कश्मीर में हर लॉकडाउन से खुलता है मानसिक समस्याओं का पिटारा

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- Author, चिंकी सिन्हा
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
ख़ून के धब्बे वाले जूते. कई लोगों के अंतिम संस्कार. क़ब्रिस्तान, समाधि-लेख और दीवार में बना वो सुराख.
यह सुराख तब बना, जब एक लॉकडाउन के दौरान एक व्यक्ति अपने ही घर में दाख़िल होने लिए दीवार फांदने की कोशिश कर रहा था और उस पर गोली चलाई गई. इस बात को सालों बीत गए, लेकिन श्रीनगर के पुराने रिहायशी इलाक़े में पले बढ़े हुज़ैफ़ा पंडित के लिए यह लड़कपन की पहली यादें हैं, लॉकडाउन की यादें.
वे बताते हैं, "29 सालों से यह सब याद है. हर बार लॉकडाउन आने के साथ यह याद आता है.'' कश्मीर में कई बार लॉकडाउन लागू किया गया है और प्रोफ़ेसर, लेखक और कवि हुज़ैफ़ा पंडित ने कई बार इसे झेला है.
बीते मार्च महीने में जब कोविड-19 महामारी के चलते देशव्यापी लॉकडाउन लागू किया गया, तो ये कश्मीर में पिछले साल अगस्त से चल रहे एक तरह के लॉकडाउन का विस्तार ही था.
पिछले साल अगस्त में भारत सरकार ने अनुच्छेद 370 को ख़त्म करने के बाद कश्मीर में लॉकडाउन लागू किया था. नवंबर महीने में जब हुज़ैफ़ा पंडित को पुणे जाने का मौक़ा मिला, तो वे वहाँ चले गए, क्योंकि कश्मीर के लॉकडाउन को झेलना उनके लिए मुश्किल भरा हो रहा था.
उन्हें सब कुछ निराशाजनक लग रहा था और इसके बाद महामारी का दौर शुरू हो गया.
हालाँकि इससे लॉकडाउन से जुड़ी उनकी पुरानी यादें लौट आईं. उनके मुताबिक़ इन यादों का बोझ उनके दिमाग़ पर है और हर लॉकडाउन उन्हें ऐसी ही यादों में ले जाता है.
यह सब निराश और अनिश्चितता का बोध कराने वाला है. उन्होंने श्रीनगर से फ़ोन पर बताया, ''हम लोग लॉकडाउन के इतने अभ्यस्त हो चुके हैं, जैसे कोई यातना शिविर का अभ्यस्त हो सकता है लेकिन इसका असर दिमाग़ पर बना रहता है."

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सालों तक चले सशस्त्र संघर्ष के चलते कश्मीर में मानसिक बीमारी हमेशा से एक मुद्दा रही है. हरेक पाबंदियाँ और सख़्ती इस क्षेत्र के लोगों की मानसिक सेहत को प्रभावित करती है.
कश्मीर घाटी में पाँच अगस्त, 2019 से ही लॉकडाउन की स्थिति है. इसी दिन केंद्र सरकार ने जम्मू कश्मीर के राज्य के दर्जे और स्वायत्तता को निरस्त करते हुए पूरे इलाक़े में क़र्फ्यू लगा दिया था.
डर और अनिश्चितता का माहौल
पहले से ही सशस्त्र सैनिकों से भरे कश्मीर में सैनिकों की संख्या बढ़ा दी गई थी और सभी तरह के संचार साधनों पर पाबंदी लगा दी गई थी.
ऐसी स्थिति का ज़िक्र करते हुए नासिर पतिगारू जैसे मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ आशंका जताते हैं कि कश्मीर में एंग्जाइटी और पोस्ट ट्रोमैटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर के मामलों में काफ़ी वृद्धि हुई होगी और पिछले पाँच महीने से जारी कोविड-19 लॉकडाउन के चलते मामले और बढ़े होंगे.
