राम मंदिर बनाने के लिए 1000 करोड़ कहाँ से आएगा? जानिए पूरा प्लान

राम मंदिर

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    • Author, टीम बीबीसी
    • पदनाम, नई दिल्ली

अयोध्या में मंदिर निर्माण के लिए पैसा जमा करने का काम निधि समर्पण अभियान के जरिए पूरा किया जाएगा.

विश्व हिन्दू परिषद के उपाध्यक्ष और श्रीराम जन्म भूमि तीर्थ क्षेत्र न्यास के महासचिव चंपत राय ने बुधवार को इसका एलान किया.

इस अभियान के ज़रिए विश्व हिंदू परिषद की योजना है भारत के 50 करोड़ लोगों तक पहुँचने की. उनका दावा है कि विश्व के इतिहास में इससे बड़ा जनसम्पर्क अभियान नहीं चलाया गया है.

इस अभियान के ज़रिए जमा किए गए पैसे को 'चंदा' नहीं कहा जाएगा. इस अभियान को 'राम मंदिर निधि समर्पण अभियान' कहा जा रहा है यानी जनता स्वेच्छा से इसके लिए समर्पित भाव से मंदिर निर्माण के लिए दान करेगी.

इस अभियान के बारे में विस्तार से बताते हुए चंपत राय ने कहा, "आज की तारीख में 35 साल की उम्र वाले नौजवानों को राम जन्म भूमि के इतिहास के बारे में बहुत कम मालूम है. उस वक़्त क्या हुआ ये तो किसी ने नहीं देखा होगा. भारत, दुनिया के सबसे अधिक युवाओं वाला देश है. इस नाते हमारी ज़िम्मेदारी है कि हम युवाओं तक भारत के उस इतिहास को पहुँचाएं."

दावा किया जा रहा है कि इस अभियान से 3 से 4 लाख कार्यकर्ता जुड़ेंगे. उनकी कोशिश होगी 50 करोड़ लोगों, 11 करोड़ घरों तक और सवा पाँच लाख गाँवों तक मंदिर के इतिहास को पहुँचाने की. 2021 में मकर संक्राती यानी 14 जनवरी से ये जनसम्पर्क अभियान शुरू होगा और माघ पूर्णिमा यानी 27 फरवरी को ख़त्म हो जाएगा. अभियान पूरा करने के लिए कार्यकर्ताओं को 42 दिन का समय दिया गया है.

इस अभियान के दौरान कार्यकर्ताओं के पास राम मंदिर का इतिहास होगा, मंदिर के कुछ चित्र होंगे और कुछ कॉन्ट्रीब्यूशन कूपन होंगे.

जितने घरों में कार्यकर्ता जाएंगे उतनी ही संख्या में राम जन्मभूमि का इतिहास छापा गया है, जो हिंदी, अंग्रेज़ी के अलावा राज्यों की मातृ भाषा में भी होगा. राज्यों के शीर्षस्थ लोगों के साथ साथ राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और प्रधानमंत्री से भी इस दौरान सम्पर्क किया जाएगा. राज्यों के मुख्यमंत्री, राज्यपाल, राजनैतिक दलों के नेताओं को भी यह इतिहास भेजा जाएगा.

विश्व हिंदू परिषद

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राम मंदिर निधि समर्पण अभियान

इस अभियान की रूपरेखा बताते हुए चंपत राय ने कहा, "मंदिर भगवान का घर है. भगवान के चरण में लक्ष्मी का निवास है इसलिए पैसे की कोई कमी नहीं होगी. मुझे अनेक संत महात्माओं ने कहा कि पैसे का विचार छोड़ दो. लक्ष्मी भगवान के पीछे पीछे चलती है. इसलिए पैसा माँगना नहीं है. समाज स्वेच्छा से समर्पण करेगा. इसलिए हम भी समाज को कहेंगे 'कॉन्ट्रीब्यूट वॉलेंटेरिली'. भगवान का धन है, भगवान का घर बनाने के लिए दो. माँगने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी."

