क्या ममता सरकार बंगाल में कोविड के टीके के लिए 315 रुपये वसूल रही है?- फ़ैक्ट चेक

ममता सरकार

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    • Author, कीर्ति दुबे,
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

केंद्र सरकार से मिल रही मुफ्त कोविड- 19 वैक्सीन के लिए पश्चिम बंगाल में लोगों से 315 रुपये वसूले जा रहे हैं. बीजेपी की आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने ऐसा दावा किया है.

रविवार शाम को उन्होंने ट्विटर पर लिखा, "प्रधानमंत्री मोदी सभी राज्यों के लिए मुफ़्त वैक्सीन भेज रहे हैं लेकिन पश्चिम बंगाल में मोदी सरकार द्वारा भेजी गई फ्री वैक्सीन के लिए 315 रुपये का 'दान' राज्य सरकार के राहत कोष में देना अनिवार्य किया गया है. वाह! ममता बनर्जी''

इस ट्वीट के साथ उन्होंने एक ख़बर का लिंक शेयर किया जिसकी हेडलाइन है - मुख्यमंत्री राहत कोष में 'स्वेच्छा' से 315 रुपये देने पर ही मिल रहा है टीका!

बांग्ला भाषा में लिखी इस ख़बर में दावा किया गया है कि ममता बनर्जी के राज्य में फ्री में वैक्सीन नहीं दी जा रही है और सिलीगुड़ी में इसके बदले पैसे लिए जा रहे हैं. दो लोगों के बयान के आधार पर ख़बर में ये दावा किया गया है.

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बीबीसी की पड़ताल

बीबीसी ने कोलकाता में सहयोगी पत्रकार प्रभाकरमणि त्रिपाठी की मदद से इस दावे की पड़ताल की.

बीबीसी उन लोगों तक पहुंचा जिनके बयान को आधार बना कर ये ख़बर लिखी गई थी. इनमें से एक हैं सिलीगुड़ी के उद्योगपति और नॉर्थ बंगाल इंडस्ट्रीज एसोसिएशन के महासचिव सुरजीत पाल.

सुरजीत पाल ने बीबीसी को बताया, "सरकार और व्यापारिक संगठनों के प्रतिनिधियों के साथ कोलकाता में एक बैठक आयोजित बैठक की गई थी. इस बैठक में सरकारी अधिकारियों ने कहा था कि राज्य सरकार को वैक्सीन ख़रीदनी पड़ रही है. इसलिए व्यापारिक संगठनों को राज्य राहत कोष में यथाशक्ति मदद करनी चाहिए. 5 जून को सरकार की ओर से जारी एक सर्कुलर में इसके लिए बैंक खाते का ब्यौरा भी दिया गया था."

वो बताते हैं कि सरकार ने लघु एवं मध्यम उद्योगों से जुड़े कर्मचारियों और मजदूरों को बिना वैक्सीन लगवाए फैक्टरियों में काम करने की इजाजत नहीं दी है. उनके मुताबिक़, फैक्टरी के कर्मचारियों और मजदूरों के लिए मौखिक रूप से इस कोष में दान देने के लिए कहा गया.

सुरजीत कहते हैं कि साफ़ तौर पर कहा जा रहा है कि "दान नहीं देने पर वैक्सीन नहीं मिलेगी.''

उनका दावा है कि इस बारे में खबर छपने के बाद उनको परोक्ष रूप से धमकी भी दी गई है.

वो बताते हैं, " सरकारी अधिकारियों से जब कहा गया कि अब तो प्रधानमंत्री ने मुफ्त वैक्सीन देने का एलान किया है तो अधिकारियों की दलील थी कि आखिर आप रेलवे में तत्काल टिकट के अतिरिक्त पैसे देते हैं या नहीं? कुछ वैसा ही समझ लीजिए. मुफ़्त वैक्सीन के लिए आपको इंतज़ार करना होगा.

