भारत-अमरीका बातचीत से क्या चीन के लिए बढ़ेंगी मुश्किलें?

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- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
जनरल मार्टिन डेम्पसी ने 2014 में अमरीकी चीफ़ ऑफ़ स्टाफ़ के रूप में रिटायर होने से पहले चीन के बारे में एक पते की बात कही थी.
उन्होंने कहा था, "अमरीका को जल्द ही चीन का उसी तरह खुल कर सामना करने के लिए बाध्य होना पड़ सकता है, जैसा शीत युद्ध के समय सोवियत संघ का सामना करना पड़ा था." उनके शब्द आज सही साबित हो रहे हैं.
इसमें कोई शक नहीं है कि इस समय अमरीका का सबसे बड़ा सिरदर्द चीन है, जिसके साथ 2018 के मध्य से ही उसका 'टैरिफ़ युद्ध' जारी है.
दोनों देशों के बीच रिश्ते इस हद तक बिगड़ चुके हैं कि विश्लेषक इसकी तुलना शीत युद्ध के दिनों से करने लगे हैं.
जनरल डेम्पसी ने ये टिप्पणी 2012 में ओबामा प्रशासन की पूर्वी एशिया को प्राथमिकता देने वाली विदेश नीति के संदर्भ में की थी.
ये नीति चीन की बढ़ती ताक़त पर अंकुश लगाने के लिए बनाई गई थी. इसके अंतर्गत नए बहुपक्षीय गठजोड़ों और सहयोगियों के साथ द्विपक्षीय संबंधों को मज़बूत करने की योजना बनाई गई थी.
तत्कालीन अमरीकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने 'क्षेत्र में व्यापक सैन्य उपस्थिति बनाने' की वकालत की थी.
चीन विरोधी एकता?

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तबसे अमरीका भारत सहित एशिया के कई देशों को चीन के विरुद्ध अपने सैन्य गठबंधनों में शामिल करने की कोशिश कर रहा है.
ऐसा नहीं है कि अमरीका की कोशिश सिर्फ़ भारत को अपने गठबंधन में शामिल करना है. वो अन्य देशों को भी अपनी इस मुहिम से जोड़ने की कोशिश कर रहा है.
हाँ, ये ज़रूर है कि व्हाइट हाउस ने चीन पर अंकुश लगाने में मदद के लिए भारत को सबसे महत्वपूर्ण देश माना है.
भारत और तीन दूसरे देशों की यात्रा पर रवाना होने से पहले अमरीकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो ने अपने मिशन के बारे में कहा, "मुझे यक़ीन है कि मेरी बैठकों में इस बात पर भी चर्चा होगी कि कैसे आज़ाद देश चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की ओर से उत्पन्न ख़तरों को विफल करने के लिए मिलकर काम कर सकते हैं."
अमरीकी विदेश मंत्री भारत के अलावा श्रीलंका, मालदीव और इंडोनेशिया भी जा रहे हैं.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच अच्छे संबंध हैं और ये बात जग ज़ाहिर है. ट्रंप प्रशासन इसे देखते हुए दुनिया के दो सबसे बड़े लोकतांत्रिक देशों के बीच रक्षा संबंधों को और मज़बूत करने के अपने प्रयासों को तेज़ करने में जुटा है.
इन सबके बीच पूर्वी लद्दाख में चीन के साथ जारी तनाव के तूल पकड़ने की आशंका को देखते हुए भारत का झुकाव अमरीका की तरफ़ बढ़ता दिखाई देता है.
मालाबार नौसैनिक अभ्यास

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चीन के मामलों के विशेषज्ञ और ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर राणा मित्तर के अनुसार अमरीका की तरफ़ अगर भारत का झुकाव बढ़ रहा है, तो चीन ही इसके लिए ज़िम्मेदार है.
लॉस एंजेलेस में भारतीय मूल की पत्रकार ज्योति मंगल कहती हैं, "पिछले साल और इस साल दोनों पक्षों के बीच राजनयिक यात्राओं और बैठकों का सिलसिला शुरू हो गया है. ये इस बात का संकेत है कि ना चाहते हुए भी भारत धीरे-धीरे अमरीका की तरफ़ झुकता जा रहा है. हाँ, वो इसमें अब भी सावधानी दिखा रहा है."