इस मुद्दे पर उन्होंने कहा, "राम जन्म भूमि तीर्थ ट्रस्ट ने ये विचार किया है कि स्वेच्छा से समर्पण करने वालों के लिए कुछ कूपन छापे जाएँ. उतनी ही संख्या में कूपन छापे जाएँ जितनी संख्या में हम घरों में जाना चाहते हैं. ये कूपन 10 रुपये, 100 रुपये और 1000 रुपये के होंगे. इतना अंक लिख कर कूपन छापेंगे. ऐसा इसलिए कि जिस व्यक्ति की क्षमता 10 रुपये देने की है, उस व्यक्ति की संतान भी कह सके कि मंदिर निर्माण में हमारी माता-पिता ने कुछ योगदान दिया था."

"100 रुपये के 8 करोड़ कूपन छापे जाएँगे. 10 रुपये के 4 करोड़ कूपन छापे जाएंगे. 1000 रुपये के 12 लाख कूपन छापे जाएंगे. और इसके बाद रसीद दी जाएगी."

अगर इन सभी कूपन को जनता में रसीद के तौर पर बाँट दिया गया, तो राम मंदिर निर्माण के लिए इस 'निधि समर्पण अभियान' से लगभग 960 करोड़ रुपये का जमा करने की योजना है.

विश्व हिन्दू परिषद के उपाध्यक्ष और श्रीराम जन्म भूमि तीर्थ क्षेत्र न्यास के महासचिव चंपत राय
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जमा राशि की पारदर्शी

कूपन बनाने की योजना निधि समर्पण अभियान से जुटाए पैसे में पारदर्शिता बनाए रखने के लिए किया गया है. इस तरीक़े से जुटाए गए पैसों को भारत के तीन बड़े बैंकों में जमा किया जाएगा. ये बैंक हैं - स्टेट बैंक, पंजाब नेशनल बैंक और बैंक ऑफ़ बड़ौदा. ये तीनों बैंक जमा राशि के लिए सिर्फ़ कलेक्शन एकाउंट का काम करेंगे.

भारत में स्टेट बैंक की 22 हज़ार ब्रांच हैं, पंजाब नेशनल बैंक की 14 हज़ार ब्रांच हैं, बैंक ऑफ़ बड़ौदा के 10 हज़ार ब्रांच हैं. यानी कुल 46 हज़ार बैंक ब्रांच से पूरा हिंदुस्तान कवर करने का प्लान है.

तीन से चार लाख कार्यकर्ता पूरे देश में इस काम के लिए प्रतिदिन तीन से चार घंटे का समय देंगे. इसके लिए टोली बनाई जाएगी जिसमें कम से कम तीन लोग होंगे. हर टोली का एक क्षेत्र निर्धारित होगा.

दिन भर में जमा की गई राशि को 48 घंटे के अंदर सबसे नज़दीकी बैंक शाखा में जमा करना होगा. पहले दिन जिस बैंक की जिस शाखा में पैसा जमा होगा, अगले 42 दिन तक उसी बैंक की उसी शाखा में पैसा जमा कराना अनिवार्य होगा.

बैंकों में पैसा जमा करने के लिए अलग से डिपोज़िट स्लिप छापे गए हैं, जिसमें कोड नंबर हैं एकाउंट नंबर नहीं. ये सभी उपाय पार्दर्शिता बनाए रखने के लिए किए गए हैं, ऐसा चंपत राय का दावा है.

विदेशी मुद्रा का क्या?

लेकिन बड़ा सवाल ये है कि क्या निधि समर्पण अभियान में विदेशी मुद्रा स्वीकार्य होगी?

इस सवाल के जवाब में चंपत राय ने कहा, "भारत में विदेश मुद्रा स्वीकार करने के लिए अगल से क़ानून है फ़ॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट (एफसीआरए). फिलहाल ट्रस्ट ने इसके लिए रजिस्ट्रेशन प्राप्त नहीं किया है. इसलिए मंदिर निर्माण के कार्य में विदेशी मुद्रा का समर्पण फंड स्वीकार नहीं किया जाएगा."

दरअसल एफ़सीआरए का प्रावधान कहता है कि विदेशी मुद्रा स्वीकार करने वाली संस्था को पिछले तीन वर्षों का ऑडिट रिपोर्ट देना चाहिए, जबकि मंदिर निर्माण के लिए ट्रस्ट को बने हुए एक वर्ष भी नहीं हुआ है.

