अर्नब गोस्वामी की गिरफ़्तारी को इमरजेंसी के दौर से जोड़ने पर बहस

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- Author, सरोज सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारत में सोशल मीडिया पर सुबह से दो ही ख़बरें छाई रहीं. पहला अमेरिका का राष्ट्रपति चुनाव और दूसरा अर्नब गोस्वामी की गिरफ़्तारी.
रिपब्लिक टीवी के एडिटर-इन-चीफ़ अर्नब गोस्वामी को बुधवार सुबह महाराष्ट्र पुलिस ने गिरफ़्तार कर लिया.
चैनल के मुताबिक़ मुंबई पुलिस की एक टीम सुबह अर्नब गोस्वामी के घर पहुँची और उन्हें पुलिस वैन में बैठाकर अपने साथ ले गई.
पुलिस का कहना है कि अर्नब गोस्वामी को 53 साल के एक इंटीरियर डिज़ाइनर को आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप में गिरफ़्तार किया गया है.
समाचार एजेंसी एएनआई के मुताबिक़ अर्नब गोस्वामी ने आरोप लगाया है कि मुंबई पुलिस ने उनके, उनकी पत्नी, बेटे और सास-ससुर के साथ हाथापाई की. रिपब्लिक टीवी चैनल ने इस पूरे मामले पर बयान जारी कर अपना पक्ष भी रखा है.
राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया
इस पूरे मामले पर भारत के सूचना और प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर की तरफ़ से सबसे पहली प्रतिक्रिया सामने आई.
ट्विटर पर उन्होंने लिखा, "हम महाराष्ट्र में प्रेस की स्वतंत्रता पर हमले की निंदा करते हैं. प्रेस के साथ इस तरह का बर्ताव ठीक नहीं है. ये इमरजेंसी के दिनों की याद दिलाता है, जब प्रेस के साथ ऐसा बर्ताव किया जाता था."
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फिर गृह मंत्री अमित शाह ने भी कांग्रेस और महाराष्ट्र की सत्ता में साझीदारों पर निशाना साधा और उसी अंदाज़ में इमरजेंसी को याद किया.
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बस फिर क्या था मंत्रियों की तरफ़ से अर्नब के समर्थन में ट्वीट्स की झड़ी लग गई.
गृह मंत्री के अलावा रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण, विदेश मंत्री एस जयशंकर और महिला विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने भी ट्वीट कर अर्नब की गिरफ़्तारी की निंदा की और इमरजेंसी की याद दिलाई.
महाराष्ट्र के गृह मंत्री अनिल देशमुख ने पूरे मामले पर अपनी प्रतिक्रिया दी है. उन्होंने कहा, "इस पूरे मामले में सरकार का कोई लेना-देना नहीं है. पुलिस अपना काम कर रही है. क़ानून से ऊपर कोई नहीं है. मुंबई पुलिस क़ानून के मुताबिक़ ही काम करेगी."
ग़ौरतलब है कि ख़बर लिखे जाने तक इस पूरे मामले पर ना तो एनसीपी नेता शरद पवार की तरफ़ से कोई प्रतिक्रिया आई और ना ही कांग्रेस नेता राहुल गांधी की ओर से.
महाराष्ट्र में इस समय सत्ता में शिवसेना, कांग्रेस और एनसीपी तीनों ही पार्टियाँ शामिल हैं. केंद्र सरकार की तरफ़ से हुए हमले में निशाना कांग्रेस पर अधिक है.

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दिल्ली के पत्रकारों और प्रेस एसोसिएशन की प्रतिक्रिया
पूरे मामले पर एडिटर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया ने अपना बयान जारी कर कहा है कि उन्हें उम्मीद है कि महाराष्ट्र सरकार अपनी सत्ता का ग़लत इस्तेमाल नहीं करेगी और पूरे मामले में निष्पक्ष सुनवाई होगी.
राम बहादुर राय ऐसे पत्रकार हैं जिन्होंने इमरजेंसी का दौर देखा है. बीबीसी ने उनसे सवाल पूछा कि क्या वाक़ई में महाराष्ट्र में इमरजेंसी जैसे हालात हैं.
