चंबल से संसद तक पहुंचने वाली फूलन देवी के गांव से हाथरस का फ़ासला कब मिटेगा

फूलन देवी

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    • Author, चिंकी सिन्हा
    • पदनाम, फूलन देवी के गांव से लौट कर, बीबीसी हिंदी के लिए

इस पूरे इलाक़े के मंज़र में एक अजब सी सादगी है. मगर, इसका एहसास आपको तब होता है, जब ढलती सांझ के वक़्त आप चंबल नदी के किनारे खड़े होते हैं. चंबल जो इस बंजर इलाक़े को चीरती हुई गुज़रती है.

एक औरत, जिसे गुज़रे हुए अर्सा हुआ, वो चंबल के क़िस्से-कहानियों में, यहां के लोक गीतों में अभी भी ज़िंदा है. वो एक डकैत थी. मगर, इस इलाक़े के लोगों की नज़र में एक रॉबिनहुड जैसा किरदार थी.

'छोटी ज़ात' की उस महिला ने यहां के बादशाह कहे जाने वाले ठाकुरों की हस्ती को ललकारा था. यहां इस गांव में, जहां वो पैदा हुई थी, लोग आज भी उसके बचपन के क़िस्से सुनाते हैं.

जब वो डकैत बनी और ठाकुरों से बदला लिया, उसका बखान गीतों की शक्ल में करते हैं. शादी-ब्याह में, तीज त्योहार में और दूसरे आयोजनों में उसकी बहादुरी के गीत गाए जाते हैं.

चंबल

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तीन राज्यों में पसरा चंबल

चंबल का ये विशाल बंजर इलाक़ा हिंदुस्तान के तीन सूबों में पसरा हुआ है. राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश.

चंबल का बीहड़ उदास सांझ जैसे भूरे मंज़र वाला इलाक़ा है. अब यहां डकैतों का राज नहीं है. लेकिन, बीहड़ तो आज भी है.

इक्कीसवीं सदी की शुरुआत के साथ, यहां विकास के जो कुछ काम हुए हैं. जैसे कि नई सड़कें बनी हैं. लेकिन, विकास की ये समतल सड़कें भी इस ऊबड़-खाबड़ बीहड़ के कभी न ख़त्म होने वाले बेदर्द क्षेत्र को क़ाबू नहीं कर सकी हैं.

ऑडियो कैप्शन, ख़तरों की ज़िंदगी थी फूलन देवी की

लगता है, दूसरी दुनिया में आ गए

दूर बह रहे दरिया के धार पर निगाह डालें, तो यूं लगता है कि कोई विशाल अजगर है, जो सब कुछ निगल जाने को बेक़रार है. पहले ही शापित माने जाने वाले इस इलाक़े में नदी के कटाव का क़हर साफ़ दिखता है.

आपने ज़िंदगी में पहले कभी ऐसा मंज़र नहीं देखा होगा. ये बड़ा ही असामान्य दृश्य है. ठीक वैसे ही जैसे इलेक्ट्रोग्राफ़ में दर्ज होती दिल की धड़कनों की एक लकीर अचानक बेतरतीब हो गई हो.

यहां आकर ऐसा लगता है, मानो आप दूसरी दुनिया में आ गए हों.

एक ऐसा इलाक़ा जिसे मापने में नक़्शानवीसों के पसीने छूट जाएं. और हर बार, जब भी किसी 'छोटी ज़ात' की औरत से 'ऊंची ज़ात' के मर्द के बलात्कार की ख़बर सुर्ख़ियां बटोरती है, तो फूलन देवी का क़िस्सा ज़िंदा हो जाता है.

हाथरस

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फूलन की तरह हथियार उठाने की चेतावनी

जैसे कि उत्तर प्रदेश के हाथरस में हुई बलात्कार की घटना, जब 19 बरस की एक दलित लड़की के साथ कथित तौर पर गांव के ठाकुरों ने बलात्कार किया था. जिससे उसकी मौत हो गई थी.

हाथरस कांड के बाद, प्रदर्शनकारियों ने दलित महिलाओं के ऊपर हो रहे ज़ुल्म को लेकर चेतावनी दी थी. कहीं ऐसा न हो कि ज़ुल्म की शिकार कोई दलित लड़की, फूलन देवी की तरह बंदूक न उठा ले.

