असदउद्दीन ओवैसी बिहार सरकार के अवैध प्रवासियों पर किस फ़ैसले से हैं नाराज़?

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- Author, दिलनवाज़ पाशा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
बिहार सरकार ने पटना हाई कोर्ट के आदेश के बाद अवैध प्रवासियों की पहचान करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है. कई ज़िलों में प्रशासन ने लोगों से अवैध प्रवासियों की पहचान करने और उनके बारे में जानकारी देने की अपील की है.
पटना हाई कोर्ट ने 18 अगस्त को दिए अपने आदेश में बिहार सरकार से अवैध प्रवासियों के मुद्दे पर जागरूकता लाने के लिए कहा था.
अपने आदेश में हाई कोर्ट ने बिहार सरकार को स्थायी हिरासत केंद्र बनाने की योजना पेश करने के लिए भी कहा है.
हाई कोर्ट ने सरकार से कहा है कि वह हिरासत केंद्र बनाए जाने की समयसीमा और स्थान की जानकारी दे.
बिहार में रहने वाले अवैध प्रवासियों की असल संख्या क्या है, इसे लेकर फिलहाल कोई पुख़्ता जानकारी नहीं है. पूरे बिहार में अभी अवैध प्रवासियों को रखने के लिए कोई स्थायी हिरासत केंद्र भी नहीं है.
पटना हाई कोर्ट ने एक अवैध प्रवासी महिला की तरफ़ से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए ये आदेश दिया है.
इस महिला को पटना रेलवे स्टेशन पर अक्तूबर 2015 में रेलवे पुलिस ने हिरासत में लिया था. इस महिला को पटना के नारी निकेतन में रखा गया था.
26 साल की इस महिला को अब वापस बांग्लादेश भेजा जा चुका है. हालाँकि हाई कोर्ट में अब भी इस याचिका पर सुनवाई अभी चल रही है.

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किशनगंज के ज़िलाधिकारी आदित्य प्रकाश की तरफ़ से जारी नोटिस में पटना हाई कोर्ट के आदेश का हवाला देते हुए कहा गया है कि विभिन्न स्थलों, विशेषकर सीमावर्ती क्षेत्रों में निवास कर रहे अवैध प्रवासी लोगों की पहचान कर स्थानीय प्रशासन को सूचित करें.
ज़िलाधिकारी की ओर से जारी इस नोटिस में ये भी कहा गया है कि "अवैध प्रवासियों के बारे में इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया के माध्यम से आम जनता में जागरूकता भी लाई जाए."
ज़िलाधिकारी आदित्य प्रकाश ने बीबीसी से इस नोटिस को जारी करने की पुष्टि करते हुए कहा है कि हाई कोर्ट के आदेश के अनुपालन में यह नोटिस जारी किया गया है.
वहीं ऐसा ही एक नोटिस सिवान के पुलिस अधीक्षक की तरफ से भी जारी किया गया है, जिसमें लोगों से अवैध प्रवासियों और ख़ौसतौर पर 'बांग्लादेशी प्रवासियों' के बारे में नज़दीकी पुलिस स्टेशन पर सूचना देने के लिए कहा गया है.

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इस आदेश पर विवाद क्यों?
सांसद असदउद्दीन ओवैसी ने इस आदेश पर सवाल उठाते हुए कहा है कि बिहार सरकार चोर दरवाज़े से एनआरसी लागू कर रही है.
एक ट्वीट में ओवैसी ने कहा, "अधिकारी आम लोगों से कह रहे हैं कि वो आस-पास रहने वाले 'विदेशी नागरिक' और 'अवैध प्रवासियो' की सूचना नज़दीकी पुलिस स्टेशन को दें. असम में भी ऐसे ही क़ानूनी कार्रवाई का दुरूपयोग बड़े पैमाने पर हुआ है."
एक और ट्वीट में ओवैसी ने कहा, "कई बा-इज़्ज़त भारतीयों पर झूठे मुक़दमे दर्ज किए जा चुके हैं, जिससे लोगों को बहुत ही ज़्यादा मुश्किलात का सामना करना पड़ा है. संघ परिवार के लोग कई सालों से इस झूठ को फैला रहे हैं कि सीमांचल के ग़य्यूर अवाम घुसपैठिए हैं, इस बात में ज़रा भी सच्चाई नहीं है."
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बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अगस्त 2020 में कहा था कि वो नहीं चाहते हैं कि केंद्र सरकार बिहार में एनआरसी (राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर) लागू करे.
