'बदनाम प्यार' की ज़िंदगी जीने पर मजबूर भारत के समलैंगिक जोड़े

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    • Author, नीलेश धोत्रे
    • पदनाम, बीबीसी मराठी

"अपना देश बहुत अच्छा है. यहाँ मौक़ों की भरमार है. इसलिए मैं इसे छोड़ कर नहीं जाना चाहता. हालांकि हमारे मौजूदा क़ानून समलिंगी शादियों को इजाज़त नहीं देते. सरकार भी क़ानूनों में संशोधन के लिए तैयार नहीं है फिर भी मैं इस देश को छोड़ कर नहीं जाऊंगा." बीबीसी मराठी से बात करते हुए राघव ने अपना इरादा जता दिया.

दिल्ली हाई कोर्ट ने हाल में समलिंगी शादियों को मान्यता देने के लिए दायर की गई कुछ अपीलों की सुनवाई की थी. लेकिन केंद्र सरकार ने सुनवाई के दौरान ऐसी शादियों को मान्यता देने के ख़िलाफ़ दलीलें दी थीं.

केंद्र सरकार ने दिल्ली हाई कोर्ट में दायर अपने शपथ पत्र में कहा, "हमारे यहां संसद के बनाए क़ानून सिर्फ़ महिला और पुरुष के बीच शादी को मान्यता देते हैं. इन क़ानूनों में अलग-अलग धार्मिक समुदायों और उनके पारंपरिक नियमों को भी मान्यता दी गई है. इस व्यवस्था में कोई भी हस्तक्षेप इन क़ानूनों के मौजूदा संतुलन को बिगाड़ देगा और इससे अराजकता फैल जाएगी. "

केंद्र सरकार ने एक क़दम आगे बढ़ कर शादी करने के अधिकार को मौलिक अधिकार के तौर मान्यता देने से भी इनकार कर दिया. केंद्र सरकार की ओर से दाखिल शपथपत्र को आप यहां पढ़ सकते हैं- समलिंगी विवाह भारतीय मूल्यों और संस्कारों से मेल नहीं खाएंगे -केंद्र सरकार

चूंकि भारत में समलिंगी शादियों को क़ानून की मान्यता नहीं है, इसलिए कई गे और लेज़्बियन जोड़े दूसरे देशों में जाकर अपनी शादियों का रजिस्ट्रेशन कराते हैं. कई बार वे वहीं स्थायी तौर पर रहने लगते हैं.

लेकिन राघव का इरादा ऐसा करने का नहीं है. वह भारत में ही रहना चाहते हैं. उन्होंने अपने पार्टनर से भारत में ही शादी की थी. वह भी बेलगाम (बेलगांव ) जैसे शहर में. एक दूसरे से तीन साल तक लगातार मिलते-जुलते रहने के बाद दोनों ने शादी का फ़ैसला किया. इस शादी को दोनों के परिवारों का समर्थन था.

उन्होंने एक बेहद निजी समारोह में शादी की. शादी हिंदू वैदिक रीति और ईसाई रीति-रिवाजों से हुई. दोनों की शादी के नौ साल हो चुके हैं लेकिन वे इसका क़ानूनी तौर पर रजिस्ट्रेशन नहीं करा पाए हैं.

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इस तरह यह जोड़ा उन सारे हक़ों से महरूम है, जो अपनी शादी का क़ानूनी तौर पर रजिस्ट्रेशन करा चुके स्त्री-पुरुष को मिलते हैं. शादी के नौ साल बाद भी दोनों अपने-अपने माता-पिता के साथ रहते हैं. दोनों के माता-पिता भी चाहते हैं वे उनके साथ रहें. इसलिए राघव और उनके पार्टनर एक दूसरे के घर जाकर ही मिल पाते हैं. अभी तक उन्होंने अपना अलग घर नहीं लिया है.

राघव कहते हैं, "हमारे समाज में तो अक्सर प्रेम-विवाह का भी विरोध होता है. इसलिए समलिंगी विवाह को मान्यता देना तो बहुत दूर की बात है. हमारे शहर का माहौल दो धर्मों में बँटा हुआ है. इसलिए एक गे रिलेशनशिप को सार्वजनिक तौर पर मंज़ूर करना ख़तरे से ख़ाली नहीं है."