प्रदर्शनकारी नारा लगा रहे थे, 'अगर हमारे साथ इंसाफ़ नहीं होगा, तो हमें फूलन देवी की तरह बंदूक उठाना भी आता है.'

हाथरस मामले में यूपी पुलिस ने रात के अंधेरे में परिजनों की मौजूदगी के बिना ही पीड़िता का अंतिम संस्कार किया था
इमेज कैप्शन, हाथरस मामले में यूपी पुलिस ने रात के अंधेरे में परिजनों की मौजूदगी के बिना ही पीड़िता का अंतिम संस्कार किया था

लेकिन, हाथरस कांड के बाद #dalitlivesmattera हैशटैग और सोशल मीडिया पर ग़ुस्सा निकालने के बाद, ख़बरों का कारवां आगे बढ़ गया था. दूसरी ख़बरों की ओर.

हाथरस कांड के पीड़ित परिवार के साथ सीबीआई अब भी पूछताछ कर रही है और अभियुक्त जेल में हैं. पीड़िता के परिवार के घर के बाहर निगरानी के लिए CRPF के जवान तैनात कर दिए गए हैं. किसी को पता नहीं है कि सीबीआई इस मामले की जांच रिपोर्ट कब दाख़िल करेगी.

फूलन देवी 1980 के दशक के शुरुआत में चंबल के बीहड़ों में सबसे ख़तरनाक डाकू मानी जाती थीं

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इमेज कैप्शन, फूलन देवी 1980 के दशक के शुरुआत में चंबल के बीहड़ों में सबसे ख़तरनाक डाकू मानी जाती थीं

बेहमई- फूलन का गांव

बेहमई से बस से हाथरस क़रीब पांच घंटे का सफ़र है. बेहमई वो गांव है, जहां कहा जाता है कि फूलन देवी ने 22 ठाकुरों को मार डाला था. ख़ुद फूलन देवी ने बाद में, इस हत्याकांड में अपना हाथ होने से इनकार कर दिया था.

इस इलाक़े में आते ही तस्वीर एकदम बदल जाती है. गांव के बाहर एक टूटा फूटा सा फाटक है, जिस पर बेहमई दर्ज है.

इस पर लिखे लफ़्ज़ भी घिस गए हैं. सांप सरीख़ी संकरी सी सड़क गांव की ओर ले जाती है. वो गांव जो नदी किनारे बसा है.

इस बीहड़ में धूल के चलते हर तस्वीर धुंधली सी नज़र आती है. एक ज़माने में ये बीहड़ डकैतों या हाइवे के लुटेरों के छुपने का सबसे अच्छा ठिकाना हुआ करते थे.

ठाकुर हत्याकांड स्मारक

ठाकुर हत्याकांड

उस हत्याकांड में मारे गए लोगों की याद में गांव में एक स्मारक भी बना है, जिसकी दीवार पर बीस लोगों के नाम दर्ज हैं.

बीहड़ के दर्रों के बीच से निकल कर फूलन देवी, जिसे लोग डकैतों की रानी कहा करते थे, इस गांव तक आई थी.

बेहमई, इस क्षेत्र के उन 84 गांवों में से एक है, जहां ठाकुरों की काफ़ी आबादी है.

बेहमई में ही फूलन देवी ने 30 मर्दों को घेर लिया था और उन पर गोलियां चलाई थीं. जिसमें 22 लोगों की मौत हो गई थी. ये 14 फ़रवरी 1981 की घटना है. उस वक़्त फूलन देवी की उम्र बस 18 बरस थी. जब वो सत्रह साल की थी, तब बेहमई के ठाकुरों ने उससे सामूहिक बलात्कार किया था.

वो किसी तरह ठाकुरों के चंगुल से जान बचाकर भाग निकली थी. और, बाद में उसने डकैतों का अपना गिरोह बना लिया था.

चालीस बरस का अर्सा बहुत लंबा होता है. लेकिन, लोगों को मौत का वो ख़ूनी खेल आज भी याद है. दूसरी जगहों के लोग इसे फूलन देवी का बदला कहते हैं. वो फूलन देवी को एक बहादुर और ग़ुस्सैल महिला के तौर पर देखते हैं. जो 'नीची ज़ात' की थी. अब तो फूलन देवी को मरे हुए भी लगभग दो दशक बीत चुके हैं.

