ब्लैक फ़ंगस: चार सर्जरी, एक आँख गंवाई लेकिन नहीं छोड़ा हौसला, गुजरात की महिला की कहानी

इमेज स्रोत, Deepika Ben family.
- Author, विनीत खरे
- पदनाम, बीबीसी संवादादाता
कोविड से जूझते भारत में रिपोर्टों के मुताबिक़ अभी तक 12,000 से ज़्यादा म्यूकरमायकोसिस या ब्लैक फ़ंगस के मामले सामने आ चुके हैं.
आकलन ये है कि इस बीमारी से संक्रमित क़रीब 50 प्रतिशत लोगों की मौत हो जाती है और जो बचते हैं, कई बार उनकी जान बचाने के लिए उनकी आँखें निकालनी पड़ती हैं.
आँखों के सर्जन डॉक्टर सपन शाह के मुताबिक़ अहमदाबाद में रह रहीं दीपिकाबेन मुकेशभाई शाह का मामला गुजरात से रिपोर्ट हुए ब्लैक फ़ंगस के शुरुआती मामलों में से एक था.
वो कहते हैं, "मैंने सितंबर में भी म्यूकरमायकोसिस के मरीज़ देखे थे, लेकिन वो सर्जरी के लिए तैयार नहीं थे."
पिछले साल अक्तूबर में कोविड से संक्रमित हुईं दीपिकाबेन की अभी तक चार सर्जरी हो चुकी हैं - नाक, आँख, मुँह की और एक और.
उनकी जान बचाने के लिए उनकी दाहिनी आँख को निकालना पड़ा, मुँह के सभी दाँत निकालने पड़े, उनकी नाक से फ़ंगस साफ़ करना पड़ा और आख़िरी सर्जरी में दिमाग़ के नीचे स्थित एक हड्डी को हटाया गया क्योंकि फ़ंगस वहाँ भी पहुँच गया था.

इमेज स्रोत, Dr Sapan Shah
आँख की 60 से अधिक सर्जरी
अक्तूबर से अभी तक डॉक्टर शाह आँख निकालने की 60 से ज़्यादा सर्जरी कर चुके हैं.
14 नवंबर को जब दीपिकाबेन डॉक्टर सपन शाह के पास पहुँचीं, तो उनकी शिकायत थी कि उन्हें दाहिनी आँख से साफ़ नहीं दिख रहा था.
डॉक्टर शाह के मुताबिक़ उस वक़्त उनका कोविड का इलाज चल रहा था और उन्हें स्टेरॉयड्स दिए जा रहे थे.
डॉक्टर शाह ने बताया, "जब वो मेरे पास आई थीं, तब उनकी स्थिति बहुत ख़राब थी. मैंने उन्हें आँख निकालने की सलाह दी थी लेकिन उस वक़्त ऐसा करना सही नहीं माना जाता था. वो लोग भी संशय में थे. दो तीन दिन बाद उन्होंने आँख निकलवाने का फ़ैसला किया."
Please wait...

इमेज स्रोत, Deepika Ben family.
सुनिए ब्लैक फ़ंगस से लड़ाई की दीपिकाबेन की कहानी उन्हीं से -
मेरा नाम दीपिकाबेन है. मेरी उम्र 42 साल है. मेरे परिवार में मेरे पति के अलावा एक बेटा और बेटी हैं. हम अहमदाबाद के पालड़ी इलाक़े में रहते हैं. मुझे पिछले साल दीवाली से पहले अक्तूबर में कोरोना हुआ था.
मुझे 20 दिन कोरोना रहा. उस दौरान मेरा शरीर टूटने लगा, बुख़ार जैसा लगा. मेरा वज़न 82 किलो था, जो गिरकर 50 तक पहुँच गया.
उसके बाद मुझे ब्लैक फ़ंगस हो गया. दरअसल मेरी आँखों में समस्या आनी शुरू हो गई थी और वो बंद होने लग गई थीं.
मुझे कुछ इन्फ़ेक्शन जैसा लगा. मुझे आँख में बहुत ज़्यादा दर्द हो रहा था. जब मैंने डॉक्टर से संपर्क किया, तो पता चला कि ये ब्लैक फ़ंगस है. तब मुझे ब्लैक फ़ंगस के बारे में कुछ पता नहीं था.

