वैक्सीन पॉलिसी : वो पाँच सवाल, जिनके जवाब मोदी सरकार से मिलना अब भी बाक़ी है

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    • Author, सरोज सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार को भारत की वैक्सीनेशन पॉलिसी में एक बार फिर बदलाव किया. मंगलवार को केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने 21 जून से शुरू होने वाली नई वैक्सीनेशन प्रक्रिया के लिए गाइडलाइन भी जारी कर दी.

नई गाइडलाइन के मुताबिक़ :

•अब 75 फ़ीसदी टीका केंद्र सरकार ख़रीदेगी और 25 फ़ीसदी प्राइवेट अस्पताल ख़रीद सकेंगे.

•राज्यों को टीका जनसंख्या, मरीज़, और टीकाकरण की रफ़्तार के आधार पर दिया जाएगा. वैक्सीन की बर्बादी का नकारात्मक असर होगा.

•प्राथमिकता के आधार पर वैक्सीन दी जाएगी. वितरण का पूरा ज़िम्मा राज्य सरकार पर होगा.

•प्राइवेट अस्पताल टीका किस दाम पर ख़रीदेंगे, ये वैक्सीन निर्माता कंपनियाँ बताएंगी. अस्पताल 150 रुपये से ज़्यादा सर्विस चार्ज नहीं ले पाएंगे. राज्य सरकारें इस पर नज़र रख सकेंगी.

•वैसे तो केंद्र सरकार हर वर्ग को मुफ़्त में टीका लगवाने की बात कर रही है. लेकिन साथ ही ये भी कहा है कि पैसा देकर टीका लगवाने की क्षमता रखने वाले लोगों को प्राइवेट अस्पतालों में जाने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा.

•समय-समय पर इस पॉलिसी को रिव्यू किया जाएगा.

वैक्सीनेशन पॉलिसी में बदलाव की घोषणा करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने राज्य सरकारों को मई महीने में टीकाकरण की धीमी गति के लिए परोक्ष रूप से ज़िम्मेदार ठहराया. दूसरी तरफ़, कुछ विपक्षी पार्टियों ने वैक्सीनेशन पॉलिसी में बदलावों का सेहरा अपने और सुप्रीम कोर्ट के सिर पर बांधा.

यह बात सही है कि केरल, आंध्र प्रदेश, झारखंड और ओडिशा के मुख्यमंत्री ने मुफ़्त में टीकाकरण करवाने की माँग केंद्र सरकार से की थी. लेकिन महाराष्ट्र उन चंद राज्यों में से था जिसने राज्यों को टीका ख़रीदने का अधिकार दिए जाने की वक़ालत की थी. प्रधानमंत्री मोदी के ताज़ा फैसले के बाद उनकी प्रतिक्रिया नहीं आई है.

अगर केंद्र राज्य, विपक्ष और सुप्रीम कोर्ट सभी को इस बदलाव का क्रेडिट दे भी दे, तो भी कई ऐसे सवाल ऐसे हैं, जिनका जवाब जनता को प्रधानमंत्री मोदी के संबोधन से नहीं मिल पाया है.

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सवाल 1 : राज्य सरकारों का असमंजस

झारखंड उन राज्यों में एक है जहाँ वैक्सीन की बर्बादी को लेकर केंद्र और राज्य सरकार के बीच पिछले दिनों काफ़ी बहस चली थी. केंद्र सरकार का दावा था कि वैक्सीन की बर्बादी झारखंड में बड़े पैमाने पर हो रही है, जबकि प्रदेश के मुख्यमंत्री ने आँकड़ों के आधार पर केंद्र सरकार को चुनौती दी.

छोटा प्रदेश होने के कारण वहाँ के खजाने का हाल भी बहुत बेहतर नहीं रहता है. बावजूद इसके प्रदेश सरकार ने मुफ़्त वैक्सीन के लिए 250 करोड़ का बजट में प्रावधान किया और मुफ़्त वैक्सीन देने के लिए 47 करोड़ रुपये का भुगतान कोविशील्ड और कोवैक्सीन कंपनी को कर भी दिया. ख़ुद मुख्यमंत्री हेंमत सोरेन ने इसकी जानकारी दी है.