बेहमई गांव

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हत्याकांड पर अदालती फ़ैसले का इंतज़ार

गांव के बाहर ही कुछ लोग एक पेड़ के नीचे खड़े हैं. उनमें से हर एक के परिवार का कोई न कोई उस दिन मारा गया था. वो मुझसे उस स्मारक तक जाने को कहते हैं, जो उस हत्याकांड में मारे गए बीस लोगों की याद में बनाया गया है.

उनकी उम्र 16 से 65 बरस के बीच थी. उनमें से 18 लोग बेहमई के ही रहने वाले थे. बाक़ी के दो पास के राजपुर और सिकंदरा गांवों के रहने वाले थे. दीवारों पर उनके नाम लाल रंग से लिखे गए हैं. मंदिरों के घंटे आज भी बजते हैं.

इस इलाक़े में आज भी लोगों को वो दिन अच्छे से याद है, जब चार दशक पहले लोगों के ख़ून की नदी बहाई गई थी.

लोगों को आज भी इस मामले में अदालत के फ़ैसले का इंतज़ार है. इसे भी एक दशक बीत चुके हैं. अदालत का फ़ैसला इस साल जनवरी में ही आना था. लेकिन, एक गुमशुदा पुलिस डायरी के चलते मामला फिर लटक गया.

बेहमई, इस इलाक़े में ठाकुरों के वर्चस्व वाले 84 गांवों में से एक है. यहां दो परिवारों को छोड़ दें, तो बाक़ी पूरी आबादी ठाकुरों की ही है. बस एक घर ब्राह्मण का और एक दलित परिवार का है.

उस हत्याकांड के स्मारक पर लगे पत्थर पर लिखा है कि 14 फ़रवरी 1981 की शाम को, क़रीब चार बजे डकैतों के एक गिरोह ने निहत्थे निर्दोष और नेकदिल कर्मवीरों को मार डाला था.

बेहमई के लोग, मीडिया से किसी हमदर्दी की उम्मीद नहीं रखते. यहां फूलन देवी के क़िस्से ने उनके दर्द को भी निगल लिया है. गांव के लोग आज भी उस हत्याकांड का शोक मना रहे हैं. वो फूलन देवी को निर्मम हत्यारी मानते हैं.

बेहमई के प्रधान, जय वीर सिंह उस दिन घर पर नहीं थे, जब फ़रवरी की उस सर्द शाम को ठाकुरों को लाइन में खड़ा करके गोली मार दी गई थी.

बेहमई गांव

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"हर साल 14 फ़रवरी को बरसी मनाई जाती है"

जय वीर सिंह कहते हैं कि, "फूलन तो अपने गैंग के साथ बीहड़ों में घूमती रहती थी. श्री राम और लाला राम (वो डकैत जिन्होंने फूलन के प्रेमी विक्रम मल्लाह को मार डाला था) भी हमारे गांव के नहीं थे. उनका गांव दमनपुर तो हमारे गांव से दस किलोमीटर दूर है. हमें उम्मीद थी कि बीजेपी की सरकार आएगी, तो हमें इंसाफ़ मिलेगा. लेकिन, हम इंसाफ की लड़ाई जारी रखेंगे. उन्हें अपनी करनी की सज़ा तो मिलनी ही चाहिए."

इस गांव में पुराने क़िलों के खंडहर भी हैं और पक्के मकान भी. प्रधान के घर पर चल रहे थ्रेशर के शोर में भी उनकी आवाज़ गूंजती है जब वो कहते हैं कि फूलन देवी के साथ कोई नाइंसाफी नहीं हुई. ये तो पुलिस और मीडिया का गढ़ा हुआ क़िस्सा है.

जय वीर सिंह कहते हैं कि, "हर त्यौहार पर हमारी बेवाएं रोती हैं. हमारे बच्चे आंसू बहाते हैं. हर साल 14 फ़रवरी को हम उस हत्याकांड की बरसी मनाते हैं."

