कोरोना-लॉकडाउन के कारण दो गंभीर समस्याओं से जूझती महिलाएं
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Author, कमलेश
पदनाम, बीबीसी संवाददाता
कोरोना वायरस के चलते लगाए गए लॉकडाउन का असर स्वास्थ्य सुविधाओं पर भी पड़ा है. एक तरफ़ अस्पतालों पर दबाव बढ़ गया तो दूसरी तरफ़ लोग स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित रह गए.
इसका असर महिलाओं के प्रजनन स्वास्थ्य पर भी हुआ और उन्हें गर्भपात और गर्भनिरोध की पर्याप्त सुविधाएं नहीं मिल पाईं. इसके चलते उन्हें गर्भपात के असुरक्षित तरीक़ों का रुख़ करना पड़ा.
आईपास डिवेलपमेंट फाउंडेशन की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ लॉकडाउन के तीन महीनों (25 मार्च से 24 जून) के दौरान 18 लाख 50 हज़ार महिलाओं ने असुरक्षित गर्भपात कराया या अनचाहा गर्भ हुआ.
आईपास फाउंडेशन महिलाओं के यौन एवं प्रजनन स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम करने वाला ग़ैर-सरकारी संस्थान है. इस संस्थान ने लॉकडाउन के दौरान स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव का महिलाओं पर असर को लेकर एक रिपोर्ट जारी की है.
वीडियो कैप्शन, ऐसे मामलों में गर्भपात अधूरा रह जाता है या कॉम्पलिकेशन हो जाते हैं.
रिपोर्ट में क्या है?
इस रिपोर्ट के लिए तीन महीनों में होने वाले अनुमानित गर्भपात को आधार बनाया गया है. इसके लिए लांसेंट की साल 2015 की एक रिपोर्ट के आँकड़ों का इस्तेमाल किया गया.
लांसेंट की रिपोर्ट के मुताबिक़ भारत में एक साल में एक करोड़ 56 लाख (1.56 करोड़) गर्भपात होते हैं. इनमें से 73 प्रतिशत केमिस्ट से मिलने वाली गर्भपात दवाइयों, 16 प्रतिशत निजी स्वास्थ्य सुविधाओं, 6 प्रतिशत सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं और 5 प्रतिशत पारंपरिक असुरक्षित तरीक़ों से होते हैं.
रिपोर्ट कहती है कि तीन महीनों में औसत 39 लाख गर्भपात होने का अनुमान लगाया था लेकिन इसमें से 18 लाख 50 हज़ार गर्भपात नहीं हो पाए.
रिपोर्ट के मुताबिक़ गर्भपात में सबसे ज़्यादा परेशान शुरुआती 40 दिनों (लॉकडाउन 1) में हुई. तब 59 प्रतिशत गर्भपात नहीं हो पाए, अगले 14 दिनों (लॉकडाउन 2) में 46 प्रतिशत, इससे आगे 14 दिनों (लॉकडाउन 3) में 39 प्रतिशत गर्भपात नहीं हो पाए.
हालांकि, इसके बाद हालात सुधरते गए. एक से 24 जून तक की अवधि में इस मामले में सुधार देखा गया. इस दौरान 33 प्रतिशत गर्भपात नहीं हुए.
गर्भपात के आँकड़े जुटाने के लिए तीन माध्यमों से जानकारी जुटाई गईं. गर्भपात के लिए महिलाएं सार्वजनिक और निजी स्वास्थ्य सुविधाओं में जाती हैं या केमिस्ट से गर्भपात की दवाइयां लेती हैं. कई लोग गैर-क़ानूनी तरीक़े से भी गर्भपात कराते हैं लेकिन रिपोर्ट में इसे हिस्सा नहीं बनाया गया है.
सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाएं- प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र और अस्पताल
निजी स्वास्थ्य सुविधाएं – क्लीनिक्स, नर्सिंग, मैटरनिटी होम्स और अस्पताल
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क्यों हुए असुरक्षित गर्भपात
इस रिपोर्ट के नतीजों को लेकर आईपास फाउंडेशन के सीईओ विनोज मेनिन कहते हैं कि आपदा प्रबंधन के दौरान प्रजनन स्वास्थ्य सुविधाएं हमेशा प्रभावित होती हैं जिसके चलते अनचाहे गर्भधारण और असुरक्षित गर्भपात बढ़ जाते हैं. कुछ ऐसी ही स्थितियां कोरोना महामारी के दौरान भी बनीं. महिलाओं को गर्भपात और गर्भनिरोध के सुरक्षित तरीके नहीं मिल सके. इसके पीछे कई कारण जिम्मेदार थे.
- महिलाएं अस्पतालों और क्लीनिक तक नहीं पहुंच पा रही थीं. एक तो लोग कोविड के कारण अस्पताल जाने से डर रहे थे और दूसरा परिवहन बंद था.
- लॉकडाउन के दौरन पुलिस की सख्ती थी और बाहर निकलने वाले को कारण बताना ज़रूरी थी. ऐसे में ये बताना कि गर्भपात के लिए अस्पताल जा रहे हैं, थोड़ा मुश्किल होता है. इसलिए भी लोग बाहर निकलने में झिझक रहे थे.
- केमिस्ट की दुकानें कम खुल रही थीं. लॉकडाउन में गर्भपात की दवाइयों की आपूर्ति हर जगह पर एक जैसी नहीं थी.
- कोविड के चलते स्वास्थ्य सेवाओं पर बोझ काफी बढ़ गया. कई अस्पतालों को कोविड फैसिलिटी बना दिया गया. डॉक्टर और नर्स कोविड ड्यूटी में लगा दिए गए. हालांकि, ऐसा करना ज़रूरी भी था. पर इससे अन्य बीमारियों के इलाज पर असर पड़ा.
- निजी अस्पतालों में पहले महीने में कई ओपीडी बंद रहीं और क्लीनिक खुलने बंद हो गए. डॉक्टर और स्टाफ में कोरोना वायरस का डर था, स्टाफ अस्पताल या क्लीनिक नहीं पहुंच पा रहे थे और उस वक्त सुरक्षात्मक उपकरण भी आसानी से उपलब्ध नहीं थे.
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असुरक्षित गर्भपात का नुक़सान
फेडरेशन ऑफ ऑब्सटेट्रिक एंड गाइनेकोलॉजिकल सोसाइटीज़ ऑफ़ इंडिया (फॉगसी) के वाइस प्रेज़िडेंट डॉ. अतुल गनात्रा कहते हैं, “महिलाओं को कोई परेशानी ना हो इसके लिए सरकार और डॉक्टर्स की तरफ से काफ़ी कोशिशें की गई थीं. वीडियो कॉल के ज़रिए मरीज़ों से बात की और उन्हें सही सलाह दी गई. फिर भी इस दौरान कॉन्ट्रेसिप्टव पिल्स, कॉपर टी और गर्भपात की दवाइयां की कमी देखी गई थी.”
जब महिलाएं सुरक्षित तरीक़े से गर्भपात नहीं कर पातीं तो वो असुरक्षित तरीक़े अपनाती हैं.
डॉक्टर अतुल बताते हैं कि महिलाएं घर पर गर्भपात करने के लिए पपीता, गर्म चीज़ें खा लेती हैं, दाई के पास जाती हैं या बिना मेडिकल सलाह के कोई दवाई ले लेती हैं. लेकिन, इससे उन्हें इंफेक्शन हो सकता है और उनकी जान भी जा सकती है. वहीं, तबीयत बिगड़ जाने पर आपदा के हालात में उनका इलाज़ होना भी मुश्किल हो जाता है.
सही स्वास्थ्य सुविधा ना मिलने से महिला ही नहीं उसके पूरे परिवार की ज़िंदगी प्रभावित होती है.
विनोज मेनन एक उदाहरण देते हुए बताते हैं कि सर्वे के दौरान एक मामला आया जिसमें एक गाँव की महिला के चार बच्चे थे और वो पाँचवा बच्चा पैदा नहीं करना चाहती थी. लेकिन, वो लॉकडाउन में गर्भपात नहीं करा पाई और अब उसे पांचवा बच्चा भी पैदा करना पड़ा.
