मोदी सरकार का 'मिशन पाम ऑयल' कैसे करेगा काम, क्या हैं ख़तरे?

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- Author, सरोज सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
मोदी सरकार ने हाल ही में 'राष्ट्रीय खाद्य तेल मिशन - पाम ऑयल' किया है. इसके मुताबिक़ आने वाले दिनों में भारत पाम ऑयल के आयात पर अपनी निर्भरता कम करने के उद्देश्य से पूर्वोत्तर भारत और अंडमान निकोबार में पाम ऑयल की खेती और प्रोसेसिंग पर ज़ोर देगा.
मिशन पाम ऑयल की महत्वपूर्ण बातें हैं :
- 11000 करोड़ की वित्तीय सहायता, जिसमें से 8844 करोड़ केंद्र सरकार वहन करेगी और बाक़ी 2196 राज्य सरकार वहन करेगी.
- साल 2025 तक 10 लाख हेक्टेयर में पाम ऑयल की खेती का लक्ष्य केंद्र सरकार ने रखा है.
- आने वाले दस साल में भारत में पाम ऑयल का उत्पादन 28 लाख टन तक पहुँच जाए.
- इसकी खेती में किसानों को घाटा न हो, इसका सरकार ख़ास ख्याल रखेगी.
- पहले प्रति हेक्टेयर 12 हजार रुपये दिये जाते थे, जिसे बढ़ाकर 29 हजार रुपये प्रति हेक्टेयर कर दिया गया है.
- पुराने बागों को दोबारा चालू करने के लिए 250 रुपये प्रति पौधा के हिसाब से विशेष सहायता दी जाएगी.
बीएल एग्रो ऐसी कंपनी है जो इंडोनेशिया और मलेशिया से पाम ऑयल भारत में आयात करती है. कंपनी के चेयरमैन घनश्याम खंडेलवाल ने बीबीसी से बातचीत में कहा, "केंद्र सरकार, भारत में होने वाली कुल खपत का 65 फ़ीसद तेल आयात करती है और 35 फ़ीसद देश में होता है. आयात किए जाने वाले 65 फ़ीसद तेल में 60 फ़ीसद पाम ऑयल होता है, क्योंकि बाक़ी तेल में इसे मिलाया जाता है.
पाम ऑयल के इस आयात पर केंद्र सरकार का 50 हज़ार करोड़ रुपये सालाना ख़र्च होता है. नए मिशन पाम ऑयल के ज़रिए केंद्र सरकार अपने इसे ख़र्च को कम करना चाहती है."
इस वजह से घनश्याम खंडेलवाल सरकार के इस क़दम का स्वागत करते हैं.

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भारत में पाम ऑयल की खेती
वर्तमान में पाम ऑयल की खेती सिर्फ़ 3.7 लाख हेक्टेयर में होती है. सरकार का लक्ष्य अगले चार साल में इसे लगभग तीन गुना करने का है.
भारत में आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु के अलावा मिजोरम, नागालैंड, असम और अरुणाचल प्रदेश में पाम ऑयल की खेती की जाती है.
ताड़ का पेड़, भूमध्य रेखा के इर्द-गिर्द ही उगाया जा सकता है. ये सर्द इलाक़ों में नहीं उगता.
अन्य तिलहनों की तुलना में प्रति हेक्टेयर के हिसाब से ताड़ के तेल का उत्पादन प्रति हेक्टेयर 10 से 46 गुना अधिक होता है. इसके अलावा एक हेक्टेयर की फसल से लगभग चार टन तेल निकलता है. इस तरह, इसकी खेती में बहुत संभावनाएं हैं.