भले ही राघव और उनके पार्टनर ने शादी कर ली हो लेकिन उन्हें इसे छिपा कर रखना पड़ता है. कई बार दोनों दोस्त के तौर पर घूमते-फिरते हैं.

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उनके पास इस शादी का कोई सुबूत नहीं है. इस वजह से होने वाली दिक्क़तों पर बात करते हुए राघव कहते हैं, "हमारी शादी का कोई प्रमाण नहीं है. इसलिए हम साथ मिलकर कोई घर नहीं ख़रीद सकते. हमें सरोगेसी की भी इजाज़त नहीं है और न ही हम बच्चा गोद ले सकते हैं. "

राघव अपने कॉमन पार्टनर के साथ मिल कर कॉमन एलआईसी पॉलिसी लेना चाहते थे. लेकिन एलआईसी वालों का कहना था कि कॉमन पॉलिसी तभी मिल सकती है जब इस पर दस्तख़त करने वालों की आपस में शादी हुई या कोई फिर कोई ख़ून का रिश्ता हो.

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एलआईसी अधिकारियों ने उनसे पूछा कि जब दोनों सिर्फ़ दोस्त हैं तो फिर साथ मिलकर पॉलिसी क्यों लेना चाहते हैं. आख़िरकार दोनों को अलग-अलग पॉलिसी ख़रीदनी पड़ी. अपनी पॉलिसी में वे एक दूसरे को नॉमिनेट भी नहीं कर सकते थे. लिहाजा दोनों को अपने-अपने माता-पिता को नॉमिनी बनाना पड़ा.

राघव कहते हैं, भेदभाव तो ऑफिशियल फॉर्म से ही शुरू हो जाता है. हर जगह ऐसा है. एक सामान्य पति-पत्नी को जो हक़ हासिल हैं हम उनसे महरूम हैं.

राघव कहते हैं, "हमारे शहर के लोगों की सोच छोटी है. यहाँ जिस तरह धर्म का प्रभाव बढ़ रहा है, उसमें हम अपने रिश्तों को सार्वजनिक करते हुए डर लगता है. एलजीबीटी अधिकार सिर्फ़ बड़े शहरों की बात है. जब मैंने दफ्तर में अपनी असली पहचान बताई तो लोगों ने मुझे निशाना बनाया. मेरा मज़ाक उड़ाया गया. आख़िरकार इसकी वजह से मैंने वहां की नौकरी छोड़ दी. "

राघव के पार्टनर काफ़ी ऊंचे ओहदे पर काम करते हैं. कई लोग उनके मातहत काम करते हैं. इसलिए उन्होंने अपनी निजी और प्रोफ़ेशनल ज़िंदगी बिल्कुल अलग कर रखी है.

समलैंगिक होना गुनाह नहीं है

लोग तो ट्रांसजेंडर और गे शख्स के बीच मोटा फ़र्क़ भी नहीं कर पाते. लिहाजा राघव ने लोगों को इस बारे में जागरूक करने के लिए एक ब्लॉग लिखने का फ़ैसला किया. लेकिन उनके साथ एक ऐसी घटना घटी कि उन्होंने तुरंत इससे हाथ खींच लिए.

राघव कहते हैं, "मैंने समलैंगिकता के बारे में लोगों को जागरूक करने के लिए ब्लॉग लिखना शुरू किया. लेकिन 2017 और 2018 में कुछ स्थानीय अख़बारों ने फ़र्ज़ी ख़बरें छापनी शुरू कीं. उन्होंने लिखा कि शहर में होमोसेक्शुअल लोगों ने धावा बोल दिया है और वे आम लोगों को अपने जाल में फंसा रहे हैं. ये लोग पुरुषों को उनकी महिलाओं से मिलने नहीं देते और उन्हें होमोसेक्शुअल बना रहे हैं. होमोसेक्शुअलिटी की यह बीमारी हर तरफ़ फैल रही है. मैं इसे पढ़ कर सदमे में आ गया."

राघव कहते हैं, "हम उस वक़्त बेहद डरे हुए थे. अपने परिवार में हम काफ़ी खुले हुए हैं लेकिन लगातार दबाव बना हुआ था. मेरा मानना है कि समाज हमें स्वीकार करे. साथ ही हमारे लिए ज़रूरी क़ानून भी बने. अगर नियम होंगे तो कम से कम हमें कुछ अधिकार तो मिलेंगे.".

