बीएचयू में 'हिन्दू स्टडीज़' कोर्स शुरू करने की ज़रूरत आख़िर क्यों पड़ी?

बीएचयू का सिंहद्वार

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    • Author, समीरात्मज मिश्र
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में छात्रों को हिन्दू धर्म की शिक्षा देने के लिए एक विशेष पाठ्यक्रम संचालित किया जा रहा है जिसमें हिन्दू धर्म से जुड़े शास्त्रों और ग्रंथों के बारे में जानकारी दी जाएगी. दो साल के इस परास्नातक पाठ्यक्रम का संचालन इसी साल से शुरू हो रहा है जिसमें प्रवेश प्रक्रिया भी शुरू हो गई है.

पाठ्यक्रम की शुरुआत बीएचयू के कला संकाय के इंडिया स्टडीज सेंटर यानी भारत अध्ययन केंद्र की ओर से की जा रही है जिसमें तीन विभागों के सहयोग से इस पाठ्यक्रम को संचालित किया जाएगा.

भारत अध्ययन केंद्र के प्रमुख और इस पाठ्यक्रम के संयोजक प्रोफ़ेसर सदाशिव द्विवेदी बताते हैं, "विश्वविद्यालय के सौ साल के इतिहास में यह पहली बार हो रहा है कि तीन विभागों के सहयोग से कोई एक पाठ्यक्रम संचालित हो रहा है. इसके बारे में यूजीसी के साथ देश के कई विद्वानों से चर्चा हुई जिसके बाद इस पाठ्यक्रम पर सहमति बनी. यूजीसी के चेयरमैन प्रोफ़ेसर डीपी सिंह का सुझाव था कि काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के साथ हिन्दू शब्द जुड़ा है तो इस पाठ्यक्रम की शुरुआत भी यहीं से की जाए."

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क्या पढ़ाया जाएगा?

पाठ्यक्रम के संचालन में मुख्य भूमिका दर्शन विभाग की होगी जो हिंदू धर्म की आत्मा, महत्वाकांक्षाओं और हिंदू धर्म की रूपरेखा के बारे में बताएगा जबकि प्राचीन इतिहास और संस्कृति विभाग की भूमिका प्राचीन व्यापारिक गतिविधियों, वास्तुकला, हथियारों, महान भारतीय सम्राटों और उनके उपयोग में आने वाले उपकरणों इत्यादि के बारे में जानकारी देने की रहेगी. इसके अलावा संस्कृत विभाग प्राचीन शास्त्रों, वेदों और प्राचीन अभिलेखों के व्यावहारिक पहलुओं की जानकारी देगा.

प्रोफ़ेसर सदाशिव द्विवेदी ने बीबीसी को बताया कि इस पाठ्यक्रम में देश-विदेश के छात्र प्रवेश ले सकते हैं और मौजूदा सत्र से इसकी शुरुआत हो गई है. फ़िलहाल पाठ्यक्रम में प्रवेश के लिए राष्ट्रीय टेस्टिंग एजेंसी यानी एनटीए की ओर से आवेदन मांगे गए हैं, जिसकी अंतिम तिथि पहले 9 सितंबर थी जिसे बढ़ाकर 14 सितंबर कर दिया गया. अक्टूबर में एनटीए स्क्रीनिंग के लिए प्रवेश परीक्षा आयोजित करेगा. दो साल के इस पाठ्यक्रम में चालीस सीटें निर्धारित की गई हैं.

पाठ्यक्रम में जो विषय पढ़ाए जाएंगे, उन्हें संस्कृत, दर्शनशास्त्र, इतिहास, आदि विषयों में भी पढ़ाया जाता है. फिर भी इस पाठ्यक्रम की ज़रूरत क्यों पड़ी?

इस सवाल के जवाब में प्रोफ़ेसर द्विवेदी कहते हैं, "यह शुद्ध शैक्षणिक उपक्रम है. विचारधारा से जोड़कर नहीं देखना चाहिए. भारतवर्ष में जो सिद्धांत बने, वो कैसे बने और उन्हें कैसे व्यवहार में लाया गया, यह पढ़ाएंगे. जो सर्वमान्य बातें हैं वो पढ़ाई जाएंगी, किसी विचारधारा से जुड़ी बातें नहीं पढ़ाई जाएंगी. हमारे शास्त्रों की तमाम अपव्याख्याएं होती रहती हैं जिसका दुष्परिणाम यह होता है कि हमारी पीढ़ियां उनका जवाब नहीं दे पातीं और जब जवाब नहीं दे पातीं तो हमें शर्मिंदा होना पड़ता है. इसी लक्ष्य को पूरा करने के लिए इसे शुरू किया जा रहा है कि यदि विश्व स्तर पर कोई ग़लत व्याख्या हो रही हो तो उसका तार्किक समाधान प्रस्तुत किया जा सके."

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समिति ने दी मंज़ूरी

प्रोफ़ेसर सदाशिव द्विवेदी के मुताबिक, इस कोर्स के ज़रिए भारतीय संस्कृति और हिंदू धर्म को वैज्ञानिक नज़रिए से समझने में मदद मिलेगी. यह पाठ्यक्रम परास्नातक यानी मास्टर स्तर पर होगा और इसमें किसी भी विषय से स्नातक करने वाले छात्र प्रवेश ले सकेंगे. इस पाठ्यक्रम में चार सेमेस्टर होंगे जिनमें 16 प्रश्न पत्र प्रस्तावित किए गए हैं जिनमें नौ अनिवार्य और सात वैकल्पिक प्रश्नपत्र होंगे. पाठ्यक्रम में प्राचीन युद्ध कलाओं, हिंदू रसायन विज्ञान, सैन्य विज्ञान, कला, शास्त्रीय संगीत इत्यादि विषय भी शामिल हैं.