अब उनका कहना है कि ये फ़ैसला कुछ हफ़्ते पहले लिया होता, तो ख़जाने पर बोझ कम हो जाता.

झारखंड के स्वास्थ्य मंत्री बन्ना गुप्ता ने बीबीसी से बातचीत में कहा, ''दूध का जला छाछ भी फूंक कर पीता है. पीएम केयर्स फंड से आवंटित एक हजार से ज्यादा प्लांट में झारखंड के खाते में केवल एक ऑक्सीजन प्लांट आया है. वेंटिलेटर बांटने में भी हमारे साथ ऐसा ही हुआ. अब तक राज्य को केंद्र सरकार से 45 साल से ज़्यादा उम्र वाले लोगों के लिए 47 लाख 16 हज़ार वैक्सीन डोज़ मिली है, जबकि ज़रूरत है 83 लाख डोज़ की.'

यानी झारखंड को डर है कि ऑक्सीजन सप्लाई, ब्लैक फंगस की दवा की सप्लाई में जैसे छोटे राज्य जहाँ विपक्ष सत्ता में है, उनके साथ सौतेला बर्ताव ना हो.

राजस्थान में भी वैक्सीन बर्बादी के आँकड़े मीडिया में कुछ और राज्य सरकार की फाइलों में कुछ और दर्ज़ है.

सुप्रीम कोर्ट ने वैक्सीन पॉलिसी पर सुनवाई के दौरान भी ये सवाल उठा था. कुछ राज्य सरकारों की आपत्ति है कि कम वैक्सीन मिलेगी, तो रफ़्तार धीमी होगी ही, ऐसी स्थिति में क्या होगा?

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सवाल 2 : रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया

मंगलवार को जारी नई गाइडलाइन में ऑन-साइट रजिस्ट्रेशन की सुविधा सभी आयुवर्ग के लिए सरकारी और प्राइवेट टीकाकरण केंद्र में उपलब्ध कराने की बात की गई है. इसके लिए राज्य सरकारों को नियम और प्रक्रिया बनाने के लिए कहा गया है. लेकिन ये नहीं बताया गया है कि राज्य सरकारें अब अपना अलग ऐप तैयार करेंगी या नहीं.

इससे पहले 45 से अधिक उम्र वालों के लिए ऑन-स्पॉट रजिस्ट्रेशन की सुविधा थी, लेकिन 18 से 44 साल की उम्र वालों को ये सुविधा नहीं दी गई थी. हालांकि सुप्रीम कोर्ट में वैक्सीन पॉलिसी पर सुनवाई के दौरान इस 'डिजिटव डिवाइड' के बारे में केंद्र सरकार से सवाल पूछे गए थे, जिसके बाद 24 मई से सरकारी टीकाकरण केंद्रों पर ऑन साइट रजिस्ट्रेशन की सुविधा शुरू कर दी गई थी.

इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन के मुताबिक़ 28 अप्रैल 2021 मे तक 45 से अधिक उम्र वाले 14 करोड़ 42 लाख लोगों ने वैक्सीन के लिए रजिस्ट्रेशन किया था, जिसमें से केवल 2 करोड़ 52 लाख ने ही कोविन एप से रजिस्ट्रेशन कराया था.

ये आँकड़े बताते हैं कि ऐप पर रजिस्टर कराने की अनिवार्यता किस तरह से टीकाकरण अभियान की रफ़्तार को रोक रही है.

इसी की ओर इशारा करते हुए तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने ट्विटर पर लिखा, ''प्रधानमंत्री ने सोमवार को कहा कि स्वास्थ्य राज्यों का विषय है. यह उचित होगा अगर रजिस्ट्रेशन, सत्यापन और टीकाकरण अभियान से जुड़ा प्रशासनिक कामकाज भी राज्यों के हवाले कर दिया जाए.''

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ऐसी ही माँग महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे भी पहले उठा चुके हैं कि राज्यों को रजिस्ट्रेशन के लिए अपना ऐप बनाने का अधिकार दिया जाए.

