'इंटरनेशनल डे ऑफ़ गर्ल' मनाएँगे पर लड़कियों को बोलने नहीं देंगे-ब्लॉग

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    • Author, मनीषा पांडेय
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए

आज इंटरनेशल डे ऑफ़ गर्ल मनाया जा रहा है. लोग प्यारी-प्यारी बातें सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर लिख रहे हैं. दो दिन पहले की बात आजकल कौन याद रखता है?

दो दिन पहले ही क्रिकेटर महेंद्र सिंह धोनी की छोटी-सी बेटी को सोशल मीडिया पर रेप की धमकियां दी जा रही थीं. आईपीएल में चेन्नई सुपर किंग्स का प्रदर्शन खराब क्या हुआ, कुछ उत्साही खेलप्रेमियों ने अभद्रता और अश्लीलता की सारी सीमाएँ लांघ दी.

आज अगर आप ट्विटर देखें तो ऐसा लगता है कि हमारे देश में लड़कियों को कितना प्यार किया जाता है, उनकी कितनी देखरेख की जाती है, उन्हें कितना सम्मान दिया जाता है.

मगर सोशल मीडिया पर लड़कियों और महिलाओं के साथ होने वाले व्यवहार के लिए 'भयावह' से नरम शब्द ढूँढना मुश्किल है.

जानी-मानी संस्था प्लान इंटरनेशनल की नई रिपोर्ट आई है, जो कह रही है कि पूरी दुनिया में 60 फीसदी लड़कियां और महिलाएं ऑनलाइन अब्यूज का शिकार होती हैं.

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इस रिपोर्ट के मुताबिक हर पाँचवी लड़की पुरुषों की गालियों, अश्लील टिप्पणियों और अभद्र व्यवहार की वजह से सोशल मीडिया से दूरी बना लेती है.

इस सूची में पहला नंबर फेसबुक का है, जहां 39 फीसदी लड़कियों ने अब्यूज की शिकायत की है. इंस्टाग्राम (23 फीसदी) व्हॉट्सऐप (14 फीसदी) स्नैपचैट (10 फीसदी) और ट्विटर (9 फीसदी) का नंबर उसके बाद आता है.

हालाँकि न ये इस तरह की पहली रिपोर्ट है और न ही इसमें कही गई बातें नई हैं.

थॉमसन रॉयटर्स का एक सर्वे कहता है कि सड़कें और सार्वजनिक जगहें महिलाओं के लिए सबसे खतरनाक हैं. दूसरी रिपोर्ट यूएन की है, जो बताती है कि पूरी दुनिया में औरतों के साथ सबसे ज्यादा हिंसा और रेप की घटनाएं घरों के अंदर होती हैं और फिर प्लान इंटरनेशनल की रिपोर्ट है कि 60 फीसदी महिलाओं के साथ ऑनलाइन अब्यूज हो रहा है.

यानी कुल मिलाकर बात मुख़्तसर है-घर, सड़क, साइबर दुनिया, कोई ऐसी जगह नहीं है जहाँ औरतें सुरक्षित हों, जहाँ उन्हें गालियों, छेड़खानी, धमकी, अभद्रता, हिंसा और बलात्कार का डर न सताए.

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गालियाँ, धमकियाँ और बदतमीज़ियाँ

इस वक्त दुनिया के सभी गंभीर और संवेदनशील मीडिया समूहों की चिंता यही है कि वे ज्यादा से ज्यादा महिला पाठकों तक अपनी बात कैसे पहुंचाएं.

न्यूयॉर्क टाइम्स में कुछ वक्त पहले एक रिपोर्ट छपी थी कि उनके प्लेटफॉर्म पर महिलाओं की उपस्थिति और उनकी आवाज़ बहुत कम है.

उन्होंने लिखा था कि औरतें राजनीतिक मुद्दों पर तो नहीं ही बोलतीं, वो उन विषयों पर भी नहीं बोलतीं, जिनका सरोकार सीधे उनकी जिंदगी से है. ऐसी ही एक स्टोरी 'द गार्डियन' ने भी की थी कि साइबर स्पेस में औरतें इतनी कम क्यों हैं.