...और इस तरह मेरे करियर को झटका लगा

इंद्रजीत घोरपडे

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इंद्रजीत घोरपड़े आईटी इंजीनियर हैं. पुणे में रहते हैं. वह पिछले तीन साल से एक रिलेशिनशिप में हैं.

लेकिन वह कहते हैं कि समलिंगी शादियों को भारत में क़ानूनी मान्यता नहीं है. इस चीज़ ने उनके करियर को नुक़सान पहुँचाया है.

इंद्रजीत बताते हैं कि दो साल पहले उन्हें आयरलैंड की एक कंपनी का काफ़ी अच्छा ऑफर मिला था. कंपनी का कहना था कि वह अपने पार्टनरशिप के साथ आयरलैंड में बस सकते हैं.

इंद्रजीत की ख़ुशियों का ठिकाना नहीं था. लेकिन यह ख़ुशी कुछ पलों के लिए थी. इंद्रजीत से कहा गया कि उन्हें पार्टनर से अपना रिश्ता क़ानूनन साबित करना होगा. तभी कंपनी उन्हें आयरलैंड का वीज़ी और दूसरी सुविधाएं दिलवा सकेगी.

कंपनी ने इंद्रजीत को जॉइंट बैंक अकाउंट, प्रॉपर्टी कार्ड या फिर कोई ऐसा दस्तावेज जमा करने के लिए कहा, जिसमें लिखा हो कि वे पार्टनर हैं.

इंद्रजीत कहते हैं, "मैं उन्हें अपने रिश्ते का दस्तावेजी सुबूत नहीं दे सका. मैं यह साबित नहीं कर सका कि वो मेरे पार्टनर हैं. भारत में ऐसा कोई क़ानून नहीं है, जिसके तहत हम कोई रजिस्ट्रेशन दिखा सकें, जो यह दिखाए कि हम दोनों पार्टनर हैं. लिहाजा मुझे आयरलैंड की उस कंपनी के ऑफर को ना कहना पड़ा."

इंद्रजीत कहते हैं, हम शादी नहीं कर सकते क्योंकि समलिंगी शादियों का रजिस्ट्रेशन भारत में नहीं होता है. अगर हम शादी भी कर लेते तो इसे मान्यता दिलाने के लिए रजिस्ट्रेशन का वर्षों इंतजार करना पड़ता.

इंद्रजीत अब विदेश जाकर वहीं बसने के बारे में सोच रहे हैं. वह कहते हैं न सिर्फ़ सामाजिक माहौल की वजह से बल्कि मानसिक शांति के लिए भी मैं ऐसा सोच रहा हूं.

इंद्रजीत कहते हैं. "जब आपको लगता है कि आपकी रिलेशनशिप को क़ानून मान्यता नहीं देता तो आप मानसिक रूप से परेशान हो जाते हैं. कई बार सोसाइटी में लोगों या फिर रिश्तेदारों से मिलने के वक़्त मैं अपने पार्टनर का परिचय अपने ब्वॉयफ्रेंड के तौर पर करवाता हूं. लेकिन हमारा रिश्ता इससे आगे बढ़ चुका है. हम एक दूसरे के सिर्फ़ बॉयफ्रेंड नहीं है. इसलिए हर बार जब मैं कहता हूं कि ये मेरा बॉयफ्रेंड है तो हताश महसूस करता हूं. हम बॉयफ्रेंड के कॉन्सेप्ट को गंभीरता से नहीं लेते. इसलिए हम लोगों से एक दूसरे का परिचय कराते वक़्त कहते हैं कि हम पार्टनर हैं."

इंद्रजीत का रोष साफ़ दिखता है. वह कहते हैं, "हेट्रोसेक्शुअल यानी विपरीत लिंगी मामलों में पति या पत्नी को आराम से वीज़ा मिल जाता है. लेकिन मुझे इसमें परेशानी हुई. किसी भी रिलेशनशिप में मेडिकल इमर्जेंसी, प्रॉपर्टी और दूसरी चीज़ों से जुड़े मामले होते हैं. हमारे रिलेशनशिप में भी यह सब है. लेकिन मेरा करियर में यह बड़ा रोड़ा बन गया है. मेरे सामने कई मौक़े आए. लेकिन मुझे इन्हें छोड़ना पड़ा. अगर हमारे रिश्ते में क़ानूनी अड़चन नहीं आती तो हम दो साल पहले आयरलैंड में बस चुके होते. "

मेरी बहनों ने इसका फ़ायदा उठाया

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दीप 54 साल के हैं. मुंबई में रहते हैं. वह एड फ़िल्म मेकर थे. उन्होंने यूनिसेफ जैसी संगठनों में भी काम किया है. लेकिन उन्हें इस बात का अफ़सोस है कि वह शादी नहीं कर सके. वह शादी करना चाहते थे लेकिन हालात कभी उनके पक्ष में नहीं रहे. दीपक गे हैं और सिंगल भी. उनके भाई-बहन इसका फ़ायदा उठाते हैं.

