जब जूही चावला की याचिका पर सुनवाई के दौरान किसी ने गाया- 'लाल लाल होठों पर'

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- Author, विनीत खरे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
दिल्ली हाईकोर्ट में बॉलीवुड अभिनेत्री जूही चावला, वीरेश मलिक और टीना वाच्छानी की याचिका पर बुधवार दोपहर वर्चुअल सुनवाई मे अदालत ने ऑर्डर रिज़र्व कर लिया.
याचिका में अदालत से कहा गया है कि वो सरकारी एजेंसियों को आदेश दें कि वो जाँच कर पता लगाएँ कि 5G स्वास्थ्य के लिए कितना सुरक्षित है. सुनवाई से पहले फ़िल्म अभिनेत्री जूही चावला ने वर्चुअल कार्रवाई का लिंक भी इंस्टाग्राम पर शेयर किया था.
लेकिन इस वर्चुअल सुनवाई में अजीब बात ये हुई कि इसमें दो बार बाधा आई जब अदालती कार्रवाई के बीच में अचानक किसी के गाना गाने की आवाज़ आने लगी.
तीनों याचिकाकर्ता 5G तकनीक के ख़िलाफ़ दिल्ली हाईकोर्ट पहुंचे थे.
जब याचिकाकर्ताओं के वकील दीपक खोसला 5G तकनीक के ख़िलाफ़ अपनी दलील पेश कर रहे थे, तभी अचानक किसी के गाने की आवाज़ आई.
गाना जूही चावला की फ़िल्म का था, 'लाल लाल होठों पर गोरी किसका नाम है.'
गाने की आवाज़ सुनते ही सभी सकते में थे.
करीब आठ सेकेंड गाने की आवाज़ आने के बाद जज जेआर मिधा ने कोर्ट स्टाफ़ को उस व्यक्ति को वर्चुअल कोर्ट से हटा देने को कहा और पूछा कि वो व्यक्ति कौन है.

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आवाज़ बंद हुई, अदालत की कार्रवाई फिर शुरू हुई
लेकिन करीब छह मिनट की कार्रवाई के बाद जब वकील दीपक खोसला फिर 5G तकनीक के खिलाफ़ अपनी दलील ज़ोर-शोर से पेश कर रहे थे, एक बार फिर किसी के गाने की आवाज़ आई.
इस बार गाना एक और जूही चावला की फ़िल्म का था, 'मेरी बन्नो की आएगी बारात...'
कार्रवाई में दोबारा बाधा आने पर जज मिधा ने व्यवधान पैदा करने वाले व्यक्ति की पहचान करने के बाद उसे कंटेंप्ट नोटिस जारी करने को कहा.
उन्होंने दिल्ली पुलिस के आईटी डिपार्टमेंट से भी संपर्क करने को कहा.
इस मामले में हमने दिल्ली हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल मनोज जैन से संपर्क करने की कोशिश की लेकिन संपर्क नहीं हो सका.
जज ने पूछे सवाल

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क़रीब 5,000 पन्नों वाली इस याचिका में कई सरकारी एजेंसियाँ जैसे डिपार्टमेंट ऑफ़ कम्युनिकेशंस, साइंस एंड एंजीनियरिंग रिसर्च बोर्ड, इंडियन काउंसिल ऑफ़ मेडिकल रिसर्च, सेंट्रल पोल्युशन कंट्रोल बोर्ड, कुछ विश्वविद्यालयों और विश्व स्वास्थ्य संगठन को पार्टी बनाया गया था.
इस याचिका पर अपना ऑर्डर रिज़र्व करने से पहले जज मिधा ने इस याचिका पर कई सवाल पूछे.
उन्होंने दीपक खोसला से पूछा कि क्या उन्होंने सरकार को अपनी चिंताओं से अवगत करवाया है और क्या सरकार ने उन्हें कोई जवाब दिया है.
अदालत ने उनसे पूछा कि अगर वो सरकार के पास नहीं गए तो वो सीधे अदालत के पास क्यों आए हैं.
जज ने दीपक खोसला से पूछा "क्या आप बिना सरकार के पास गए सीधे अदालत आ सकते हैं?"
उन्होंने दीपक खोसला से पूछा कि क्या उन्होंने इस याचिका को तैयार किया है और कहा कि ऐसा लगता है कि याचिका मीडिया पब्लिसिटी के लिए है.
जूही चावला की फ़िक्र पुरानी

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मोबाइल टावर रेडिएशन को लेकर जूही चावला की फ़िक्र 10 साल पुरानी है.
साल 2011 की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ मालाबार हिल में रहने वाली जूही चावला अपने घर से 40 मीटर दूर सहयाद्रि गेस्ट हाउस पर लगे 16 मोबाइल फ़ोन टावर से स्वास्थ्य पर होने वाले असर को लेकर चिंतित थीं और जब आईआईटी मुंबई के एक प्रोफ़ेसर ने जाँच की तो पाया कि उनके घर का एक बड़ा हिस्सा कथित तौर पर 'असुरक्षित' था.
यूट्यूब पर मौजूद एक प्रज़ेंटेशन में जूही चावला बताते हुई दिखती हैं कि कैसे इतने सारे फ़ोन टावर से उनकी फ़िक्र बढ़ी थी और उन्होंने अपने घर के आस-पास रेडिएशन के स्तर की जाँच के बारे में सोचा. और जब उन्होंने जाँच रिपोर्ट देखी, तब उनकी फ़िक्र और बढ़ गई.
5जी सेल्युलर नेटवर्क दुनिया के कई हिस्सों जैसे अमेरिका, यूरोप, चीन और दक्षिण कोरिया में पहले से ही काम कर रहा है. भारत में भी 5जी ट्रायल्स पर काम चल रहा है.

