पश्चिम बंगाल चुनाव: धरने पर ममता बनर्जी, चुनाव आयोग के फ़ैसले से गरमाई सियासत

ममता बनर्जी

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    • Author, प्रभाकर मणि तिवारी
    • पदनाम, कोलकाता से, बीबीसी हिंदी के लिए

चुनाव आयोग की ओर से चुनाव प्रचार पर चौबीस घंटे की पाबंदी के ख़िलाफ़ पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने मंगलवार दोपहर को कोलकाता में महात्मा गांधी की मूर्ति के पास धरना शुरू किया है.

हालांकि उनको अब तक इसके लिए सेना की अनुमति नहीं मिल सकी है. ये इलाक़ा सेना का है.

मंगलवार सवेरे टीएमसी ने धरने की अनुमति के लिए सेना को एक पत्र भेजा था, लेकिन यह रिपोर्ट लिखने तक सेना ने उस पत्र पर कोई फ़ैसला नहीं किया था.

सेना के एक प्रवक्ता ने बताया, इतने कम वक्त में इस तरह की अनुमति नहीं दी जा सकती क्योंकि इसके लिए कुछ तय प्रक्रिया का पालन करना होता है.

उधर, ममता के इस धरने पर बीजेपी ने उनको आड़े हाथों लेते हुए कहा है कि किसी मुख्यमंत्री का इस तरह चुनाव आयोग के फ़ैसले के ख़िलाफ़ सड़क पर उतरना उन्हें शोभा नहीं देता.

प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष दिलीप घोष ने कहा कि "ममता पर चौबीस घंटे नहीं बल्कि चुनाव संपन्न होने तक पाबंदी लगाई जानी चाहिए थी."

विपक्षी कांग्रेस और सीपीएम ने भी ममता के धरने की आलोचना की है. हालांकि उन्होंने चुनाव प्रचार पर पाबंदी के चुनाव आयोग की निष्पक्षता को लेकर भी सवाल उठाए हैं.

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क्या है मामला?

केंद्रीय बलों के ख़िलाफ़ ममता बनर्जी की टिप्पणी और कथित तौर पर धार्मिक लहज़े वाले बयान के बाद सोमवार को चुनाव आयोग ने उनके चुनाव प्रचार पर पाबंदी लगा दी थी.

आयोग ने अपने आदेश में कहा था, "आयोग पूरे राज्य में क़ानून व्यवस्था की गंभीर समस्याएं पैदा कर सकने वाले ऐसे बयानों की निंदा करता है और ममता बनर्जी को सख्त चेतावनी देते हुए सलाह देता है कि आदर्श आचार संहिता प्रभावी होने के दौरान सार्वजनिक अभिव्यक्तियों के दौरान ऐसे बयानों से बचें."

आयोग के आदेश में उनके भाषण के 'प्रमुख हिस्सों' का उल्लेख किया गया है.

इसके मुताबिक़ उन्होंने कहा था, "मैं अपने अल्पसंख्यक भाइयों और बहनों से हाथ जोड़कर अनुरोध करती हूं कि बीजेपी से पैसा लेने वाले शैतान की बात सुनकर अल्पसंख्यक वोटों को बंटने नहीं दें. वह कई सांप्रदायिक बयान देता है और हिंदू और मुस्लिमों के बीच झगड़े की आग लगाता है."

केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों के ख़िलाफ़ अपने कथित बयान पर 'कारण बताओ नोटिस' के जवाब में ममता बनर्जी ने कहा था कि उन्होंने केवल मतदाताओं, ख़ासतौर पर महिलाओं से अपील की थी कि यदि सशस्त्र बल समेत कोई उनके मताधिकार में अड़चन पैदा करता है तो वे 'घेराव' करके लोकतांत्रिक तरीके से प्रदर्शन करें.

उनकी दलील थी, "घेराव सार्वजनिक प्रदर्शन दर्ज करने का एक लोकतांत्रिक तरीका है और उसे अवैध मानने की कोई वजह नहीं है."

आयोग ने पहले इन दोनों मुद्दों पर ममता को 'कारण बताओ नोटिस' दिया था. लेकिन उनका जवाब संतोषजनक नहीं होने की वजह से उके चुनाव प्रचार पर पाबंदी लगाने का फ़ैसला किया गया.

ममता ने सोमवार रात आयोग के फ़ैसले के बाद अपने एक ट्वीट में धरने पर बैठने का ऐलान किया था. ख़ुद ममता और उनकी पार्टी टीएमसी ने आयोग के इस फ़ैसले को अलोकतांत्रिक और असंवैधानिक बताया है.