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सरकारें नहीं दे सकेंगी समर्पण फंड

5 अगस्त को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों से ही मंदिर निर्माण के लिए भूमि पूजन का कार्यक्रम सम्पन्न हुआ था.

ऐसे में सवाल ये भी उठता है कि जब जन सम्पर्क अभियान में प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, राज्यों के मुख्यमंत्रियों से सम्पर्क किया जाएगा, तो क्या उनकी भी 'समर्पण निधि' को स्वीकार किया जाएगा.

इस पर चंपत राय कहते हैं, "सरकारों से सहयोग की अपेक्षा है धन की नहीं है. सरकारों का काम मंदिर बनाना नहीं है. सरकार का काम समाज की भलाई के लिए काम करना है. लेकिन कोई नेता अपने व्यक्तिगत क्षमता से आधार पर कुछ देना चाहे तो वो स्वीकार्य होगा. भारत सरकार के ख़जाने के एक रुपये का समर्पण आया है, जो बैंक में डिपोज़िट है. बैंक में उस एक रुपये को फ्रेम करके भी रख दिया गया है."

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मंदिर निर्माण के लिए अलग से कमेटी

मंदिर निर्माण के लिए सुप्रीम कोर्ट की आदेश पर अलग से एक ट्रस्ट का गठन किया गया है. अब ट्रस्ट ने अपनी तरफ़ से मंदिर निर्माण के लिए एक अलग कमेटी बनाई है. उसके अध्यक्ष निपेंद्र मिश्रा हैं. एकाउंट संभालने के लिए अलग से ऑडिटर जनरल भी नियुक्त किया गया है.

मंदिर की सुरक्षा व्यवस्था कैसी होगी, इसके लिए फिलहाल काम जारी है. रूपरेखा तैयार होते ही सरकार से इस बारे में सम्पर्क किया जाएगा.

मंदिर ट्रस्ट के लिए प्रोजेक्ट मैनेजमेंट कंसल्टेंट के तौर पर टाटा कंसल्टिंग इंजीनियर्स कंपनी को जोड़ा गया है.

अभी मंदिर के नींव पर काम चल रहा है. अयोध्या में ज़मीन के नीचे 60 मीटर तक 'लूज़ सैंड' है, जो ऊपर के पत्थर के भार को कैसे सह पाएगी, इस पर अभी विचार चल रहा है.

जो हिस्सा ज़मीन के ऊपर बनेगा वो पत्थर का होगा, जिसके लिए पत्थर तराशने का काम 1990 से चल रहा है.

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मंदिर के लिए पत्थर कहाँ से आएगा?

बीच में कुछ इस तरह की ख़बरें आई थीं कि राजस्थान सरकार ने मंदिर निर्माण में इस्तेमाल होने वाले पत्थर वहाँ से लाने पर रोक लगा दी है.

चंपत राय ने ऐसी खबरों का खंडन किया है. उन्होंने बताया, "मंदिर निर्माण के लिए राजस्थान के भरतपुर ज़िले का बंसी पहाड़पुर गाँव का पत्थर चाहिए. वो दिखने में सुंदर लगता है. हल्का गुलाबी रंग का होता है. उसमें कार्विंग आसान होती है. मंदिर के पत्थरों पर पुराना काम उन्ही पर किया गया है. लेकिन अब कई कारणों से उस इलाके को जंगल घोषित कर दिया गया है.

"1990 से 2006 तक हमने पत्थर मंगाया, किसी सरकार ने कोई बाधा नहीं डाली है. लेकिन जंगल घोषित होने के बाद इस बारे में हमें सोचना है."

मंदिर निर्माण के लिए कुल 4 लाख क्यूबिक फुट पत्थर की ज़रूरत है, जिसमें से फिलहाल 70 हज़ार क्यूबिक फुट पत्थर उपलब्ध है. सवा तीन लाख क्यूबिक फुट पत्थर और चाहिए. पत्थरों में नींव बनानी पड़ी तो और पत्थर की ज़रूरत होगी.

ट्रस्ट को उम्मीद है कि अगले तीन वर्षों में मंदिर पूरी तरह तैयार हो जाएगा.

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