भारतीय सेना में अधिक महिलाओं के शामिल होने का रास्ता साफ़

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भारत की सुप्रीम कोर्ट ने अधिक संख्या में महिलाओं के सेना से जुड़ने का रास्ता साफ़ कर दिया है.
बुधवार को केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि महिलाएं मिलिट्री कॉलेज में दाख़िला ले सकती हैं और वो स्थायी कमिशन के लिए पात्र होंगी.
एक महीने से भी कम समय पहले कोर्ट ने महिलाओं को नेशनल डिफेंस अकादमी (एनडीए) की परीक्षा में बैठने की अनुमति दी थी, जिसके बाद सरकार का ये फ़ैसला आया है.
भारतीय सेना के 1 लाख 40 हज़ार की संख्या वाले सैन्य बलों में केवल 0.56 प्रतिशत महिलाएं हैं.
वायुसेना (1.08 प्रतिशत) और नौसेना (6.5 प्रतिशत) में महिलाओं का प्रतिशत थोड़ा बेहतर है.
सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी की अलोचना की थी
बुधवार को, सरकार ने भारतीय सशस्त्र बलों के संयुक्त प्रशिक्षण संस्थान, एनडीए में महिलाओं के पाठ्यक्रम के लिए गाइडलाइन तैयार करने के लिए समय मांगा.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, "सैन्य बल एक अहम भूमिका निभाते हैं, लेकिन उनमें लैंगिक समानता की ज़रूरत है. हम चाहते हैं कि वो कोर्ट के दख़ल देने से पहले ही लैंगिक समानता सुनिश्चित करने के लिए सक्रिय कदम उठाएं."
अगस्त में कोर्ट ने महिलाओं को एनडीए की परीक्षा में नहीं बैठने देने की केंद्र सरकार की "पुरानी मानसिकता" की आलोचना की थी.
कोर्ट ने कहा था कि, "ये एक नीतिगत फ़ैसला है जो कि लैंगिक असमानता के आधार पर बना है."

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अभी तक महिलाओं की सेना में शॉर्ट सर्विस कमिशन (एसएससी) के तहत भर्ती होती है, स्थायी कमिशन के तहत नहीं, जो पूरे कार्यकाल के लिए सर्विस की अनुमति होती है.
इसलिए महिलाओं को पांच साल सेवा का अवसर मिलता है, जिसे बाद में बढ़ाया जा सकता है, लेकिन उन्हें पुरुषों जैसी सुविधाएं नहीं मिलतीं.
इसमें सेना की कानून और शिक्षा विभाग अपवाद हैं, जहां महिला अफसर साल 2008 से स्थायी कमिशन के योग्य हैं.
महिलाएं सेना में डॉक्टर, नर्स, इंजीनियर, संकेतक, एडमिनिस्ट्रेटर और वकील के तौर पर काम करती रही हैं. उन्होंने जंग के मैदान में सैनिकों का इलाज किया है, विस्फोटकों को हैंडल किया है. माइन खोजे और निष्क्रिय किये हैं और संचार के लिए लाइने बिछाई हैं.
जानकारों का कहना है कि लड़ाई के अलावा महिलाओं ने लगभग सबकुछ किया है. उन्हें इंफेंटरी और बंख़्तबंद सेवा से दूर रखा गया है.
साल 2019 में सरकार ने महिलाओं को स्थायी कमिशन देने की इजाज़त दी थी लेकिन उमरदराज़ महिलाओं की शारीरिक परेशानियों को देखते हुए सरकार ने कहा था कि ये केवल उन अफ़सरों पर लागू होगा तो जिन्होंने 14 साल से कम की सेवा दी है.
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