कश्मीर के अनंतनाग में पतिगारु क्लिनिक चलाने वाले नासिर बताते हैं, "मुश्किल यह है कि प्रत्येक लॉकडाउन के अलग-अलग मायने हैं. यहाँ दो एक्टर हैं- एक इसे थोपने वाला और दूसरा इसे झेलने वाला. पहले तो लॉकडाउन लागू करने वाला सिस्टम ही होता था, इस बार कोरोना महामारी भी है. बहुत सारे मरीज़ कोविड-19 के चलते अवसाद में चले गए हैं. बीते तीन महीनों में हमलोगों के पास दो हज़ार से ज़्यादा मामले सामने आए हैं. हमलोग ऑनलाइन साइकियाट्रिक क्लीनिक भी चलाते हैं."
यह क्लिनिक वैसे तो 2004 से ही चल रहा है, लेकिन पिछले कुछ ही महीनों से यहाँ ऑनलाइन काउंसलिंग दी जाने लगी है.
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कश्मीर में जिस तरह की पाबंदियाँ हैं, उसके चलते अगस्त, 2019 के बाद से मानसिक स्वास्थ्य देखभाल भी बेहद कम लोगों को मिली हैं.
अंतरराष्ट्रीय मानवीय चिकित्सा संगठन 'डॉक्टर्स बिदाउट बॉर्डर' ने कश्मीर घाटी के चार ज़िलों में अपनी मानसिक स्वास्थ्य देखभाल की सुविधाओं को बंद करने का फ़ैसला किया, क्योंकि वे अपने कर्मचारियों से संपर्क नहीं कर पा रहे थे.
जम्मू कश्मीर कॉलिशन ऑफ़ सिविल सोसायटी के प्रोग्राम कार्डिनेटर खुर्रम परवेज़ के मुताबिक़ लंबे समय से चले आ रहे संघर्ष और क्षेत्र में डेमोग्राफ़िक बदलाव की आशंका के चलते लोग चिंता में हैं.
कश्मीर संघर्ष प्रभावित क्षेत्र रहा है, जिसके चलते यहाँ मानसिक स्वास्थ्य समस्याएँ पहले से ही मौजूद हैं. कश्मीर में लंबे समय से लोगों में मानसिक समस्याओं को लेकर रिपोर्टें आती रही हैं.
पहले से रही हैं स्वास्थ्य समस्याएँ
'डॉक्टर्स बिदाउट बॉर्डर' के 2015 के एक सर्वे के मुताबिक़ कश्मीर घाटी में कुल आबादी के 45 फ़ीसदी लोगों यानी 18 लाख वयस्कों में मानसिक समस्याओं के लक्षण देखे गए थे.
41 फ़ीसदी आबादी में अवसाद के लक्षण देखे गए थे. इसी सर्वे के मुताबिक़ 26 फ़ीसदी लोगों में एंग्जाइटी और 19 फ़ीसदी लोगों में पोस्ट ट्रोमैटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (पीटीएसडी) के संभावित लक्षण पाए गए थे.
इंस्टीट्यूट ऑफ़ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरो साइंसेज (आईएमएचएएनएस) और एक्शन एड की ओर से 2016 में प्रकाशित एक रिसर्च के मुताबिक़ कश्मीर के 11.3 फ़ीसदी लोगों में मानसिक स्वास्थ्य समस्याएँ हैं, जो राष्ट्रीय औसत सात फ़ीसदी की तुलना में ज़्यादा है.

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पतिगारू के मुताबिक़ अर्थव्यवस्था में मंदी और नौकरियों के जाने के चलते मानसिक स्वास्थ्य समस्याएँ बढ़ी हैं.
उन्होंने बताया, "लॉकडाउन के बीच हमलोग टूट जाते हैं. यहाँ तो एक के बाद एक लॉकडाउन की स्थिति रही है. 2008 से ही मैं लॉकडाउन देख रहा हूँ. वे लॉकडाउन कुछ महीनों तक चला करते थे. इसके बाद एक या दो साल का गैप आ जाता था. हमलोग इस बीच में राहत ले पाते थे. अगर चीज़ें बेहतर नहीं हुईं, तो स्थिति बदतर होगी."