ऐसी संभावनाओं को तलाशने के लिए आंध्र प्रदेश के एलुरु शहर के पास एक गांव में रहने वाले शिव प्रसाद ने पाम (ताड़) की खेती का काम दस साल पहले शुरू किया. उनके पास 10 एकड़ ज़मीन है.
पाम की खेती से जुड़ी आवश्यकताओं पर बात करते हुए शिव प्रसाद ने बीबीसी से कहा, "एक पेड़ को पूरी तरह से फल देने में 4-6 साल का समय लगता है.
ताड़ की खेती में पानी की भी ज़रूरत भी खूब होती है. हफ़्ते में एक बार कम-से-कम पानी देना ही पड़ता है, लेकिन खेतों में ठहरा पानी नुक़सान पहुँचा सकता है. इस वजह से ख़ास ध्यान भी रखने की ज़रूरत पड़ती है.
शिवप्रसाद आगे कहते हैं, एक एकड़ में ताड़ की खेती करने के लिए किसान को 50 हज़ार ख़र्च करने पड़ते हैं, जिससे साल में डेढ़ से दो लाख रुपये तक कमाई की जा सकती है. ये रकम बाजार भाव पर निर्भर करता है.
एक बार खेती करने पर 30 साल तक इन पेड़ों से फल मिलते रहते हैं. इस वजह से ये फ़ायदे का सौदा माना जाता है.
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पाम तेल का इस्तेमाल
पाम तेल रोज़ाना की ज़रूरतों में शामिल हो चुका है. हो सकता है आज आपने शैंपू में इसका इस्तेमाल किया हो या फिर नहाने के साबुन में. टूथपेस्ट में या फिर विटामिन की गोलियों और मेकअप के सामान में. किसी न किसी तरह आपने पाम तेल का इस्तेमाल ज़रूर किया होगा.
जिन वाहनों में आप सफ़र करते हैं, वो बस, ट्रेन या कार जिस तेल से चलती हैं, उनमें पाम तेल भी होता है. डीज़ल और पेट्रोल में बायोफ्यूल के अंश शामिल होते हैं जो मुख्य तौर पर पाम तेल से ही मिलते हैं. यही नहीं, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण जिस बिजली से चलते हैं, उसे बनाने के लिए भी ताड़ की गुठली से बने तेल को जलाया जाता है.
ये दुनिया का सबसे लोकप्रिय वेजिटेबल तेल है और रोज़मर्रा में इस्तेमाल होने वाले कम से कम 50 फ़ीसद उत्पादों में मौजूद होता है. साथ ही औद्योगिक प्रयोगों में भी इसका इस्तेमाल अहम है.
पाम तेल पीला और गंधहीन होता है, जो खाने में इस्तेमाल के लिए दुरुस्त है.
पाम तेल का मेल्टिंग पॉइंट अधिक है और इसमें सैचुरेटेड फ़ैट भी ज़्यादा होता है. इसी वजह से यह खाते समय मुंह में घुलता है और मिठाई वग़ैरह बनाने के लिए मुफ़ीद है.
कई अन्य वनस्पति तेलों को कुछ हद तक हाइड्रोजनेटेड करने की ज़रूरत पड़ती है, जिससे स्वास्थ्य को नुक़सान पहुंचता है.

उत्पादन से जुड़े ख़तरे
साल 2018 में किसानों ने वैश्विक बाज़ार के लिए क़रीब 7.7 करोड़ टन पाम तेल का उत्पादन किया और साल 2024 तक इसके 10.76 करोड़ टन तक पहुंचने का अनुमान लगाया जा रहा है.
लेकिन पाम तेल की बढ़ती माँग और इसके लिए अधिक से अधिक पेड़ लगाने की वजह से इंडोनेशिया और मलेशिया में जंगलों को लगातार ख़त्म किए जाने के आरोप भी लगते रहे हैं. यही नहीं जंगलों के ख़त्म होने से यहां के मूल जंगली जीव जैसे ओरंगुटान भी प्रभावित हो रहे हैं और कई अन्य प्रजातियां भी संकट में हैं.
सिर्फ़ इंडोनेशिया और मलेशिया में ही क़रीब 1.3 करोड़ हेक्टेयर ज़मीन पर तेल के लिए पाम के पेड़ लगाए गए हैं, जो दुनिया भर के आधे पाम के पेड़ हैं.
ग्लोबल फॉरेस्ट वॉच के मुताबिक़ सिर्फ़ इंडोनेशिया में 2001 से 2018 के बीच 2.56 करोड़ हेक्टेयर ज़मीन से पेड़ काटे गए. ये इलाक़ा न्यूज़ीलैंड के बराबर है.
इसी वजह से दुनिया के तमाम देश इसके विकल्प तलाशने में लगे हैं.