एक ज़माने में फूलन देवी, हिंदुस्तान की मोस्ट वांटेड महिला बन गई थीं. उनके ऊपर सरकार ने दस हज़ार डॉलर का इनाम रखा था.

बेहमई गांव के प्रधान कहते हैं, "उस ज़माने में पुलिस वालों और डकैतों में फ़र्क़ कर पाना बड़ा मुश्किल होता था. दोनों ही ख़ाकी वर्दी पहनते थे. वो अक्सर पीने का पानी या खाना लेने गांव आते थे. वो तो क़ानून की नज़र में मुजरिम थे. ऐसे में ये बीहड़ उनके छुपने का सबसे अच्छा ठिकाना हुआ करता था."

बेहमई गांव

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फूलन देवी का गांव

लोहे की गेट पर लिखा है कि ये बहादुर महिला फूलन देवी का घर है, जो वीरगति को प्राप्त हुईं. एकलव्य सेना ने यहां पर फूलन देवी की एक मूर्ति भी लगा रखी थी.

एकलव्य सेना का गठन ख़ुद फूलन देवी ने ही किया था. इसका मक़सद 'छोटी ज़ात' के लोगों के ऊपर होने वाले ज़ुल्मों के ख़िलाफ़ लड़ना था. इस घर के भीतर ही फूलन देवी की मूर्ति लगी हुई है.

अब यहां फूलन की मां मूला देवी रहती हैं.

ऊंचे चबूतरे पर लगी इस मूर्ति तक पहुंचने के लिए सीढ़ियां बनी हैं. साड़ी पहने और हाथ जोड़े खड़ी उनकी प्रतिमा को देखकर ये क़तई नहीं लगता कि ये वही फूलन देवी है, जो खाकी वर्दी में बंदूक लेकर चलती थीं. जिनकी कमर से बंधी पिस्तौल लटकती रहती थी. और जो अपने माथे पर लाल रंग का गमछा बांधती थीं ताकि बेतरतीब बाल क़ाबू में रहें. मौत के बाद अक्सर आप कई बार बढ़ा-चढ़ाकर कहते, सुनते और लिखते हैं.

एकलव्य सेना अब फूलन देवी को एक संत, एक मसीहा और साड़ी पहनकर हाथ जोड़े खड़ी महिला के तौर पर प्रस्तुत करते हैं.

ये फूलन देवी का राजनीतिक अवतार है. जिसे उनकी मौत के बाद गढ़ा गया है.

अब फूलन देवी के प्रशंसक उनकी इसी छवि की याद के साथ रहना पसंद करते हैं.

फूलन देवी

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यहां देवी की तरह पूजी जाती हैं फूलन

फूलन देवी का गांव, मेन रोड से कुछ दूरी पर है और बिल्कुल नदी से लगा हुआ है. यहां ज़्यादातर आबादी मल्लाहों की है. मल्लाह, अन्य पिछड़ा वर्ग में आते हैं.

उस हत्याकांड को क़रीब चालीस बरस बीत चुके हैं. नदी किनारे बसे इस गांव में फूलन वाक़ई में देवी की तरह पूजी जाती हैं. वहीं, नदी के उस पार के गांव में फूलन देवी एक हत्यारन है.

यहां दो स्मारक हैं. एक फूलन देवी के ठाकुरों से लिए गए बदले का प्रतीक है. वो ठाकुर जो सदियों से फूलन देवी सरीखी 'छोटी ज़ात' वालों का शोषण करते आए थे. वहीं, दूसरा स्मारक उन लोगों की याद में बनाया गया है, जो उस हत्याकांड में मारे गए थे.

दोनों ही गांवों में अक्सर घंटियों की गूंज सुनाई देती है. दोनों गांवों के लोग, एक दूसरे से कभी नहीं मिले. वो एक दूसरे से दूर ही रहते हैं. आज भी ये परंपरा क़ायम है.

अनिल कुमार

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गीतों में फूलन का ज़िक्र

अनिल कुमार, फूलन देवी की उस टीम का हिस्सा रहे हैं, जो मिर्ज़ापुर से चुनाव लड़ते वक़्त उनका प्रचार किया करती थी. वो कहते हैं कि तब से अब तक कुछ ख़ास बदलाव नहीं आया है.