इस सवाल के जवाब में उस समय को याद करते हुए वो कहते हैं, "25 जून 1975 की रात को इमरजेंसी के पेपर पर दस्तख़्त किया गया था और अगले दिन से लागू करने की घोषणा हुई थी. लेकिन पूरे देश में 25 जून को अख़बारों के दफ़्तरों की बिजली काट दी गई थी. बीजी वर्गीज़ उस समय हिंदुस्तान टाइम्स के एडिटर इन चीफ़ थे. वो 2 बजे रात को दफ़्तर पहुँचे और अख़बार का संस्करण निकाला. संस्करण की 40 प्रतियाँ ही छपी थीं, उसी समय उनके दफ़्तर को बंद कर दिया गया. इंडियन एक्सप्रेस शाम से ही बंद हो गया था. जेपी को रात को 2.30 बजे जगाकर संसद मार्ग थाने ले जाया गया था. इमरजेंसी की पहली दस्तक में नियम, क़ानून और संविधान को दरकिनार करके हैवानियत का नंगा नाच किया गया था.

इस वक़्त महाराष्ट्र में जो हो रहा है उसको मैं ये तो नहीं कहूँगा कि इमरजेंसी जैसे हालात हैं. लेकिन मैं इतना ज़रूर कहूँगा कि ये दूसरा मौक़ा है जब मुख्यमंत्री के तौर उद्धव ठाकरे के चेहरे पर इतनी गहरी कालिख़ पुतने जा रही है, उनकी इमेज इतनी ख़राब होने जा रही है जिसका उनको अंदाज़ा तक नहीं है. इससे पहले उद्धव ठाकरे सुशांत सिंह राजपूत मामले को भी सही से हैंडल नहीं कर पाए थे."
राम बहादुर राय पूरे मामले को राजनीतिक बदले की कार्रवाई नहीं मानते, बल्कि निजी खुन्नस की कार्रवाई कहते हैं. वो आगे कहते हैं कि ऐसा लगता है मानो मुख्यमंत्री ने अर्नब गोस्वामी के ख़िलाफ़ मन में कोई गांठ बांध ली है.
पर साथ ही अर्नब की पत्रकारिता के स्टाइल से भी वो व्यक्तिगत स्तर पर असहमति जताते हैं. उनका कहना है कि पत्रकार का काम सूचना देना और उसका विश्लेषण करना है. लेकिन कुछ टीवी पत्रकारों को ग़लतफ़हमी हो गई है कि देश वो चला रहे हैं.
लेकिन उनके इस बयान से देश के कई पत्रकार इत्तेफ़ाक़ नहीं रखते. वरिष्ठ पत्रकार जयशंकर गुप्त उनमें से एक हैं.
वो कहते हैं, "अर्नब गोस्वामी के बहाने ही सही, सबसे अच्छी बात है कि हमारे मंत्रियों को इमरजेंसी की बात याद आने लगी है. इससे पहले छत्तीसगढ़ के एक पत्रकार थे विनोद वर्मा. उनको छत्तीसगढ़ की पुलिस रात के अंधेरे में इंदिरापुरम के घर से गिरफ़्तार कर रोड के रास्ते छत्तीसगढ़ ले गई थी. उसके बाद प्रशांत कनौजिया एक पत्रकार हैं, जिनको दिल्ली से गिरफ़्तार कर यूपी पुलिस ले गई थी. कुछ दिन पहले हाथरस की घटना की रिपोर्टिंग के लिए जा रहे केरल के पत्रकार को मथुरा के पास गिरफ़्तार किया गया और उन पर देशद्रोह का चार्ज लगाया गया. इन सभी घटनाओं में किसी मंत्री को इमरजेंसी की याद नहीं आई. भीमा कोरेगांव के नाम पर सुधा भारद्वाज, गौतम नवलखा जैसे तमाम बुद्धिजीवी को इन्होंने गिरफ़्तार किया. ये सभी घटनाएँ जिनका मैंने जिक्र किया ये इमरजेंसी से ज्यादा ख़तरनाक दौर था. इमरजेंसी का दौर तो घोषित रूप से था. लेकिन ऊपर मैंने जो घटनाएँ गिनाईं हैं, उस समय देश में इमरजेंसी घोषित नहीं थी." जयशंकर गुप्त मानते हैं कि अर्नब गोस्वामी का मामला अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता या फिर प्रेस की स्वतंत्रता से जुड़ा हुआ नहीं है. ये आत्महत्या के लिए मजबूर करने का मामला है. अगर उनके किसी लिखी बात को लेकर या किसी रिपोर्ट को लेकर कोई एक्शन होता, तो पत्रकार के तौर पर हम विरोध कर सकते हैं.

