जब कोलकाता में महिलाओं को करवाना होता था जननांगों का परीक्षण

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- Author, सौतिक बिस्वास
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
कलकत्ता (अब कोलकाता) शहर की ब्रितानी पुलिस ने साल 1868 में सुखीमोनी रौर नाम की एक वेश्या को अपना चिकित्सीय परीक्षण न कराने के जुर्म में जेल भेज दिया था.
तब पंजीकृत सेक्स वर्करों के लिए अपने जननांगों का परीक्षण करवाना अनिवार्य कर दिया गया था.
सेक्स के ज़रिए फैलने वाली बीमारियों को रोकने के लिए ब्रितानी शासनकाल में कंटेजियस डिजीज़ एक्ट (संक्रामक रोग क़ानून) लाया गया था.
इसके तहत यौन कर्मियों को अपने आप को थानों में पंजीकृत कराना होता था और अपनी मेडिकल जांच करवानी होती थी.
सुकीमोनी रौर ने गिरफ़्तारी को चुनौती देते हुए अपनी रिहाई के लिए अदालत में याचिका दायर की.
उन्होंने अपनी याचिका में कहा था, "मैंने महीने में दो बार होने वाला मेडिकल परीक्षण नहीं करवाया क्योंकि मैं वेश्या नहीं हूं."
सुखीमोनी ने कहा था कि पुलिस ने ग़लती से उन्हें वेश्याओं की सूची में शामिल कर लिया था और उन्होंने कभी भी इस तरह का काम नहीं किया था.
मार्च 1869 में कलकत्ता हाई कोर्ट ने उनके पक्ष में फैसला दिया.
अदालत ने अपने फ़ैसले में कहा था कि सुखीमोनी पंजीकृत वेश्या नहीं हैं और महिलाओं को वेश्या के तौर पर पंजीकरण कराने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता. ये पंजीकरण स्वेच्छा से होना चाहिए.

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हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में जेंडर, महिलाओं और सेक्सुएलिटी की प्रोफ़ेसर दरबा मित्रा ने ब्रितानी काल के दस्तावेज़ खंगाले हैं.
उन्होंने पाया कि ब्रितानी काल में हज़ारों महिलाओं को अपने जननांगों का परीक्षण न कराने के जुर्म में गिरफ़्तार किया गया था.
प्रोफ़ेसर मित्रा की नई किताब 'इंडियन सेक्स लाइफ़' का प्रकाशन प्रिंसटन यूनिवर्सिटी प्रेस ने किया है.
मित्रा कहती हैं कि ब्रितानी शासनकाल में ब्रितानी अधिकारियों और भारतीय बुद्धिजीवियों ने 'भारत में आधुनिक समाज को नियंत्रित करने के लिए महिलाओं की कामुकता को नियंत्रित करने के विचार ईजाद किए.'
महिलाओं का सेक्स वर्कर के तौर पर पंजीकरण करना और उनके जननांगों का मेडिकल परीक्षण करना एक तरह से कामुकता को नियंत्रित करना ही था.
जुलाई 1869 में कलकत्ता की कुछ यौन कर्मियों ने जननांगों के मेडिकल परीक्षण और सेक्स वर्कर्स के पंजीकरण के ख़िलाफ़ याचिका दायर कर इसे अपने नारीत्व का उल्लंघन बताया.
महिलाओं ने उस मेडिकल परीक्षण का विरोध किया था जिसमें उन्हें डॉक्टरों और दूसरे कर्मचारियों के समक्ष नग्न होना पड़ता था.
अपनी याचिका में महिलाओं ने लिखा, "हमें डॉक्टर और उसके अधीनस्थ कर्मचारियों के सामने नग्न होना पड़ता है... महिला सम्मान की भावना अभी हमारे दिलों से पूरी तरह निकली नहीं है."
अधिकारियों ने इस याचिका को खारिज करने में कोई देर नहीं की.

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शहर के प्रभावशाली अधिकारियों का कहना था कि गुपचुप तरीके से यौन कर्म का पेशा अपनाने वाली महिलाएं, जो पंजीकरण नहीं करवाती हैं, नए क़ानून के लिए ख़तरा हैं.
कलकत्ता के एक प्रमुख अस्पताल के चीफ़ रहे डॉक्टर रॉबर्ट पेन का तर्क था कि बंगाल में यौन कर्मियों का नियमन करना लगभग असंभव काम है. उन्होंने कहा था कि महिलाओं का उनकी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ सेक्स वर्कर के तौर पर पंजीकरण किया जाना चाहिए.
डॉ. मित्रा के मुताबिक 1870 से 1888 के बीच कोलकाता में ही प्रतिदिन औसतन 12 महिलाओं को क़ानून का उल्लंघन करने पर गिरफ्तार किया जाता था.
अधिकारियों ने इस बात को भी नोट किया था कि बहुत सी महिलाएं पुलिस की निगरानी का पता चलने पर शहर छोड़कर जाने लगी थीं.
संघीय सरकार में इस बात को लेकर भी बहस हुई थी कि क्या बंगाल की पुलिस उन महिलाओं के जननांगों का परीक्षण कर सकती है जिनके गर्भपात कराने का शक है.
एक मजिस्ट्रेट ने कहा था, "महिलाओं के अनिवार्य जननांग परीक्षण के बिना रेप के झूठे मामले और गर्भपात बढ़ेंगे."
एक अन्य मजिस्ट्रेट ने तर्क दिया था कि परीक्षण के लिए महिलाओं की सहमति लेने से न्यायिक प्रशासन कमज़ोर हो सकता है.
बंगाल के सेक्रेटरी को लिखे पत्र में पुलिस कमिश्नर स्टुअर्ट हॉग ने लिखा था कि क़ानून की सीमाओं की वजह से महिलाओं का पुरुषों को संक्रमित करना जारी है.
लेकिन भारत और ब्रिटेन में हो रहे लगातार विरोध की वजह से आपत्तिजनक कंटेजियस डिजीज़ ऐक्ट को 1888 में वापस ले लिया गया.

