चेन्नई सिक्सः भारतीय जेल में रहे एक ब्रितानी नागरिक की कहानी

चेन्नई सिक्स, निक डन, पॉल टावर्स, निक सिम्पसन, रे टिन्डल, जॉन आर्मस्ट्रॉन्ग, बिलि इरविंग
इमेज कैप्शन, चेन्नई सिक्स: (ऊपर की पंक्ति बांए ये दाएं) पूर्वी यॉर्कशायर के पॉकलिंगटन से निक डन, पॉल टावर्स, उत्तरी यॉर्कशायर के कैटरिक से निक सिम्पसन (नीचे की पंक्ति दांए से बांए) चेश्टर से रे टिन्डल, कम्ब्रिया के विंगटन से जॉन आर्मस्ट्रॉन्ग और आर्गिल के कॉनल से बिलि इरविंग
    • Author, डंकन लेदरडेल
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़

निक डन उन छह ब्रितानी पूर्व-सैनिकों में से एक थे जिन्हें कई साल भारतीय जेल में गुज़ारने पड़े. उन्हें एक ऐसे अपराध की सज़ा झेलनी पड़ी जो उन्होंने किया ही नहीं था.

इस दौरान उन्हें हर दिन हिंसा के ख़तरे, खाने के संघर्ष जैसे मुश्किल हालातों से जूझना पड़ा. इराक़ और अफ़ग़ानिस्तान में तैनात रह चुके एक पूर्व पैराट्रूपर निक डन ने कैसे इस क़ैद में अपने दिन गुज़ारे?

एक गंदे फ़र्श पर बेड के रूप में बिछाने के लिए एक पतली दरी थी. जमीन पर बना हुए एक छेद टॉयलेट के लिए था. खाने के लिए कचरे में से गाजर या आलू ढूंढकर निकालने पड़ते थे.

वह और चेन्नई सिक्स में उनके साथ रह रहे सहयोगी सदस्यों के लिए पिछले ढाई साल से यही हर दिन की हक़ीक़त थी. निक डन और उनके सहयोगियों को यहीं पर कैद में रखा गया था.

कैसे पकड़े गए निक और उनके साथी?

निक और अन्य पांच लोग सशस्त्र सुरक्षा गार्ड के तौर पर काम करते थे. उनकी ड्यूटी सोमालियाई समुद्री लुटेरों से सुरक्षा करने के लिए लगाई गई थी. लेकिन, अक्टूबर 2013 में उन्हें भारतीय समुद्री तट के पास कारोबारी जहाज 'एम वी सीमैन गार्ड ओहायो' से पकड़ लिया गया.

उन पर भारतीय समुद्री सीमा में अवैध हथियारों के साथ प्रवेश करने का आरोप था. हालांकि, चार साल बाद एक कोर्ट ने फ़ैसला दिया कि ऐसा नहीं था.

निक के पास उन हथियारों से जुड़े सभी ज़रूरी दस्तावेज़ थे. साथ ही भारतीय समुद्री सीमा में उनकी मौजूदगी उचित थी क्योंकि उन्हें तूफ़ानी मौसम के दौरान इमर्जेंसी सप्लाई लेनी थी.

निक डन

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सालों तक चलता रहा केस

निक की मानें तो ये एक गलतफ़हमी थी, एक ऐसी गलतफ़हमी जिसे थोड़े से वक्त के भीतर ही खत्म हो जाना चाहिए था.

लेकिन, भारतीय अभियोजकों ने इस केस को आगे बढ़ाने पर ज़ोर दिया.

इसके बाद दिन हफ्तों में बदलने लगे और हफ्ते महीनों में. कोर्ट में लगातार आगे बढ़ते केस के साथ महीने सालों में बदल गए.

