चीन से टक्कर लेगी भारत, अमरीका, जापान और ऑस्ट्रेलिया की चौकड़ी?

शिंज़ो आबे, डोनाल्ड ट्रंप और नरेंद्र मोदी

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    • Author, टीम बीबीसी हिंदी
    • पदनाम, दिल्ली

भारत और चीन के बीच बढ़ते सीमा विवाद पर दुनिया भर की नज़रें टिकीं है.

इसी साल जून में जब लद्दाख सीमा पर गलवान घाटी में दोनों देशों के बीच हिंसक संघर्ष की खबरें आई थी, तब अमरीका ने देर से ही सही भारत के पक्ष में बयान दिया था.

भारत के समर्थन में पहला बयान अमरीका के विदेश मंत्री माइक पॉम्पियो का आया था.

इस बार भी भारत चीन सीमा पर दोनों देशों के सैनिकों के बीच झड़प की खबरें आई हैं, लेकिन पिछली बार की तरह ये संघर्ष हिंसक नहीं है. इस बार सौनिकों के बीच की झड़प गलवान घाटी में नहीं बल्कि पैंगॉन्ग झील के दक्षिणी तट के पास हुई है.

इस वजह से दुनिया के तमाम देशों की नज़र एक बार फिर भारत-चीन सीमा विवाद पर टिकीं है. इन सब घटनाक्रम के बीच अमरीका की एक महत्वपूर्ण बयान सामने आया है.

नरेंद्र मोदी

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अमरीका का निमंत्रण

अमरीका के उप-विदेश मंत्री स्टीवन बीगन ने कहा है कि जल्द ही भारत, अमरीका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के विदेश मंत्रियों की एक औपचारिक मुलाक़ात दिल्ली में आने वाले हफ़्तों में होगी.

स्टीवन बीगन, यूएस-इंडिया स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप फ़ोरम में एक संवाद सत्र के दौरान बोल रहे थे. इस संवाद सत्र का संचालन रिचर्ड वर्मा कर रहे थे, जो भारत में अमरीका के राजदूत रह चुके हैं.

हालाँकि इस बयान को सीधे पैंगॉन्ग में हुए झड़प के साथ जोड़ कर नहीं देखा जा सकता.

शिंजो आबे और मोदी

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क्या है क्वॉड?

इन चारों देशों के समूह को 'दि क्वाड्रिलैटरल सिक्योरिटी डायलॉग' (क्यूसिड) जिसे क्वॉड (QUAD) के नाम से भी जाना जाता है, ये अमरीका, भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया के बीच अनौपचारिक राजनीतिक वार्ता समूह है. साल 2007 में जापान के प्रधानमंत्री शिंज़ो आबे ने पहली बार इसका प्रस्ताव रखा था, जिसे भारत, अमरीका और ऑस्ट्रेलिया ने समर्थन दिया.

पैंगॉन्ग त्सो पर अगस्त के अंत में चीन और भारतीय सैनिकों के बीच जो कुछ हुआ, उसके बाद अमरीका के किसी मंत्री की तरफ़ से आए इस बयान से बात की गंभीरता और बढ़ जाती है.

लेकिन पिछले सप्ताह ही शिंज़ो आबे ने स्वास्थ्य कारणों से जापान के प्रधानमंत्री पद से इस्तीफ़ा दे दिया. उसके बाद अमरीका के इस निमंत्रण पर जापान और ऑस्ट्रेलिया की प्रतिक्रिया क्या होती है, इसका भारत को इंतज़ार करना पड़ेगा.

जहाँ तक भारत का सवाल है, स्टीवन बीगन ने जिस फोरम पर ये बयान दिया, वहाँ भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने भी एक सत्र में अपनी बात रखी थी.

हालाँकि इस समूह के विदेश मंत्रियों की 10 साल बाद 2017 में एक बैठक हुई. इस समूह की पिछली बैठक 2019 में संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक के बाद न्यूयॉर्क में हुई थी. लेकिन एक लंबे समय तक ये समूह अनौपचारिक तौर पर मिलता जुलता और काम करता रहा.