इस महामारी का लोगों के मानसिक स्वास्थ्य पर ऐसा असर पड़ा है कि ज़ाहिर होता है कि लोग सामान्य अवसाद का सामना कर रहे हैं. जहाँ लोग आसपास की चीज़ों से खुश नहीं हैं.
पतिगारू ने बताया, "लोग सो नहीं पाते, ख़ुश नहीं रहते. वे अमूमन कहते हैं- दिल ख़ुश नहीं रहता है." लॉकडाउन और महामारी की अनिश्चितताओं ने लोगों की नींद उड़ाकर उन्हें चिंता में डाल दिया है.
32 साल के हुज़ैफ़ा पंडित दीवार में बने सुराख को बचपन से ही देख रहे हैं. यह गोली से बना सुराख है. गोली उस शख़्स पर चलाई गई थी, जो अपने ही घर में दाख़िल होने के लिए दीवार कूदने की कोशिश कर रहा था. पंडित कहते हैं, "उसने ऐसा क्यों किया होगा, मैं अब भी नहीं जानता."
पाँच अगस्त, 2019 को कश्मीर में लॉकडाउन लगाए जाने के बाद सभी संचार साधनों पर पाबंदी लगा दी गई थी.
उन्होंने बताया, "यह भयावह था. मुझे बेहद अकेलापन महसूस हुआ. मैं अपने बिस्तर से बाहर नहीं निकलना चाहता था. सब कुछ उजड़ा हुआ लग रहा था और जब बाहर निकले तो सेना का विशाल ट्रक सड़क पर मौजूद था. कोविड संकट के दिनों में तो कम से कम फ़ोन है. पाँच अगस्त के बाद लगा कर्फ़्यू भयानक था. हम घंटों तक फ़ोन को घूरते रहते थे."
लॉकडाउन के दिनों में पंडित अपनी पूर्व गर्लफ्रेंड को उन बिहारी मज़दूरों के हाथों चिट्ठी भेजा करते थे, जो कश्मीर छोड़कर बाहर निकल रहे थे. हालांकि वे महज तीन चिट्ठी ही भेज पाए. 2012 में पंडित पोस्ट ट्रोमैटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (पीटीएसडी) की चपेट में आए थे.
उन्होंने बताया, "बचपन से आसपास कोई लोगों को मरते हुए देख चुका हूँ. कोई नहीं सोचता कि मुझे यह नहीं देखना चाहिए था." वे याद करते हुए बताते हैं कि पाँच साल की उम्र में उन्हें पुलिस वाले ने रायफ़ल के बट से सिर के पीछे मारा था. वे तब लाल चौक पर काम करने वाले अपने पिता के साथ थे.
लॉकडाउन से बदलते हालात

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पंडित ने बताया, "जिस पुलिसवाले ने मारा, उसने ना तो माफ़ी मांगी और ना ही रुका. मैं रो पड़ा था. काफ़ी चोट लगी थी. पुलिस वालों की कार्रवाई मेरे बचपन का नियमित हिस्सा रहा. मुझे अचरज होता था कि वे क्यों हमलोगों की तरफ़ आते हैं. हम लोग अपने आभूषण और मूल्यवान चीज़ें मुर्गियों के दड़बे में छिपा देते थे. मेरी माँ को सारी चीज़ें व्यवस्थित करने में घंटों लगते थे."
ऐसी हर कार्रवाई के बाद हुज़ैफ़ा पंडित को अपने जीवन को फिर से व्यवस्थित करना होता था और अपनी यादों को भी. पंडित 10वीं में थे, जब उनके पिता महज 43 साल की उम्र में गुज़र गए.
