तालिबान की ये घोषणा और रूस-अमेरिका हुए भारत को लेकर सक्रिय- प्रेस रिव्यू

अजित डोभाल और एस जयशंकर

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तालिबान ने मंगलवार को अफ़ग़ानिस्तान में अपनी सरकार के शीर्ष नेतृत्व की घोषणा कर दी है.

तालिबान ने यह घोषणा काबुल पर क़ब्ज़े के क़रीब एक महीने बाद की है. तालिबान के प्रमुख प्रवक्ता ज़बीहुल्लाह मुजाहिद ने मंगलवार शाम प्रेस कॉन्फ़्रेंस कर कहा कि यह अंतरिम सरकार है और तालिबान के प्रमुख नेता और शूरा काउंसिल के मुखिया मुल्ला मोहम्मद हसन अखुंद कार्यकारी प्रधानमंत्री होंगे.

अफ़ग़ानिस्तान में इससे पहले के तालिबान शासन में मुल्ला अखुंद उप-विदेश मंत्री थे और इनका नाम संयुक्त राष्ट्र की ब्लैकलिस्ट में था.

अंग्रेज़ी अख़बार 'द हिन्दू' की रिपोर्ट के अनुसार अफ़ग़ानिस्तान में इस अहम घटनाक्रम के बीच भारत, अमेरिका और रूस दोनों से नज़दीकी संपर्क में है. अख़बार की रिपोर्ट के अनुसार इस हफ़्ते दोनों देशों का उच्चस्तरीय ख़ुफ़िया प्रतिनिधिमंडल दिल्ली आ रहा है.

द हिन्दू ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है, ''अमेरिकी ख़ुफ़िया एजेंसी सेंट्रल इंटेलीजेंस एजेंसी यानी सीआईए प्रमुख विलियम बर्न्स के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल भारत और पाकिस्तान पहुँच रहा है. यह प्रतिनिधिमंडल भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल से अफ़ग़ानिस्तान को लेकर कई मुद्दों पर बात करेगा.''

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अख़बार ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है, ''रूसी सिक्यॉरिटी काउंसिल के सचिव जनरल निकोलाई पात्रुशेव बुधवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, एनएसए अजित डोभाल और विदेश मंत्री एस जयशंकर से मुलाक़ात करेंगे. इस मुलाक़ात की घोषणा भारत के विदेश मंत्रालय ने ही की है.''

अख़बार का कहना है कि विलियम बर्न्स के दौरे को लेकर भारतीय विदेश मंत्रालय और भारत स्थित अमेरिकी दूतावास ने न तो इनकार किया है और न ही स्वीकार किया है. अमेरिका और रूस के उच्चस्तरीय अधिकारियों के साथ भारत सरकार की बैठक तब हो रही है जब अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान ने अपनी सरकार के नेतृत्व की घोषणा कर दी है. तालिबान ने मुल्ला ग़नी बरादर को उप-प्रधानमंत्री बनाया है.

तालिबान का यह नेतृत्व आने वाले अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों के लिए भी अहम होगा. प्रधानमंत्री मोदी एससीओ (शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गेनाइज़ेशन) और क्वॉड गुट की बैठकों में शामिल होने वाले हैं. दोनों गुटों में रूस और अमेरिका सबसे अहम हैं.

दोनों बैठकों में अफ़ग़ानिस्तान का मुद्दा केंद्र में होगा. जनरल पात्रुशेव रूस के उच्चस्तरीय सुरक्षा अधिकारी हैं. वे 2008 तक सिक्यॉरिटी काउंसिल के सचिव रहे हैं. इससे पहले उन्होंने रूसी ख़ुफ़िया एजेंसी एफ़बीएस की कमान संभाली थी. 24 अगस्त को पीएम मोदी और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच अफ़ग़ानिस्तान को लेकर फ़ोन पर बात हुई थी.

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द हिन्दू का कहना है कि जनरल पात्रुशेव के साथ बैठक भारत और रूस के लिए उस मौक़े की तरह है जिसमें दोनों मुल्क अफ़ग़ानिस्तान में बदलती स्थिति पर अपना-अपना दृष्टिकोण साझा कर सकें.

अमेरिका और रूस की उच्चस्तरीय टीम भारत तब पहुँच रही है जब दोनों देशों के बीच अफ़ग़ानिस्तान को लेकर मतभेद बढ़ रहा है. ऐसा तब है, जब दो साल पहले अफ़ग़ानिस्तान पर समन्वय बनाने के लिए 'ट्रॉइक प्लस' बनाया गया गया था और इसमें चीन, पाकिस्तान को भी शामिल किया गया था.

पिछले हफ़्ते रूस ने अमेरिकी नेतृत्व वाले पश्चिमी देशों पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में इस्लामिक स्टेट (इराक़ और सीरिया केंद्रित) और ईस्टर्न तुर्किस्तान इस्लामिक मूवमेंट के मध्य एशिया में ख़तरों की उपेक्षा का आरोप लगाया था.

तब संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की अध्यक्षता भारत के पास थी. अफ़ग़ानिस्तान पर सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 2593 पर वोटिंग का चीन और रूस ने बहिष्कार किया था.

