एसएचओ बालेंदु ही हैं. वो कहते हैं, ''हम घटना की सभी कड़ियां जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं. जांच के बाद ही स्पष्ट हो पाएगा कि क्या हुआ था.''

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क्या जब उन्होंने बॉडी देखी तब उन्हें पता था कि ये पत्रकार रमन हैं? इस सवाल पर उन्होंने कहा, ''हमें अज्ञात शव मिला था जिसे हमने बाकी शवों की तरह अस्पताल भिजवाया था. उनकी पहचान स्पष्ट नहीं थी. बाद में सोशल मीडिया के ज़रिए हमें पता चला कि एक पत्रकार लापता हैं तब हमने उनके परिवार से पहचान के लिए संपर्क किया.''
वहीं पवन अपना आरोप दोहराते हुए कहते हैं, ''पुलिस को ये स्पष्ट करना चाहिए कि मेरे भाई के शव को सीधे मोर्चरी क्यों भेजा गया, किसी डॉक्टर ने उन्हें क्यों नहीं देखा, किसने तय किया कि उनकी जान जा चुकी है?'' पवन कहते हैं, "मैं अब अपने भाई को न्याय दिलाने के लिए संघर्ष करूंगा. मैं पत्रकारों की सुरक्षा के लिए क़ानून बनाने के लिए भी संघर्ष करूंगा."
इसी बीच यूपी सरकार ने 45 लाख रुपए की सहायता राशि रमन कश्यप के परिवार को दी है. सरकार ने उनकी विधवा को सरकारी नौकरी देने का वादा भी किया है. कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी और राहुल गांधी ने भी पीड़ित परिवार के घर पहुंचकर मुलाक़ात की है.
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