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इस पूरे मामले में महाराष्ट्र सरकार पर ये भी आरोप लग रहे हैं कि राज्य सरकार ने बदले की कार्रवाई की है.
दरअसल, अप्रैल के महीने में महाराष्ट्र के पालघर से सूरत जा रहे दो साधुओं और उनके ड्राइवर की भीड़ ने पीट-पीट कर हत्या कर दी थी. इसी मुद्दे पर अर्नब गोस्वामी ने सोनिया गांधी को लेकर टिप्पणी की थी.
अर्नब ने अपने शो कहा था, "अगर किसी मौलवी या पादरी की इस तरह से हत्या हुई होती तो क्या मीडिया, सेक्युलर गैंग और राजनीतिक दल आज शांत होते? अगर पादरियों की हत्या होती तो क्या 'इटली वाली सोनिया गांधी' आज चुप रहतीं?"
उसके बाद मुंबई समेत पूरे देश में कई जगह उनके ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज हुई.

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महाराष्ट्र सरकार और अर्नब गोस्वामी के बीच इस मुद्दे पर सबसे ज़्यादा विवाद हुआ था.
दूसरा विवाद सुशांत सिंह राजपूत मामले को लेकर भी हुआ, जब रिपब्लिक टीवी ने मुंबई पुलिस पर पूरे मामले की ठीक से जाँच ना करने के आरोप लगाए. मुंबई पुलिस ने इन आरोपों को सिरे से ख़ारिज़ किया था.
सुशांत मामले में महाराष्ट्र सरकार पर भी आरोप लगाए गए और विवाद बढ़ता गया. आज की घटना को कई पत्रकार बदले की कार्रवाई और राजनीति से प्रेरित क़दम भी बता रहे हैं.
कई राष्ट्रीय टीवी चैनल के एडिटरों ने ट्विटर पर अपनी प्रतिक्रिया दी है.
इंडिया टीवी के प्रमुख रजत शर्मा, एनडीटीवी की सोनिया सिंह और टाइम्स नाऊ से जुड़े राहुल शिवशंकर भी इनमें शामिल हैं.
रजत शर्मा न्यूज़ ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन (एनबीए) के अध्यक्ष भी हैं. उन्होंने ट्विटर पर लिखा है, "मैं आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले में अर्नब गोस्वामी की अचानक हुई गिरफ़्तारी की निंदा करता हूँ. मैं उनके स्टूडियो ट्रायल वाली पत्रकारिता स्टाइल से सहमत नहीं हूँ, लेकिन एक पत्रकार को सत्ता में बैठे लोग इस तरह से परेशान करें, ये भी उचित नहीं है. एक मीडिया के एडिटर के साथ ऐसा बर्ताव सही नहीं है."
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मुंबई के पत्रकारों और एसोसिएशन की राय अलग
तो क्या वाक़ई में महाराष्ट्र में सरकार के ख़िलाफ़ बोलने और लिखने की आज़ादी नहीं बची है?
ये जानने के लिए हमने मराठी पत्रकारों से भी बात की.
लोकमत अख़बार में काम करने वाले यदु जोशी महाराष्ट्र में 30 साल से पत्रकारिता कर रहे हैं.
बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, "महाराष्ट्र में इमरजेंसी जैसे हालात है, ऐसा मुझे नहीं लगता. आज भी महाराष्ट्र में पत्रकार सरकार की नीतियों के ख़िलाफ़ लिख रहे हैं, मैं भी लिख रहा हूँ, लेकिन ऐसा अनुभव नहीं हुआ कि पत्रकारों का दमन चल रहा है. अर्नब का मामला अलग है. उसका सभी पार्टियाँ राजनीतिक मुद्दा बना रही है."