रूस उन छह देशों में शामिल है जिसका काबुल स्थित दूतावास तालिबान के आने के बाद भी काम कर रहा है. इससे संकेत मिलते हैं कि रूस तालिबान के साथ काम करने को लेकर ज़्यादा उत्साहित है जबकि भारत समेत अमेरिका और उसके सहयोगी पश्चिमी देशों ने काबुल स्थित दूतावासों को क़तर की राजधानी दोहा में शिफ़्ट कर दिया है.

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अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान से एक लाख, 20 हज़ार लोगों को निकाला है. इनमें ज़्यादातर अफ़ग़ान नागरिक ही शामिल हैं. अभी बड़ी संख्या में ऐसे अफ़ग़ान हैं, जो देश छोड़ना चाहते हैं.

द हिन्दू की रिपोर्ट के अनुसार बर्न्स कुछ अफ़ग़ान नागरिकों को काबुल से निकालकर भारत में भी रखने पर बात करेंगे.

भारत ने अफ़ग़ानिस्तान से लोगों को निकालने में कोई उत्साह नहीं दिखाया है. अफ़ग़ानिस्तान से कुल 565 लोगों को भारत लाया गया है. इनमें 112 अफ़ग़ान नागरिक हैं. इसके अलावा भारत ने मुश्किल से कुछ दर्जन ही ई-वीज़ा जारी किए हैं जबकि हज़ारों अफ़ग़ान नागरिकों ने आवेदन किया है.

बर्न्स अमेरिकी सेना और सुरक्षा अधिकारियों में शामिल उन लोगों में से एक हैं, जो पिछले कुछ महीनों में दोबारा भारत आ रहे हैं. वॉशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार 23 अगस्त को बर्न्स ने तालिबान के अहम नेता अब्दुल ग़नी बरादर से मुलाक़ात की थी.

देहरादून

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इंडियन मिलिटरी एकेडमी में 82 अफ़ग़ान कैडेट की ट्रेनिंग जारी रहेगी

भारत सरकार ने कहा है कि देहरादून स्थित इंडियन मिलिटरी एकेडमी में 82 अफ़ग़ान कैडेटों की ट्रेनिंग जारी रहेगी.

मंगलवार को रक्षा राज्य मंत्री अजय भट्ट ने कहा कि वे अफ़ग़ान कैडेट की दुविधा से अवगत हैं. भट्ट ने कहा कि अफ़ग़ान कैडेट अपनी ट्रेनिंग जारी रखेंगे और सरकार इस मुद्दे को भविष्य में चीज़ें निर्धारित होने के बाद देखेगी.

अंग्रेज़ी अख़बार इंडियन एक्सप्रेस ने इस ख़बर को प्रमुखता से छापा है. अख़बार के अनुसार अजय भट्ट ने कहा है, ''अफ़ग़ान कैडेट अभी ट्रेनिंग कर रहे हैं. वे ख़ुद निराश हैं. उन्हें सब कुछ पता है. मैंने उनसे बात नहीं की है लेकिन उन्हें लेकर अधिकारियों से मेरी बात हुई है. मुझे पता चला है कि अफ़ग़ान कैडेट के परिवार वाले चिंतित हैं. ये अच्छे लोग हैं. ये अपनी ट्रेनिंग पूरी करेंगे और बाद में सरकार की नीति के हिसाब से फ़ैसले लिए जाएंगे.''

किसान

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संयुक्त किसान मोर्चा के प्रदर्शनकारी करनाल में डटे

कोलकाता से प्रकाशित होने वाले अंग्रेज़ी अख़बार टेलिग्राफ़ ने हरियाणा के करनाल में संयुक्त किसान मोर्चा के विरोध-प्रदर्शन की ख़बर को प्रमुखता से जगह दी है.

अख़बार ने लिखा है कि करनाल में मिनी-सेक्रेटेरिएट के पास किसानों ने नया मोर्चा खोल दिया है. किसान हरियाणा सरकार से मांग कर रहे हैं कि वो उस सब-डिविज़नल मैजिस्ट्रेट आयूष सिन्हा के ख़िलाफ़ अनुशासनात्मक कार्रवाई करे जिन्होंने 28 अगस्त को पुलिस को आदेश दिया था कि प्रदर्शनकारी किसानों को मारकर सिर फोड़ दो.

हरियाणा सरकार ने उस अधिकारी के ख़िलाफ़ किसी भी तरह की कार्रवाई से इनकार कर दिया है.

प्रदर्शनकारी किसान और प्रशासन के बीच बातचीत विफल होने के बाद किसान करनाल में मिनी सेक्रेटेरिएट के पास ही जम गए हैं. मंगलवार को प्रदर्शनकारी किसानों के ख़िलाफ़ पुलिस ने पानी के फव्वारे भी छोड़े थे.

संयुक्त किसान मोर्चा 40 किसान संगठनों का यूनियन है. यह मोर्चा केंद्र सरकार के तीन कृषि क़ानून के ख़िलाफ़ पिछले एक साल से सड़क पर है. प्रदर्शनकारी किसानों का कहना है कि जब तक उनकी मांग पूरी नहीं हो जाती है, तब तक वे डटे रहेंगे.

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