आईसीएमआर क्यों प्लाज़्मा थेरेपी को लिस्ट से हटाना चाहता है?

प्लाज़्मा थेरेपी

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    • Author, सुशीला सिंह
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी

इंडियन काउंसिल फ़ॉर मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) का कहना है कि प्लाज़्मा थेरेपी को लेकर किए गए क्लिनिकल ट्रायल से पता चला है कि यह कोविड-19 के मरीज़ों के लिए ज़्यादा कारगर साबित नहीं हुई है. ऐसे में इसे कोविड-19 के इलाज के लिए बनाई गयी गाइडलाइन्स से हटाये जाने पर विचार किया जा रहा है.

आईसीएमआर सरकार की बॉयो-मेडिकल शोध एजेंसी है.

आईसीएमआर ने सितंबर के महीने में देश के 39 अस्पतालों में भर्ती कोविड-19 के 464 मरीज़ों पर अध्ययन किया और पाया कि प्लाज़्मा थेरेपी ने कोविड से लड़ने में मदद नहीं की.

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आईसीएमआर के महानिदेशक डॉक्टर बलराम भार्गव ने एक प्रेस कान्फ्रेंस में कहा कि इस बात पर भी चर्चा चल रही है कि क्या क्लिनिकल मैनेजमेंट गाइडलाइन्स से हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन और रेमडेसिवियर को भी हटाया जाना चाहिए या इन्हें शामिल रखना चाहिए. क्योंकि विश्व स्वास्थ्य संगठन की सॉलीडेरिटी ट्रायल में चार दवाएं- हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन, रेमडेसिवियर, इंटरफेरॉन-बी और लॉपिनावियर कोविड-19 के मरीज़ों के इलाज में बहुत कारगर साबित नहीं हुई हैं.

आईसीएमआर के महानिदेशक बलराम भार्गव का कहना है, "प्लाज़्मा थेरेपी पर एक बड़ा ट्रायल किया गया है. इस पर नेशनल टास्क फ़ोर्स से विचार किया गया और साथ ही एक संयुक्त निगरानी समूह से भी इस पर चर्चा की जा रही है. इसे नेशनल गाइडलाइन्स से हटाया जा सकता है. इस पर चर्चा चल रही है."

हालांकि आईसीएमआर के इस बयान के बाद दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन ने कहा कि इस थेरेपी ने ही कोरोना वायरस से उनकी जान बचाई है.

उन्होंने कहा, "दिल्ली में इसका फ़ायदा होता दिख रहा है और अब तक 2000 से ज़्यादा लोगों को प्लाज़्मा बैंक के ज़रिए प्लाज़्मा दिया गया है और कइयों ने ख़ुद प्लाज़्मा का इंतज़ाम किया. प्लाज़्मा थेरेपी प्रभावी नहीं है, ऐसा कहना ग़लत होगा."

दिल्ली सरकार ने इसी साल जून के महीने में देश का सबसे पहला प्लाज़्मा बैंक खोला था और कहा था कि इस थेरेपी से कोरोना से होने वाली मौत में कमी आएगी. साथ ही लोगों से प्लाज़्मा डोनेट करने की अपील भी की थी.

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नेशनल हार्ट इंस्टीट्यूट के प्रमुख डॉ ओपी यादव का कहना है कि प्लाज़्मा थेरेपी को लेकर आईसीएमआर और दिल्ली सरकार की तरफ़ से अलग-अलग बातें कहीं जा रही हैं. कहीं न कहीं इसमें एक राजनीति भी नज़र आती है लेकिन इसे तकनीकी बिंदु से भी देखा जाना चाहिए.

ओपी यादव

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वे कहते हैं, "किसी भी कोविड-19 के मरीज़ को प्लाज़्मा थेरेपी 72 घंटों में दी जानी चाहिए और अगर इसे छह या सात दिन बाद दिया जाता है तो इसका फ़ायदा नहीं होता है. सही चीज़ सही समय पर इस्तेमाल की जाए तो इसकी उपयोगिता हो सकती है. एक हाई न्यूट्रालाइज़िंग एंटी बॉडी प्लाज़्मा वाले डोनर से मरीज़ को जल्द फ़ायदा मिल सकता है और वो उसके लिए एक तरह से पैसिव इम्यूनिटी या प्रतिरोधक क्षमता बना देता है. लेकिन अगर कोई लो न्यूट्रालाइजिंग एंटीबॉडी वाला डोनर है तो उससे मरीज़ को फ़ायदा नहीं होगा."

लेकिन वे ये भी बताते हैं कि प्लाज़्मा थेरेपी से एलर्जी-रिएक्शन होने की भी आशंका हो सकती है. ट्रासफ़्यूज़न से संबंधित लंग-इन्जरी हो सकती है. शरीर में दाने आ सकते हैं. और अगर अगली बार आपका ब्लड ट्रांसफ़्यूज़न हो तो बॉडी रिएक्ट भी कर सकती है. दरअसल ब्लड ट्रांसफ्यूज़न बहुत गंभीर माना जाता है और इसके नुक़सान भी होते हैं.

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उनके अनुसार जब ये वायरस आया उन दवाओं को दिया जाने लगा जो कारगर साबित होती लग रही थीं और उन्हें इमरजेंसी यूज़ ऑथोराइज़ेशन के तहत इस्तेमाल किया गया था. इसी में एक कोशिश प्लाज़्मा बैंक भी था. लेकिन अब हम देख रहे है कि सोलिडेरिटी ट्रायल के तहत चार दवाई हटाई जा रही है. तो ऐसे में जब उस समय जितनी जानकारी थी वैसे ही क़दम उठाए जा रहे थे.

वो कहते हैं, "अब प्लाज़्मा थेरेपी को लेकर आईसीएमआर और दिल्ली सरकार के पास जो डेटा है वो वैज्ञानिकों को देना चाहिए ताकि वो इसका सही आकलन कर सकें. क्योंकि अब आर्थिक गतिविधियां शुरू हो गई हैं, कहीं किसान प्रदर्शन कर रहे हैं, राजनीतिक रैलियां चल रही हैं, वहीं सर्दियां शुरू हो रही हैं और हम प्रदूषण का ख़तरा भी बढ़ता देख रहे हैं. ऐसे में अभी कोरोना की दूसरी लहर आना बाक़ी है. हालांकि संक्रमितों की संख्या कम हो रही है लेकिन स्थिति गंभीर है."

वे कहते हैं, "लोगों को ही एहतियात बरतनी होगी क्योंकि वैक्सीन कब आएगी, कितनी और कब तक प्रभावी होगी ये देखना होगा."

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