उत्तराखंड में संक्रमण की चपेट में आते बच्चे बड़े ख़तरे का तो संकेत नहीं?

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- Author, ध्रुव मिश्रा
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए देहरादून से
उत्तराखंड में पिछले डेढ़ माह में 16 हज़ार से अधिक बच्चे और 19 साल तक के युवक संक्रमित पाए गए हैं.
स्टेट कंट्रोल रूम कोविड-19 की वेबसाइट के मुताबिक़ इनमें नौ साल की उम्र के 3,020 और और 10 से 19 साल के बीच के 13,393 किशोर शामिल थे.
कोरोना संक्रमण का पहला मामला राज्य में पिछले साल मार्च में पाया गया था. लगभग साल भर में (31 मार्च तक) प्रदेश में बच्चों और किशोरों के बीच संक्रमण के कुल 10740 मामले सामने आए लेकिन एक माह यानी अप्रैल 2021 तक ये 18 हज़ार का आँकड़ा पार कर गया है.
बच्चों और किशोरों में संक्रमण में तेज़ी प्रदेश में जारी है.
सवाल उठने लगा है कि क्या उत्तराखंड में कोरोना की तीसरी लहर पहुँच चुकी है, जिसके बारे में कहा जा रहा है कि इसमें सबसे ज़्यादा नुक़सान बच्चो-किशोरों को होगा.
उत्तराखंड में डायरेक्टर नेशनल हेल्थ मिशन डॉक्टर सरोज नैथानी ने बीबीसी से कहा कि कहीं ना कहीं ये आँकड़े 'हमें अलर्ट कर रहे हैं.'
दूसरी जगहों की तरह उत्तराखंड में भी इस आयु वाले कई तरह के परिवेश से आते हैं - कुछ बच्चे उस वर्ग से हैं जहाँ अधिकतर समय घरों के भीतर बीतता है, वीडियो गेम्स पर, क्लासेज़ ऑनलाइन होती हैं. दूसरा उस वर्ग से है, जो छोटी कॉलोनीज़ या झुग्गी-झोपड़ियों में रहते हैं.

इन दोनों से अलग वो बच्चे-युवक हैं, जो गाँवों में रहते हैं. उत्तराखंड के गाँवों में रहने वाले अधिकतर बच्चे पहाड़ी इलाक़ों में निवास करते है जहाँ लोगों की धारणा है कि यहाँ पहाड़ों पर कोरोना नहीं होता.
डॉ सरोज बताती हैं "अभी जो आँकड़े आए हैं, इनमें से हमें ये देखना होगा जो बच्चे संक्रमित हुए हैं, ये किस कैटेगरी के बच्चे हैं और कहाँ के हैं. क्या ये सभी देहरादून, हरिद्वार और ऊधम सिंह नगर के के हैं या पहाड़ के किसी इलाक़े के हैं, हमें अपनी सर्विलांस टीम से यह पता करवाना शुरू करना पड़ेगा ताकि हमारी स्ट्रेटजी भी वैसी ही बने इससे हमें ये और क्लियर हो जाएगा कि हमे अपनी स्ट्रेटजी को किस तरफ तेज़ी से ले जाना है."

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वो कहती हैं, हो सकता है बच्चे घर से बाहर न निकल रहे हों, लेकिन माँ-बाप या परिवार के दूसरे लोग तो काम से बाहर जाते होंगे और हो सकता है इंफेक्शन उनके माध्यम से पहुँच रहा हो.
डॉक्टर सरोज का मानना है कि अगर हम पैंडेमिक की हिस्ट्री देखें, तो नॉर्मल तीन से चार वेव आतीं हैं. वायरस म्यूटेट भी हो रहा है. अभी देश में 18 साल से अधिक उम्र के लोगों को वैक्सीन लगनी शुरू हो गई है हालाँकि इसमें अभी थोड़ा सा टाइम लगेगा क्योंकि वैक्सीन की अवेलेबिलिटी के हिसाब से हमें इसमें भी यह पूरा साल ख़त्म हो सकता है, अब सिर्फ़ 18 साल से नीचे की उम्र का ग्रुप ही बच जाता है इंफेक्शन का ख़तरा उसको ज़्यादा है"
आरोप
विपक्ष का आरोप है कि उत्तराखंड में चाइल्ड स्पेशलिस्ट नहीं हैं.
बीबीसी से बातचीत में मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस के वरिष्ठ नेता किशोर उपाध्याय कहते हैं, "इस समय उत्तराखंड में चाइल्ड स्पेशलिस्ट नहीं हैं, उसके साथ ही कोविड से संक्रमित जो बच्चे हैं उनको किस तरह से हमको ट्रीट करना है किस तरह से उनको मनोवैज्ञानिक तरह से उनकी मदद करनी है उसकी राज्य में किसी भी तरह की व्यवस्था नहीं है."
वो आरोप लगाते हैं कि सरकार को बच्चों के लिए अलग से एक प्रकोष्ठ बनाना चाहिए था.
विपक्ष का आरोप है कि मुख्यमंत्री सिर्फ़ अस्पतालों के दौरे में समय लगा रहे हैं जिससे फ़ायदे की बजाय और अफरातफरी मच रही है, स्टाफ का ध्यान लोगों को बचाने की बजाय तीमारदारी और जानकारी देने में लगा है.