अनिल कुमार कहते हैं कि, "ठाकुर हमसे जलते हैं."

अनिल कुमार जो गीत गाते हैं, वो बीहड़ की रानी का है. जो उनकी अपनी बिरादरी से थी. वो गीत, फूलन की गिरफ़्तारी की घटना बयां करता है.

फूलन देवी, मल्लाह जाति में पैदा हुई थी. मल्लाह आज भी शादी ब्याह के दौरान अपने लोक गीतों में फूलन देवी का ज़िक्र करते हैं.

वो उन्हें त्यौहारों पर याद करते हैं. ख़ास तौर से अक्तूबर के महीने में, जब मां दुर्गा घर आती हैं.

कहा जाता है कि फूलन देवी हमेशा अपनी जेब में मां दुर्गा की एक छोटी सी मूरत रखा करती थीं. और उनके आत्मसमर्पण के वक़्त की जो ख़बरें प्रकाशित हुई थीं, उसमें लिखा गया है कि सरेंडर करते वक़्त भी दुर्गा की एक प्रतिमा, फूलन देवी के साथ थी.

अमेरिकी अख़बार द अटलांटिक में मैरी एन वीवर ने 1996 में एक लेख में लिखा था कि किस तरह, "फ़रवरी 1983 की भयंकर ठंड वाली शाम में फूलन देवी भूरे रंग का ऊनी कंबल लपेटे हुए, और लाल रंग की शॉल सिर पर डाले, मध्य प्रदेश के चंबल के बीहड़ों से अपने गिरोह के बारह सदस्यों के साथ निकली थीं. उनके कंधे से .315 बोर का माउज़र लटक रहा था. फूलन के बेल्ट से एक हंसिया भी लटका हुआ था. और उनके सीने को कारतूसों की पेटी ने ढका हुआ था."

फूलन देवी और उनके डकैतों वाले गिरोह को ग़रीब लोगों का ज़बरदस्त समर्थन हासिल था. वो उन्हें अपने खेवनहार के तौर पर, अपने मसीहा की तरह मानते थे.

अनिल कहते हैं कि, "वो जब गांव आती थी, तो लड़कियों की शादी के लिए ज़ेवर लेकर आती थी. वो ग़रीबों के परिवारों को पैसे दिया करती थी."

फूलन देवी

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फूलन के किस्से आज भी फिज़ां में

एक बाग़ी के रूमानी क़िस्से आज भी यहां की फिज़ां में तैर रहे हैं.

जब फूलन देवी ने भिंड ज़िले के एक गांव में आत्मसमर्पण किया था, तो किसी को पता नहीं था कि फूलन देवी कैसी दिखती हैं.

पुलिस के पास फूलन देवी की कोई तस्वीर नहीं थी. फूलन देवी ने अपनी शर्तों पर पुलिस के सामने हथियार डाले थे. मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के इस सियासी दांव को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने अच्छे से कवर किया था. और बहुत से पत्रकारों ने तब लिखा था कि, "जब एक छोटे कद की महिला ने आगे आकर भीड़ की ओर मुंह करके अपने हथियार उठाए और ज़मीन पर रख कर हाथ जोड़े, तो बहुत से लोगों को बड़ी निराशा हुई थी. उन्हें लगा था कि फूलन देवी अच्छी कद काठी की सुंदर सी दिखने वाली मगर ख़तरनाक महिला होगी."

जिस डकैत को पत्रकारों ने दस्यु सुंदरी कह कर उसका मिथक गढ़ा था, उसे वास्तविक रूप में देखकर बहुतों के दिल टूटे थे. जिसे बीहड़ों की रानी कहा जाता था, वो ऐसी निकलेगी इसका अंदेशा किसी को नहीं था.

फूलन देवी (फ़ाइल फ़ोटो)

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दस्यु सुंदरी से जेल फिर संसद का सफर

इंडिया टुडे के एक पत्रकार ने फूलन देवी के सरेंडर से पहले उसे दस्यु सुंदरी और बीहड़ों की रानी जैसे खिताबों से नवाज़ा था.

