उत्तराखंड आपदा: यूपी के कुछ गाँवों से दर्जनों लोग लापता

- Author, समीरात्मज मिश्र
- पदनाम, लखीमपुर से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
नेपाल की सीमा से लगे यूपी के लखीमपुर ज़िले की निघासन तहसील के कई गाँवों के दर्जनों लोग उत्तराखंड में ग्लेशियर टूटने से आई आपदा के बाद से ही लापता हैं.
ये सभी लोग मज़दूर हैं और चमोली ज़िले के तपोवन जलविद्युत परियोजना में काम करते थे. घटना के बाद से ही इन गाँवों में हाहाकार मचा हुआ है.
निघासन तहसील के इच्छानगर गाँव में सबसे ज़्यादा 15 लोग लापता हैं. मंगलवार को इसी गाँव के एक युवक अवधेश शाह की मौत की ख़बर आई तो लापता लोगों के सुरक्षित मिल पाने की उम्मीद जैसे धूमिल होने लगी. अवधेश के एक चाचा जितेंद्र शाह घर के बाहर कई लोगों के साथ खड़े थे और अंदर महिलाएं विलाप कर रही थीं. जितेंद्र शाह भी रो रहे थे.
जितेंद्र शाह बोले, "हमारे परिवार में छह लोग लापता हैं. दो मेरे भाई हैं और चार भतीजे. एक भतीजे की बॉडी मिली है. बाक़ी लोगों के बारे में कुछ भी पता नहीं चल रहा है. सभी लोग पिछले दो साल से वहां काम कर रहे थे. लॉकडाउन में घर आ गए थे लेकिन अभी दो महीने पहले ही दोबारा गए थे."

जितेंद्र शाह बताते हैं कि ये सभी लोग उत्तराखंड की बजाय अब काम करने के लिए कानपुर जा रहे थे लेकिन फिर वहीं चले गए.
वो बताते हैं, "जिसके माध्यम से ये लोग गए थे, उसके यहाँ कुछ पैसा बकाया था. उस ठेकेदार ने कहा कि यहीं काम कर लो तो बकाया पैसा भी मिल जाएगा. बस इसीलिए कानपुर जाकर काम करने का इरादा बदलकर सभी लोग दोबारा चमोली पहुंच गए."
जितेंद्र शाह के ही पड़ोस में सद्दाम हुसैन का घर है. उनके दो भाई भी तपोवन पनबिजली परियोजना में ही काम के लिए गए थे लेकिन छोटा भाई जलाल हुसैन लापता है.

सद्दाम हुसैन बताते हैं, "मेरे बड़े भाई इशरत और छोटे भाई जलाल गांव के दूसरे लोगों के साथ ही वहां काम करते थे. हादसे वाले दिन छोटा भाई टनेल में ही काम करने गया था जबकि इशरत की ड्यूटी दूसरी जगह लगी थी. हम लोगों ने फ़ोन से संपर्क किया तो इशरत भाई से बात हो गई लेकिन जलाल का पता नहीं लग पा रहा है."
चुन्नी देवी के पति और उनका बीस साल का बेटा दोनों ही वहां काम कर रहे थे लेकिन पति कुछ दिन पहले वापस आ गए थे. बेटे का कुछ भी नहीं पता चल रहा है. अब उनके पति बेटे का पता लगाने के लिए गांव के अन्य लोगों के साथ चमोली गए हैं. इच्छानगर गांव के लोगों के साथ गांव के प्रधान भी गए हुए हैं.

