ICU DIARY: कोरोना वॉर्ड में जब एक बीमार बुजुर्ग ने सबको खुश कर दिया.

आईसीयू डायरी

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कोरोना से जंग में लाखों लोगों ने अपनी जान गँवाई है. कोरोना से सीधी जंग में मरीज़ों के बाद कोई रहा है तो वो हैं डॉक्टर.

दूसरों की मौत से जंग लड़ने का काम डॉक्टरों के लिए कितना चुनौतीपूर्ण रहा? किस तरह के अनुभव रहे और कैसे अंजान लोगों की ज़िंदगी या मौत एक डॉक्टर को प्रभावित करती है?

ये समझने के लिए बीबीसी आपके लिए पेश करता है नई सिरीज़ - ICU DIARY. इस सिरीज़ की सभी कहानियाँ आप एक साथ यहाँ पढ़ सकते हैं.

इन कहानियों में कोविड आईसीयू वॉर्ड में ड्यूटी करने वाली डॉ दीपशिखा घोष के लिखे अनुभव हैं.

इन अनुभवों में आपको बेटा भी मिलेगा, बेटी भी. पिता भी और पति पत्नी भी. अंजान चेहरे वाले मरीज़ भी और मास्क लगाए डॉक्टरों का दुख भी.

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#ICUdiary 5: आईसीयू में फैलती मुस्कुराहटें...

कोरोना के दौर में उन मरीज़ों को काफ़ी संघर्ष करना पड़ा, जिन्हें कीमोथेरपी, डायलिसिस जैसी प्रक्रियाओं के लिए बार-बार अस्पताल जाना पड़ता है.

कमज़ोर इम्यून सिस्टम की वजह से ऐसे मरीज़ ज़्यादा रिस्क पर रहते हैं. ख़तरा ये कि कहीं वायरस चपेट में ना ले ले और ख़तरा ये भी कि पहले से जो बीमारी है, वो सांसों को और मुश्किल ना बना दे.

कोरोना की दूसरी लहर के दौरान मैं एक ऐसे ही मरीज़ से मिली. 78 साल के इन शख़्स को कोरोना संक्रमण तब हुआ, जब वो एक हफ़्ता पहले डायलिसिस के बाद लौट रहे थे.

ये समझते हुए कि शायद वो हर दूसरे बुजुर्ग मरीज़ की तरह अपना मास्क ढंग से नहीं लगा रहे होंगे, मैं समझाने के लिए उनके बेड के पास जाती हूं.

लेकिन अगले ही पल मैं ग़लत साबित होती हूं.

ख़राब तबीयत के बावजूद वो मुझे देखकर मुस्कुराते हैं. वो अपने बारे में बताते हुए पूछते हैं कि क्या उनका डायलिसिस जल्द शुरू हो सकेगा?

वो ये भी कहते हैं कि इलाज में पूरा सहयोग करेंगे और परेशानी की वजह कम से कम बनेंगे.

हम डॉक्टरों को ऐसी बातें सुनना बेहद कम नसीब हो पाता है.

नर्सों की नज़र में वो प्रिय बन गए और इस बात पर नोक-झोंक होने लगी कि कौन उनकी देखभाल करेगा.

हम उन्हें ब्रीदिंग मशीन पर रखते हैं. उनका डायलिसिस शुरू होता है. एक लंबे वक़्त के बाद ICU में खुशी महसूस हुई. लेकिन डायलिसिस के ठीक बीच उनकी तबीयत बिगड़ने लगी.

हमने जैसे ही अलॉर्म बजते हुए सुना, हर कोई उन्हें बचाने की जद्दोजहद में जुट गया.

क़रीब 20 मिनट तक हम CPR देते रहे. कोशिशें रंग लाईं और हम उन्हें बचाने में सफ़ल हुए.

अगले तीन दिन वो धीरे-धीरे बेहतर सेहत की ओर बढ़ने लगे. चार दिन बाद पहली बार वो आंख खोलते हैं. इशारे से बात कहने की कोशिश करते हैं.

ICU की फ़िज़ा एक बार फिर सुकून भरी हो गई थी. अगले कुछ दिन जो कोई भी बेड के पास से गुज़रता वो सबको मुस्कुराकर देखते.

एक हफ़्ते बाद वो वॉर्ड में शिफ्ट होते हैं और उसके चार दिन बाद वो अस्पताल से घर चले जाते हैं.

ऐसी जीत ही होती हैं, जो हम डॉक्टरों को हौसला दिए रहती हैं. यही वो जीत हैं, जिनकी ख़ातिर हम हर रोज़ दूसरी की ज़िंदगियों की जंग लड़ने सफ़ेद कोट पहनकर निकल पड़ते हैं.