10वीं पास करने के बाद पंडित ने एक नौकरी की और पाँच साल तक उस नौकरी को करते रहे. जब उन्होंने पहली बार इलाज कराया, तो उनमें गंभीर मानसिक समस्याएँ देखने को मिलीं.
वे बताते हैं, "मैं भावनाओं पर क़ाबू नहीं रख पा रहा था और मैं आत्महत्या के बारे में सोचने लगा था. मनोचिकित्सक ने पहली बार कहा था कि मौत के ओवर एक्सपोजर के चलते मुझे अत्यधिक घबराहट हो रही है."
लेकिन घाटी में मौतों की संख्या कम नहीं हुई. पंडित के मुताबिक़ वे नहीं चाहते कि लोगों की जान जाए, उन लोगों में पड़ोसी और कजिन भी हो सकते हैं. जिस सड़क पर उनका घर है, उसी सड़क पर क़ब्रिस्तान भी है और कई मौक़ों पर वे क़ब्रिस्तान में बने समाधि लेखों पर कविताएँ पढ़ने चले जाते हैं.
इस साल मार्च में जब कोरोना महामारी के चलते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहले चरण का लॉकडाउन घोषित किया था, तब पंडित पुणे में थे.
उन्होंने बताया, "मैं कुत्तों से ईष्या करने लगा था. कुत्ते कहीं भी आ जा सकते हैं. मैंने नवंबर में लॉकडाउन से बचने के लिए ही कश्मीर से बाहर निकला था. जब जब लॉकडाउन होता है, यह चोट पहुँचाता है, अपमानित करता है. मैंने बहुत पहले दवा छोड़ दी थी, लेकिन मुझे फिर से लेनी पड़ी. मैं फिर से आत्महत्या के बारे में सोचने लगा था."
पंडित एक तरह से बिखर गए थे. उन्हें महसूस हुआ कि कुछ ग़लत हो रहा है, लिहाजा उन्होंने डॉक्टर को फ़ोन किया और फिर से दवाइयों पर आ गए. हालांकि वे ख़ुद को काफ़ी आक्रोशित और कमज़ोर महसूस करते हैं.
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अधिकांश मानसिक स्वास्थ्य सेवाएँ श्रीनगर के अस्पतालों में केंद्रित हैं, ज़ाहिर है कि ग्रामीण इलाक़ों के लोग उन सुविधाओं तक नहीं पहुँच सकते, ऐसे में अधिकांश लोग नीम हकीम के चक्कर में पड़ते हैं.
नीम हकीम से उनको कोई ख़ास मदद नहीं मिलती. जो लोग पहले भी एंग्जाइटी और अन्य मानसिक विकारों की चपेट में आ गए थे और ठीक होने के बाद दवाइयां बंद कर चुके थे, उन लोगों में भी लगातार जारी लॉकडाउन के दौरान विकार के लक्षण फिर से नजर आने लगे हैं.
2011 की जनगणना के मुताबिक़ जम्मू कश्मीर की आबादी 1.25 करोड़ के आसपास थी और वहाँ महज 41 मनोचिकित्सक थे. मानसिक स्वास्थ्य सुविधाएँ श्रीनगर के महज दो अस्पताल- जीएमसी श्रीनगर और एसकेआईएमएस अस्पताल में मौजूद हैं.
कुछ निजी चिकित्सक भी इलाक़े में मनोचिकित्सीय देखभाल की सुविधाएँ मुहैया कराते हैं. महामारी के चलते लागू लॉकडाउन में तनाव, एंग्जाइटी, हताशा, अवसाद, उलझन, चिंता, अनिश्चितता जैसी मानसिक समस्याओं में वृद्धि देखने को मिल रही है.
कोविड-19 संक्रमण की चपेट में आने के अलावा दूसरी समस्याएँ भी हैं. लोगों में बेरोज़गारी बढ़ी है, परिवार के लोगों में भी शारीरिक दूरी रखनी पड़ रही है, घरों में क़ैद होने जैसी स्थिति है, आजीविका के अलावा आर्थिक अनिश्चितता और सामाजिक असुरक्षा, इन सबका असर लोगों पर पड़ रहा है.
