कोरोना काल में मोदी सरकार कितना रख पाई आपकी जेब का ख़याल

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    • Author, सरोज सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

इस कहानी का कोई पात्र काल्पनिक नहीं है. भारत के मध्यम वर्ग के हर परिवार को इस कहानी में अपना चेहरा नज़र आ सकता है. लेकिन कहानी है उत्तर प्रदेश के शर्मा परिवार की.

भारत में कोरोना की दूसरी लहर जब पीक पर थी, उस समय जो परिवार दर-दर अस्पताल में एक बेड की तलाश में जुटे थे, उनमें सुमेधा शर्मा का परिवार भी एक था.

दिल्ली से सटे ग़ाज़ियाबाद में रहने वाली सुमेधा शर्मा के पूरे परिवार को इस साल अप्रैल के अंत में कोविड बीमारी हुई थी. जब सब घर पर रह कर ठीक हो गए तब सुमेधा के पति शांतनु को कोरोना वायरस ने अपनी चपेट में ले लिया. शांतनु को पहले से ही मधुमेह (डायबिटीज़) की बीमारी थी. शुरुआत के कुछ दिन तो घर पर ही रह कर दवाइयां खाई. लेकिन बाद में ऑक्सीजन लेवल नीचे रहने लगा तो अस्पताल में भर्ती करने की नौबत आई. 6 मई से 20 मई तक शांतनु दो अलग-अलग अस्पताल में भर्ती रहे.

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15 दिन अस्पताल में चले इलाज में खर्च आया तक़रीबन 5 लाख रुपये. इसमें से कुछ तो इंश्योरेंस से मिल गए, लेकिन बहुत बड़ा हिस्सा उन्हें अपनी जेब से चुकाना पड़ा, क्योंकि कोविड ट्रीटमेंट का कोई तय प्रोटोकॉल है ही नहीं.

2016 में शांतनु ने नौकरी छोड़ का अपना इलेक्ट्रिकल अप्लायंस का बिजनेस शुरू किया था. पहले की बचत और जमा पूंजी बिजनेस में लगा थी. जब बिज़नेस सेट हो ही रहा था, तब लॉकडाउन लग लगा. पिछले एक साल से उनका धंधा बिल्कुल ठप पड़ा है. यानी आमदनी बिल्कुल बंद है. पहले के बचत के सहारे घर ख़र्च चल रहा था. बीमारी के ख़र्चे ने तो जैसे परिवार की कमर तोड़ दी. बाक़ी रोज़मर्रा की चीज़ों की बढ़ती महँगाई की वजह से अब घर के दूसरे ख़र्चे हैं उनके लिए. हर बार ठहर कर दो बार सोचना पड़ता है.

शर्मा परिवार में सुमेधा, शांतनु के अलावा, उनके माता-पिता और दो बच्चे हैं. बड़ी बेटी पाँचवीं में पढ़ती है और दूसरी बेटी का पिछले साल ही नर्सरी में दाख़िला हुआ है. घर की ईएमआई का ख़र्चा है सो अलग.

अगर आपका भी परिवार भारत का मध्यमवर्गीय परिवार है तो सुमेधा की कहानी में आप अपना चेहरा तलाश रहे होंगे.

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बढ़ती महँगाई और घर ख़र्च

लेकिन क्या इसमें कोई राहत ऐसी थी जो मोदी सरकार से मिल सकती थी? इस पर सुमेधा कहती हैं, "घर के राशन का ही ख़र्चा थोड़ा कम करा दे, पेट्रोल, डीज़ल, दाल, तेल, तो ही हमारा भला हो जाता. बाक़ी तो वायरस पर किसका बस चला है."

सरकारी आँकड़ों के मुताबिक़ अप्रैल 2021 में खाने के तेल के दाम 25 फ़ीसद तक बढ़े हैं, अंडा 10 फ़ीसदी, मछली, मीट 16 और दाल 7 फ़ीसदी तक महँगी हुई है.