सुरजीत कहते हैं, ज्यादातर एसोसिएशनों ने यह रकम दी है. ट्रैवल एंड टूर ऑपरेटर्स एसोसिएशन ने भी पैसे दिए हैं. लेकिन जब इस बारे में खबरें छपी तो पैसा लेना बंद कर दिया गया है.''

सुरजीत का दावा है कि उन्होंने अपने कर्मचारियों के टीकाकरण के लिए एक लाख से कुछ ज्यादा रकम राहत कोष में दान दी है. उन्होंने बीबीसी को इसकी रसीद भी भेजी है.

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अमित मालवीय ने जो लेख साझा किया है उसमें दूसरा बयान ईस्टर्न हिमालयन ट्रैवल एंड टूर ऑपरेटर्स एसोसिएशन( ईएचटीटीओए) के महासचिव संदीपन का दर्ज है.

बीबीसी से बात करते हुए संदीपन कहते हैं कि उनके बयान के साथ छेड़छाड़ की गई है.

उन्होंने बताया, "इस बारे में जो ख़बरें छपी हैं उनमें मेरे बयान का पूरा हिस्सा नहीं छापा गया है. महामारी के कारण पर्यटन उद्योग मंदी की मार झेल रहा है. राहत कोष में दान देने की स्थिति में इस उद्योग से जुड़े लोगों को प्राथमिकता के आधार पर वैक्सीन मिल रही है. इसलिए हमने स्वेच्छा से जितना बन सका, दान दिया. आखिर हमारे धंधे का सवाल है. कब तक घर बैठे रहेंगे. कर्मचारियों और ड्राइवरों का टीका लगाना तो जरूरी है."

वो बताते हैं कि सरकार ने हमें दो विकल्प दिए थे. पहला - हम कोविन ऐप के जरिए पंजीकरण कर मुफ़्त टीकाकरण के लिए अपनी बारी का इंतजार करें और दूसरा - यथाशक्ति दान देकर प्राथमिकता के आधार पर वैक्सीन लगवा लें. हमने अपने कारोबार को ध्यान में रखते हुए, दूसरा विकल्प चुना है.

इसकी एक वजह ये है कि कोविन ऐप के जरिए स्लॉट मिलना बेहद मुश्किल है. संदीपन एक उदाहरण के जरिए अपनी बात समझाते हैं.

वो कहते हैं, "मेरे पास चार ड्राइवर हैं. निजी अस्पताल में वैक्सीन की स्थिति में हमें तीन हजार से ज्यादा ख़र्च करना पड़ता. लेकिन राहत कोष में इससे बहुत कम दान देकर ही चारों को वैक्सीन लग गई है. इसमें दोनों पक्ष का फ़ायदा है."

राहत कोष में स्वेच्छा से दान का नियम सिर्फ़ उद्योग कंपनियों पर लागू

बीबीसी ने पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से 5 जून को जारी नोटिफिकेशन को भी पढ़ा. ये नोटिफिकेशन लधु एंव मध्यम उद्योग से जुड़े लोगों के लिए जारी किया गया है.

नोटिफिकेशन में लिखा है कि राज्य स्वास्थ्य विभाग, छोटी और मध्यम कंपनियों के साथ मिलकर उनके यहाँ टीकाकरण केंद्र बनाएगी, जिसके लिए कुछ नियम बनाए गए हैं.

नियमों में एक नियम है - राज्य की कोविड के खिलाफ़ लड़ाई में मदद के लिए इंडस्ट्री एसोसिएशन, चैंबर और व्यक्तिगत यूनिट अपनी इच्छानुसार दान कर सकती है. इसके साथ ही दो बैंक अकाउंट का ब्यौरा दिया गया है.

