बिहार चुनावः नीतीश कुमार 15 साल की सत्ता के बाद भी हैं सबसे बड़े किरदार

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- Author, प्रवीण शर्मा
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने ऐलान कर दिया है कि बिहार विधानसभा चुनावों में नीतीश कुमार ही एक बार फिर से एनडीए के नेता होंगे.
इस ऐलान के साथ ही बीजेपी ने साफ़ शब्दों में उन अटकलबाज़ियों पर भी लगाम लगाने की कोशिश की है जिनमें कहा जा रहा था कि बीजेपी नीतीश कुमार को किनारे लगाकर चुनाव बाद अपना मुख्यमंत्री बनाने की राजनीति खेल रही है और अंदरख़ाने से चिराग़ पासवान की अगुवाई वाली लोक जनशक्ति पार्टी (एलजेपी) को नीतीश कुमार के ख़िलाफ़ आगे बढ़ा रही है.
चिराग़ पासवान की एलजेपी ऐलान कर चुकी है कि वह जेडी(यू) के साथ मिलकर राज्य विधानसभा चुनाव नहीं लड़ेगी.
बीजेपी और जेडी(यू), दोनों पार्टियों ने सीटों का बंटवारा भी कर लिया.
पटना में हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बताया कि जेडी(यू) इस बार 122 सीटों पर चुनाव लड़ेगी, जबकि बीजेपी के खाते में 121 सीटें गई हैं. इस तरह से बिहार में एनडीए से एलजेपी बाहर हो गई है.
हालांकि, यह देखना बाक़ी है कि क्या बीजेपी लगातार नीतीश को चुनावों के नतीजे आने के बाद भी अपना समर्थन जारी रखती है या नहीं.
एलजेपी का अलग चुनाव लड़ने का फ़ैसला बेहद दिलचस्प है और इससे कई संभावनाएं आने वाले वक़्त में बन सकती हैं.
लेकिन समझा जाता है कि बीजेपी को यह लगता है कि जेडी(यू) और नीतीश कुमार बिहार में अभी भी एक बड़ी ताक़त हैं और उनको दरकिनार कर किसी के लिए भी सरकार बनाना आसान नहीं है. यही वजह है कि कोई जोखिम लिए बग़ैर बीजेपी ने नीतीश को ही एनडीए का नेता मानकर चुनाव लड़ने का फ़ैसला किया है.
पिछले कुछ वक़्त से ऐसा लग रहा था कि इन चुनावों में एक मज़बूत एंटी-इनकंबेंसी या सत्ता विरोधी लहर उभर रही है और जेडी(यू) को इसका नुक़सान उठाना पड़ सकता है.
लेकिन, मौजूदा वक़्त में कोई भी राजनीतिक विश्लेषक यह कहने की स्थिति में नहीं है कि जेडीयू की हालत कमज़ोर है.
इसके अलावा, बाढ़ के दौरान और उससे पहले कोरोना महामारी रोकने के लिए लागू किए गए देशव्यापी लॉकडाउन के दौरान प्रवासी मज़दूरों की दिक़्क़तों और उनकी घर वापसी के इंतज़ामों को लेकर नीतीश सरकार की बड़ी आलोचना हुई है.
माना जा रहा है कि प्रवासी मज़दूरों का यह तबक़ा, जिसमें लाखों लोग आते हैं, नीतीश कुमार से ख़ासा नाराज़ हैं और उनका वोट इस बार दूसरी तरफ़ जा सकता है.
जेडीयू और बीजेपी के सीट बंटवारे के ऐलान के लिए हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में बीजेपी नेता और उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने कहा, "निश्चिंत रहिए. चाहे जिस पार्टी को जितनी भी सीटें मिलें, लेकिन नीतीश कुमार ही हमारे मुख्यमंत्री होंगे."
आख़िर बिहार में नीतीश कुमार की अहमियत इतनी क्यों है?
पटना यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ़ सोशल साइंसेज़ के पूर्व डीन और पटना कॉलेज के प्राचार्य रह चुके प्रोफ़ेसर नवल किशोर चौधरी वे चार कारण गिनाते हैं जिनके चलते नीतीश बिहार की राजनीति में सबसे अहम शख़्सियत बने हुए हैं.
वे कहते हैं कि लीडरशिप, सोशल जस्टिस के साथ विकास का मेल, एनडीए का साथ होने का फ़ायदा और एक साफ़-सुथरी छवि उनके पक्ष में जाती है.
चौधरी कहते हैं, "बिहार ही नहीं देश की राजनीति में भी नेतृत्व एक बड़ा फ़ैक्टर होता है. देश की डेमोक्रेसी में लीडरशिप का रोल सबसे अहम है. बिहार में नीतीश सबसे बड़ा चेहरा हैं. उनके मुक़ाबले तेजस्वी यादव हैं. लेकिन नीतीश के मुक़ाबले उनका क़द उतना बड़ा नहीं है."
वरिष्ठ पत्रकार अरुण पांडेय कहते हैं कि लीडरशिप एक बड़ा मुद्दा है और जेडीयू का मतलब ही नीतीश कुमार हैं.