भारत में इस वक्त इंटरनेट इस्तेमाल करने वालों का जेंडर अनुपात 28:72 का है यानी 72 फीसदी मर्द और सिर्फ 28 फीसदी औरतें. लेकिन वो 28 फीसदी लड़कियां भी पब्लिक डिबेट में हिस्सेदारी नहीं कर रही हैं. इसकी वजह एक ही है- मर्दों की गाली-गलौज और अभद्र व्यवहार का डर.

यूँ तो हर जगह, लेकिन खासतौर पर पब्लिक स्पेस में अपनी बात कहने का एक सलीका होता है. एक स्त्री के मुंह खोलते ही चार मर्द आकर उसे तरह-तरह के नामों से पुकारने लगें, रेप की धमकी देने लगें, उसकी निजता पर हमला करने लगें तो जाहिर है वह स्त्री ऐसी किसी जगह पर जाने और बोलने से डरेगी.

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ऐसे लोग अक्सर नाम और पहचान छिपाकर अपनी मर्दानगी का प्रदर्शन कर रहे होते हैं. मर्द 'नंगेपन' पर उतर आते हैं और औरतें डरकर चुप हो जाती हैं लेकिन जब वो अपना नाम और पहचान छिपा नहीं रहे होते गालियां नहीं भी दे रहे होते तो क्या कर रहे होते हैं?

यूनिवर्सिटी ऑफ मिसूरी-कोलंबिया ने 40,000 से ज्यादा ब्लॉग्स का अध्ययन कर अपनी एक लंबी रिपोर्ट तैयार की.

यह रिपोर्ट कहती है कि पुरुषों के मुकाबले महिलाओं के लिखे ब्लॉग्स और आर्टिकल की ज्यादा कठोर आलोचना होती है, जिसमें एक बड़ी संख्या में यौन हिंसा वाली टिप्पणियाँ होती हैं.

यूनेस्को ने भी ऑनलाइन अब्यूज पर अपनी रिपोर्ट में इस तथ्य को शामिल किया कि महिलाओं के नाम के साथ छपने वाले लेखों पर तीखी और अभद्र आलोचना का अनुपात पुरुषों के लिखे लेखों के मुकाबले 56 फीसदी ज्यादा है.

महिलाओं का प्रदर्शन

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नैतिकता के अनैतिक पहरेदार

कुछ समय पहले फ़िल्म समीक्षक अनुपमा चोपड़ा देश के कुछ नामी स्टैंडअप कॉमेडियंस का इंटरव्यू कर रही थीं.

यह सवाल आने पर कि पॉलिटिकल सटायर करने वाली लड़कियां क्यों नहीं हैं, जवाब में वरुण ग्रोवर ने कहा कि राजनीति पर कुछ बोलते ही सबसे पहले उन्हें ये धमकी मिलती है कि 'तुम्हारा गैंगरेप करेंगे.'

सोशल मीडिया पर औरतों को मिलने वाली सामूहिक बलात्कार की धमकी तो ऐसी मामूली बात है कि पतझड़ के पत्तों की तरह जब-तब यहां-वहां झरती रहती है. इस धमकी से डरी औरतें बोलना बंद कर देती हैं.

वीडियो कैप्शन, COVER STORY: अंतरिक्ष में महिलाएं कम क्यों?

वो अपनी बात तो नहीं ही कहतीं, दूसरों की कही बात पर पर पब्लिक स्पेस में टिप्पणी तक करने की हिम्मत नहीं जुटा पातीं. मेरे इस ब्लॉग पर उनकी कोई राय होगी तो वे निजी तौर वे इनबॉक्स में मैसेज भेजेंगी मानो युद्ध के दौरान कोई खुफिया गतिविधि हो रही हो.