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गवर्निंग जेंडर एंड सेक्सुएलिटी इन कोलोनियल इंडिया नाम की किताब की लेखक और इतिहासकार जेसिका हिंची कहती हैं कि जननांगों का मेडिकल परीक्षण सिर्फ़ संदिग्ध यौन कर्मियों तक ही सीमित नहीं था.
उन्होंने बताया कि 1871 में पारित हुए एक विवादित क़ानून, जिसके दायरे में ऐसे जाति समूह आते थे जिन्हें पारंपरिक तौर पर अपराधी माना जाता था, के तहत किन्नर समुदाय का मेडिकल परीक्षण भी किया जाता था.
डॉ. हिंची कहती हैं, "इस क़ानून का मक़सद किन्नर लोगों के अनिवार्य पुलिस पंजीकरण, प्रस्तुती पर रोक और महिलाओं के कपड़े पहनने पर रोक, हिजड़ा परिवारों से बच्चों को ज़बरदस्ती ले जाना, किन्नर गुरु-शिष्य परंपरा को रोकना आदि के ज़रिए धीरे-धीरे हिजड़ा परंपरा को सांस्कृतिक और भौतिक रूप से समाप्त करना था."
कंटेजियस डिजीज़ ऐक्ट को भारत के औपनिवेशिक इतिहास का काला अध्याय भी माना जाता है. यौन कर्मियों को कैसे परिभाषित किया जाए इसके लिए अधिकारियों ने मजिस्ट्रेट, पुलिस और डॉक्टरों को सवालों की एक सूची बांटी थी.
औपनिवेशिक अधिकारियों ने अपने जवाब में बताया था कि सभी भारतीय महिलाओं को किसी न किसी तरह से संभावित सेक्स वर्कर माना जा सकता है.
एक शीर्ष अधिकारी एजी हाइल्स ने तर्क दिया था कि सभी महिलाएं जो शादीशुदा नहीं है और उच्च जाति वर्गों से नहीं हैं, सेक्स वर्कर हो सकती हैं.
1875 से 1879 के बीच प्रकाशित बंगाल के आंकड़ों में जगह-जगह यौन कर्मी वर्ग का इस्तेमाल किया गया है.
उस समय बंगाल की अफ़सरशाही में मध्य दर्जे के अधिकारी रहे और बाद में भारत का राष्ट्रगीत वंदे मातरम लिखने के लिए जाने गए बंकिम चंद्र चटर्जी ने ऐसी महिलाओं के बारे में विस्तार से लिखा था जो गुपचुप तरीके से सेक्स वर्क के पेशे में शामिल थी.
प्रोफ़ेसर मित्रा कहती हैं, औपनिवेशिक भारत में, उन सभी महिलाओं को यौन कर्मी मान लिया जाता था जो हिंदू धर्म की कथित उच्च-जाति व्यवस्था से बाहर थीं.
इनमें नर्तकियां, विधवाएं, बहु-विवाह करने वाली हिंदू और मुसलमान महिलाएं, घुमंतू महिलाएं, फैक्ट्रियों में काम करने वाली महिलाएं और घरों में नौकरी करने वाली महिलाएं शामिल थीं.
1881 में हुई बंगाल की जनगणना में 15 वर्ष से ऊपर की अविवाहित महिलाओं को सेक्स वर्कर माना गया था.

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कलकत्ता में हुई पहली जनगणना में महिलाओं की कुल आबादी 14500 थी जिनमें से 12228 को सेक्स वर्कर माना गया था. 1891 की जनगणना में यौन कर्मियों की संख्या 20 हज़ार थी.
प्रोफ़ेसर मित्रा कहती हैं, 'इस क़ानून के लागू होने से ज्ञान को लेकर एक महत्वपूर्ण परिवर्तन हुआ, जिसमें भारतीय लोगों का यौन व्यवहार ब्रितानी औपनिवेशिक राज्य की रूचि का केंद्र बन गया.'
लेकिन पुरुषों का यौन व्यवहार राज्य सत्ता की निगरानी से बाहर ही रहा. प्रोफ़ेसर मित्रा कहती हैं, 'महिलाओं की कामुकता का नियंत्रण और उन्मूलन भारतीय की रोज़मर्रा की ज़िदंगी में ब्रितानी शासन के दख़ल के लिए अहम हो गया.'
साथ ही, बंगाल जैसी जगहों पर, जो प्रोफ़ेसर मित्रा के शोध का केंद्र हैं, भारतीय पुरुषों ने भी 'महिलाओं की कामुकता को भारतीय समाज के अपने नज़रिए से नियंत्रित किया जिसने समाज को उच्च जाति के हिंदू एकल विवाह की प्रथा से पुनर्व्यवस्थित किया था और जिसमें नीची जाति के लोगों और मुसलमानों के लिए जगह नहीं थी.'
इस सबके पीछे वो जड़ विचारधारा थी जो मानती है कि महिलाओं का खुलापन वो समस्या है जिसे आसानी से नहीं सुलझाया जा सकता.
प्रोफ़ेसर मित्रा कहती हैं, और इसी प्रक्रिया में, 'महिलाओं को वर्णित किया गया, उन पर मुक़दमे चले, सार्वजनिक तौर पर उनकी आलोचना हुई और उनकी मर्जी के बिना उनका परीक्षण किया गया.'
वो कहती हैं, इतिहास का वो दौर, आज महिलाओं के साथ जो हो रहा है, उसमें भी दिखाई दे रहा है.
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