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#ICUdiary 4: 'घर ले चलो, वहीं मरना है'

डर समेटे हुए अस्पताल, अकसर ज़ाहिर सी वजहों से पसंद नहीं किए जाते हैं. कुछ लोग ऐसे भी रहे, जो कोरोना होने पर पहली बार ज़िंदगी में अस्पताल में भर्ती हुए.

ऐसे लोगों का डर साफ झलकता है. एक सुबह कोविड ICU वॉर्ड में 44 साल की एक औरत भर्ती हुईं. बेहद परेशान और इलाज करवाने को लेकर बिलकुल अनिच्छुक.

वो घर जाना चाहती थीं. वो लगातार ये ज़िद करती रहीं कि परिवार से उनको बात करने दी जाए ताकि घरवाले आएं और अस्पताल से ले जाएं.

वो बोलीं, ''मेरा तो बच्चा भी नॉर्मल डिलिवरी से हुआ था क्योंकि मुझे ऑपरेशन नहीं करवाना था. आप मेरे उस दर्द का अंदाज़ा भी नहीं लगा सकतीं. मुझे बस घर जाने दो. चाहे फिर मैं वहां मर ही जाऊं.''

मैं उनको उनके इलाज के बारे में समझाती हूं, और कहती हूँ 'आपको कुछ नहीं होगा..'

पर वो मेरी बात सुनने के लिए तैयार ही नहीं होतीं. मैं उनके बेटे को फोन करती हूं और फोन उनके पास रखती हूं.

वो अपने बेटे से कहती हैं- तू मेरा अच्छा बेटा नहीं है क्योंकि तू मेरे मना करने के बाद भी मुझे अस्पताल छोड़ गया.

बेटा मां से माफ़ी मांगता है और कहता है- डॉक्टर जो कहें वो करो मां.

बेटा मां से वादा करता है- मां आप "कुछ दिनों" में बेहतर महसूस करोगी तो मैं आकर आपको ले जाऊंगा.

क़रीब आधा घंटा लगा, तब जाकर वो कुछ शांत हुईं. हमने इलाज शुरू किया. हालांकि उनकी तबीयत लगातार बिगड़ती रही.

100 फीसदी सपोर्ट के बावजूद ऑक्सीजन लेवल बढ़ नहीं रहा था. वो मॉनीटर की ओर देखती हैं, जिस पर लिखा था- 84%.

वो मुझे बुलाती हैं और कहती हैं- 'कुछ दिन' पूरे हुए. मेरे बेटे को अभी बुलाओ. उसने कहा था कि वो मुझे घर ले जाएगा. मुझे घर पर मरना है, अस्पताल में नहीं.

मुझे नहीं मालूम था कि क्या जवाब दूं? मैं उनके बेटे को फोन करती हूं और तबीयत के बारे में बताती हूं कि उन्हें मैकेनिकल वेंटिलेशन की ज़रूरत पड़ेगी. उनका बेटा फौरन हामी तो भर देता है लेकिन कहता है कि मां को फोन मत देना. क्योंकि वो मां की गुज़ारिशों को इंकार नहीं कह सकता.

वो मुझसे कहता है, 'मां को समझाइए कि तबीयत ठीक होते ही घर ले जाऊंगा.' ये कहते हुए उसकी आवाज़ लड़खड़ाने लगती है.

वो मुझे हर हाल में इलाज करने के लिए कहता है, ''आप मां की मत सुनिए. मां की जान बचाने के लिए जो ज़रूरी है वो कीजिए.''

हमने पूरी कोशिश की ताकि उनको बचाया जा सके. वो अब भी वेंटिलेटर पर हैं. कई दिन बीत चुके हैं.

उनका बेटा रोज़ फोन करता है. पर वो अब इस हाल में नहीं कि बात सुन भी सकें.

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#ICUdiary 3: पत्नी, चाय और वेंटिलेटर

एक रोज़ एक दादाजी अस्पताल में भर्ती हुए. तेज़ बुखार और बेहद कम ऑक्सीजन लेवल.

जिस रात मैंने उन दादाजी को ICU में एडमिट किया, वो काफी बेचैन थे. वो इस बात से परेशान थे कि आख़िर उनके मुंह पर ये ऑक्सीजन मास्क क्यों लगा हुआ है?

मेडिकल टर्म में हम जिसे NIV यानी नॉन इनवेसिव वेंटिलेशन कहते हैं, वो उनके लिए जी का जंजाल था.

