उत्तराखंड में पैर पसारने की कोशिशों में जुटी आम आदमी पार्टी

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- Author, रोहित जोशी
- पदनाम, देहरादून से बीबीसी हिंदी के लिए
उत्तराखंड में होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए इस बार यहां की सर्द वादियों में चुनावी सुगबुगाहट की गर्मी, स्थापित राजनीतिक पार्टियों के बजाय आम आदमी पार्टी ने भरी है. पार्टी ने अगले चुनावों में पूरे दमखम के साथ सभी 70 सीटों में चुनाव लड़ने का दावा किया है.
उत्तराखंड की राजनीति पर नज़र रखने वाले जानकारों का मानना है कि आम आदमी पार्टी के आने से यहां राजनीति के समीकरण बदल सकते हैं. इसी सिलसिले में बीते हफ़्ते के आख़िर में पार्टी के वरिष्ठ नेता और दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया संगठन को मजबूती देने अपने दो दिवसीय उत्तराखंड दौरे पर थे.
सत्तारूढ़ त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार पर हमलावर होते हुए उन्होंने हल्द्वानी में एक प्रेस कांफ्रेंस के दौरान कहा, "मैं चुनौती देते हुए कहता हूं कि उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत जी के पास ऐसी पांच चीजें नहीं हैं जिन्हें लेकर वे कह सकें कि मैंने उत्तराखंड की जनता के लिए की हैं और जिसकी वजह से उत्तराखंड के लोगों के जीवन में पॉज़िटिव बदलाव आया है."
मनीष सिसोदिया और पार्टी के दूसरे नेताओं का दावा है कि पार्टी दिल्ली की तर्ज पर उत्तराखंड के शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली, पानी जैसे 'असल मुद्दों' पर चुनाव लड़ेगी.
आम आदमी पार्टी, उत्तराखंड की प्रवक्ता उमा सिसोदिया कहती हैं, "उत्तराखंड में मौजूदा विपक्ष पर जनता का कोई यक़ीन नहीं है. कांग्रेस इतने गुटों में बंटी हुई है कि उनका कोई सर्वमान्य नेता ही नहीं जिसके नीचे वे चुनाव लड़ सकें. उत्तराखंड क्रांति दल पहले ही पूरी तरह ख़त्म हो चुकी है. ऐसे में हमारी रणनीति यही है कि मौजूदा सरकार से पूरी तरह असंतुष्ट जनता के सामने हम आम आदमी पार्टी को विकल्प के रूप में रख पाएं."
हालांकि उत्तराखंड की राजनीति में पूरी तरह वर्चस्व रखने वाली दोनों राष्ट्रीय पार्टियां, भाजपा और कांग्रेस यह दिखाने की कोशिश कर रही हैं कि आम आदमी पार्टी ने उनके माथे पर कोई बल नहीं डाला है. दोनों की ही राय है कि आम आदमी पार्टी उत्तराखंड की मौजूदा राजनीति पर हल्का सा डेंट भी नहीं लगा पाएगी.

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कांग्रेस को नुकसान?
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद प्रदीप टम्टा कहते हैं, "आम आदमी पार्टी का उत्तराखंड में ज़मीन पर ना कोई स्ट्रक्चर है ना कोई कैडर. असल में उसका कोई अस्तित्व नहीं है. वह सिर्फ़ भारतीय जनता पार्टी की 'बी-टीम' की तरह उत्तराखंड में चुनावों से ठीक पहले इसलिए उतारी गई है ताकि पूरी तरह असफल साबित हुई भाजपा सरकार से, असंतुष्ट जनता को गुमराह कर कांग्रेस के वोट काटे जा सकें. लेकिन यह हो नहीं पाएगा."
इधर, सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश उपाध्यक्ष और प्रवक्ता डॉक्टर देवेन्द्र भसीन भी कांग्रेस की बात को दोहराते हुए कहते हैं कि आम आदमी पार्टी का कोई जनाधार नहीं है, "आम आदमी पार्टी दावे तो ख़ूब कर रही है लेकिन इनको 70 सीटों के लिए 70 कैंडिडेट्स भी मिल पाएंगे, यह अभी संदेह के घेरे में है. यह दूसरी पार्टियों के कार्यकर्ताओं और नेताओं पर ताक-झांक कर रहे हैं कि कुछ लोग टूट कर उनके पास आ जाएं. लेकिन यह होगा नहीं."
हालांकि उत्तराखंड की राजनीति को बारीक़ नज़र से पढ़ने वाले जानकारों की राय है कि उत्तराखंड में आम आदमी पार्टी सीटें जीते या न जीते लेकिन उसका दखल यहां के राजनीतिक समीकरणों को प्रभावित तो करेगा ही.
वरिष्ठ पत्रकार चारू तिवारी कहते हैं, "यह तो एक आम राय बन ही रही है कि आम आदमी पार्टी, भाजपा के कोर वोट बैंक पर सेंध नहीं लगा पाएगी, जबकि वह कांग्रेस को मिल सकने वाले वोटों को ही अपनी ओर डायवर्ट करेगी."
तिवारी आगे कहते हैं, "दिल्ली में 2015 के चुनावों में आप ने कांग्रेस के वोट शेयर को 28 प्रतिशत से नौ प्रतिशत पर ला दिया था और 2020 में यह पांच प्रतिशत से भी कम हो गया था. जबकि 2015 के चुनावों में बीजेपी का वोट शेयर 32 प्रतिशत से 34 प्रतिशत हुआ था और 2020 में यह और बढ़कर 38 प्रतिशत तक जा पहुंचा था. आम आदमी पार्टी ने वोट शेयर में बीजेपी को कोई नुक़सान नहीं पहुंचाया है."