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भारत में उत्पादन बढ़ा तो क्या होगी दिक़्क़त ?
भारत में सरकार जब इसका उत्पादन बढ़ाने की बात कर रही है तो यहाँ भी जानकार सरकार को पहले ही चेता रहे हैं. कहीं भारत सरकार भी मलेशिया और इंडोनेशिया वाली ग़लती न करे.
बीएल एग्रो कंपनी के चेयरमैन कहते हैं कि भारत की कुल ज़रूरत का एक फ़ीसद पाम ऑयल यहाँ नहीं बनता. भारत का मौसम ताड़ की खेती के लिए उतना अनुकूल नहीं है. इसलिए यहां की क्वालिटी मलेशिया और इंडोनेशिया के मुकाबले कमतर है.
घनश्याम खंडेलवाल के मुताबिक़ भारत सरकार को इसकी खेती को प्रोत्साहित करते समय इसका ध्यान रखना चाहिए कि इकोलॉजी (पर्यावरण) पर इसका प्रभाव न पड़े. जंगलों को काट कर इसकी खेती न की जाए. जंगलों के अलावा जो ख़ाली पड़े ज़मीन हैं वहाँ ही इसकी खेती की जाए.
घनश्याम खंडेलवाल की बात से जीवी रामनजानेयुलु भी सहमत हैं. जीवी रामनजानेयुलु, सेंटर फ़ॉर सस्टेनेबल एग्रीकल्चर के साथ जुड़े हैं.
बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, सरकार को पाम ऑयल की खेती प्रमोट करने के लिए कुछ बातों पर ख़ास ध्यान रखना होगा.
पाम ऑयल की खेती को बढ़ावा देने के चक्कर में जंगल न काटे जाए, ये उनकी भी दलील है. उनके मुताबिक़ पूर्वोत्तर में जहाँ सरकार इसकी खेती को प्रोत्साहित करना चाहती है, वहाँ जंगल बहुत हैं. इसलिए ऐसा होने का ख़तरा ज़्यादा है.

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इसके साथ ही वो कहते हैं कि मलेशिया और इंडोनेशिया की तरह इनकी खेती के लिए बहुत ज़्यादा केमिकल का इस्तेमाल न किया जाए. उनके मुताबिक वीडीसाइड ( दो पौधों के बीच में पैदा होने वाले अनचाहे पौधे को मारने के इस्तेमाल में आने वाला केमिकल) का बिल्कुल इस्तेमाल नहीं होना चाहिए. खाद और दूसरे कीटनाशकों का भी इस्तेमाल कम से कम करें, ताकि पर्यावरण को कम नुक़ासन हो.
एक तीसरी समस्या भी है. इसके उत्पादन से जुड़े बड़ी कंपनियों की पुरानी माँग है कि छोटे खेतों में इनकी खेती फ़ायदेमंद नहीं होती. इस वजह से लैंड होल्डिंग की सीमा बढ़ाई जाए. फिलहाल लैंड होल्डिंग की सीमा, जहाँ सिंचाई के लिए बारिश का पानी मिलता है, वहाँ 54 एकड़ की है. जहाँ सिंचाई के लिए दूसरे माध्यमों पर निर्भर रहना पड़ता है वहाँ ये सीमा 18 एकड़ की है.
जीवी रामनजानेयुलु कहते हैं लैंड होल्डिंग की सीमा हटा दी गई तो सब बड़े खेतों में पाम ऑयल की खेती में जुट जाएंगे और पानी की समस्या खड़ी हो जाएगी. पाम की खेती में पानी बहुत लगता है.
वो कहते हैं, सरकार ने अंडमान निकोबार को इसकी खेती के लिए चुना वो सही फैसला है. लेकिन पूर्वोत्तर को लेकर वो थोड़े आशंकित है. उनके मुताबिक़ ताड़ के पेड़ में फल कटने के बाद तेल निकालने के लिए 24 घंटें के अंदर ही उसे प्रोसेसिंग में डालना होता है. पहाड़ों में आवाजाही एक बड़ी समस्या रहती है. ऐसे में किसानों की इस दिक़्क़त को दूर करने के लिए सरकार को उपाए सोचने चाहिए.
हालांकि, कृषि नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज के सचिव प्रमोद कुमार जोशी, रामनजानेयुलु के तर्क से सहमत नहीं है.
उनका कहना है कि मिशन पाम ऑयल के किसानों को बहुत लाभ होगा, पूंजी निवेश में बढ़ोतरी होगी, रोजगार पैदा होंगे, आयात पर निर्भरता कम होगी और किसानों की आय भी बढ़ेगी.
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