पूर्व राजनयिक और मुंबई-स्थित थिंक टैंक 'गेटवे हाउस' की नीलम देव इससे अधिक सहमत नहीं हैं. उनके विचार में अमरीका से भारत के रिश्ते पिछले 20 सालों से लगातार बेहतर हो रहे हैं. वो कहती हैं, "मौजूदा राष्ट्रपति आने वाले राष्ट्रपति के लिए भारत से बेहतर रिश्ते बनाकर जाता है."
मंगलवार को नई दिल्ली में हो रही तीसरी मंत्रिस्तरीय 2+2 बैठक को इसी पृष्ठभूमि में देखा जाना चाहिए. इसे अगले महीने के अरब सागर और हिंद महासागर में भारत के नेतृत्व में मालाबार नौसैनिक अभ्यास के संदर्भ में भी देखा जाना चाहिए.
बड़े पैमाने पर इस संयुक्त अभ्यास में भाग लेने वाले देश भारत, अमरीका, ऑस्ट्रेलिया और जापान होंगे.
क्वाड समूह इन्हीं चार देशों पर आधारित है. 12 साल पहले ऑस्ट्रेलिया चीन के दबाव में आकर मालाबार नौसैनिक अभ्यास से बाहर हो गया था. भारत ने इस बार ऑस्ट्रेलिया को निमंत्रण देकर चीन को खुली चुनौती दी है.
बैठक के अहम मुद्दे क्या होंगे?
मंगलवार को होने वाली मंत्रिस्तरीय 2+2 बैठक में भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह शामिल होंगे जबकि अमरीका की तरफ से उसके विदेश मंत्री माइक पोम्पियो और रक्षा मंत्री मार्क टी एस्पर शामिल होंगे.
जानकार कहते हैं कि इस बात की पूरी संभावना है कि दोनों देश 'बेसिक एक्सचेंज एंड कोऑपरेशन एग्रीमेंट' (BECA) पर हस्ताक्षर करेंगे, जो सैन्य रिश्तों को और प्रगाढ़ करने में मदद करेगा.
दूसरे शब्दों में, भारत के पास क्षेत्र में किसी भी देश के विमानों की आवाजाही और इनके उड़ान मार्ग की सही जानकारी होगी.
समझौते के अंतर्गत अमरीका भारत को हवा में विमानों और ज़मीन पर टैंकों के रूट्स और गतिविधियों पर नज़र रखने की सही जानकारी साझा करेगा.
इस सूचना के आधार पर भारत जवाबी कार्रवाई कर सकता है. साथ ही मिसाइलों और सशस्त्र ड्रोन को अचूक बनाने में उसे मदद भी मिलेगी.
अमरीकी विदेश मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी, डीन थॉम्पसन ने शुक्रवार को एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस में कहा, "हम कई मुद्दों पर भारत से चर्चा करने वाले हैं. मुझे पता है कि 'बेसिक एक्सचेंज एंड कोऑपरेशन एग्रीमेंट' और अन्य मामले समझौतों की लिस्ट में है."
भारतीय विदेशी मंत्रालय के प्रवक्ता अनुराग श्रीवास्तव ने एजेंडा का विवरण देते हुए कहा, "यह एक व्यापक वैश्विक साझेदारी है और इस साझेदारी के तहत सभी क्षेत्रीय और वैश्विक मुद्दों पर चर्चा होगी."
अमरीकी विदेश मंत्रालय ने रविवार को एक प्रेस रिलीज़ में भारत के लोकतंत्र की प्रशंसा की और दोनों देशों के बीच मंगलवार को होने वाली बातचीत पर कहा, "पिछले दो दशकों में रक्षा व्यापार में काफ़ी वृद्धि हुई है. भारत अमरीका के बाद सी-17 और पी-8 विमानों का सबसे बड़ा बेड़ा रखता है. अमरीका और भारत के बीच रक्षा औद्योगिक सहयोग बढ़ता जा रहा है. अमरीका और भारत रक्षा उपकरणों के उत्पादन और विकास पर मिलकर काम कर रहे हैं."
इस साल तक अमरीका भारत को 20 अरब डॉलर से अधिक के रक्षा उपकरणों की बिक्री कर चुका है.
'बेसिक एक्सचेंज एंड कोऑपरेशन एग्रीमेंट' से दोनों देशों के बीच पहले से ही मज़बूत रक्षा संबंध और बेहतर होंगे.