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5जी से इंटरनेट की स्पीड बहुत तेज़ हो जाती है और इसे क्रांतिकारी माना जाता है, क्योंकि इससे टेलीसर्जरी, आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस, बिना ड्राइवर के कार जैसी तकनीक को और विकसित करने में मदद मिलेगी.
लेकिन दुनिया के कई हिस्सों में फ़िक्र भी है कि 5जी की आधारभूत सुविधाओं से रेडिएशन का एक्सपोज़र बढ़ता है, जिससे कैंसर जैसी बीमारियाँ हो सकती हैं.
याद रहे कि पिछले साल ब्रिटेन में 5जी टावर्स को इन अफ़वाहों के फैलने के बाद आग लगा दी गई थी कि 5जी टावर्स कोरोना वायरस के फैलने या तेज़ी से फैलने का कारण हैं.
भारत में भी ऐसी अफ़वाहें फैली थीं जिसके बाद सरकार को सफ़ाई देनी पड़ी थी.
याचिका क्या कहती है?

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याचिका में 5जी से पेश संभावित ख़तरों का ज़िक्र किया गया है.
इसमें बेल्जियम का हवाला दिया गया है, जहाँ 5जी को लेकर विरोध रहा है.
याचिका में दावा किया गया है एक तरफ़ जहाँ सेल्युलर कंपनियाँ ख़तरनाक तेज़ी से सेल टावर लगा रही हैं ताकि कनेक्टिविटी बेहतर की जा सके. वहीं 5,000 से ज़्यादा ऐसे वैज्ञानिक शोध हैं, जो कथित तौर पर बता रहे हैं कि नेटवर्क प्रोवाइडर्स की इस लड़ाई में लोग मौत का शिकार हो रहे हैं.
याचिका कहती है कि अगर टेलिकम्युनिकेशंस इंडस्ट्री का 5जी का प्लान कामयाब हो गया, तो कोई व्यक्ति, कोई जानवर, कोई चिड़िया और कोई पत्ता भी रेडियो फ़्रीक्वेंसी रेडिएशन से हर क्षण पेश आने वाले रेडिएशन से बच नहीं पाएगा और इस रेडिएशन का स्तर आज के स्तर 10 से 100 गुना ज़्यादा होगा.
5जी से ख़तरे पर अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टें

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साल 2014 में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कहा कि आज तक मोबाइल फ़ोन के इस्तेमाल से स्वास्थ्य पर कोई प्रतिकूल असर नहीं दिखा है.
लेकिन ये रिपोर्ट ये भी कहती है कि इंटरनेशनल एजेंसी फ़ॉर रिसर्च ने मोबाइल फ़ोन से पैदा होने वाली एलेक्ट्रोमैग्नेटिग फ़ील्ड्स को इंसानों के लिए संभावित कैंसर पैदा करने वाला माना है.
विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक़ ऐसा इसलिए है क्योंकि अभी इस बारे में पुख्ता सबूत नहीं मिले हैं कि मोबाइल फ़ोन से पैदा होने वाली एलेक्ट्रोमैग्नेटिग फ़ील्ड्स से पक्के तौर पर इंसानों में कैंसर होता है या नहीं.
साल 2018 की अमेरिकी सरकार की एक रिपोर्ट ने पाया कि रेडियो फ़्रीक्वेंसी रेडिएशन के ज़्यादा एक्सपोज़र से चूहों के दिल में एक तरह का कैंसर जैसा ट्यूमर हो गया.
इस शोध के लिए चूहे के पूरे शरीर को मोबाइल फ़ोन के रेडिएशन के एक्सपोज़र में दो साल तक रखा गया और हर दिन नौ घंटे ये चूहे एक्सपोज़ होते थे.

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शोध करने वाले एक वैज्ञानिक ने लिखा कि मोबाइल फ़ोन के रेडिएशन को जो इन चूहों ने सहा, वो किसी इंसान के अनुभव से बहुत दूर है इसलिए इस शोध का आपके जीवन पर असर नहीं पड़ना चाहिए.
क्या मोबाइल फ़ोन स्वास्थ्य के लिए ख़तरा है, इस पर अमेरिका के फ़ूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन की रिपोर्ट कहती है, अभी तक ऐसे कोई सबूत नहीं मिले हैं कि इससे इंसानों में कैंसर का ख़तरा पैदा हो.
साल 2020 की विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ वो 5जी सहित सभी रेडियो फ्रीक्वेंसी के एक्सपोज़र से होने वाले स्वास्थ्य पर ख़तरे को लेकर एक रिपोर्ट 2022 में प्रकाशित करेगी.
साल 2019 में कई भारतीय वैज्ञानिकों ने भी सरकार को 5जी के ख़िलाफ़ पत्र लिखा था.
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