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आपदा प्रबंधन में प्रजनन स्वास्थ्य सुविधाएं
हमारे देश में समय-समय पर आपदाएं आती रहती हैं. कहीं बाढ़, कहीं सूखा तो कहीं तूफ़ान. ऐसी स्थितियों में स्वास्थ्य सुविधाओं का प्रभावित होना स्वाभाविक है. महिलाएं भी इसके असर से बच नहीं पातीं.
विनोज मेनन कहते हैं, “हर आपदा में महिलाओं का प्रजनन स्वास्थ्य प्रभावित होता है. लेकिन, अमूमन ये आपदाएं सीमित क्षेत्र में और सीमित समय के लिए आती हैं तो उनमें महिलाओं की प्रजनन संबंधी परेशानियों पर किसी का ध्यान नहीं जाता. तब खाना, रहना, दवाइयां और कपड़े आदि उपलब्ध कराने और आपदा के नुक़सान को कम करने पर ज़्यादा ज़ोर होता है.”
डॉक्टर अतुल का कहना है कि ये बात समझना होगी कि किसी भी आपदा में डिलीवरी नहीं रुक सकती, गर्भपात भी एक तय समयसीमा में होना ज़रूरी है. लेकिन, आपदा कई महीनों तक रह गई तो गर्भपात का समय निकल जाएगा. ऐसे में महिला को अनचाहा गर्भधारण करना पड़ेगा. इसलिए ये एक तरह से आपात स्वास्थ्य ज़रूरतें हैं जो नज़रअंदाज़ नहीं की जा सकतीं.”
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आपदा प्रबंधन में कैसे इसे प्राथमिकता से जगह दी जाए इसके लिए विनोज मेनन और डॉक्टर अतुल कुछ सुझाव देते हैं.
- प्रजनन सुविधाओं को आपदा प्रबंधन का हिस्सा बनाना चाहिए. हर राज्य में आपदा प्रबंधन एजेंसी है, वो अपनी योजना में इस बात पर भी गौर करे कि कैसे विषम स्थितियों में गर्भनिरोध और गर्भपात की सुविधा दी जा सकती है.
- हमें नए तरीके खोजने होंगे जैसे टेली मेडिसिन. लोगों को अस्पताल आने की ज़रूरत ना हो. वो वीडियो कांफ्रेंसिंग या व्हाट्सऐप वीडियो कॉल के ज़रिए डॉक्टर से संपर्क कर सकें.
- महिलाओं को प्रजनन संबंधी समस्याओं में सहयोग के लिए एक हेल्पलाइन बनाई जाए, ताकि महिलाओं को गर्भनिरोध, गर्भपात और प्रजनन संबंधी सलाह एक जगह पर मिल सके.
- गर्भपात और गर्भनिरोधक दवाइयों का स्टॉक रखा जा सकता है. उन्हें अन्य ज़रूरी दवाइयों का हिस्सा बना सकते हैं. जिस तरह सैनेटरी पैड पहुंचाए जाते हैं उसी तरह ज़रूरतमंदों को डॉक्टरी सलाह पर ये दवाइयां दी जा सकती हैं.
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कोरोना वायरस एक संक्रामक बीमारी है जिसका पता दिसंबर 2019 में चीन में चला. इसका संक्षिप्त नाम कोविड-19 है
सैकड़ों तरह के कोरोना वायरस होते हैं. इनमें से ज्यादातर सुअरों, ऊंटों, चमगादड़ों और बिल्लियों समेत अन्य जानवरों में पाए जाते हैं. लेकिन कोविड-19 जैसे कम ही वायरस हैं जो मनुष्यों को प्रभावित करते हैं
कुछ कोरोना वायरस मामूली से हल्की बीमारियां पैदा करते हैं. इनमें सामान्य जुकाम शामिल है. कोविड-19 उन वायरसों में शामिल है जिनकी वजह से निमोनिया जैसी ज्यादा गंभीर बीमारियां पैदा होती हैं.
ज्यादातर संक्रमित लोगों में बुखार, हाथों-पैरों में दर्द और कफ़ जैसे हल्के लक्षण दिखाई देते हैं. ये लोग बिना किसी खास इलाज के ठीक हो जाते हैं.