उन्होंने अल्पसंख्यकों मुसलमानों को संबोधित करते हुए ये भी कहा था कि जब तक वो हैं, उन्हें डरने की ज़रूरत नहीं है.
भारतीय जनता पार्टी ने देश से अवैध घुसपैठियों को बाहर निकालने का वादा अपने चुनावी घोषणापत्र में किया था और ये पार्टी की अहम नीतियों में शामिल है.
नीतीश कुमार बिहार में भाजपा के साथ मिलकर सरकार चला रहे हैं. नीतीश सरकार एनआरसी के विरोध में रही है.
नीतीश पर निशाना साधते हुए ओवैसी ने कहा, "एक मंसूबा-बंद तरीक़े से बिहारियों और ख़ास कर सीमांचल के लोगों की शहरियत को निशाना बनाएँगे. नीतीश कुमार ने चुनाव के दौरान कहा था कि कोई किसी को देश के बाहर नहीं करेगा, सब भारत के हैं, तो फिर चोर-दरवाज़े वाला एनआरसी क्यों लागू किया जा रहा है?"

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पूरा देश और देशवासी यही काम कर रहे हैं- जदयू
वहीं ओवैसी के ट्वीट पर टिप्पणी करते हुए जदयू के नेता अजय आलोक ने कहा, "विदेशी नागरिक और अवैध प्रवासी आपके लिए भाई-बहन होंगे साहब, बिहार सरकार के लिए नहीं. अगर इनके बारे में सूचित करने को आप एनआरसी लागू करना कहते हैं तो पूरा देश और देशवासी यही काम कर रहे हैं."
अजय आलोक ने बीबीसी से कहा कि बिहार सरकार का एनआरसी पर वही स्टैंड है, जो नीतीश कुमार का 2020 में था.
वहीं जनता दल यूनाइटेड से जुड़े किशनगंज के स्थानीय नेता मास्टर मुजाहिद आलम कहते हैं, "ओवैसी जिस मुद्दे को समझते नहीं है उस पर राजनीति कर रहे हैं."
पूर्व विधायक मास्टर मुजाहिद कहते हैं, "हम बचपन से सुनते आ रहे हैं कि सीमांचल में अवैध प्रवासी रह रहे हैं. दीवारों पर आपत्तिजनक नारे लिखे होते थे. लेकिन आज तक किसी ने किसी अवैध प्रवासी की पहचान नहीं की. ये एक बेबुनियाद मुद्दा है. ये मुद्दा सिर्फ़ वोट बैंक की राजनीति के लिए उठाया जा रहा है."
एनआरसी अभी देश में लागू नहीं है- बीजेपी
वहीं असदउद्दीन ओवैसी के बयान पर टिप्पणी करते हुए बिहार में बीजेपी के नेता और प्रवक्ता निखिल आनंद ने बीबीसी से कहा, 'असादुद्दीन ओवैसी एनआरसी का नाम लेकर बयानबाजी ना करें क्योंकि यह कानून फिलहाल देश में लागू नहीं है. शायद उन्हें समझ की कमी है. वे सिर्फ़ मुसलमानों की भावनाओं को भड़काकर राजनीति करना चाहते हैं. उन्हें लगता है कि वो एनआरसी के नाम पर मुसलमानों की भावना को आसानी से भड़का सकते हैं.'
निखिल आनंद कहते हैं, 'किसी भी देश में कोई भी व्यक्ति बिना पासपोर्ट और वीज़ा के नहीं रह सकता है. जिन्हें राजनीतिक आश्रय या शरणार्थी का दर्जा नहीं मिला हो उनके अलावा बाहर से आये सभी लोग अवैध निवासी ही माने जाएंगे. यह सिर्फ़ भारत की ही बात नहीं बल्कि किसी भी देश की बात है. क्या पाकिस्तान, चीन, रूस या अमेरिका ऐसे अवैध लोगों को आश्रय देते है?'
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प्रशासन के इस नोटिस का मकसद ऐसे लोगों के बारे में जानकारी हासिल करना है जो अवैध रूप से बिहार में रह रहे हैं.
क्या इस नोटिस से स्थानीय लोगों में हलचल है. इस सवाल पर मुजाहिद कहते हैं, "अगर कोई विदेशी पहचान छुपाकर अवैध तरीक़े से रह रहा है तो उसकी पहचान किए जाने से किसी को विरोध क्यों हो सकता है? हमारा स्टैंड साफ़ रहा है, अगर कोई अवैध रूप से रह रहा है तो उसकी पहचान की जानी चाहिए. उस पर क़ानूनी कार्रवाई भी होनी चाहिए, हमें उससे कोई हमदर्दी नहीं है."