कोविड-19 महामारी को मानसिक स्वास्थ्य पर असर डालने वाली महामारी भी कहा जा रहा है, कश्मीर के लोगों के सामने जटिल स्थिति है.
उन्हें लॉकडाउन झेलने का अनुभव तो है, लेकिन इस बार स्थिति बेहद अलग है, उनके सामने कोई दिखाई देने वाला दुश्मन नहीं है और ढेर सारी अनिश्चितताएँ हैं. एक साल से भी ज़्यादा समय से छात्र स्कूल नहीं गए हैं. टीनएजरों में ड्रग्स सेवन के मामले बढ़ने की आशंका भी जताई जा रही है.
डॉक्टर मुज़फ़्फ़र ख़ान श्रीनगर में मानसिक स्वास्थ्य चिकित्सक हैं, उनका कहना है कि कोरोना महामारी के चलते लगाए गए लॉकडाउन के पहले दो चरणों में उन्होंने कश्मीरियों को संघर्ष करते नहीं देखा.
उन्होंने कहा, "हमारे जीवन में मेट्रोपॉलिटन कल्चर नहीं है. हमलोग जाड़े से निकल रहे थे और गर्मियों की तैयार कर रहे थे, तभी लॉकडाउन शुरू हो गया. इससे कुछ भी नहीं बदला. लेकिन अक्तूबर आ गया है और अब लॉकडाउन काफ़ी लंबा हो चुका है, मैं समस्याएँ देख रहा हूँ."
ख़ान सेंटर फॉर मेंटल हेल्थ सर्विसेज में क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट हैं और वे ड्रग्स की लत को छुड़ाने वाले कार्यक्रम को भी देखते हैं. उन्होंने पहले सोचा था कि लॉकडाउन के चलते ड्रग्स की आपूर्ति भी बाधित होगी और ड्रग्स सेवन के मामले कम होंगे.
उन्होंने बताया, "लेकिन हमलोग ग़लत साबित हुए. हमने देखा कि ज़्यादा से ज़्यादा लोग ड्रग्स सेवन कर रहे हैं."
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पिछले कुछ सालों में कश्मीर में ड्रग्स की लत में बदलाव देखने को मिला है. पहले ख़ान को प्रत्येक 10 में आठ मरीज़ ऐसे मिलते थे, जो गाँजा, नींद की गोली और मेडिसिन में इस्तेमाल होने वाले अफ़ीम का नशा करते थे और दो मरीज़ हेरोइन जैसे ज़्यादा नशे की चपेट में थे.
नशे की चपेट में युवा पीढ़ी
उन्होंने बताया, "बीते दो सालों में, हमने इसमें बड़ा बदलाव देखा है, अब आठ लोग ज़्यादा नशे वाला ड्रग्स ले रहे हैं. कोविड महामारी के दौर में ड्रग्स सेवन और मानसिक बीमारियाँ बढ़ी हैं और हमारी सुविधाएँ कम हुई हैं."
लॉकडाउन से पहले जम्मू कश्मीर सरकार ड्रग्स की लत छुड़ाने के लिए एक कार्यक्रम चलाती थी, लेकिन अब नई कोशिशें नहीं हो रही हैं और पुराने कोशिशों पर सवालिया निशान लगा हुआ है.
ख़ान ने बताया, "एक डॉक्टर के रूप में मेरा मानना है कि स्कूल बच्चों को ड्रग्स सेवन से बचाने में मदद करते हैं. कोविड -19 महामारी और 370 हटाए जाने के बाद से नौवीं से लेकर 11वीं तक के बच्चे सड़कों पर हैं, उनकी कोई दिनचर्या नहीं है. मुझे आशंका है कि नई पीढ़ी नशे का सेवन करने लगी है."