लेकिन, कुछ उम्रदराज़ लोगों और पहले से ह्दय रोग, डायबिटीज़ या कैंसर जैसी बीमारियों से लड़ रहे लोगों में इससे गंभीर रूप से बीमार होने का ख़तरा रहता है.
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जब लोग एक संक्रमण से उबर जाते हैं तो उनके शरीर में इस बात की समझ पैदा हो जाती है कि अगर उन्हें यह दोबारा हुआ तो इससे कैसे लड़ाई लड़नी है.
यह इम्युनिटी हमेशा नहीं रहती है या पूरी तरह से प्रभावी नहीं होती है. बाद में इसमें कमी आ सकती है.
ऐसा माना जा रहा है कि अगर आप एक बार कोरोना वायरस से रिकवर हो चुके हैं तो आपकी इम्युनिटी बढ़ जाएगी. हालांकि, यह नहीं पता कि यह इम्युनिटी कब तक चलेगी.
कोरोना वायरस का इनक्यूबेशन पीरियड क्या है?जिलियन गिब्स
मिशेल रॉबर्ट्सबीबीसी हेल्थ ऑनलाइन एडिटर
वैज्ञानिकों का कहना है कि औसतन पांच दिनों में लक्षण दिखाई देने लगते हैं. लेकिन, कुछ लोगों में इससे पहले भी लक्षण दिख सकते हैं.
वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन (डब्ल्यूएचओ) का कहना है कि इसका इनक्यूबेशन पीरियड 14 दिन तक का हो सकता है. लेकिन कुछ शोधार्थियों का कहना है कि यह 24 दिन तक जा सकता है.
इनक्यूबेशन पीरियड को जानना और समझना बेहद जरूरी है. इससे डॉक्टरों और स्वास्थ्य अधिकारियों को वायरस को फैलने से रोकने के लिए कारगर तरीके लाने में मदद मिलती है.
क्या कोरोना वायरस फ़्लू से ज्यादा संक्रमणकारी है?सिडनी से मेरी फिट्ज़पैट्रिक
मिशेल रॉबर्ट्सबीबीसी हेल्थ ऑनलाइन एडिटर
दोनों वायरस बेहद संक्रामक हैं.
ऐसा माना जाता है कि कोरोना वायरस से पीड़ित एक शख्स औसतन दो या तीन और लोगों को संक्रमित करता है. जबकि फ़्लू वाला व्यक्ति एक और शख्स को इससे संक्रमित करता है.
फ़्लू और कोरोना वायरस को फैलने से रोकने के लिए कुछ आसान कदम उठाए जा सकते हैं.
बार-बार अपने हाथ साबुन और पानी से धोएं
जब तक आपके हाथ साफ न हों अपने चेहरे को छूने से बचें
खांसते और छींकते समय टिश्यू का इस्तेमाल करें और उसे तुरंत सीधे डस्टबिन में डाल दें.
आप कितने दिनों से बीमार हैं?मेडस्टोन से नीता
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
हर पांच में से चार लोगों में कोविड-19 फ़्लू की तरह की एक मामूली बीमारी होती है.
इसके लक्षणों में बुख़ार और सूखी खांसी शामिल है. आप कुछ दिनों से बीमार होते हैं, लेकिन लक्षण दिखने के हफ्ते भर में आप ठीक हो सकते हैं.
अगर वायरस फ़ेफ़ड़ों में ठीक से बैठ गया तो यह सांस लेने में दिक्कत और निमोनिया पैदा कर सकता है. हर सात में से एक शख्स को अस्पताल में इलाज की जरूरत पड़ सकती है.
अस्थमा वाले मरीजों के लिए कोरोना वायरस कितना ख़तरनाक है?फ़ल्किर्क से लेस्ले-एन
मिशेल रॉबर्ट्सबीबीसी हेल्थ ऑनलाइन एडिटर
अस्थमा यूके की सलाह है कि आप अपना रोज़ाना का इनहेलर लेते रहें. इससे कोरोना वायरस समेत किसी भी रेस्पिरेटरी वायरस के चलते होने वाले अस्थमा अटैक से आपको बचने में मदद मिलेगी.