मुजाहिद कहते हैं, "19 दिसंबर 2019 को बिहार के मुस्लिम संगठनों ने ये मामला मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से मुलाक़ात करके उठाया था. नीतीश कुमार ने इसके बाद ही कहा था कि बिहार में एनआरसी लागू नहीं होगा और एनपीआर भी पुराने फ़ॉर्मेट पर ही होगा. हमारा स्टैंड आज भी यही है."
वहीं प्रशासन के नोटिस पर सवाल खड़े करने को ग़ैरज़रूरी बताते हुए आनंद कहते हैं, 'भारत में संघीय व्यवस्था है और जिस बात पर असदुद्दीन ओवैसी अन्यथा का बयान देकर मुसलमानों की भावनाएं भड़का रहे हैं वह एक सामान्य पुलिस प्रक्रिया है. यह बात किसी से नहीं छुपी है कि बिहार के सीमांचल इलाक़े किशनगंज, कटिहार, अररिया आदि ज़िलों सहित कई अन्य जगहों पर बड़ी संख्या में अवैध निवासी प्रवास कर रहे हैं. ऐसे निवासियों की सूची सरकार को निश्चित तौर पर बनानी चाहिए.'
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वहीं सीमांचल पर नज़र रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार हसन जावेद कहते हैं, "बिहार में ये कोई अहम मुद्दा नहीं है. राज्य सरकार भी कई बार इसे नकार चुकी है. हाँ, जब ऐसी बात होती है तो सीमांचल के क्षेत्र को विशेष रूप से टारगेट किया जाता है. यहाँ के लिए वास्तव में ये मुद्दा सियासी है. ज़मीनी हक़ीक़त से कुछ लेना देना नहीं है और न ही अल्पसंख्यक समाज में कोई दहशत है."
हसन जावेद कहते हैं, "बांग्लादेशी के बजाए नेपाली नागरिक भारतीय हिस्से में खुलेआम प्रवेश करते हैं. जिन्हें चेक आउट कर बाहर करने की ज़रूरत है लेकिन इस दिशा में प्रशासन ने कोई क़दम नहीं उठाया है."
ये सवाल भी उठ रहा है कि सरकार के इस आदेश का ग़लत फ़ायदा उठाया जा सकता है और लोगों के बारे में झूठी या ग़लत सूचना दी जा सकती है. इस पर मुजाहिद कहते हैं, "प्रशासन ग़लत सूचना पर कार्रवाई नहीं करता है. अगर किसी को ग़लत तरीक़े से टारगेट किया जाएगा, तो उसकी आवाज़ को पुरज़ोर तरीक़े से उठाया जाएगा."
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वहीं पूर्व आईपीएस अधिकारी विभूति नारायण राय कहते हैं कि इस आदेश पर सवाल उठाना सही नहीं है. अगर प्रशासन संदिग्ध लोगों के बारे में जानकारी देने की अपील करता है, तो इसमें कुछ भी ग़लत या ग़ैर क़ानूनी नहीं है.
विभूति नारायण कहते हैं, "अगर कोई किसी जेबकतरे के बारे में पुलिस को सूचना देता है तो इसमें कुछ ग़लत नहीं होता, ऐसे ही किसी संदिग्ध के बारे में पुलिस या प्रशासन को सूचित करने में या ऐसे संदिग्धों की जानकारी मांगने में कुछ भी ग़लत नहीं है."
नारायण कहते हैं, "जहाँ तक दुरुपयोग का सवाल है, तो ये किसी भी क़ानून का किया जा सकता है. सिर्फ़ दुरुपयोग की आशंका के चलते किसी आदेश को ग़लत नहीं ठहराया जा सकता."
दस्तावेज़ मुहैया कराना हो सकता है मुश्किल
वहीं पत्रकार हसन जावेद कहते हैं कि सीमांचल में इससे बड़ा मुद्दा दस्तावेज़ों की उपलब्धता है. जावेद के मुताबिक़ इस इलाक़े में बहुत से लोग ऐसे रहते हैं, जिनके पास अपने दस्तावेज़ नहीं है.
जावेद कहते हैं, "यहाँ हर साल बाढ़ आती है, अभी भी पूर्णिया ज़िले का बड़ा हिस्सा बाढ़ में डूबा है. ऐसे में बहुत से लोगों के दस्तावेज़ या तो ख़राब हो गए हैं या खो गए हैं. असल समस्या तब आएगी जब ऐसे लोगों से दस्तावेज़ दिखाने के लिए कहा जाएगा."
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