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इससे निपटने को क्या हैं सरकार की तैयारियाँ?
उत्तराखंड सरकार के प्रवक्ता और कैबिनेट मंत्री सुबोध उनियाल कहते हैं, "सरकार बच्चों के लिए अलग से कोविड हॉस्पिटल तैयार कर रही है, जिनमें अलग कमरों में बच्चों को रखा जाएगा. हम लोग होटलों को भी इसमें शामिल कर रहे हैं, जिससे उनको कोविड अस्पताल के रूप में तैयार कर सकें जिनमे बच्चों को सिंगल रूम फैसिलिटी दी जा रही है. जिसमें अगर बच्चे के साथ उनके माँ बाप को भी रखना हो, तो उन्हें रखा जा सके."
सुबोध उनियाल मानते हैं कि राज्य में चाइल्ड स्पेशलिस्ट पर्याप्त संख्या में नहीं हैं, लेकिन उनका कहना है कि जितने भी हॉस्पिटल तैयार किए जा रहे हैं उनमें चाइल्ड स्पेशलिस्ट की उपलब्धता रहेगी.
"हमने सभी ज़िलाधिकारियों और मुख्य चिकित्सा अधिकारियों को अधिकार दे दिया है डॉक्टरों की कमी को देखते हुए वो भर्तियाँ कर सकते हैं"
सुबोध उनियाल ने बीबीसी के माध्यम से गाँवों में लोगों से अपील भी की कि वो टेस्टिंग से न हिचकें.
देहरादून मे सोशल डेवेलपमेंट फ़ॉर कम्युनिटीज फाउंडेशन के संस्थापक अनूप नौटियाल कहते हैं कि बच्चों का इलाज कैसे हो, उसकी अभी तक सरकार या स्वास्थ्य विभाग की तरफ से कोई भी एसओपी अभी तक हमारे पास में उपलब्ध नहीं हो पाई है.
बच्चों के केस में एक महत्वपूर्ण बात ये है बच्चा जब हॉस्पिटल में एडमिट होता है, तो उनके साथ माताओं को भी अस्पताल में देखरेख के लिए रहना पड़ेगा, तो ऐसे में ये जानकारी नहीं आई है कि क्या उत्तराखंड के अस्पतालों में ऐसे बच्चों की माताओं के रहने के लिए अलग से इंतजाम किया जा रहा है?
इसके अलावा बच्चों से संक्रमण माताओं में ना हो, इससे उन्हें कैसे बचाया जाएगा ये अपने आप मे बच्चों को लेकर विशेष तौर पर बड़ी समस्या है. इसके लिए सरकार को राज्य के जितने भी बच्चों के डॉक्टर हैं, चाहे वो सरकारी हैं या प्राइवेट हैं उनके साथ में सरकार तुरंत एक बैठक करने की आवश्यकता है"
देहरादून में इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के प्रेसिडेंट डॉक्टर अमित सिंह कहते हैं कि अस्पतालों में एनआईसीयू और पीडियाट्रिक केअर यूनिट डेवलप करने की अत्यधिक आवश्यकता है. बच्चों के साथ स्थिति में मिनट भर में हालात ख़राब हो सकते हैं इसलिए ट्रीटमेंट और रेस्पांस टाइम को खासतौर पर ध्यान में रखना होगा.
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