"जिस ढंग से अर्नब ने कुछ महीनों से स्टैंड लिया है, उसको आज की घटना के साथ जोड़ कर देखा जा रहा है. जबकि अर्नब को गिरफ़्तार 2018 के एक इंटीरियर डिज़ाइनर की आत्महत्या के मामले में किया गया है. इस मामले में उनकी पत्नी ने शिकायत की थी, ये भी एक पहलू है."
"मुबंई पुलिस को अपनी साफ़ छवि बरक़रार रखने के लिए सुबह का घटनाक्रम टालना चाहिए था. अगर मुंबई पुलिस जिस ढंग से पेश आई, वो नहीं आती, तो ये ज़रूर कहा जाता कि अर्नब को अन्वय नाइक की आत्महत्या मामले में गिरफ़्तार किया गया है. उसमें बदले की भावना नहीं है."
इस मुद्दे पर दिल्ली के पत्रकारों और एडिटरों की राय मुंबई और महाराष्ट्र के जर्नलिस्टों की राय से अलग दिख रही है.
निखिल वागले, स्वतंत्र पत्रकार हैं. इससे पहले उन्होंने टीवी और अख़बार दोनों में काम किया है.
ट्विटर पर एडिटर्स गिल्ड का बयान ट्वीट करते हुए उन्होंने कहा कि अर्नब की गिरफ़्तारी का पत्रकारिता से कोई संबंध नहीं है. ये एक पुराना मामला है जिसमें देवेंद्र फडणवीस सरकार ने जाँच करने से इनकार कर दिया था. पीड़ित परिवार ने पूरे मामले में जाँच की माँग की है.
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यहाँ ये जानना ज़रूरी है कि महाराष्ट्र देश का सबसे अकेला राज्य है, जहाँ पत्रकारों की सुरक्षा के लिए क़ानून है. 2017 में बने इस क़ानून को 2019 में राष्ट्रपति से मंज़ूरी मिली है.
इस क़ानून के मुताबिक़ ड्यूटी पर तैनात किसी पत्रकार या उससे जुड़ी संस्था पर हमला किया जाता है, तो उसे जेल और जुर्माना भरना होगा.
महाराष्ट्र में टीवी जर्नलिस्ट एसोसिएशन नाम की एक संस्था भी है. महाराष्ट्र में काम करने वाले पत्रकार इसके सदस्य होते हैं. वर्तमान में इनके 475 सदस्य हैं, जिसमें रिपब्लिक टीवी के कुछ पत्रकार भी शामिल हैं.
अर्नब की गिरफ़्तारी के बाद इन्होंने अपना बयान जारी कर कहा है, "रिपब्लिक टीवी के संपादक अर्नब गोस्वामी की गिरफ़्तारी एक व्यक्तिगत मामले को लेकर हुई है. पत्रकारिता से इसका कोई संबंध नहीं है. क़ानून के सामने सभी समान होते हैं. इसलिए क़ानून को अपना काम करने दीजिए. न्याय व्यवस्था से सत्य जनता के सामने आएगा और हम पत्रकार के नाते सच के साथ हैं."
महाराष्ट्र सरकार, मुंबई पुलिस और रिपब्लिक टीवी के बीच विवाद की वजहें?
दरअसल महाराष्ट्र सरकार, मुंबई पुलिस और रिपब्लिक टीवी के एडिटर-इन-चीफ़ अर्नब गोस्वामी के बीच तनाव बीते कई महीनों से चल रहा था.
पालघर में दो साधुओं और उनके ड्राइवर की हत्या के बाद रिपब्लिक टीवी पर एक चर्चा आयोजित की गई थी.
इस चर्चा में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को लेकर अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया. कांग्रेस के कई बड़े नेताओं ने अर्नब गोस्वामी की भाषा को लेकर सवाल उठाए थे.