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हालांकि कुछ सब्ज़ियों के दाम घटे भी हैं जैसे आलू, टमाटर, लेकिन राशन के बाकी चीज़े में बढ़ोतरी ने उन कीमतों को बेअसर कर दिया है.

पेट्रोल के दाम तो मई के महीने में 17 बार बढ़े हैं. वो रफ़्तार जून में भी जारी है. कई जगह 100 रुपये प्रति से ऊपर बिक रहा है पेट्रोल.

डीज़ल भी रेट में पेट्रोल के बस थोड़ा ही पीछे है. असर ये कि महँगी खाने-पीने की चीज़े ट्रांसपोर्टेशन के नाम पर और महँगी हो गई हैं.

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सुमेधा जहाँ पहले घर में महीने का राशन 7 हज़ार रुपये में लाती थी, पिछले 2-3 महीने से 10 हज़ार रुपये भी कम पड़ रहे हैं. इम्यूनिटी अच्छी रखने की वजह से सेहत के नाम पर फल सब्ज़ियों और प्रोटीन वाले खाने की खपत पहले से ज़्यादा हो रही है.

बेरोज़गारी दर

लेकिन सुमेधा के पति शांतनु को इंश्योरेंस वालों और सरकार से ज़्यादा शिकायत है. वो कहते हैं, "नई बीमारी के नाम पर मरीज़ के गिनीपिग बना दिया है, सारे नए शोध हम पर किए, लेकिन इ्श्योरेंस वाले प्रोटोकॉल में ना होने का बहाना बना कर ख़र्च से पल्ला झाड़ गए. सरकार, इंश्योरेंस कंपनियों और अस्पताल वालों थोड़ी नकेल कस लेती तो हमारी जेब पर बोझ कम हो जाता. हर इलाज के रेट तय करने की ज़िम्मेदारी तो इन्हीं दोनों की है. शांतनु आजकल ख़ुद को बेरोज़गार ही मानते हैं, काम धंधा चल नहीं रहा, तो ख़र्चे कैसे उठाएं.

सेंटर फ़ॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (CMIE) के 6 जून 2021 के आँकड़ों के मुताबिक़ भारत में बेरोज़गारी दर 13 फ़ीसदी है.

सीएमआईई के प्रभाकर सिंह कहते हैं, "लेबर पार्टिशिपेशन रेट देखें तो 2016 में 46 फ़ीसद था. आज वो घट कर 40 फ़ीसद रह गया है. भारत जैसे देश में जहाँ युवा आबादी ज़्यादा है, वहाँ लेबर पार्टिशिपेशन रेट का इस तरह से कम होना अपने आप में चिंता का विषय है. इसे बढ़ना चाहिए. ये बेरोज़गारी दर नोटबंदी के बाद से बढ़ रही थी, कोरोना काल में उसका स्तर और बढ़ गया है."

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लेबर पार्टिसिपेशन रेट का मतलब 15 साल से ऊपर आयु वर्ग के लोग जो रोज़गार पाने के लिए इच्छुक हैं और रोज़गार की तलाश में लगे हुए हैं. इस दर का 6 फ़ीसद घट जाने का मतलब है, रोज़गार मिलने की उम्मीद लोगों ने छोड़ दी है.

देश के जाने माने सांख्यिकीविद प्रणब सेन कहते हैं, "जो लोग बेरोज़गार हुए और उन्हें कोरोना हुआ, इसका पता लगाना सरकार के लिए आसान था. टेस्ट रिपोर्ट के समय फॉर्म भरवा कर ऐसे लोगों की पहचान कराई जा सकती थी. जैसा शांतनु के मामले में था."

केंद्र सरकार को दिक़्क़त उन लोगों में आती जिनकी, नौकरी चली गई और कोविड-19 बीमारी नहीं हुई. ऐसे लोगों का पता लगाने के लिए सरकार के पास कोई तरीका ही नहीं था. ऐसे कुछ लोगों के पास प्रोविडेंट फंड यानी पीएफ़ का सहारा था. प्रणब सेन ऐसे लोगों को मध्यम वर्ग या उच्च मध्यम वर्ग का मानते हैं.