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ममता अपने तय समय बारह बजे से पहले ही धरनास्थल पर पहुंची. धरनास्थल पर उनके लिए एक अस्थायी टेंट लगाया गया. उनके साथ ना तो टीएमसी का कोई नेता या कार्यकर्ता था और न ही धरनास्थल पर पार्टी के झंडे या बैनर लगाए गए थे.

ममता को मंगलवार को चार रैलियां करनी थीं. लेकिन अब इस पाबंदी की वजह से उनकी कम से कम दो चुनावी रैलियां रद्द करनी पड़ी है.

रात आठ बजे पाबंदी की मियाद ख़त्म होने के बाद वे दो रैलियों को संबोधित करेंगी.

दूसरी ओर, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से लेकर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह तक आज कोलकाता और आसपास के इलाक़ों में रोड शो और रैलियां कर रहे हैं.

दिलीप घोष

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इस बीच, प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष दिलीप घोष ने ममता पर उत्तेजना और सांप्रदायिकता फ़ैलाने का आरोप लगाते हुए मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़े की मांग की है. उनका कहना है कि ममता के ख़िलाफ़ चुनाव ख़त्म होने तक पाबंदी लगाई जानी चाहिए थी.

मीडिया से बात करते हुए दिलीप घोष ने कहा, "मैंने ही आयोग से ममता बनर्जी के चुनाव अभियान पर पाबंदी लगाने की मांग की थी. वे सुप्रीम कोर्ट, संसद और संवैधानिक संस्थाओं के ख़िलाफ़ सड़कों पर उतर रही हैं. किसी मुख्यमंत्री को यह सब शोभा नहीं देता. उनको तुरंत अपने पद से इस्तीफ़ा दे देना चाहिए."

घोष का आरोप है कि कूचबिहार जिले के शीतलकुची में पांच लोगों की मौत के लिए ममता ही ज़िम्मेदार हैं.

दूसरी ओर, सीपीएम और कांग्रेस ने ममता पर पाबंदी के फ़ैसले का स्वागत किया है और उनके धरने पर बैठने को ग़लत बताया है. लेकिन साथ ही उन्होंने चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर भी सवाल उठाए हैं.

सीपीएम नेता सुजन चक्रवर्ती कहते हैं, "ममता को दी गई कारण बताओ नोटिस के संदर्भ में ही आयोग ने यह पाबंदी लगाई है. लेकिन क्या प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष दिलीप घोष या सायंतन बसु और राहुल सिन्हा जैसे नेताओं के ख़िलाफ़ भी ऐसी कार्रवाई की जा सकती है? अगर नहीं तो चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल जरूर खड़े होंगे."

हालाँकि चुनाव आयोग ने मंगलवार को राहुल सिन्हा के ख़िलाफ़ कार्रवाई करते हुए उनके चुनाव प्रचार करने के पर 48 घंटे की पाबंदी लगा दी है. साथ ही दिलीप घोष से भी बुधवार सुबह तक जवाब माँगा गया है.

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अब्दुल मन्नान कहते हैं, "आयोग को अगर अपनी निष्पक्षता साबित करनी है तो उसे प्रधानमंत्री, केंद्रीय गृह मंत्री और बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष के ख़िलाफ़ भी कार्रवाई करनी चाहिए."

अधीर चौधरी

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प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अधीर चौधरी ने ममता बनर्जी सरकार को कमज़ोर बताते हुए कहा है कि अगर उनकी सरकार होती तो वे भड़काऊ बयान देने वाले बीजेपी के नेताओं को कब का गिरफ्तार कर जेल भेज चुके होते.

वह कहते हैं, "राज्य सरकार ने बीजेपी नेताओं के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं की है. अब उनको धरने के ज़रिए आग में घी डाल कर राजनीति नहीं करनी चाहिए.

चौधरी ने चुनाव आयोग पर भी तंज कसते हुए कहा, "आयोग शांतिपूर्ण चुनाव कराने में नाकाम रहा है. शीतलकुची की फायरिंग की सीबीआई जांच कराने के बाद दोषियों को सख्त सज़ा दी जानी चाहिए."

अधीर ने कहा कि चुनाव प्रचार पर चौबीस घंटे की पाबंदी लगाना मुख्यमंत्री के लिए काफी अपमानजनक है. लेकिन टीएमसी के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, अधीर चौधरी शायद भूल गए हैं कि राज्य में चुनाव हो रहे हैं और पुलिस प्रशासन आयोग के नियंत्रण में है, मुख्यमंत्री के नहीं.

राजनीतिक पर्यवेक्षक प्रोफ़ेसर समीरन पाल कहते हैं, "ममता को आयोग की पाबंदी का सम्मान करना चाहिए. लेकिन धरने पर उनके ख़िलाफ़ पाबंदी की मियाद बढ़ने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता."

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