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उनका मानना है, "उत्तराखंड में आम आदमी पार्टी के लिए यह दोहराना आसान नहीं होगा क्योंकि यहां कांग्रेस की स्थिति इतनी कमज़ोर नहीं है. जिस तरह दिल्ली और दूसरी जगहों पर कांग्रेस हताश दिखाई देती है, उत्तराखंड में ऐसा नहीं है. कम से कम 30 से अधिक ऐसी सीटें हैं जहां कांग्रेस की दावेदारी उसके प्रत्याशियों की व्यक्तिगत छवि के बूते भी क़ाफ़ी मज़बूत है. ऐसे में कांग्रेस को इस बात का भय होगा ही कि आम आदमी पार्टी उसके वोटों को डायवर्ट कर भाजपा को बढ़त ना दिला दे."
राज्यसभा सांसद प्रदीप टम्टा, कांग्रेस के लिए ऐसे किसी भी ख़तरे को सिरे से नकारते हैं, "दिल्ली में आम आदमी पार्टी के उभार के पीछे भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ चलाए गए एक प्रायोजित आंदोलन का उभार सबसे बड़ा कारण था. उत्तराखंड के लिहाज से आम आदमी पार्टी किसी आंदोलन में कभी नहीं रही. उसके नेता यहां के मुद्दों से वाक़िफ़ तक नहीं हैं."

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आसान नहीं है चुनौती
प्रदेश में आम आदमी पार्टी के संगठन और जनाधार के ना होने का सवाल विरोधी दल और विशेषज्ञ दोनों उठा रहे हैं. इसके जवाब में पार्टी प्रवक्ता उमा सिसोदिया कहती हैं, "उत्तराखंड के 30 लाख से ज़्यादा लोग दिल्ली में रहते हैं और दिल्ली में पिछले छह सालों में आम आदमी पार्टी ने जो काम किया है उसे उन्होंने देखा है. हम जब कैम्पेन में गांवों में जाते हैं तो वहां लोगों को केजरीवाल सरकार के किए कामों के बारे में पता है. यह हमारे लिए प्लस प्वॉइंट है."
हालांकि, उत्तराखंड के प्रवासियों की इतनी बड़ी संख्या होने के बावजूद दिल्ली चुनावों में आम आदमी पार्टी ने किसी भी उत्तराखंडी मूल के व्यक्ति को टिकट नहीं दिया था.
चारू तिवारी कहते हैं, "इसके चलते दिल्ली चुनावों में ख़ुद मनीष सिसोदिया को उत्तराखंडियों की बहुतायत वाली पटपड़गंज की उनकी सीट को जीतने में काफ़ी मुश्किल का सामना करना पड़ा था. उत्तराखंड में भी आम आदमी पार्टी के सपनों को यह बात झटका पहुंचा सकती है."
उमा सिसोदिया इसे पार्टी की ग़लती के तौर पर स्वीकारते हुए कहती हैं, "ये एक बड़ी ग़लती हमारे संगठन की रही है. पहाड़ के लोग केजरीवाल सरकार से नाराज़ नहीं थे लेकिन इस बात से नाराज़ थे कि जब आपने बिहार के लोगों को टिकट दिया या दूसरे इलाक़े के लोगों को टिकट दिया तो उत्तराखंड के लोगों को भी टिकट दिया जाना चाहिए था."

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सिसोदिया आगे कहती हैं, "लेकिन उत्तराखंड में हमारा सिंपल एजेंडा है कि कोई भी पैराशूट कैंडिडेट नहीं होगा. जो भी टिकट दिए जाएंगे यहां के लोकल लोगों को ही दिए जाएंगे."
कांग्रेस और भाजपा के बीच बारी-बारी सत्ता की गेंद उछालने वाली उत्तराखंड की जनता की ओर इस बार आदमी पार्टी ने उम्मीद से देखा है और उसे विकल्प देने का दावा करते हुए वह आगामी चुनावों के लिए कमर कस रही है.
लेकिन उत्तराखंड की राजनीति का उबड़-खाबड़ पहाड़ क्या 'आप' के लिए दिल्ली जितना सपाट होगा, यह प्रश्न अब भी बरक़रार है.
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