उनसे बात करने की कुछ कोशिशों के बाद मुझे पता चला कि वो बीमारी की वजह से कुछ भी समझ पाने की हालत में नहीं थे. मैंने उन दादाजी की पत्नी को फोन लगाया. उनकी तबीयत के बारे में बताया और ये कहा कि अगर ये ऑक्सीजन मास्क बार-बार हटाएंगे तो हमें उनके हाथ बाँधने पड़ेंगे.

सिसकते हुए वो धीरे से बोलीं- आप लोगों को जो ठीक लगे, वो सब करिए... बस इन्हें बचा लीजिए.

फ़ोन के दूसरी तरफ़ रोती हुईं उन दादीजी को मैं ये दिलासा देती हूं कि जब तक ऑक्सीजन लेवल ठीक नहीं हो जाएगा, तब तक मैं यहीं बेड के बिलकुल पास रहूंगी.

कुछ मिनट बाद मुझे फोन पर वो कॉल करती हैं. वो अब कुछ संभली हुई आवाज़ में बात कर रही थीं. वो बोलीं, ''अगर इनको वक़्त पर मन की चाय ना मिले तो चिड़चिड़े हो जाते हैं, शायद वो चाय पीना चाह रहे होंगे.''

मैं इस पर ज़्यादा कुछ नहीं कहती हूं. सिवाय इसके कि हां शायद ये एक वजह हो, मैं चाय का इंतज़ाम करवाती हूँ.

वो फिर कहती हैं कि प्लीज़ सबसे कहिए कि उनका बहुत ख्याल रखें. मैं हामी भरती हूँ.

कुछ घंटों बाद वो दादाजी ख़त्म हुई बेचैनी के बाद कुछ शांत दिखते हैं. अगले कुछ दिन मैं अस्पताल से छुट्टी पर रहती हूँ.

लौटने पर वो दादाजी ICU के वेंटिलेटर पर ख़राब हालत में मिलते हैं. वो अब ज़्यादा दिन बचेंगे नहीं.

उस रोज़ मुझे एक और ख़ौफ़ से भरी कॉल करनी पड़ती है.

मैं उनकी पत्नी को फ़ोन करके कहती हूं कि तबीयत बहुत खराब है और उम्मीद अब बहुत कम बची है. वो मुझसे पूछती हैं कि वेंटिलेटर पर जाने से पहले क्या उन्हें चाय दी गई थी?

मेरे में इतना जिगरा नहीं था कि मैं ना कह सकूं. मैं जवाब 'हां' में देती हूं. सिर्फ एक शब्द- हां.

नहीं जानती कि मेरे इस शब्द से उन्हें सुकून मिला होगा या नहीं. मैं सिर्फ़ उम्मीद कर सकती हूं कि काश ऐसा हुआ हो. कुछ पलों की ख़ामोशी के बाद वो कहती हैं- आप इस बात का ध्यान रखिएगा कि सब उनका अच्छे से ख़्याल रखें. मैं जवाब देती हूं कि मैं रखूंगी.

ये जानते हुए कि उन दादीजी को शायद अब ज़िंदगी भर चाय अकेले पीनी पड़ेगी.

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#ICUdiary 2: ये बच तो जाएंगे ना?

ICU में मैं सिर्फ़ ऐसे मरीज़ों को देखती हूँ, जिनकी हालत बद से बदतर हो. मैंने काफ़ी नए चेहरे देखे. ज़्यादातर चेहरे उम्मीदों को खो चुके थे.

मैंने लड़खड़ाती आवाज़ में कितने ही वो सवाल सुने, जो पूछने वाले भी पूछना नहीं चाहते थे. फिर भी उम्मीद लिए पूछते- ये बच तो जाएंगे न?

बर्बादी के कितने ही मंज़र इन आंखों को नसीब हुए. ये मंज़र पूरी दुनिया में देखे जा रहे हैं. किसी मुल्क़ में कम तो किसी मुल्क़ में ज़्यादा.

ये सारे चेहरे और आवाज़ें सिर्फ़ एक नंबर नहीं हैं. इन सबकी भी ज़िंदगी और सपने उतने ही सच हैं, जैसे हम सबके हैं.

कोरोना ने इस वक़्त की गुल्लक को तोड़ने को काम किया है, जिसके चलते सब बिखर गया है. सपनों को पूरा करने की उम्मीदें और ये ख्वाहिश कि दुनिया को अलविदा कहने से पहले हम कुछ ऐसा कर जाएं, जिसे देखकर कोई हमें याद कर सके.

कुछ कहानियां अब कभी नहीं कही जा सकेंगी. क्योंकि कुछ कहानियां गैर-मामूली सी बातों को समेटे हुए थीं और कुछ रोज़मर्रा के कामों से भरी. कुछ कहानियां एक भाषा से दूसरी भाषा में अनुवाद होने के दरमियां खो जाएंगी.