वे कहते हैं कि बिहार की तीनों पार्टियां- बीजेपी, जेडीयू और आरजेडी अलग-अलग चुनाव लड़कर देख चुकी हैं. लेकिन इनमें से कोई भी अकेले सरकार बनाने में सफल नहीं रही. ऐसे में नीतीश ने बीजेपी के साथ गठजोड़ किया और यह फ़ॉर्मूला चल गया.
अरुण पांडेय के मुताबिक़, "बिहार की राजनीति में जाति के आधार पर दो ध्रुव बने हुए हैं. बिहार में यादवों की आबादी क़रीब 14 फ़ीसद हैं और क़रीब 17 फ़ीसद मुस्लिम हैं. दूसरा ध्रुव बाक़ी जातियों का है. ऐसा माना जाता है कि ये तबक़ा बीजेपी को वोट नहीं देता है. लालू यादव के इस बड़े जनाधार के ख़िलाफ़ नीतीश खड़े हुए थे. जातियों के इन दो ध्रुवों में एक तबक़ा लालू के साथ है और दूसरा तबक़ा नीतीश के साथ बना हुआ है."
पांडेय कहते हैं, "तब से बिहार के चुनाव नीतीश बनाम लालू हो गए."
बिहार में 16-17 फ़ीसद सवर्ण जातियों को छोड़ दें तो बाक़ी 80 फ़ीसद हिस्सा पिछड़ों का है.

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गठजोड़ का फ़ॉर्मूला
2019 के लोकसभा चुनावों में बिहार में एनडीए ने बेहतरीन प्रदर्शन किया था. एनडीए ने राज्य की 40 लोकसभा सीटों में से 39 पर जीत हासिल की थी. इसके अलावा नीतीश कुमार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता का भी फ़ायदा मिलने की उम्मीद है.
बीजेपी के राज्य प्रवक्ता प्रेम रंजन पटेल कहते हैं, "लोगों को सरकार की योजनाओं का लाभ मिला है. हम केंद्र और राज्य दोनों के कार्यों और हमारे वादों को लेकर लोगों के बीच जाएंगे."
प्रोफ़ेसर नवल किशोर चौधरी कहते हैं कि 'नीतीश पर भ्रष्टाचार का कोई दाग़ नहीं है. इस लिहाज़ से भी उनकी छवि पाक-साफ़ है'.
वो साथ ही कहते हैं, "बीजेपी के साथ होने से बहुसंख्यक हिंदू वोट मिलने का उनका रास्ता साफ़ हो जाता है. नीतीश ने लालू यादव का सामाजिक न्याय का मुद्दा लिया और उसमें विकास को भी शामिल कर लिया. लालू की तरह से नीतीश ने भी जातियों का भरपूर इस्तेमाल किया.''
वे ये भी कहते हैं कि एनडीए के साथ होने से उन्हें बीजेपी का संगठनात्मक सहयोग भी मिल गया.
एंटी-इनकंबेंसी फ़ैक्टर क्या भारी पड़ेगा?
एंटी-इनकंबेंसी और प्रवासी मज़दूरों में नाराज़गी पर जेडीयू के प्रवक्ता कमल नोपानी कहते हैं कि राज्य सरकार ने इस मामले में केंद्र की गाइडलाइंस का पालन किया है और बाद के चरण में मज़दूरों को हर तरह से राहत देने की कोशिश की गई है.
बीजेपी प्रवक्ता प्रेम रंजन पटेल मानते हैं कि 'हो सकता है कि थोड़ी-बहुत नाराज़गी हो, लेकिन जब मसला नेता चुनने का होगा तो लोग नीतीश को ही चुनेंगे'.
वरिष्ठ पत्रकार अरूण पांडेय कहते हैं, "नीतीश और बीजेपी लालू के 15 साल को 'जंगल राज' की संज्ञा देते हैं."
पांडेय कहते हैं कि भले ही बिहार में अभी नीतीश कुमार के 15 साल के शासन को लेकर एंटी-इनकंबेंसी है, लेकिन यह अभी भी वैसा नहीं है जैसा लालू के 15 साल के दौर के बाद 2005 में था.
लेकिन वे यह भी कहते हैं कि आज के वक़्त में नीतीश का वैसा आकर्षण भी नहीं है जैसा पहली बार सत्ता में आने के बाद था. उस वक़्त एकदम बदलाव की लहर दिखाई दी थी.
प्रवासी मज़दूरों की सरकार से नाराज़गी के मुद्दे पर पांडेय कहते हैं, "बिहार में जातियों का असर बड़े गहरे तक है और ये मज़दूर भी इससे अछूते नहीं हैं. ऐसे में जो जाति जिस पार्टी के साथ जुड़ी हुई है उसी हिसाब से वोटिंग होगी."