दीप की कहानी उनकी ही जुबानी सुनिए.

"शुरू में मुझे ख़ुद पर शक होता था. मुझे ख़ुद को स्वीकार करने में काफ़ी वक़्त लगेगा. जब मैंने ख़ुद को जैसा था वैसा ही स्वीकार करना शुरू किया तो मुझे अहसास हुआ कि यह तो भारत के क़ानून के हिसाब से ग़लत है. गे होने की मैंने भारी क़ीमत चुकाई है. "

कुछ वक़्त बाद मैं अपने जैसे ही एक शख्स से मिला. हम एक दूसरे से शादी करना चाहते थे. लेकिन भारत में यह मुमकिन नहीं था. लिहाजा मेरे पार्टनर ने कहा कि हमें विदेश जाकर शादी कर लेनी चाहिए.

लेकिन मेरे पैरेंट्स बीमार थे. मेरे लिए यह संभव नहीं था कि मैं विदेश जाकर शादी करूं. अपने बीमार माँ-बाप को मैं यहां छोड़ कर नहीं जा सकता था. इसलिए मुझे उस रिश्ते से निकलना पकड़ा. मेरे पार्टनर ने कनाडा में किसी दूसरे शख्स से शादी कर ली.

दरअसल, मेरी शादी हो सकती थी. अगर मेरी दोनों बहनें हमारे पैरेंट्स की देखभाल की ज़िम्मेदारी साझा कर लेतीं तो यह संभव हो सकता था. लेकिन दोनों बहनों ने माँ-बाप की ज़िम्मेदारी लेने से इनकार कर दिया. उन्होंने यह कह कर पल्ला झाड़ लिया कि उनकी शादी हो चुकी है और उन्हें अब अपने बच्चे पालने हैं.

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जब मैंने उनसे कहा कि आखिर मैं कब तक अकेले उनकी देखभाल की ज़िम्मेदारी संभालूंगा तो उन्होंने कहा कि तुम शादी क्यों नहीं कर लेते. जबकि उन्हें मालूम था कि मैं गे हूँ. उन्हें मेरी स्थिति के बारे में पूरी तरह मालूम है. वे जानती हैं कि मैं किसी औरत से शादी नहीं कर सकता. उन्होंने मेरी हालत का पूरा फ़ायदा उठाया.

इन वजहों से मैं अपने करियर पर पूरी तरह फोकस नहीं कर सका. मुझे काम के लिए शहर से बाहर जाना बंद करना पड़ा. मेरे ऊपर पैरेंट्स की जिम्मेदारी थी. मुझे कई अच्छे ऑफर ठुकराने पड़े.

अगर मैं भारत में अपने पार्टनर से शादी कर पाता तो मेरे लिए अपने मां-बाप की देखभाल बेहद आसान हो जाती. फिर मैं अपने बहनों को सही जवाब देता.

लेकिन अब वे कहती हैं कि मैं तो अकेला हूं. मेरे ऊपर किसी और काम की भी ज़िम्मेदारी नहीं है. तो इस तरह मेरी बहनों ने पूरी ज़िम्मेदारी मेरे कंधों पर लाद दी.

मेरी भी अपनी ज़िंदगी है. मैं भी अपनी ज़िंदगी जीना चाहता हूँ. चलिए, शादी की बात छोड़ दीजिये. मुझे तो सिंगल रहने का भी अधिकार नहीं. शादी-शुदा न होने की वजह से मेरे साथ लगातार भेदभाव होता रहा.

वे क़ानूनन शादीशुदा हैं और मैं क़ानूनी तौर पर शादी नहीं कर सका. और इससे ये हालात पैदा हो गए. कभी-कभी तो मैं बेहद मानसिक दबाव में आ जाता हूँ. इसने मेरे शारीरिक स्वास्थ्य को भी असर डाला है.