सोमवार को राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में प्रधानमंत्री मोदी ने कोविन ऐप की तारीफ़ों के पुल बांधे और कहा कि दूसरे देश भी इसके बारे में जानने के इच्छुक हैं.

लेकिन 21 जून से जब ऑन-साइट रजिस्ट्रेशन खुल जाएगा, तो लोगों की भीड़ वैक्सीनेशन सेंटर पर आने से कैसे रोक सकेंगे? इसका जवाब अब मिलना बाक़ी है. हो सकता है हर राज्य में इसके लिए नियम क़ायदे अलग हों.

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सवाल 3: प्राइवेट अस्पताल में वैक्सीन की कीमत क्या होगी?

नई वैक्सिनेशन पॉलिसी में लोग प्राइवेट अस्पतालों में जा कर पहले की तरह वैक्सीन लगवा सकेंगें. इस पर सर्विस चार्ज सरकार ने तय कर दिए हैं. लेकिन क्या दाम अब भी पहले जितने ही होंगे, इसके बारे में कुछ भी नहीं कहा गया है.

फिलहाल प्राइवेट अस्पतालों में वैक्सीन के रेट में भारी अंतर देखने को मिल रहा है. कहीं प्राइवेट वैक्सीन एक डोज़ 850 रुपये में लग रही है तो कहीं 1200 और 1500 रुपये भी ख़र्च करने पड़ रहे हैं.

नई गाइडलाइन के मुताबिक़ राज्य और केंद्रशासित प्रदेश प्राइवेट ( छोटे और बड़े) अस्पतालों की डिमांड के बारे में केंद्र को बताएंगे और केंद्र सरकार टीका ख़रीदने में इनकी मदद करेगी.

'एसोसिएशन ऑफ़ हेल्थकेयर प्रोवाइडर्स इंडिया' भारत में ऐसी संस्था है जो देश भर में छोटे अस्पतालों के साथ काम करती है. इसके अध्यक्ष डॉक्टर ऐलेक्ज़ैंडर थॉमस ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि प्राइवेट अस्पतालों के कई सवाल हैं जिनके जवाब हमें प्रधानमंत्री के भाषण में नहीं मिले.

उन्होंने कहा, ''भारत की 70 फ़ीसदी आबादी की स्वास्थ्य सेवाओं का ख़याल प्राइवेट सेक्टर के अस्पताल रखते हैं. उसको 25 फ़ीसद ही टीका देने का आधार क्या है? क्या केंद्र सरकार 75 फ़ीसद टीकाकरण राज्यों के साथ मिल कर सरकारी अस्पतालों में करवा लेगी? कहीं इससे वैक्सीन की बर्बादी तो नहीं होगी?''

डॉक्टर थॉमस ने कहा, ''केंद्र सरकार प्राइवेट अस्पतालों के लिए टीका ख़रीद कर मुफ्त में क्यों नहीं देती? केवल सर्विस चार्ज लेकर प्राइवेट वाले भी टीका लगा सकते हैं. ऐसे में टीकाकरण का भार केवल बड़े प्राइवेट अस्पतालों पर नहीं पड़ेगा. छोटे अस्पताल भी इससे जुड़ सकेंगे, जो फिलहाल टीके के दाम की वजह से बहुत ऑर्डर एक साथ नहीं दे पाते.''

नई गाइडलाइन के बाद भी ये समस्या बरक़रार ही रहने वाली है. केंद्र सरकार ने कहा है कि प्राइवेट अस्पताल टीका किस दाम पर ख़रीदेंगे ये वैक्सीन निर्माता कंपनियाँ बताएंगी.

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सवाल 4 : डिमांड और सप्लाई अंतर और पेमेंट

केंद्र सरकार का दावा है कि इस साल के अंत तक देश के सभी 100 करोड़ लोगों को कोविड-19 की वैक्सीन मिल जाएगी.

इसके लिए 200 करोड़ वैक्सीन डोज़ की ज़रूरत होगी, वैक्सीन की डोज़ कहाँ से आएगी इसका भी ख़ाका तैयार है.