अगर आपको अपने अस्थमा के बढ़ने का डर है तो अपने साथ रिलीवर इनहेलर रखें. अगर आपका अस्थमा बिगड़ता है तो आपको कोरोना वायरस होने का ख़तरा है.
क्या ऐसे विकलांग लोग जिन्हें दूसरी कोई बीमारी नहीं है, उन्हें कोरोना वायरस होने का डर है?स्टॉकपोर्ट से अबीगेल आयरलैंड
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
ह्दय और फ़ेफ़ड़ों की बीमारी या डायबिटीज जैसी पहले से मौजूद बीमारियों से जूझ रहे लोग और उम्रदराज़ लोगों में कोरोना वायरस ज्यादा गंभीर हो सकता है.
ऐसे विकलांग लोग जो कि किसी दूसरी बीमारी से पीड़ित नहीं हैं और जिनको कोई रेस्पिरेटरी दिक्कत नहीं है, उनके कोरोना वायरस से कोई अतिरिक्त ख़तरा हो, इसके कोई प्रमाण नहीं मिले हैं.
जिन्हें निमोनिया रह चुका है क्या उनमें कोरोना वायरस के हल्के लक्षण दिखाई देते हैं?कनाडा के मोंट्रियल से मार्जे
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कम संख्या में कोविड-19 निमोनिया बन सकता है. ऐसा उन लोगों के साथ ज्यादा होता है जिन्हें पहले से फ़ेफ़ड़ों की बीमारी हो.
लेकिन, चूंकि यह एक नया वायरस है, किसी में भी इसकी इम्युनिटी नहीं है. चाहे उन्हें पहले निमोनिया हो या सार्स जैसा दूसरा कोरोना वायरस रह चुका हो.
कोरोना वायरस से लड़ने के लिए सरकारें इतने कड़े कदम क्यों उठा रही हैं जबकि फ़्लू इससे कहीं ज्यादा घातक जान पड़ता है?हार्लो से लोरैन स्मिथ
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शहरों को क्वारंटीन करना और लोगों को घरों पर ही रहने के लिए बोलना सख्त कदम लग सकते हैं, लेकिन अगर ऐसा नहीं किया जाएगा तो वायरस पूरी रफ्तार से फैल जाएगा.
फ़्लू की तरह इस नए वायरस की कोई वैक्सीन नहीं है. इस वजह से उम्रदराज़ लोगों और पहले से बीमारियों के शिकार लोगों के लिए यह ज्यादा बड़ा ख़तरा हो सकता है.
क्या खुद को और दूसरों को वायरस से बचाने के लिए मुझे मास्क पहनना चाहिए?मैनचेस्टर से एन हार्डमैन
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
पूरी दुनिया में सरकारें मास्क पहनने की सलाह में लगातार संशोधन कर रही हैं. लेकिन, डब्ल्यूएचओ ऐसे लोगों को मास्क पहनने की सलाह दे रहा है जिन्हें कोरोना वायरस के लक्षण (लगातार तेज तापमान, कफ़ या छींकें आना) दिख रहे हैं या जो कोविड-19 के कनफ़र्म या संदिग्ध लोगों की देखभाल कर रहे हैं.
मास्क से आप खुद को और दूसरों को संक्रमण से बचाते हैं, लेकिन ऐसा तभी होगा जब इन्हें सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए और इन्हें अपने हाथ बार-बार धोने और घर के बाहर कम से कम निकलने जैसे अन्य उपायों के साथ इस्तेमाल किया जाए.
फ़ेस मास्क पहनने की सलाह को लेकर अलग-अलग चिंताएं हैं. कुछ देश यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि उनके यहां स्वास्थकर्मियों के लिए इनकी कमी न पड़ जाए, जबकि दूसरे देशों की चिंता यह है कि मास्क पहने से लोगों में अपने सुरक्षित होने की झूठी तसल्ली न पैदा हो जाए. अगर आप मास्क पहन रहे हैं तो आपके अपने चेहरे को छूने के आसार भी बढ़ जाते हैं.