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समलिंगी शादी का क़ानून होता तो मुझे कुछ भरोसा मिलता

भुवनेश्वर की रहने वाली रुचा कहती हैं, "ऐसा नहीं है कि समलिंगी शादियों को क़ानूनी मंज़ूरी मिलते ही समाज तुरंत बदल जाएगा लेकिन कम से कम हमें बराबरी से रहने का हक तो मिल जाएगा."

रुचा अपनी पार्टनर से शादी करना चाहती हैं. दोनों 14 साल से रिलेशनशिप में हैं. पिछले तीन साल से दोनों ने साथ रहना शुरू किया है.

लेकिन रुचा की इसकी भारी क़ीमत चुकानी पड़ी है. उनके परिवार ने उन्हें घर छोड़ने के लिए कह दिया. उनसे काग़ज पर लिखवा लिया गया कि परिवार की संपत्ति में वह कोई हक़ नहीं मांगेंगी.

रुचा कहती हैं, "मैं शुरू से ही अपने परिवार के कारोबार में लगी रही थी. मैंने अपनी पार्टनर के साथ मिलकर जॉब कंस्लटेंसी का काम शुरू किया था. परिवार के बिज़नेस से होने वाली कमाई इसके बैंक अकाउंट ही जमा होती थी. मैंने अपना हिस्सा कभी नहीं रखा. लेकिन 2018 में मेरी पार्टनर सड़क हादसे का शिकार हो गईं. वह गंभीर रूप से घायल हो गईं. उस समय मेरे परिवार को पता चला कि मैं लेस्बियन हूँ. मेरे माता-पिता नहीं हैं. मेरे चाचा-चाची ने मुझे घर छोड़ने के लिए कह दिया. मुझे उन्होंने यह लिख कर देने को कहा कि मैं परिवार की संपत्ति में हिस्सा नहीं मांगूगीं. अपने हिस्से की संपत्ति सरेंडर कर रही हूं. मेरी गाड़ी भी उन्होंने रख ली. अगर क़ानून मेरे पक्ष में होते मैं ऐसे लोगों के ख़िलाफ़ लड़ सकती थी."

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मेरी पार्टनर के साथ हुई दुर्घटना और घर से निकाल दिए जाने के बाद जॉब कंस्लटेंसी का मेरा काम बंद हो गया. मुझे नया काम ढूंढना पड़ा. हां, इस दौरान मेरी पार्टनर के माता-पिता की पूरी सहानुभूति मेरे साथ रही. अब हम किराये के घर में रह रहे हैं. मैं नौकरी ढूंढ रही हूं. "

रुचा कहती हैं, "लेकिन हमारे लिए सबसे बड़ी बात यही है कि हम मुश्किल वक्त में भी एक साथ रह सकते हैं. "

चूंकि रुचा और उनकी पार्टनर की शादी को क़ानूनी मान्यता नहीं है इसलिए वे एलआईसी की ज्वाइंट पॉलिसी नहीं ले सकतीं. रुचा अपनी पॉलिसी में अपनी पार्टनर को नॉमिनेट नहीं कर सकतीं. उन्हें सब कुछ छिपा कर करना पड़ता है.

रुचा ने अपने एक तर्जुबे के बारे में बताया, "एक बार हम एक गायनोकोलोजिस्ट के पास गए. मेरी पार्टनर को शरीर में अंदरुनी जलन की शिकायत थी. जब हम डॉक्टर के पास गए तो उन्होंने पूछा कि मैं हर वक़्त पार्टनर के साथ क्यों लग रहती हूं. अगर हमारे रिलेशनशिप को क़ानूनी मान्यता मिली होती तो हम सीधे उन्हें अपने रिश्ते के बारे में बता सकते थे. आज हम इस बारे में लोगों को सीधे बताने लगें तो पता नहीं लोगों का क्या रुख होगा. अगर हमारे रिश्ते को कानूनी मान्यता मिली होती तो हमारे अंदर थोड़ा विश्वास तो जगता."

लेकिन रुचा की दिक्कतें यहीं खत्म नहीं होती. उन्हें हमेशा डर के साये में रहना पड़ता है.