ख़ान इसी सप्ताह 11वीं में पढ़ने वाली एक लड़की से मिले हैं और उनके व्यवहार में कोई समस्या नहीं थी, लेकिन लड़की को बोलने में मुश्किल हो रही थी. जाँच में इस समस्या की कोई जैविक वजह नहीं मिली.
उन्होंने कहा, "मनोवैज्ञानिक वजह थी. लड़की घर में बंद सी रह रही थी और उनकी कोई दिनचर्या नहीं थी." वहीं एक अन्य मरीज़ में ऑब्सेसिव कंपल्सिव डिसऑर्डर की वापसी देखने को मिली. 21 साल के युवा की मां के मुताबिक़ वह घंटों तक ख़ुद को बाथरूम में बंद रखने लगा था.
ख़ान ने बताया, "हमलोग कोशिश कर रहे हैं कि उनकी दिनचर्या वापस लौटे. कुछ दवाइयाँ भी दी हैं. ऐसी समस्याएँ हमलोग देख रहे हैं."
डार्क ह्यूमर में यह किसी मज़ाक़ से कम नहीं होगा लेकिन दुख झेल रहे समाज की यह सच्चाई ही है. श्रीनगर के इंस्टीट्यूट ऑफ़ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरोसाइंस में बच्चों और किशोरों के मेंटल हेल्थ थेरेपिस्ट के तौर पर काम कर रहे वसीम राशिद काकरू बताते हैं, "पुराना वाला या नया वाला. हम लॉकडाउन के बारे में इसी तरह पूछते हैं. जब वे कहते हैं कि लॉकडाउन के दौरान हुआ तो पूछते हैं कि कौन सा लॉकडाउन."

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काकरू ने पिछले कुछ महीनों में कई तरह के मामले देखे हैं. लोगों के रिश्ते टूट रहे हैं, नशे का सेवन कर रहे हैं. जिनका आत्मबल कम था, वे बेहद अकेलापन महसूस करने लगे हैं, कई मामलों में तो लोगों ने ख़ुद को ज़ख़्मी भी किया है.
कोविड-19 के असर पर काकरू ने बताया, "आब्सेसिव कंपल्सिव डिसऑर्डर के मामले बढ़े हैं. यह एक तरह से एंग्जाइटी डिसऑर्डर है. आपको संक्रमण की चपेट में आने का डर सताने लगता है. आब्सेसिव कंपल्सिव डिसऑर्डर (ओसीडी) में, आप लगातार डरते हैं और आशंका में रहते हैं. जिन लोगों में ओसीडी पहले से था, उनमें महामारी के दौरान यह और भी बढ़ गया है."
हुज़ैफ़ा पंडित ने लगातार दो लॉकडाउन के दौरान दो कविताएँ लिखी हैं. लंबे समय से उन्हें महसूस होता है कि उन्हें लोगों ने धोखा दिया और अकेले छोड़ दिया है.
उनकी हाल की एक कविता The Prisoners Always Knew इसी को संबोधित है. हालाँकि अब वे अपने परिवार के पास श्रीनगर में हैं. दवाइयों के चलते समस्या कम ज़रूर हुई है लेकिन उदासी दूर नहीं हुई है.
जाड़े के मौसम में आसपास का परिदृश्य सफ़ेद हो जाएगा, लेकिन ख़ून को भूल पाना मुश्किल होगा. यह ऐसा ही है. यादों का ढेर. जो फिर से आपको अंधेरे में धकेल देता है.
नोट: मानसिक बीमारियों का इलाज संभव है. किसी भी तरह की परेशानी होने पर योग्य मनोचिकित्सक से संपर्क करें. कुछ ऐसे भी सायकोलॉजिस्टऔर साइकियाट्रिस्ट हैं जो ज़रूरतमंद लोगों को बहुत कम फ़ीस या मुफ़्त में सेवाएं देते हैं. इन डॉक्टरों की लिस्ट देखने के लिए यहां क्लिक करें.
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