  • कोविशील्ड (सीरम इंस्टीट्यूट) - 75 करोड़ डोज़
  • कोवैक्सीन (भारत बायोटेक) - 55 करोड़ डोज़
  • स्पुतनिक-वी - 15 करोड़
  • बायो ई-सबयूनिट वैक्सीन - 30 करोड़ डोज़
  • ज़ाइडस कैडिला - 5 करोड़
  • सीरम इंस्टीट्यूट कोवैक्स - 20 करोड़
  • भारत बायोटेक नेज़ल वैक्सीन - 10 करोड़ डोज़
  • जेनोवा वैक्सीन - 6 करोड़

लेकिन इसमें कई पेंच हैं. पहला,इनमें से कोविशील्ड, कोवैक्सीन और स्पुतनिक-वी के अलावा किसी वैक्सीन को मंज़ूरी नहीं मिली है. दूसरास इसमें वैक्सीन वेस्टेज़ को भी ध्यान में नहीं रखा गया. तीसरी बात, पहले चार महीने में कोविशिल्ड और कोवैक्सीन के जितने उत्पादन होने थे, वो टारगेट भी पूरा नहीं हुआ है.

बीबीसी रिएलिटी चेक से बात करते हुए भारत के जाने माने जन-नीति और स्वास्थ्य तंत्र विशेषज्ञ चंद्रकात लहरिया ने कहा, ''जिन वैक्सीन को अभी तक अप्रूवल नहीं मिला उन पर अभी से हम भरोसा नहीं कर सकते. जो वैक्सीन पहले से बन रही है उन वैक्सीन के प्रोडक्शन को बढ़ाने के बारे में सरकार को सोचना होगा. तभी डिमांड सप्लाई को दुरुस्त किया जा सकता है.''

सोमवार को नेज़ल वैक्सीन की प्रधानमंत्री मोदी ने बहुत तारीफ़ की लेकिन सप्लाई शुरू होने की तारीख अभी तक सरकार के पास नहीं है.

डिमांड और सप्लाई के गैप को दूर करने के बारे में गाइडलाइन कुछ नहीं कहती. सबसे अहम बात इनमें से किन-किन वैक्सीन को ख़रीदने के लिए केंद्र ने कितना पेमेंट किया है इसके बारे में कोई पारदर्शिता नहीं दिखती है.

सरकार ने हाल में 1500 करोड़ रुपये बायो ई वैक्सीन के लिए एडवांस पेमेंट की बात स्वीकार की है. मंगलवार को कोविशील्ड और कोवैक्सीन के 25 करोड़ और 19 करोड़ डोज़ के ऑर्डर देने की बात भी कही. लेकिन बाक़ी वैक्सीन के ऑर्डर और पेमेंट पर रोड मैप बहुत साफ़ नहीं है.

राहुल गांधी

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सवाल 5 : 'मुफ़्त वैक्सीन' आख़िर कितनी मुफ़्त?

नई गाइडलाइन के अनुसार हर तबके के लिए केंद्र सरकार मुफ़्त में वैक्सीन मुहैया कराएगी. लेकिन जो लोग ख़रीद कर प्राइवेट अस्पताल में वैक्सीन लगवाने की क्षमता रखते हैं, वो प्राइवेट में ही जा कर वैक्सीन लगवाएँ. सरकार ऐसा करने के लिए प्रोत्साहित भी कर रही है.

प्राइवेट अस्पतालों को हर महीने के वैक्सीन उत्पादन का 25 फ़ीसद ख़रीदने का अधिकार भी दिया है. 100 करोड़ की जनता को वैक्सीन के दो डोज़ लगाने के लिए 200 करोड़ वैक्सीन चाहिए. यानी 50 करोड़ वैक्सीन के लिए लोगों को कीमत चुकानी होगी.

ऐसे में मुफ़्त वैक्सीन का प्रचार मुफ़्त में क्यों हो रहा है, ये सवाल विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री मोदी के संबोधन के बाद उठाया है.

हालांकि केंद्रीय मंत्री हरदीप पुरी ने राहुल गांधी को ट्विटर पर इसका जवाब देते हुए लिखा कि क्या वो पंजाब सरकार को सवाल पूछकर ट्रोल कर रहे हैं?

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