उत्तराखंड में रविवार को हुए हादसे के बाद से लखीमपुर ज़िले की निघासन तहसील के कुछ गांवों के 34 लोग अब तक लापता बताए जा रहे हैं. हालांकि स्थानीय लोगों का कहना है कि यह संख्या इससे भी ज़्यादा है लेकिन प्रशासनिक अधिकारियों ने अभी 34 की ही पुष्टि की है.
लखीमपुर के ज़िलाधिकारी शैलेंद्र कुमार सिंह कहते हैं कि निघासन के एसडीएम को जोशीमठ भेजा जा चुका है ताकि वो यहां के लोगों की मदद कर सकें.
बीबीसी से बातचीत में डीएम शैलेंद्र कुमार सिंह ने बताया, "हमने सभी गांवों के लोगों से संपर्क करके लापता लोगों की सूची तैयार की है. सभी लोग निघासन तहसील के ही कुछ गांवों से हैं. अब तक 34 लापता लोगों की पुष्टि हुई है जिनमें से एक युवक की मौत हो गई है.''
''उन्हें उनके घर तक पहुंचाया जा रहा है. कुछ लोग ख़ुद से भी अपनों की तलाश में गए हैं. राज्य सरकार के कई अधिकारियों को समन्वय के लिए उत्तराखंड में तैनात किया गया है. उन अधिकारियों के नंबर भी उपलब्ध कराए गए हैं और गाँव में जाकर भी हम लोगों ने कहा है कि किसी भी जानकारी के लिए परिजन संपर्क कर सकते हैं."
डीएम ने बताया कि ड्यूटी पर लगाए गए अधिकारी प्रभावित और लापता व्यक्तियों के परिजनों से उनके घर जाकर व्यक्तिगत रूप से संपर्क कर रहे हैं और उत्तराखंड राज्य से पीड़ित व्यक्तियों के संबंध में जो भी सूचना मिल रही है, उससे उनके परिजनों को अवगत कराया जा रहा है.

निघासन तहसील के भैरमपुर, बाबूपुरवा, मांझा और कड़िया गांवों के 33 लोगों का अभी भी कुछ पता नहीं है. परिजनों को आशंका है कि ये लोग भी कहीं हादसे का शिकार न हो गए हों.
भैरमपुरवा गांव के राममूर्ति के तीन बेटे भी पनबिजली परियोजना में काम करने गए थे. तीनों बेटों में सिर्फ़ इंद्रपाल से ही बात हो पा रही है जबकि संतोष और मनोज लापता हैं. गांव में उनके घर पर कई महिलाएं संवेदना जताने के लिए जुटी थीं. राममूर्ति की बुज़ुर्ग पत्नी का रो-रोकर बुरा हाल है.
राममूर्ति बच्चों की खोज-ख़बर लेने के लिए अन्य लोगों के साथ चमोली गए हैं. उनके पड़ोसी केवल प्रसाद ने बताया, "जिन लोगों के परिजन लापता हैं, उन लोगों ने ख़ुद से ही चंदा लगाकर प्राइवेट गाड़ी किराए पर ली है. सरकार की ओर से कोई मदद नहीं दी गई है. सिर्फ़ एक बार अधिकारी यहां आए थे, लोगों का नाम लिखकर और उनकी तस्वीरे लेकर गए थे. उसके बाद कोई नहीं आया."

निघासन तहसील क्षेत्र में भारत नेपाल सीमा पर स्थित बाबूपुरवा, भैरमपुर, मांझा और कड़िया गाँवों के तमाम लोग बाहर मज़दूरी करते हैं. इनमें से कई चमोली स्थित पनबिजली परियोजना में भी काम करने के लिए गए हैं. रविवार को हादसे की सूचना मिलने के बाद लोग दहशत में आ गए. ख़ासकर तब, जबकि वहां काम कर रहे कई लोगों के मोबाइल फ़ोन पर संपर्क नहीं हो पाया.
मांझा गाँव के राम लाल कहते हैं, "वहां काम कर रहे गांव के ही कुछ लोगों ने फ़ोन पर यह सूचना दी कि उन्होंने कई लोगों को पानी के तेज़ बहाव में बहते हुए देखा है. इसके बाद तो जिनके भी परिजन वहां थे, सभी दहशत में आ गए. कुछ लोगों के परिवार से तो कई सदस्य हैं और सभी का पता नहीं चल रहा है."
इन सभी गांवों में मातम छाया हुआ है. लापता हुए लोगों के घरों में तीन दिन से चूल्हा तक नहीं जला है और लोग रात-दिन अपने परिजनों की सलामती की प्रार्थना कर रहे हैं. लखीमपुर के ज़िलाधिकारी के दफ़्तर में एक कंट्रोल रूम भी बनाया गया है जहां हर वक़्त अधिकारियों की ड्यूटी लगाई गई है.

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