रोज़गार, प्रवासी मज़दूर और दूसरे मसले
बिहार में रोज़गार एक पुरानी समस्या है और यह आज भी क़ायम है. लालू यादव और नीतीश कुमार दोनों 15-15 साल तक सरकारें चला चुके हैं, इसके बावजूद रोज़गार यहां बड़ी समस्या बनी हुई है और पलायन बड़े पैमाने पर जारी है.
अरूण पांडेय कहते हैं कि आज बड़ा मसला रोज़गार का है. तेजस्वी भी लोगों को सरकारी नौकरियां देने का वादा कर रहे हैं और नीतीश भी इसी तरह के ऐलान कर रहे हैं.
हालांकि, जेडीयू के प्रवक्ता मानते हैं कि राज्य में औद्योगिकीकरण कम हुआ है और आने वाले वक़्त में इस पर ध्यान दिया जाएगा.
बीजेपी के राज्य प्रवक्ता प्रेम रंजन पटेल ने बताया, "बिहार में विकास सबसे बड़ा मामला है. केंद्र और राज्य में एक ही गठबंधन की सरकार होने से बहुत फ़ायदा होता है."
वहीं आरजेडी रोज़गार के अलावा शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मसलों पर नीतीश सरकार को चुनावों में घेरने की कोशिश कर रही है.
आरजेडी के मृत्युंजय तिवारी कहते हैं, "राज्य में बेरोज़गारी सबसे बड़ा मसला है. शिक्षा और स्वास्थ्य पर भी सरकार पूरी तरह से फ़ेल हो गई है. विकास को लेकर कोई ब्लूप्रिंट नहीं है. क़ानून व्यवस्था लचर है और भ्रष्टाचार चरम पर है."
वे कहते हैं, "नीतीश बिहार को विशेष राज्य का दर्जा नहीं दिला पाए. पटना यूनिवर्सिटी को वे केंद्रीय विश्वविद्यालय नहीं बनवा पाए. किस बात की डबल इंजन सरकार है ये?"
क्या एलजेपी बिगाड़ेगी जेडीयू का खेल?
एलजेपी के नीतीश पर हमलावर होने और जेडीयू के ख़िलाफ़ उम्मीदवार उतारने से पैदा ख़तरे को जेडीयू और बीजेपी दोनों बड़ा नहीं मानते.
जेडीयू प्रवक्ता कमल नोपानी कहते हैं कि एलजेपी एनडीए का हिस्सा नहीं है.
बीजेपी प्रवक्ता प्रेम रंजन पटेल कहते हैं कि लोजपा अब एनडीए का हिस्सा नहीं है. वे कहते हैं, "लोजपा के जाने से एनडीए के वोटों पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा."
राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के प्रवक्ता मृत्युंजय तिवारी कहते हैं कि एनडीए एक बेमेल गठबंधन है और चिराग़ पासवान को जनता के आक्रोश के बारे में फ़ीडबैक मिल रहा था.
तिवारी कहते हैं, "एनडीए के आचरण से जनता में भ्रम पैदा हो गया है. लोगों को यह समझ नहीं आ रहा है कि यह किस तरह का गठबंधन है."
नोपानी कहते हैं, "हम नीतीश के 15 साल के शासन को लेकर जनता के बीच जाएंगे. हम विकास के मुद्दे पर चुनाव लड़ेंगे. एलजेपी केवल एक वोटकटवा पार्टी बनकर रह जाएगी."
वो कहते हैं कि ऐसे लोग बिहार में केवल विकास के बीच में अवरोध बनकर खड़े हैं.
लेकिन पत्रकार अरूण पांडेय कहते हैं कि अभी तक इस चुनाव में मुक़ाबला एनडीए बनाम महागठबंधन का था. लेकिन, अब एक दिलचस्प फ़ैक्टर एलजेपी ने पैदा कर दिया है. अब मुक़ाबला त्रिकोणीय हो गया है.
पांडेय कहते हैं कि लोजपा के उम्मीदवार सीधे तौर पर जेडीयू का नुक़सान करेंगे.

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नीतीश बनाम तेजस्वी में किसे चुनेगी जनता?
बिहार का नेतृत्व कौन करेगा यह एक अहम सवाल है. इसमें विकल्पों की बात की जाए तो नीतीश के सामने कोई क़द्दावर विकल्प नज़र नहीं आता है.
पांडेय कहते हैं कि नीतीश कुमार के मुक़ाबले में तेजस्वी यादव हैं.
वे कहते हैं, "नीतीश का लंबा राजनीतिक अनुभव है और उनकी साख है. दूसरी ओर, तेजस्वी को अपनी साख बनाने में अभी काफ़ी वक़्त लगेगा. यह अंतर भी नीतीश को बढ़त दिलाता है. "
नेतृत्व के मसले पर नोपानी कहते हैं, "नीतीश के सामने दूर-दूर तक कोई चेहरा नहीं है."
प्रो. चौधरी भी यह मानते हैं कि नीतीश और तेजस्वी की लोकप्रियता के बीच में अभी एक बड़ा अंतर है.
एनडीए बिहार में नीतीश के क़द के किसी दूसरे नेता के न होने पर ही उन पर दांव लगा रहा है.
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