एमनेस्टी पर भारत सरकार ने कहा, मानवाधिकार की आड़ लेकर क़ानून नहीं तोड़ा जा सकता

एमनेस्टी इंटरनेशनल

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    • Author, योगिता लिमये
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

भारत सरकार ने एमनेस्टी इंटरनेशनल के बयान को दुर्भाग्यपूर्ण और सच से दूर बताया है. साथ ही कहा है कि एमनेस्टी ने बात को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया है. भारतीय गृह मंत्रालय ने एक बयान जारी कर अपनी ओर से मामले के तथ्य रखे हैं.

भारत सरकार के बयान के मुताबिक़, "एमनेस्टी इंटरनेशनल को सिर्फ एक बार फ़ॉरेन कंट्रीब्यूशन (रेगुलेशन) एक्ट (FCRA) के तहत मंज़ूरी मिली थी और वो भी 20 साल पहले. उसके बाद से बार-बार किए गए आवेदनों के बावजूद एमनेस्टी इंटरनेशनल को किसी सरकार ने FCRA की मंज़ूरी नहीं दी, क्योंकि क़ानून के मुताबिक़ वो इन मंज़ूरियों के लिए योग्य नहीं है."

"हालांकि एमनेस्टी यूके ने FCRA के नियम को किनारे करते हुए प्रत्यक्ष विदेशी निवेश यानी एफडीआई बताकर भारत में पंजीकृत चार संस्थाओं को बड़ी मात्रा में धन भेजा. भारतीय गृह मंत्रालय की अनुमति के बिना एमनेस्टी (इंडिया) को भी काफ़ी विदेशी धन भेजा गया. रास्ता बदलकर ग़लत तरीक़े से भेजे गए ये पैसे मौजूदा क़ानूनी प्रावधानों के उल्लंघन था."

"एमनेस्टी के इन अवैध तरीक़ों की वजह से पहले वाली सरकार ने भी विदेशों से फंड लेने के एमनेस्टी के आवेदनों को बार-बार अस्वीकार्य कर दिया था. इसलिए इससे पहले भी एमनेस्टी को भारत में अपना काम-काज बंद करना पड़ा था. एमनेस्टी के प्रति अलग-अलग सरकारों की ये क़ानूनी अप्रोच दिखाता है कि अपने काम-काज के लिए फंड हासिल करने की एमनेस्टी की ही संदिग्ध प्रक्रिया में सारी ख़ामी है."

"भारत सरकार ने बयान में कहा कि मानवीय कामों और सत्ता से सच बोलने के सभी बढ़िया बयान सिर्फ उनकी ख़ुद की उन गतिविधियों से ध्यान हटाने की चाल है, जो भारतीय क़ानूनों का स्पष्ट उल्लंघन करती हैं. साथ ही ऐसे बयान सालों में की गई अनियमितताओं और अवैधताओं की जांच को प्रभावित करने की कोशिश भी है."

भारतीय गृह मंत्रालय ने साथ ही बयान में ये भी कहा है कि एमनेस्टी अन्य संस्थाओं की तरह ही भारत में मानवीय काम जारी रखने के लिए स्वतंत्र है. "हालांकि भारत विदेशी दान से वित्त पोषित संस्थाओं को अपनी घरेलू राजनीतिक बहस में हस्तक्षेप की अनुमति नहीं देता है. ये क़ानून सभी पर बराबर लागू होता है और एमनेस्टी इंटरनेशनल पर भी लागू होगा."

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भारत में अपना काम बंद करने की घोषणा

अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्था एमनेस्टी इंटरनेशनल ने भारत में अपना काम बंद करने की घोषणा की है. उसने ये फ़ैसला हाल ही में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के संस्था के खातों को फ़्रीज़ करने के बाद किया है.

ईडी ने सीबीआई की ओर से पिछले साल दर्ज एक एफ़आईआर के बाद अलग से जाँच शुरू की थी. एमनेस्टी पर विदेशी चंदा लेने के बारे में बने क़ानून एफ़सीआरए के उल्लंघन का आरोप लगाया गया था.

एमनेस्टी ने एक बयान में अपना काम बंद करने के लिए "सरकार की बदले की कार्रवाई" को ज़िम्मेदार बताया है.

एमनेस्टी ने अपने बयान में कहा है, "10 सितंबर को एमनेस्टी इंटरनेशल इंडिया को पता चला कि ईडी ने उसके सारे बैंक खातों को फ़्रीज़ कर दिया है, जिससे मानवाधिकार संस्था के अधिकतर काम ठप हो गए हैं."

उसने आगे लिखा है, "ये मानवाधिकार संगठनों के ख़िलाफ़ भारत सरकार की ओर से बेबुनियाद और ख़ास मक़सद से लगाए गए आरोपों के आधार पर चलाए जा रहे अभियान की एक ताज़ा कड़ी है."