इन लोगों का कुछ वक्त होटलों और हॉस्टलों में कटा. इसकी एक वजह यह थी कि इन लोगों के परिवारों ने 1,30,000 लोगों के समर्थन वाली एक याचिका ब्रितानी सरकार को सौंपी. इस याचिका में भारतीय अधिकारियों से इन्हें जमानत पर रिहा करने की मांग की गई थी.

लेकिन, इस अवधि का उनना ज़्यादातर वक्त जेल में कटा. कई बार इनमें से चार लोगों को एक ही कोठरी में रखा जाता था. कई बार ऐसा भी होता था कि 20 से ज़्यादा लोगों को एक ही कोठरी में रखा जाता था - इनमें ये छह ब्रितानी नागरिक और उनके सहयोगी क्रू मेंबर थे.

जेल में दूसरे कै़दियों से ख़तरा रहा

जिस जेल में निक और उनके सहयोगी थे वहां हत्या और बलात्कार के अपराध की सज़ा पा रहे कई अपराधी थे. उन्हें छोड़कर पश्चिमी देशों का कोई भी नागरिक वहां मौजूद नहीं था.

उन्हें पहले दिन से ही निशाना बनाया जाने लगा था. उन पर पत्थर फेंके जाते थे और उन्हें समूह में चलना पड़ता था ताकि कोई हमला होने पर वो सामना कर सकें.

उन्हें लेकर एक आधिकारिक तर्क यह था कि जेल में आए ये नए बंदी चरमपंथी हैं. इस उकसावे के शिकार लोग उन पर हमला करने की सोचते थे, लेकिन आमतौर पर इन पूर्व सैनिकों की कद-काठी देखकर वे ये ख़याल दिल से निकाल देते थे.

लेकिन, एक दिन संघर्ष हो ही गया.

निक ने अपनी नई क़िताब 'सरवाइविंग हेल' में लिखा है, "वो सभी हम पर टूट पड़े."

ब्रिटेन के इन लोगों पर जेल के बाक़ी क़ैदियों ने उस वक्त हमला कर दिया जब एक डॉक्टर क़ैदियों को देखने आए थे. इन लोगों ने ब्रितानी क़ैदियों पर बैसाखियों और कुर्सियों से हमला कर दिया.

निक बताते हैं, "चारों तरफ से मुक्के मारे जा रहे थे. क़ैदी एक-दूसरे को बुरी तरह मार रहे थे और कई लोग ज़मीन पर गिर भी गए थे. चारों तरफ़ अफ़रातफ़री का माहौल था."

गार्ड्स के दख़ल देने के बाद ही यह झगड़ा रुक सका. वास्तव में यह झगड़ा इन लोगों के लिए मददगार साबित हुआ.

निक लिखते हैं, "अन्य क़ैदियों ने ज़रूर ही लंबे-चौड़े शरीर वाले हम लोगों के समूह को और हमने जो नुक़सान किया, उसे देखा था. इसके बाद वो अचानक ही लोग हमसे उलझने से बचने लगे थे."

"उन्हें शायद ये संदेश मिल गया था कि हमसे दूर रहना है, क्योंकि इसके बाद हमें कोई दिक्कत नहीं हुई. कम से कम जेल के क़ैदियों ने हमारे लिए कोई मुश्किल खड़ी नहीं की."

जेल के भीतर बुरे हालातों में भी निक और उनके साथियों ने अपना मनोबल नहीं टूटने दिया. जेल के बुरे हालात से अपना ध्यान भटकाने के लिए उन्होंने ख़ुद ही अपने लिए इंतजाम किए.

जेल के मैदान में पड़े पत्थरों से जिम के उपकरण बनाए.

निक ने लिखा है, "गार्ड्स हमेशा हमारी अस्थाई तौर पर बनाई गई जिम को बिगाड़ देते थे. लेकिन, हर बार जब वे ऐसा करते, हम जिम को दोबारा बना लेते थे."

"आख़िर में, हमने उनसे गुज़ारिश की कि वो हमारे इन उपकरणों को वहीं रहने दें. निश्चित तौर पर उन्हें लगा कि हम बाक़ी क़ैदियों के लिए भी एक अच्छा उदाहरण पेश कर रहे हैं."