कुछ शायद इसलिए खो जाएंगी कि कोई नहीं बचा था जिससे बात की जा सके. कोरोना ने हम डॉक्टरों को मरीज़ों का इलाज करने में लगाकर हमारा वक़्त बाँट दिया है. इसके बावजूद कई बार थोड़ा सा वक़्त या थक चुका दिमाग ये मोहलत देता है कि हम बात कर सकें.

ऐसे मौक़ों पर हमेशा दो तरह की बातें होती हैं.

पहली बातचीत, जिसमें हम मरीज़ों से मास्क ढंग से लगाने, दवाएं लेने के लिए कह रहे होते हैं. या फिर लोगों से परिवार, काम या ज़िंदगी के बारे में बात करके समझा रहे होते हैं कि ये ज़िंदगी कितनी ख़ूबसूरत है और मरीज़ को इस बिन बुलाए वायरस से जंग जीतकर जल्द अस्पताल को टाटा कहकर घर लौटना है.

दूसरी बातचीत, जिसमें हमसे कुछ कठोर सवाल पूछे जा रहे होते हैं. ये सवाल मरीज़ सीधा आपकी आंख में देखते हुए पूछता है, मैं बच तो जाऊंगा ना डॉक्टर?

ऐसे सवालों पर हम सही चीजें बताने की कोशिश करते हैं. लेकिन कई बार चीज़ें सही होती ही नहीं हैं.

आंखों में देखते हुए ये बताना कि ये आंखें जल्द बंद हो जाएंगी, हमारे काम का सबसे कठोर हिस्सा हो चला है.

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#ICUdiary 1: तुमी तो आमार माँ...

हम लगातार एक जंग लड़ रहे हैं. जंग न सिर्फ़ कई रूप वाले वायरस से है बल्कि कई दूसरी मुश्किलों से भी है.

हमारे अस्पताल में एक महिला भर्ती हुई, जो ख़ुद एक डॉक्टर हैं. उनका ऑक्सीजन लेवल काफ़ी कम था. फिर भी वो ज़्यादा इलाज या वेंटिलेटर पर जाने से इंकार करती हैं.

ऑक्सीजन पर होने के बावजूद वो एक पूरा वाक्य बोलने में लड़खड़ा जातीं. वो एक सांस में कुछ ही शब्द बोल पातीं. बीते कुछ हफ़्तों में मैंने उनके मिजाज़ को तेज़ी से बदलते देखा है. शुरू में मुझसे और नर्सों के लिए जो बेरुखी थी, वो अब प्यार में बदल गई थी.

अब वो मेरा हाथ पकड़कर अक्सर नींद आने वाली दवा मांगतीं.

वो बंगाली में कहतीं- तुमी तो आमार मां...

यानी तुम ही तो मेरी मां हो.

ये बातें उन नौजवानों के मन में जाकर ठहर रही थीं, जो बेहद कम उम्र के हैं और अचानक मौत से लड़ते लोगों का ख़याल रखने के रोल में आ गए हैं.

उनके पति भी कोरोना मरीज़ हैं और बेहतर तबीयत होने की वजह से इसी अस्पताल के दूसरे वार्ड में भर्ती हैं. अक्सर वो अपनी पत्नी से कहते- कम से कम प्रोन वेंटिलेशन तो कर लो.

प्रोन वेंटिलेशन में मरीज़ को पेट के बल लेटने को कहा जाता है, इससे सांस लेने की दिक्कत दूर होने की संभावना रहती है.

लेकिन उनका वज़न ज़्यादा है, इसलिए प्रोन वेंटिलेशन तकलीफों से भरा हो सकता है. वो ये जानती हैं कि उनके पति भी ये बात समझते हैं.

फिर भी वो अपना हाथ उठाती हैं और पति को इशारे से समझाती हैं कि वो पूरी कोशिश कर रही हैं. उनके पति हमसे गुज़ारिश करते हैं कि चाहे जैसे भी हो, हम उनकी पत्नी से इलाज करवाने के लिए कहें.

मैं दिलासा देती हूं कि हर संभव कोशिश करूंगी.

हाथ जोड़े और आंखों में खूब सारी उदासी लिए वो शख्स अपने बेड तक चले जाते हैं. एक ऐसी उम्मीद लिए जो पूरी होनी मुश्किल है.

कुछ रोज़ बाद वो शख्स अस्पताल से घर चला जाता है. लेकिन अकेला...

'तुमी तो आमार मां....' ये बात बिना किसी लड़खड़ाहट के कानों में गूंजती रहती है.

(सिरीज़ प्रोड्यूसर: विकास त्रिवेदी/इलस्ट्रेशन: पुनीत बरनाला)

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