पाठ्यक्रम के बारे में निर्णय लेने वाली समिति में जेएनयू के प्रो. रामनाथ झा, आइआइटी-कानपुर के प्रो. नचिकेता तिवारी, प्रो. कमलेश दत्त त्रिपाठी, लोकगायिका मालिनी अवस्थी, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र वाराणसी के निदेशक प्रोफ़ेसर विजय शंकर शुक्ल जैसे कई लोग शामिल थे. लंबे विचार-विमर्श के बाद समिति ने इस पाठ्यक्रम पर अपनी संस्तुति दी.

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विश्वविद्यालय से जुड़े लोगों का दावा है कि इस पाठ्यक्रम को लेकर देश से ज़्यादा विदेशों में लोगों की रुचि है जबकि विश्वविद्यालय के ही कुछ प्रोफ़ेसर इस तरह के पाठ्यक्रमों के औचित्य पर सवाल उठाते हैं. विश्वविद्यालय के एक वरिष्ठ प्रोफ़ेसर नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं, "पाठ्यक्रम में कोई नया विषय नहीं जोड़ा गया है. इसका मक़सद सिर्फ़ एक ख़ास विचारधारा के आधार पर प्राचीन धर्मग्रंथों और ऐतिहासिक तथ्यों की मनमाने तरीक़े से व्याख्या करना है. चूंकि ऐसी मान्यताओं के पीछे वैज्ञानिक तर्क तो होता नहीं, इसलिए उसे पाठ्यक्रम से जोड़कर अकादमिक वैधानिकता देने की कोशिश की जा रही है."

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आर्थिक मदद की पेशकश

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में इस तरह के अभी कुछ और पाठ्यक्रम भी संचालित करने की तैयारी हो रही है. हिन्दू स्टडीज़ पाठ्यक्रम से जुड़े और विश्वविद्यालय में राजनीति शास्त्र के प्रोफ़ेसर कौशल किशोर मिश्र कहते हैं कि जल्दी ही 'काशी स्टडीज़ कोर्स' और 'मालवीय स्टडीज़ कोर्स' भी संचालित होने वाले हैं जो हिन्दू स्टडीज़ कोर्स से ही जुड़े रहेंगे.

प्रोफ़ेसर कौशल किशोर मिश्र कहते हैं, "अभी ये दोनों कोर्स शुरू नहीं हुए हैं, लेकिन इनकी प्रक्रिया चल रही है. कोर्स शुरू करने की एक लंबी प्रक्रिया होती है. हम लोगों ने पिछले साल इस बारे में विचार-विमर्श करके पाठ्यक्रम तैयार किया है. अब उसे स्वीकृत कराने की प्रक्रिया चल रही है. लेकिन लोगों को जैसे ही पता चला, उन्होंने इन कोर्सेज़ में दिलचस्पी लेनी शुरू कर दी है. मेरे पास यूरोप के कई देशों के अलावा कनाडा और अमरीका से भी ऐसे लोगों के फ़ोन आए जो बनारस के ही हैं लेकिन इन देशों में बस गए हैं. उन लोगों ने तो ख़ुद इसमें एडमिशन लेने में दिलचस्पी दिखाई है और आर्थिक सहायता तक देने की पेशकश की है."

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विश्वविद्यालय के अधिकारियों का भी कहना है कि हिन्दू स्टडीज़ पाठ्यक्रम के लिए भी विदेशों से कई लोगों के फ़ोन और ईमेल आए हैं और कई लोग इसमें रुचि दिखा रहे हैं.

परास्नातक स्तर के इस दो वर्षीय पाठ्यक्रम को पूरा करने के बाद रोज़गार की भी कोई संभावना होगी या नहीं, इस सवाल पर प्रोफ़ेसर सदाशिव द्विवेदी कहते हैं, "अभी यह पाठ्यक्रम भले ही बीएचयू में शुरू हो रहा है लेकिन आने वाले दिनों में सभी विश्वविद्यालयों में चलेगा. ऐसे में छात्रों के लिए अध्यापन का एक विकल्प होगा. हम लोग इस विषय को यूपीएससी और राज्य लोकसेवा आयोगों में भी शामिल कराने की कोशिश करेंगे जिससे कि इस विषय में रोज़गार के अवसर बढ़ें."

देश के कई अन्य विश्वविद्यालयों में भी इस पाठ्यक्रम को संचालित करने की तैयारी हो रही है लेकिन अब तक किसी निजी विश्वविद्यालय ने इसमें दिलचस्पी नहीं दिखाई है. ऐसा माना जा रहा है कि अकादमिक जगत के अलावा इस पाठ्यक्रम के ज़रिए रोज़गार की और कोई संभावना शायद ही हो, इसलिए निजी विश्वविद्यालय इसमें दिलचस्पी दिखाएंगे भी नहीं.

लेकिन काशी स्टडीज़ कोर्स को लेकर प्रोफ़ेसर कौशल किशोर काफ़ी उत्साहित हैं. वो कहते हैं, "बनारस के बारे में एक-एक चीज़ की जानकारी दी जाएगी. यहां की गलियां, खान-पान, संस्कृति इत्यादि की. अन्य क्षेत्रों के अलावा, इस कोर्स को करने के बाद छात्र अच्छे गाइड का भी काम कर सकते हैं. सच बताऊं तो विश्वविद्यालय ऐसा अनोखा कोर्स देने जा रहा है, जिसमें रोज़गार ही रोज़गार होगा."

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