अक्सर ऐसा हुआ है कि अपने साथ हुई किसी यौन और घरेलू हिंसा पर कोई आर्टिकल लिखने पर लड़कियों ने इनबॉक्स में आकर कहा, ''काश कि मैं इसे अपनी वॉल पर शेयर कर पाती. काश कि मैं इसे अपने पति को ये पढ़वा पाती.''

उन्हें अपने सच को कहने, उसे स्वीकार करने से भी इतना डर लगता है कि वो हर वक्त एक अकेला कोना तलाशती हैं. वो चुपके से इनबॉक्स में आकर कहती हैं कि उनका पति उन्हें मारता है या उनके चाचा ने बचपन में क्या किया था.

ऐसी हजारों कहानियां उनके दिलों में दबी बैठी हैं, जिन्हें कह सकने की हर जगह पर नैतिकता के पहरेदार तैनात हैं, जो खुद घोर अनैतिक हैं.

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हिंदी का तो कहना ही क्या!

पिछले कुछ समय से हिंदी में लड़कियों की आवाज कुछ हद तक सुनी जाने लगी है लेकिन वहाँ भी कठिन नियम और शर्तें लागू हैं, उनसे उम्मीद की जाती है कि वे अच्छी-अच्छी बातें करें, फूलों, खाने और सिनेमा वगैरह के बारे में बात करें. उनसे सामाजिक-राजनीतिक मामले पर मर्द कुछ सुनने को तैयार नहीं दिखते.

माहौल अब भी ऐसा है कि लड़की को चरित्रहीन घोषित करने से लेकर, उसे इनबॉक्स में सेक्स के प्रस्ताव भेजने में देर नहीं लगती.

यही वजह है कि अब भी मूक लड़कियों की संख्या मुखर लड़कियों के मुकाबले कई गुना ज्यादा है. उनकी वॉल पर दस ताले लगे हैं. उनकी प्रोफाइल लॉक है. वो उसे लगातार रेयुग्लेट कर रही हैं. अश्लील कमेंट डिलिट कर रही हैं. वो लिखते, बोलते हुए हर वक्त चौकन्नी हैं. उनकी ऊर्जा का एक बड़ा हिस्सा सिर्फ खुद को सुरक्षित रखने में खर्च हो रहा है.

लेकिन एक जगह है, जहां उन्हें डर नहीं लगता. हर वो स्पेस, जहां मर्द नहीं हैं. फेसबुक पर ही महिलाओं का एक इंटनेशनल क्लोज्ड ग्रुप है. वहां अमेरिका से लेकर यूरोप, अरब देशों, लातिन अमेरिका और एशियाई देशों की महिलाएं हैं.

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वो सब धर्म और राजनीति से लेकर प्यार, शरीर और सेक्स तक सभी मुद्दों पर दिल खोलकर अपनी बात कहती हैं. कोई उन्हें गाली नहीं देता, न कैरेक्टर सर्टिफिकेट जारी करता है. लेबनान की एक औरत ने अपने साथ हुई हिंसा की कहानी लिखी तो दुनिया भर की स्त्रियां उस पर प्यार लुटाने चली आईं.

जहां मर्दों की मौजूदगी न हो, उस स्पेस में स्त्रियां ज्यादा आजाद और एक-दूसरे के साथ ईमानदार होती हैं. यह तो घरों में भी होता है कि रूढ़िवादी परिवार की औरतें मर्दों के सामने जबान सिले रहती हैं और उनके हटते ही हंसी और आंसुओं का फव्वारा हो जाती हैं. वो सिर्फ तब बात करती हैं, जब आसपास मर्द न हों.

और सबसे बड़ी त्रासदी तो ये है कि मर्दों को पता ही नहीं कि अगर वो भरोसेमंद दोस्त नहीं हैं तो ये उनके भी जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी है. मालिक बन बैठा मर्द खुद भी दोस्ती और बराबरी के सुख से वंचित है.

अपने से कमजोर को गालियां देने और डराकर रखने में क्या सुख. सुख तो इस बात होता कि जब आप उसकी बात सुनते, समझते, उसमें हिस्सेदार बनते.

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