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वह कहती हैं, " कई पुरुष दोस्त मेरी पार्टनर के पास आकर पूछते हैं कि वह मेरे साथ क्यों रहती हैं. वे कहते हैं हमारे साथ शादी कर लो. हम अच्छा कमाते हैं. मेरी पार्टनर को यह सब झेलना पड़ता है. "

रुचा कहती हैं, "अस्पृश्यता यानी छुआछूत को ख़त्म करने के कानून बने हुए हैं. लेकिन इससे यह पूरा खत्म नहीं हुआ है. हाँ, इससे हालात थोड़े सुधरे हैं. अगर क़ानून लागू हो तो हमारी स्थिति भी थोड़ी सुधर सकती है. कम से कम हम लोगों के सवाल का सीधा जवाब तो दे सकते हैं. "

रुचा को इस बात का आश्चर्य होता है कि केंद्र सरकार समलिंगी शादियों को क़ानूनी मान्यता देने के विरोध में कोर्ट में भारतीय संस्कृति की दुहाई दे रही है.

वह कहती हैं, "महाभारत में भी समलिंगी संबंधों की कई कहानियां हैं. फिर यह भारतीय संस्कृति से कैसे अलग है. यहाँ तक कि खजुराहो में समलिंगी संबंधों से जुड़ी मूर्तियां हैं. आख़िर वे कहाँ से आए."

रुचा के अंदर इसे लेकर बड़ा रोष है, "अगर कोई का़ान बने तो मुझे और मेरी पार्टनर को सुरक्षा मिल सकती है. इससे हमें बराबरी का हक मिलेगा. आज के समाज में हमें नीची निगाहों से देखा जाता है.

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क्या प्राचीन भारतीय संस्कृति में समलैंगिकता मंज़ूर थी?

इस सवाल पर कई बार चर्चा हो चुकी है. बीबीसी मराठी ने इस पर एक लेख प्रकाशित किया था. इसका शीर्षक था- क्या प्राचीन भारत में समलैंगिकता को सामाजिक मान्यता हासिल थी?

इसमें इसी मुद्दे पर चर्चा की गई थी. हम इसके कुछ हिस्से यहां पेश कर रहे हैं.

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दूसरे देशों में लोगों को समलैंगिकता को कानूनी मान्यता दिलाने के लिए लड़ना पड़ा लेकिन प्राचीन भारत में इसे सामाजिक वैधता हासिल थी.

अमर दास विलहेम ने अपनी किताब 'Tritiya Prakriti: People of the Third Sex: Understanding Homosexuality, Transgender Identity through Hinduism' में कहा है कि समलैंगिकता और तीसरा जेंडर हमेशा भारतीय समाज में मौजूद रहा है. मध्यकाल और संस्कृत के ग्रंथों का अध्ययन करने के बाद वह इस नतीजे पर पहुंचे थे.

विलहेम ने कामसूत्र का हवाला देते हुए कहा था कि प्राचीन भारत में समलिंगी महिलाओं को 'स्वरानी' कहा जाता था. ये महिलाएं दूसरी महिलाओं से शादी करती थीं. थर्ड जेंडर की बिरादरी और सामान्य समाज में इन्हें आसानी से मंजूरी दी जाती थी.

इस किताब में समलिंगी पुरुषों को 'क्लीव' कहा गया है. उन्हें नपुंसक पुरुष कहा गया है. समलिंगी प्रवृतियों के कारण इनमें महिलाओं के प्रति आसक्ति नहीं होती थी.

कामसूत्र का संदर्भ

वात्सयायन ने गुप्त काल में कामसूत्र लिखी थी. इसमें सुंदर पुरुष सेवकों और मालिश करने वालों के दूसरे पुरुषों से संबधों का विवरण दिया गया है.

कामसूत्र में पुरुषों के बीच उन्मत्त संभोग का भी विवरण है. उस समय महिलाओं जैसे हाव-भाव वालों को ख़राब निगाह से नहीं देखा जाता था. उन्हें दुष्ट या अपराधी नहीं समझा जाता था. कामसूत्र में महिलाओं के बीच भी यौन संबंधों का ज़िक्र है. खजुराहो और ओडिशा के मंदिरों में इस तरह के संबंधों को दिखाती मूर्तियां हैं. मध्यकाल में बहनापे की जो परंपरा थी उसे समलैंगिकता का महिमामंडन माना जा सकता है.

( पहचान जाहिर न करने के अनुरोध पर इस स्टोरी में कुछ नाम बदल दिए गए हैं. जगहों के नाम भी बदले गए हैं. )

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