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पीएफ़ से निकासी

दिल्ली की रहने वाली मंजरी के भाई के साथ भी कोरोना काल में ऐसा ही हुआ. अस्पताल में 31 दिन रहने का ख़र्चा आया 10 लाख रुपये. कुछ रकम तो भाई के कंपनी वालों ने इंश्योरेंस क्लेम से दिलवा दी, कुछ घर परिवार और दूसरे सगे संबंधियों ने दिया. जो रकम कम पड़ी, वो तीन महीने की एडवांस सैलरी से पूरा किया गया.

मंजरी कहती हैं, "ख़र्चा और बढ़ सकता था, लेकिन हम अस्पताल से और पहले ही भाई की छुट्टी करवा कर घर ले आए. नहीं तो पीएफ़ तक निकालने की नौबत आ जाती."

सरकारी आँकड़ों की बात करें तो कोरोना महामारी के शुरू होने से लेकर अब तक 76 लाख लोगों ने कोविड एडवांस पीएफ़ क्लेम किया है. सरकार ने तक़रीबन 18 हज़ार करोड़ रुपये पीएफ़ एडवांस क्लेम के तौर पर लोगों को दिया है. महामारी की पहली लहर में केंद्र सरकार ने ऐसे मध्यम और उच्च मध्यम वर्ग के लोगों के लिए पीएफ से पैसा निकासी को थोड़ा आसान कर दिया, जिसे दूसरी लहर में भी जारी रखा है.

जानकार मानते हैं और भारत में ये आम धारणा है कि लोग जब तक बहुत मुश्किल में ना हो, बचत के इस पैसे को हाथ नहीं लगाते. इसलिए मध्यम और उच्च मध्यम वर्ग की तंगहाली के लिए पीएफ़ निकासी के इस आँकड़े को आधार बताया जा रहा है.

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ग़रीब मजदूरों का हाल

प्रणब सेन मानते हैं कि कोरोना महामारी की दूसरी लहर में ग़रीब मजदूर सबसे ज़्यादा आर्थिक रूप से प्रभावित हुए. पहली लहर के बाद प्रधानमंत्री जनकल्याण अन्न योजना के तहत मुफ़्त अनाज भी मिला था और जनधन अकाउंट में पैसे भी. लेकिन इस बार केवल अनाज में ही उन्हें गुज़ारा करना पड़ा. रोज़मर्रा के ज़रूरी सामान की बढ़ती कीमतों ने उनकी कमर सबसे ज़्यादा तोड़ी है.

प्रधानमंत्री मोदी का दावा है कि 80 करोड़ लोगों को इसका लाभ मिला. दूसरी लहर में अब दीवाली तक ग़रीबों के लिए इस योजना को लागू किया जा रहा है. पर सीधे बैंक खाते में पैसा देने की बात केंद्र सरकार ने नहीं की.

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इसकी एक बड़ी वजह थी - इस बार लॉकडाउन जैसी पाबंदियों की घोषणा केंद्र सरकार ने नहीं बल्कि राज्य सरकारों ने की. इसलिए ज़िम्मेदारी केंद्र से ज़्यादा राज्यों की बनती थी. लेकिन राज्यों के पास वो संसाधन नहीं जो केंद्र सरकार के पास है.

कुछ राज्यों ने ऐसे ग़रीब मजदूरों के लिए घोषणाएं की, कुछ ने नहीं की. इसमें से कितनों ने पूरी की कितनों ने नहीं इसके आँकड़े एकमुश्त नहीं मिल पाएँगे. इनमें से कईयों को कोविड बीमारी से लड़ने में भी केंद्र और राज्यों की स्कीमों का लाभ नहीं मिला.

ऐसे में जनता की जेब कितनी भरी और कितनी ख़ाली रही ये अंदाज़ा लगाया जा सकता है.

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