लेकिन, जब फूलन ने सरेंडर किया तो उसी पत्रकार ने फूलन को इन शब्दों में बयां किया था, "वो बड़ी नीरस सी, फीकी रंगत वाली, बेहद चंचल चित्त वाली बचकानी और झक्की लड़की थी. जो बहुत जल्दी भड़क उठती थी. और इसी महिला ने बीहड़ों ने उत्पात मचा रखा था."

फूलन देवी को बिना मुक़दमे के क़रीब 11 बरस तक जेल में क़ैद रहकर गुज़ारने पड़े थे.

जब मुलायम सिंह, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने, तो उन्होंने सरकारी वक़ीलों को फूलन देवी के ऊपर लगे सारे आरोप वापस लेने का निर्देश दिया. जिसके बाद फ़रवरी 1994 में फूलन देवी को जेल से रिहा कर दिया गया.

फूलन देवी की रिहाई को 'पिछड़ी ज़ात' वालों ने सवर्णों के प्रभुत्व वाली जाति व्यवस्था के ख़िलाफ़ एक बग़ावत के तौर पर देखा क्योंकि वो जाति व्यवस्था उनके ऊपर ज़ुल्मों का बोझ लादे हुए थी. अपने और 'छोटी ज़ात' के दूसरे लोगों पर हुए ज़ुल्मों का बदला लेने वाली फूलन देवी, जाति व्यवस्था को चुनौती देने का एक प्रतीक बन गईं.

अपनी रिहाई के दो साल बाद फूलन देवी ने मिर्ज़ापुर से समाजवादी पार्टी के टिकट पर लोकसभा का चुनाव लड़ा और जीत गईं.

1999 में उन्होंने फिर से लोकसभा का चुनाव जीता. मगर, 38 साल की उम्र में फूलन देवी को दिल्ली में उनके घर के बाहर गोली मार दी गई थी.

फूलन देवी का गांव

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बेहमई को इंसाफ का इंतजार

एक बुज़ुर्ग महिला को आज भी इस बात का इंतज़ार है कि मरने से पहले उसे इंसाफ़ मिलेगा. श्री देवी कहती हैं कि वो बस इंतज़ार कर रही हैं. उन्हें कोई उम्मीद नहीं हैं. बेहमई के हत्याकांड में श्री देवी के ससुर और देवर को मार डाला गया था. उस वक़्त श्री देवी की उम्र बस 24 बरस की थी. उनकी चार छोटी बेटियां थीं.

उस दिन को याद करते हुए श्री देवी बताती हैं कि, "हमें कुछ पता नहीं था कि वो हमारे आदमियों को कहां लेकर गए थे. हम तो शाम को लाशें देखने गए थे."

श्री देवी पूछती हैं कि, "अब हमें क्या इंसाफ मिलेगा? फूलन देवी तो मर गई. अब उस दिन के बारे में बात न करो. उससे वो तकलीफ़देह यादें वापस आ जाती हैं. हम उस दिन को भूले ही कहां हैं."

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दलितों के साथ बढ़ती बर्बरता

ये संघर्ष तो सदियों से चला आ रहा है. उसी की एक और मिसाल हमें हाथरस में एक महीने पहले देखने को मिली थी. जब, 19 बरस की एक दलित लड़की को ठाकुरों ने बलात्कार के बाद मार डाला था.

उस लड़की के किरदार पर सवाल उठाए गए. केस में एक दावा ये भी किया गया कि ख़ुद लड़की के परिवार ने ख़ानदान की लाज बचाने के नाम पर अपनी बेटी को मार डाला.

हाल के वर्षों में दलित लड़कियों के साथ बलात्कार की घटनाओं में काफ़ी इज़ाफ़ा हुआ है. और ये बात नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के आंकड़े कहते हैं.

पिछले साल, भारत में हर दिन 10 दलित लड़कियों के साथ बलात्कार की घटनाएं दर्ज की गईं. ये सरकारी आंकड़े हैं.

महिलाओं के साथ हिंसा और लड़कियों के ख़िलाफ़ यौन अपराधों के मामले में उत्तर प्रदेश, पूरे देश में पहले नंबर पर है.

फूलन देवी निषाद जाति से आती थीं, जो अन्य पिछड़ा वर्ग में आने वाली जाति है. फिर भी वो ठाकुरों की ताक़त के ख़िलाफ़ बग़ावत करने वाली 'छोटी जातियों' की प्रतीक बन गईं.