अर्नब के बयान पर उनके ख़िलाफ़ मुंबई के अलावा भी कई जगह एफ़आईआर दर्ज कराई गई थी. मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँचा, जहाँ से अर्नब गोस्वामी को अंतरिम राहत मिल गई थी.
इसके बाद 22-23 अप्रैल की मध्य रात्रि में उन पर कुछ लोगों ने कथित तौर पर हमला किया.
इस हमले से जुड़ा एक वीडियो पोस्ट करते हुए अर्नब ने कहा था, ''मैं ऑफ़िस से घर लौट रहा था, तभी रास्ते में बाइक सवार दो गुंडों ने हमला किया. मैं अपनी कार में पत्नी के साथ था. हमलावरों ने खिड़की तोड़ने की कोशिश की. ये कांग्रेस के गुंडे थे.''
इसके बाद मुंबई पुलिस ने दो लोगों को गिरफ़्तार भी कर लिया था.

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लेकिन पहले मामले में 28 अप्रैल को मुंबई पुलिस ने अर्नब गोस्वामी से क़रीब 10 घंटे तक पूछताछ की.
इसके बाद फ़िल्म अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत के मामले में भी रिपब्लिक टीवी पर कई खब़रें दिखाई गईं, जिनमें मुबंई पुलिस और महाराष्ट्र सरकार पर मामले को ठीक से हैंडल ना करने का आरोप लगाया गया.
महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे और मुंबई पुलिस कमिश्नर परमबीर सिंह पर भी अर्नब ने कई गंभीर आरोप लगाए.
इसके बाद 8 सितंबर को रिपब्लिक टीवी के संपादक अर्नब गोस्वामी के ख़िलाफ़ महाराष्ट्र विधानसभा में विशेषाधिकार हनन का प्रस्ताव पेश किया गया. उस वक़्त भी इंटीरियर डिज़ाइनर को आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले का ज़िक्र विधानसभा में हुआ था.
उसके बाद 8 अक्तूबर को मुंबई पुलिस ने टीआरपी स्कैम का पर्दाफ़ाश करने का दावा किया. दूसरे चैनलों के साथ रिपब्लिक टीवी पर भी पैसे देकर अपने चैनल की टीआरपी (टेलीविज़न रेटिंग प्वाइंट्स) को बढ़ाने के आरोप लगे.
हालाँकि रिपब्लिक टीवी ने इन तमाम आरोपों को ख़ारिज किया.

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इसके बाद 23 अक्तूबर को मुंबई पुलिस ने रिपब्लिक टीवी के चार पत्रकारों के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज की. मुंबई पुलिस को कथित तौर पर बदनाम करने के मामले में चैनल के चार पत्रकारों के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज कराई गई.
अपने विरोधियों की आवाज़ दबाने का मुंबई पुलिस और महाराष्ट्र सरकार पर ये इकलौता आरोप नहीं है.
कंगना रनौत ने भी सुशांत सिंह राजपूत की मौत के मामले में शिवसेना, महाराष्ट्र सरकार और मुंबई पुलिस पर आरोप लगाए थे.
इसके बाद उनके ऑफ़िस में हुई तोड़फोड़ पर भी सवाल उठे. मामला कोर्ट भी पहुँचा. वहीं सोशल मीडिया पर सांप्रदायिक तनाव फैलाने के आरोप में कंगना और उनकी बहन को भी नोटिस भेजा गया है.
दूसरी ओर शिवसेना के नेता संजय राउत रिपब्लिक टीवी पर मुंबई पुलिस की कार्रवाई को जायज़ ठहरा रहे हैं.
उन्होंने कहा, "सर्वोच्च न्यायालय ने इस चैनल के बारे में कहा था कि आप न्यायालय नहीं हो, जाँच एजेंसी नहीं हो, इसलिए आप किसी के ख़िलाफ़ कुछ भी ग़लत-सलत बोलकर लोगों को बहकावे में नहीं ला सकते."
संजय राउत ने उल्टा सवाल किया कि ये हमारा कहना नहीं है, बल्कि सर्वोच्च न्यायालय का है, तो क्या आप सर्वोच्च न्यायालय से भी कहेंगे कि ये काला दिन है?
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