एमनेस्टी के एक वरिष्ठ अधिकारी रजत खोसला ने बीबीसी से कहा, "हम भारत में एक अभूतपूर्व परिस्थिति का सामना कर रहे हैं. हमें सरकार की ओर से एक व्यवस्थित तरीक़े से लगातार हमलों, दादागिरी और परेशानी का सामना करना पड़ रहा है और ये केवल इसलिए हो रहा है कि हम मानवाधिकार से जुड़े काम कर रहे हैं और सरकार हमारे उठाए सवालों का जवाब नहीं देना चाह रही है, वो चाहे दिल्ली दंगों को लेकर हमारी पड़ताल हो या जम्मू-कश्मीर में लोगों की आवाज़ों को ख़ामोश करना."

सरकार पर उठाए थे सवाल

दिल्ली पुलिस ने रिपोर्ट का खंडन करते हुए अख़बार द हिंदू से कहा था कि एमनेस्टी की रिपोर्ट "एकतरफ़ा, पक्षपाती और विद्वेषपूर्ण" है.

इस साल अगस्त में जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे को ख़त्म किए जाने के एक साल पूरा होने पर एमनेस्टी ने हिरासत में रखे गए सभी नेताओं, कार्यकर्ताओं और पत्रकारों को रिहा किए जाने और सामान्य इंटरनेट सेवा बहाल करने की माँग की थी.

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2019 में एमनेस्टी ने अमरीका में विदेश मामलों की एक समिति के सामने दक्षिण एशिया में मानवाधिकारों की स्थिति पर सुनवाई के दौरान कश्मीर के बारे में अपनी पड़ताल को पेश किया था.

एमनेस्टी बार-बार ये कहते हुए सरकार की आलोचना करती रही है कि भारत में असंतोष का दमन किया जा रहा है.

2016 के अगस्त में, एमनेस्टी इंडिया के ख़िलाफ़ ये आरोप लगाते हुए देशद्रोह का मामला दर्ज किया गया था कि उसके एक कार्यक्रम में भारत विरोधी नारे लगे. तीन साल बाद, एक अदालत ने इन आरोपों को ख़ारिज कर दिया था.

2018 के अक्तूबर में एमनेस्टी के बेंगलुरू स्थित दफ़्तरों पर ईडी ने छापा मारा था. तब भी उसके खाते फ़्रीज़ कर दिए गए थे, लेकिन एमनेस्टी ने कहा कि अदालत के हस्तक्षेप के बाद उसे खाते से लेन-देन की मंज़ूरी मिल गई.

फिर 2019 में संस्था के अनुसार उसके दर्जनों चंदा देने वालों को इनकम टैक्स विभाग की ओर से नोटिस भेजा गया. इसी साल उसके दफ़्तरों पर फिर छापे पड़े, लेकिन इस बार ये छापे सीबीआई ने मारे.

एमनेस्टी इंटरनेशनल को इससे पहले कांग्रेस की अगुआई वाली गठबंधन सरकार के कार्यकाल में भी मुश्किल हुई थी.

2009 में भी उसने भारत में अपना काम स्थगित कर दिया था. तब संस्था का कहना था कि विदेशों से चंदा लेने के लिए उसका लाइसेंस बार-बार रद्द किया जा रहा था.

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विदेशी चंदा

भारत में पिछले कई सालों से विदेशी चंदा लेने को लेकर बने नियमों को सख़्त किया जाता रहा है और हज़ारों ग़ैर-सरकारी संगठनों पर विदेशों से चंदा लेने पर पाबंदी लगाई गई है.

मौजूदा मोदी सरकार ने पहले कहा था कि एमनेस्टी के ख़िलाफ़ विदेशी चंदा लेने के क़ानून का उल्लंघन करने के संदेह में जाँच की जा रही है.

एमनेस्टी के अधिकारी रजत खोसला कहते हैं, "ये सफ़ेद झूठ है. एमनेस्टी इंडिया ने सभी घरेलू और क़ानूनी शर्तों का पालन किया है."

उन्होंने कहा, "ऐसे क़दमों से भारत अच्छे देशों के समूह से अलग दिखता है. हम 70 से ज़्यादा देशों में काम कर रहे हैं, और इससे पहले किसी और देश में अगर हमने काम बंद किया है तो वो 2016 में रूस में किया था. "

"मुझे उम्मीद है दुनिया भर में लोग इसे ध्यान से देखेंगे. हम ये फ़ैसला बहुत ही बोझिल दिल से और क्षुब्ध और दुखी होते हुए कर रहे हैं."

एमनेस्टी ने कहा है कि वो भारत में अपने मुक़दमों को लड़ना जारी रखेगी.

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