फूलन देवी

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गांववालों की म्यूज़ियम बनाने की चाह

अनिल कुमार कहते हैं कि, "फूलन देवी ने जो रास्ता चुना वो कोई आसान तो था नहीं. हमारे लिए वो बाग़ी हैं. और बाग़ी वो हैं, जो बहुत मुश्किल ज़िंदगी जीते हैं. वो बाग़ी इसलिए हो जाते हैं क्योंकि उनके साथ इंसाफ नहीं होता. 'छोटी जाति' के लोगों ने ठाकुरों का बहुत आतंक झेला है. वो सब ठाकुरों का ये आतंक ख़त्म करना चाहते थे."

अनिल कुमार याद करते हैं कि जिस दिन फूलन देवी की हत्या हुई, उस दिन पूरा गांव बहुत दुखी हुआ था.

फूलन देवी का गांव आज भी अलग थलग है. नदी के ऊपर एक पुल बनना था, मगर वो आज तक नहीं बना. गांव के लोग लंबे समय से डिग्री कॉलेज की मांग कर रहे हैं.

ये फूलन देवी का संसदीय क्षेत्र तो नहीं था. लेकिन, अगर वो आज ज़िंदा होतीं तो यक़ीनन यहां के लोगों की मदद करती.

गांव के लोग फूलन देवी की याद में एक म्यूज़ियम बनाने की सोच रहे हैं. वो इस म्यूज़ियम में फूलन देवी की तमाम चीज़ें रखेंगे. उनकी वर्दी, लाल गमछा, लाल शॉल, जूते वग़ैरह…

गांव के लोगों ने फूलन देवी के क़िस्से को अपने लोक गीतों का हिस्सा बना लिया है. वो इस बदला लेने वाली बाग़ी महिला को याद रखने के लिए हर संभव कोशिश करते हैं.

गांव की लड़कियों को फूलन देवी का क़िस्सा मालूम है. उन्हें इस बात पर गर्व है कि वो फूलन देवी के गांव की रहने वाली हैं. लेकिन समय के साथ साथ उस महिला का क़िस्सा भी पुराना पड़ने का डर है, जिसने नाइंसाफ़ी के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने का साहस किया.

अनिल कुमार को इस बात की बड़ी चिंता है कि फूलन देवी की यादों को कैसे सहेज कर रखा जाए.

फूलन देवी

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फूलन का परिवार

इस गांव में सौ से ज़्यादा परिवार रहते हैं. और वो अपनी बेटियों को चिरैया कह कर बुलाते हैं. जब फूलन देवी की मूरत यहां लगाई गई थी, तो फूलन की मां ने कहा था कि उनकी चिरैया लौट आई है.

फूलन की छोटी बहन, जो मां का ख़याल रखा करती थीं, वो अब नहीं हैं. और फूलन देवी की बड़ी बहन रुक्मिणी देवी राजनेता बन चुकी हैं. कुल मिलाकर फूलन देवी चार बहनें थीं.

फूलन देवी की मां ज़्यादा नहीं बोलती हैं. रामकली, जो फूलन देवी की मां का ध्यान रखा करती थीं, वो भी गुज़र चुकी हैं. अब गांव में रामकली का बेटा और उनकी पत्नी रहते हैं. रुक्मिणी देवी अब ग्वालियर में रहती हैं.

हाथरस में बलात्कार पीड़ित की लाश को उसके परिजनों की इजाज़त के बग़ैर ही जला दिया गया था. चिता की राख़ अब भी वहां मौजूद है. वहीं, जालौन के गांव में दस्यु सुंदरी की याद में गाए जाने वाले गीत आज भी गाए जाते हैं.

इन दोनों के बीच पांच घंटे और चालीस बरस लंबा फ़ासला है. यही फ़ासला न्याय और नाइंसाफी के बीच का भी है. आख़िर में सब कुछ एक फ़ासला ही तो है. एक मंज़िल से दूसरे ठिकाने के बीच का फ़ासला. अदालत से जनता के बीच की दूरी. लोगों के बीच का, दो समुदायों के बीच का फ़ासला.

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