यह सुनिश्चित कीजिए कि आप अपने इलाके में अनिवार्य नियमों से वाकिफ़ हों. जैसे कि कुछ जगहों पर अगर आप घर से बाहर जाे रहे हैं तो आपको मास्क पहनना जरूरी है. भारत, अर्जेंटीना, चीन, इटली और मोरक्को जैसे देशों के कई हिस्सों में यह अनिवार्य है.
अगर मैं ऐसे शख्स के साथ रह रहा हूं जो सेल्फ-आइसोलेशन में है तो मुझे क्या करना चाहिए?लंदन से ग्राहम राइट
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
अगर आप किसी ऐसे शख्स के साथ रह रहे हैं जो कि सेल्फ-आइसोलेशन में है तो आपको उससे न्यूनतम संपर्क रखना चाहिए और अगर मुमकिन हो तो एक कमरे में साथ न रहें.
सेल्फ-आइसोलेशन में रह रहे शख्स को एक हवादार कमरे में रहना चाहिए जिसमें एक खिड़की हो जिसे खोला जा सके. ऐसे शख्स को घर के दूसरे लोगों से दूर रहना चाहिए.
मैं पांच महीने की गर्भवती महिला हूं. अगर मैं संक्रमित हो जाती हूं तो मेरे बच्चे पर इसका क्या असर होगा?बीबीसी वेबसाइट के एक पाठक का सवाल
जेम्स गैलेगरस्वास्थ्य संवाददाता
गर्भवती महिलाओं पर कोविड-19 के असर को समझने के लिए वैज्ञानिक रिसर्च कर रहे हैं, लेकिन अभी बारे में बेहद सीमित जानकारी मौजूद है.
यह नहीं पता कि वायरस से संक्रमित कोई गर्भवती महिला प्रेग्नेंसी या डिलीवरी के दौरान इसे अपने भ्रूण या बच्चे को पास कर सकती है. लेकिन अभी तक यह वायरस एमनियोटिक फ्लूइड या ब्रेस्टमिल्क में नहीं पाया गया है.
गर्भवती महिलाओंं के बारे में अभी ऐसा कोई सुबूत नहीं है कि वे आम लोगों के मुकाबले गंभीर रूप से बीमार होने के ज्यादा जोखिम में हैं. हालांकि, अपने शरीर और इम्यून सिस्टम में बदलाव होने के चलते गर्भवती महिलाएं कुछ रेस्पिरेटरी इंफेक्शंस से बुरी तरह से प्रभावित हो सकती हैं.
मैं अपने पांच महीने के बच्चे को ब्रेस्टफीड कराती हूं. अगर मैं कोरोना से संक्रमित हो जाती हूं तो मुझे क्या करना चाहिए?मीव मैकगोल्डरिक
जेम्स गैलेगरस्वास्थ्य संवाददाता
अपने ब्रेस्ट मिल्क के जरिए माएं अपने बच्चों को संक्रमण से बचाव मुहैया करा सकती हैं.
अगर आपका शरीर संक्रमण से लड़ने के लिए एंटीबॉडीज़ पैदा कर रहा है तो इन्हें ब्रेस्टफीडिंग के दौरान पास किया जा सकता है.
ब्रेस्टफीड कराने वाली माओं को भी जोखिम से बचने के लिए दूसरों की तरह से ही सलाह का पालन करना चाहिए. अपने चेहरे को छींकते या खांसते वक्त ढक लें. इस्तेमाल किए गए टिश्यू को फेंक दें और हाथों को बार-बार धोएं. अपनी आंखों, नाक या चेहरे को बिना धोए हाथों से न छुएं.
बच्चों के लिए क्या जोखिम है?लंदन से लुइस
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
चीन और दूसरे देशों के आंकड़ों के मुताबिक, आमतौर पर बच्चे कोरोना वायरस से अपेक्षाकृत अप्रभावित दिखे हैं.
ऐसा शायद इस वजह है क्योंकि वे संक्रमण से लड़ने की ताकत रखते हैं या उनमें कोई लक्षण नहीं दिखते हैं या उनमें सर्दी जैसे मामूली लक्षण दिखते हैं.
हालांकि, पहले से अस्थमा जैसी फ़ेफ़ड़ों की बीमारी से जूझ रहे बच्चों को ज्यादा सतर्क रहना चाहिए.