इमेज स्रोत, Deepika Ben family.
जान बचाने के लिए निकालनी पड़ी आँख
मुझे पहले डायबिटीज़ नहीं थी, लेकिन कोरोना के बाद मेरा शुगर लेवल बढ़कर 550 तक पहुँच गया था. मुझे कोरोना के वक़्त दवाइयाँ दी गई थीं, लेकिन इंजेक्शन नहीं लगा था.
जब डॉक्टर ने आँख निकालने को कहा, तब मुझे बहुत चिंता होने लगी, लेकिन डॉक्टर ने कहा था कि अगर आँख नहीं निकाली गई, तो मेरी जान चली जाएगी. और आख़िर मुझे ये फ़ैसला लेना ही पड़ा.
आँख निकालने के ऑपरेशन के बाद मेरे सारे दाँत एक-एक करके गिरने लगे और फ़ंगस नाक तक पहुँच गया था, जिसके कारण नाक की भी सर्जरी करनी पड़ी और उसमें से फ़ंगस निकालना पड़ा.
दाँत में दर्द के कारण रात में मैं सो नहीं पाती थी. आँख निकालने और दाँत निकालने के ऑपरेशन 5-6 घंटे चलते थे. वो महीने ऐसे थे कि मैं डिप्रेशन में चली गई थी और रात में नींद नहीं आती थी.

इमेज स्रोत, Deepika Ben family.
उन दिनों मैं खाने को चबा नहीं सकती थी और सिर्फ़ तरल पदार्थ जैसे जूस, नारियल पानी ले रही थी. मुझे तीन महीने तक इंजेक्शन लगाए गए.
आठ-नौ महीने बाद मेरे माथे में फ़ंगस वापस आ गया और अप्रैल में मेरा फिर ऑपरेशन हुआ. मुझे व्हाइट और ब्लैक दोनों फ़ंगस हो गए थे.
ये सब सहने के लिए मुझे भगवान ने शक्ति दी. मुझे अपने बच्चों को देखकर ये शक्ति आती थी. मेरे पति ने मुझे बहुत सपोर्ट किया. मुझे अच्छे डॉक्टर मिले. डॉक्टरों ने भी हिम्मत दी.
50 लाख रुपए ख़र्च हुए
मुझे ठीक करने के लिए डॉक्टरों की एक टीम थी.
शुरुआत से अभी तक मेरे इलाज में क़रीब 50 लाख रुपए ख़र्च हो चुके हैं. अभी कुछ और ख़र्च बाक़ी हैं. नकली दाँत लगवाने हैं. नकली आँख लगवानी है. वो सब.
ब्लैक फ़ंगस ठीक करने के लिए मुझे तीन महीने तक जो इंजेक्शन लगे, वो बहुत महंगे थे. हर इंजेक्शन की क़ीमत आठ हज़ार रुपए थी. एक दिन में ऐसे छह इंजेक्शन लगते थे.
यानी तीन महीने तक हर एक दिन में छह इंजेक्शन. इसका मतलब एक दिन में 48 हज़ार रुपए के इंजेक्शन.

इमेज स्रोत, Deepika Ben family.
मेरे पति का पीवीसी पाइप का बिज़नेस है. डॉक्टर ने बोला है कि अभी कोई समस्या तो नहीं है लेकिन मुझे रुटीन चेक-अप करवाना पड़ेगा.
मुझे खाने-पीने पर ध्यान रखना पड़ेगा. मुझे धूप में निकलने की मनाही है. मेरे नाक और आँख के बीच की नसें काट दी गई हैं.
अभी मुझे खाने और साँस लेने में थोड़ी तकलीफ़ होती ही है. मैं अंदर से बहुत मज़बूत हूँ, इसलिए मेरे लिए इन चीज़ों के मायने ज़्यादा नहीं है क्योंकि मैं अच्छी हो रही हूँ.
डॉक्टर ने बोला है कि धीरे-धीरे ये तकलीफ़ें भी चली जाएँगी. जो कटी नसें हैं, वो कुदरती तौर पर जुड़ जाएँगी, लेकिन उसे वक़्त देना पड़ेगा.
जब डॉक्टर ने मुझे पहली बार देखा था, तो बोला कि आपका मामला बस ख़त्म है लेकिन भगवान पर मुझे बहुत ज़्यादा विश्वास है. बच्चों ने, सभी ने मुझे बहुत हिम्मत दी.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)