10 सितंबर 2017 को जब उनकी बहन लीज़ा ने अपने भाई की मदद के लिए क़ानूनी सहायता के लिए फंडिंग जुटाने और उनकी रिहाई के लिए जागरूकता फैलाने के लिए ग्रेट नॉर्थ रन दौड़ लगाई, तब निक ने भी जेल के मैदान में अपने हाफ़-मैराथॉन को पूरा किया.

उन्होंने करीब 40 डिग्री सेल्सियस तापमान में मैदान के 27 चक्कर लगाए. इस दौरान गार्ड्स और दूसरे क़ैदी उन्हें हैरानी से देख रहे थे.

उनके कुछ ब्रितानी साथियों ने उनके साथ इस मैराथॉन में हिस्सा लिया, जबकि कुछ उनके लिए फल जनमा करने में सफल रहे क्योंकि उस वक्त उन्हें अधिक ताकत की ज़रूरत थी.

जेल के भीतर नाममात्र की मिलने वाली सप्लाई में उन्हें खाने की चीज़ों का भी जुगाड़ करना पड़ता था.

जेल में ग्रुप की तरफ से खाना बनाने में मदद के लिए किस दिन कौन जाएगा इसके लिए एक शेड्यूल बनाया गया था.

निक बताते हैं, "रसोई में हर दिन एक जंग होती थी. हमें जिंदा रहने लायक खाना हासिल करने में बड़ा संघर्ष करना पड़ता था."

शावर का जुगाड़ जुगाड़ करने के लिए एक पुराना पाइप जोड़कर नल से लगाया गया.

निक बताते हैं, "हम हमेशा ऐसे इंतजाम करने की कोशिश करते थे ताकि जिन सुविधाओं को हम हलके में लेते थे उनके खोने की कमी का हमें अहसास न हो."

"हम हमारे पास मौजूद चीज़ों के सहारे वो सब करते थे जिससे हमारी जिंदगी थोड़ी आसान हो जाए. हालांकि, इन चीज़ों की उपलब्धता भी बेहद सीमित थी."

"साफ़-सफ़ाई और हाइजीन हमारी पहली प्राथमिकता थी. जैसे हालात में हम रह रहे थे उसमें बीमार होने के अधिक आसार थे. हमारे चारों तरफ़ गंदगी होती थी."

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चेन्नई सिक्स टाइमलाइन

  • 6 अक्टूबर 2013 - निक श्रीलंका में तैनाती के लिए 'एम वी सीमैन गार्ड ओहायो' पर चढ़े.
  • 12 अक्टूबर 2013 - 'एम वी सीमैन गार्ड ओहायो' को भारतीय कोस्टगार्ड तूतीकोरिन पोर्ट पर ले आए.
  • 18 अक्टूबर 2013 - जहाज़ पर मौजू 10 क्रू मेंबर्स और 25 गार्ड्स को गिरफ़्तार कर लिया गया और जेल में डाल दिया गया.
  • फरवरी 2014 - 2,158 पन्नों की चार्जशीट तैयार की गई और इसे हर एक क़ैदी को दिया गया.
  • मार्च 2014 - 1,36,000 लोगों की याचिका ब्रिटिश सरकार को दी गई जिसमें इन कैदियों को भारतीय जेल से रिहा करने की मांग की गई.
  • 26 मार्च 2014 - निक समेत 35 लोगों में से 33 को जमानत मिल गई.
  • जुलाई 2014 - मद्रास हाईकोर्ट ने निक पर लगे आरोपों को ख़ारिज कर दिया, लेकिन अपील के लंबित होने के चलते इन लोगों को भारत में ही रुकना पड़ा.
  • अक्टूबर 2014 - मामले में भारतीय पुलिस ने अपील दायर की
  • जुलाई 2015 - भारत की सर्वोच्च अदालत ने मद्रास हाईकोर्ट के आदेश को पलटते हुए ट्रायल शुरू करने का आदेश दिया.
  • 11 जनवरी 2016 - क्रू सदस्य दोषी पाए गए और इन्हें पांच साल कैद की सजा दी गई.
  • 27 नवंबर 2017 - चेन्नई अपील कोर्ट ने निक को बरी कर दिया. इन्हें रिहा किया गया और ये अब अपने घर जाने के लिए आजाद थे.
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रिहाई के लिए परिवारवालों ने चलाई मुहिम