यहाँ गौर करने वाली बात ये है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सभी राज्यों को मुफ्त में टीका मुहैया कराने का ऐलान 7 जून को किया था. पश्चिम बंगाल सरकार का ये नोटिफिकेशन प्रधानमंत्री के ऐलान से दो दिन पहले 5 जून का है. उस वक़्त तक भारत में 18 से 44 साल तक की उम्र के लोगों के लिए टीका का ख़र्च राज्य सरकारें उठा रही थी. हालांकि ममता बनर्जी सरकार ने भी पश्चिम बंगाल में इसे मुफ्त लगाने का ऐलान किया था.

कोलकाता में स्वास्थ्य विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी नाम नहीं छापने की शर्त पर बताते हैं, "जब राज्य सरकार (18 से 44 आयु वर्ग के लिए) अपनी जेब से टीका खरीद रही थी तो व्यापारिक संगठनों के साथ बैठक में राहत कोष में दान देने पर चर्चा हुई थी. बंगाल महामारी के साथ अंफान से भी जूझ रहा था. आखिर कोष में दान देने में दिक्कत कहां हैं? किसी से जबरन पैसे नहीं वसूले जा रहे हैं. ऐसी खबरें निराधार हैं. इस पर जबरन राजनीतिक रंग चढ़ाया जा रहा है.

ये ऑर्डर आम जनता के लिए नहीं बल्कि सिर्फ़ उन कंपनियों या उद्योगों के लिए है जहां पर वह कंपनियां खुद निजी वैक्सीन सेंटर या शिविर लगवाना चाहती है. साथ ही इसमें रक़म का कोई ज़िक्र नहीं है कि वैक्सीन की प्रति डोज़ के बदले कितने पैसे देने होंगे. इसे अपनी स्वेच्छा से तय करने के लिए कहा गया है."

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आम लोगों कभी नहीं लिए गए पैसे

बीबीसी ने इसके बाद पश्चिम बंगाल में रहने वाले आम लोगों से बात करके जानने की कोशिश की कि क्या सरकारी टीकाकरण केंद्र पर उनसे किसी तरह के पैसे लिए जा रहे हैं?

इस कड़ी में हमने कोलकाता में टीका लगवा चुके एक मजदूर सोमेश्वर से बात की. उन्होंने बताया "पता नहीं, मुझसे तो कहीं किसी ने पैसे नहीं मांगे. आधार कार्ड के सहारे मुझे मुफ्त टीका लग गया."

एक दुकान मालिक वीरेन कुमार मंडल भी यही बात कहते हैं. वह कहते हैं, "पैसा ही देना होता तो निजी अस्पताल में बहुत पहले ही टीका नहीं लगवा लिया होता. मैंने सरकारी स्वास्थ्य केंद्र में मुफ्त टीका लिया है. हां, इसके लिए चार घंटे कतार में ज़रूर खड़ा रहना पड़ा. लेकिन टीके के बदले रुपए मांगने की बात सही नहीं है."

सिलीगुड़ी के डाबग्राम इलाके में सरकारी स्वास्थ्य केंद्र में टीका लेने वाले देबेन कुमार दास ने भी मुफ्त में ही टीका लिया है. वो कहते हैं, "टीके के बदले पैसे मांगने वाली बात तो पहली बार सुन रहा हूं. हमारे पास टीके के लिए पैसे कहां हैं. मैंने तो पूरे परिवार के साथ मुफ्त में टीका लिया है."

हमारी पड़ताल में दो बातें सामने आई हैं :

पहला- पश्चिम बंगाल सरकार ने स्वेच्छा से राहत कोष में दान देने का आदेश 5 जून को जारी किया था. उस वक्त तक वैक्सीन का खर्च राज्य सरकार वहन कर रही थी. मुफ्त में राज्यों को वैक्सीन देने का ऐलान मोदी सरकार ने 7 जून को किया था.

दूसरा- ये आदेश लघु एंव मध्यम उद्योग पर लागू था. आम लोगों को वैक्सीन के बदले अब तक कोई पैसे नहीं देने पड़े हैं.

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