ट्रंप, आबे और मोदी

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कैसे काम करता है क्वॉड

जून के महीने में गलवान घाटी में हुए तनाव के बाद भी इस समूह को दोबारा से औपचारिक तौर पर शुरू करने की पहल पर बातचीत शुरू हुई थी.

लेकिन इस पर ये पहला आधिकारिक बयान है, जो अमरीका की तरफ़ से आया है.

जून में इस समूह को लेकर बीबीसी ने पूर्व राजनयिक राजीव डोगरा से बात की थी.

उन्होंने बीबीसी को बताया था कि क्वाड का ये सिलसिला अनौपचारिक तरीक़े से शुरू हुआ था, किसी प्लान के तहत नहीं. जब सुनामी आई थी तब अमरीका, भारत और कुछ और देशों ने मिलकर राहत का काम शुरू किया था, जिसका काफ़ी सकारात्मक असर हुआ था. उससे लगा कि हम कई चीज़ों में साझेदारी कर सकते हैं जो डिफ़ेंस से जुड़ा नहीं हो. लेकिन लोगों के फ़ायदे के लिए हो. इसके अलावा जब सोमालिया के समुद्री लुटेरों के ख़िलाफ़ ऑपरेशन शुरू हुए, उसमें भी अमरीका, भारत और कुछ और देशों ने मिलकर काम किया. इसके नतीजे भी अच्छे थे. इन देशों को लगने लगा कि हम मिलकर काम कर सकते हैं.

डोगरा ने कहा था, "जब साउथ चाइना समुद्र में चीन ने अपनी प्रभुता दिखानी शुरू की, तो सबको चिंता होने लगी कि दुनिया के नियमों को ताक पर रख चीन अपनी मर्ज़ी चलाने लगेगा. भारत, जापान, ऑस्ट्रेलिया का कारोबार इस रास्ते से होता है. क्वॉड कोई आक्रामक रवैया नहीं है, ये कुछ देशों के विचारों का मिलन है कि दुनिया नियमों और क़ानूनों से चलनी चाहिए. क्वॉड की शुरुआत एक सकारात्मक सोच के साथ हुई है."

सांकेतिक तस्वीर

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चीन को दिक्क़त

हालांकि क्वॉड कोई सैन्य गठजोड़ नहीं है और भारत इसे वैसा बनाना भी नहीं चाहता है. यही वजह है कि भारत,अमरीका और जापान के साथ मालाबार में नौ-सेना अभ्यास करता आया है लेकिन उसमें ऑस्ट्रेलिया को शामिल नहीं करने के पक्ष में रहा.

लेकिन ये चौकड़ी चीन की नज़र में हमेशा से खटकती रही है. चीन को लगता है कि अमरीका और भारत के साथ ये दो देश मिल कर चीन के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल रहे हैं, जिससे आने वाले दिनों में चीन को दिक़्क़त हो सकती है.

गलवान घाटी में हिंसक संघर्ष के बाद भी आस्ट्रेलिया भारत के साथ खड़ा दिखा. इसके अलावा हॉन्ग कॉन्ग के मुद्दे पर भी आस्ट्रेलिया और चीन एक दूसरे के आमने सामने हैं.

पैंगॉन्ग त्सो में हुई झड़प के बाद चीन के सरकारी अख़बार ग्लोबल टाइम्स में छपे एक संपादकीय लेख में लिखा है कि भारत को अमरीका के साथ का दम नहीं भरना चाहिए और ना ही भारत को क्वार्ड समूह का हिस्सा होने का पर ख़ुद को साहसी मानना चाहिए. ये सीमा विवाद दोनों देशों के बीच का मसला है, जिसे दो देश मिल कर सुलझा सकते हैं.

स्पष्ट है कि चीन में इस समूह को लेकर थोड़ी असहजता है. अमरीका इस समूह में कई दूसरे देशों को भी जोड़ना चाहता है, जिसमें न्यूज़ीलैंड, दक्षिण कोरिया और वियतनाम से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग पर बात की गई. अगर ये देश साथ आ जाएँ, तो इसे क्वॉड प्लस का नाम दिया जा सकता है.

लेकिन होने वाली बैठक में इस समूह में सैन्य गठजोड़ को लेकर किस तरह की चर्चा होती है, बहुत कुछ इस बात पर भी निर्भर करेगा.

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