निक और उनके सहयोगी भारतीय जेल में थे, लेकिन ब्रिटेन में उनके परिवार के लोग पूरी ताकत से इनकी रिहाई के लिए मुहिम चला रहे थे.

निक की बहन लीज़ा ने अपने एक दौरे के दौरान उन्हें एक खुफ़िया कैमरे वाला पेन देने में सफलता हासिल कर ली. लीज़ा ने ब्रिटिश अधिकारियों के सामने इस मामले में दखल देने का अनुरोध किया, लेकिन इन लोगों का कोर्ट केस लटका रहा और इसके आगे बढ़ने के कम ही आसार नज़र आए.

निक के मुताबिक, "हमें लगने लगा था कि हम में से किसी की जान जाने पर ही हम सब की मुसीबतों का शायद अंत होता."

निक अपनी बहन लीज़ा के साथ

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2017 की गर्मियों में जब ये लोग पांच साल की कैद में से दो साल काट चुके थे, चीजें बदलना शुरू हुईं.

इन लोगों के जहाज़ के यूक्रेनी कप्तान बुरी तरह से बीमार हो गए. निक बताते हैं कि ऐसा लगने लगा कि वह बचेंगे नहीं.

लेकिन आख़िरकार वो दिन आ गया जब कोर्ट ने इस मामले का संज्ञान लिया.

निक कहते हैं, "जैसा मेरा अनुमान था, अचानक से न्यायिक तंत्र ने फिर से हमारे मामले का नोटिस लेना शुरू कर दिया."

"भारतीय क़ैद में होते हुए हमारे किसी सदस्य की मौत या गंभीर बीमारी होना अधिकारियों के लिए शर्मिंदगी की बात होती."

निक डन

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इसके बाद यह केस तेज़ी से देश के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के पास पहुंच गया. उन्होंने इसे निबटाने के आदेश दिए.

इस मामले पर फ़ैसले की तारीख़ 27 नवंबर 2017 थी.

और जेल में बंद ये लोग अपने भविष्य को लेकर आने वाले इस फ़ैसले का इंतज़ार करने लगे थे.

रिहाई और फिर आज़ादी

27 नवंबर 2017 को घंटों के इंतज़ार के बाद संदेश आया कि उन्हें बरी कर दिया गया है. निक कहते हैं, "मेरी खुशी का ठिकाना नहीं था."

अगले दिन उन्हें जेल से रिहा कर दिया गया और दिन छह दिन बाद वो ब्रिटेन वापस लौट गए.

न्यूकासल इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर जब निक बाहर आए तो ज़ोरदार तरीक़े से उनका स्वागत किया गया. परिवार और दोस्तों ने उन्हें गले लगा लिया.

इस मामले को कई साल गुज़र चुके हैं और निक अभी भी सिक्योरिटी में काम करते हैं. हालांकि, अब वो देश से बाहर जाने को लेकर अधिक उत्साहित नहीं रहते.

वो कहते हैं, "जिन परिस्थियों से मैं गुज़रा था उन्होंने मेरी पूरी ज़िंदगी को बदल दिया है."

"अब मैं वर्तमान में जीता हूं. कई बार उतार-चढ़ाव भी आते हैं, लेकिन मैं जानता हूं कि उससे ज़्यादा बुरे दौर से गुजर चुका हूं."

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