पहली दो बैठकों में क्या हुआ?
इससे पहले दोनों देशों ने अगस्त 2016 में 'लॉजिस्टिक्स एक्सचेंज मेमोरेंडम ऑफ़ एग्रीमेंट' या LEMOA पर हस्ताक्षर किए थे.
समझौते पर पूरी सहमति में लगभग 10 साल लग गए. इस पर हस्ताक्षर ओबामा प्रशासन के अंतिम महीनों के दौरान हुआ था.
इस समझौते के तहत, प्रत्येक देश की सेना को एक दूसरे देश की सुविधाओं, हवाई अड्डों और बंदरगाहों से आपूर्ति, स्पेयर पार्ट्स और दूसरी सेवाओं के लिए एक दूसरे के ठिकानों के इस्तेमाल करने की अनुमति है.
इस समझौते से भारत-प्रशांत क्षेत्र में नौ सेनाओं के बीच सहयोग आसान हो गया है. इसके अलावा भारत और अमरीका ने एक और रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसे COMCASA या 'कम्युनिकेशंस कॉम्पैटिबिलिटी एंड सिक्योरिटी एग्रीमेंट' कहा जाता है.
दिल्ली में सितंबर 2018 में पहले 2+2 डायलॉग के दौरान इस पर दस्तख़त किए गए थे.
इस समझौते से भारतीय और अमरीकी सैन्य कमांडरों, उनके विमानों और दूसरे उपकरणों का एन्क्रिप्टेड और सुरक्षित संचार नेटवर्क पर सूचनाओं का आदान-प्रदान आसान हो गया है.
नई दिल्ली में 2018 और 2019 में वॉशिंगटन में आयोजित पहले दो "2+2 मंत्रिस्तरीय संवाद" सुर्ख़ियों में नहीं रहे. लेकिन विशेषज्ञ कहते हैं कि मंगलवार की बैठक बहुत महत्वपूर्ण है.
मुद्दा चीन है और भारत और अमरीका दोनों के पास चीन से जूझने के अलग-अलग कारण हैं. लेकिन चीन को रोकना दोनों देशों का मक़सद है.
राष्ट्रपति चुनाव से एक सप्ताह पहले ये यात्रा क्यों?

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अमरीका में कुछ विशेषज्ञों ने राष्ट्रपति चुनाव से एक सप्ताह पहले इस यात्रा के समय पर सवाल उठाए हैं. लेकिन भारत में ये कोई मुद्दा नहीं है.
विदेश मंत्रालय के एक सूत्र ने बताया कि चुनाव के बाद सत्ता में कौन आएगा, इसकी ज़्यादा परवाह भारत सरकार को नहीं है. सत्ता बदलने से इस क्षेत्र में हालात नहीं बदलेंगे और इसीलिए अमरीकी प्राथमिकताएँ भी नहीं बदलेंगी.
भारत और अमरीका के बीच 10 साल की बातचीत और दो राष्ट्रपतियों के बदलाव के बाद भी 2016 में 'लॉजिस्टिक्स एक्सचेंज मेमोरेंडम ऑफ़ एग्रीमेंट' पर हस्ताक्षर हुए.
ये इस बात का संकेत है कि विदेश नीतियाँ सत्ता में बदलाव से हर समय प्रभावित नहीं होती हैं.
भारत सरकार जानती है कि भारत के प्रति अमरीकी नीतियों को लेकर डेमोक्रेटिक पार्टी और रिपब्लिकन पार्टी में सर्वसम्मति है.
भारत में कुछ लोग ये मानते हैं कि डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवार जो बाइडन की जीत से भारत को कश्मीर के मुद्दे पर परेशानी हो सकती है.
लेकिन नीलम देव कहती हैं कि कश्मीर के मुद्दे कई राष्ट्रपतियों ने उठाए हैं, लेकिन भारत के साथ रिश्ते बढ़ते ही रहे.
उनके विचार में बाइडन के राष्ट्रपति बनने से चीन से निपटने में भारत को ज़्यादा आसानी होगी, क्योंकि बाइडन बहुपक्षीय दृष्टिकोण और सर्वसम्मति बनाने के पक्ष में हैं.
दूसरी ओर ट्रंप चीन से अकेले या केवल चंद देशों के साथ मिल कर मुक़ाबला करने को तैयार रहते हैं.
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