मोदी सरकार का लॉकडाउन का फ़ैसला क्या दूसरी नोटबंदी थी?

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- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
पुरानी दिल्ली के निवासी युवा समीद फ़ारूक़ी के माता-पिता उन लोगों में शामिल हैं जो कोरोना वायरस से शुरू के दिनों में पीड़ित हुए थे.
उनकी माँ डायबिटिक थीं जबकि पिता दिल के मरीज़ थे. उस समय कोरोना की बीमारी भी नई थी और देश-भर में लगा लॉकडाउन भी बिलकुल एक अनोखा अनुभव था.
समीद फ़ारूक़ी कहते हैं, "यह मेरे लिए एक बड़ा झटका था जब मुझे पता चला कि मेरे माता-पिता कोरोना पॉज़िटिव हैं. किसी भी हेल्पलाइन नंबर से मदद नहीं मिली, चाहे वह 102 हो या 100. हम उन्हें मैक्स अस्पताल ले गए."
"वो गर्मी में तीन घंटे तक बाहर बैठे रहे. जब वो थक गए और मेरे पास कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा था तो मैं उन्हें सरकारी अस्पताल ले आया. उनकी हालत तब तक काफी ख़राब हो चुकी थी. हालांकि, इलाज़ शुरू होने के बाद वो धीरे-धीरे ठीक हो गए."
समीद मुंबई में एक स्टार्टअप कंपनी से जुड़े हैं और इन दिनों दिल्ली में अपने घर से ही काम कर रहे हैं. वह कहते हैं, "मैंने 22 मार्च को जनता कर्फ़्यू के दिन दिल्ली आने का फ़ैसला किया. उस दिन सब कुछ बंद था. मैं अपनी बाइक से ही एयरपोर्ट गया और वहीं उसे पार्क करके दिल्ली की फ़्लाइट ले ली."
लॉकडाउन के लिए कितना तैयार था देश?
समीद जैसे लाखों नागरिकों को अंदाज़ा हो गया था कि जनता कर्फ़्यू आने वाले दिनों के लिए तैयारी है. रेल गाड़ियां और हवाई उड़ानें रोक दी गई थीं और कुछ राज्य अपने स्तर पर लॉकडाउन की तैयारी में जुट गए थे.
दो दिन बाद ही यानी 24 मार्च को शाम आठ बजे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के नाम एक सन्देश में देशभर में एक सख़्त लॉकडाउन की घोषणा कर दी. उन्होंने चार घंटे बाद से, यानी 24 मार्च को 12 बजे रात से, इसे लागू करने का एलान किया.
प्रधानमंत्री ने लोगों को आश्वासन दिया कि महामारी के ख़िलाफ़ ये जंग तीन हफ़्तों में जीत ली जाएगी. उन्होंने कहा था, "महाभारत का युद्ध 18 दिनों में जीता गया. आज कोरोना के ख़िलाफ़ जो युद्ध पूरा देश लड़ रहा है उसमें 21 दिन लगने वाले हैं."
लेकिन, इस आश्वासन का असर सड़कों और बाज़ारों में नहीं दिखा. दहशत और घबराहट का माहौल पैदा हो गया. दुकानों और बाज़ारों में ख़रीदारों की भीड़ और सड़कों पर निकल आए लाखों की संख्या में प्रवासी मज़दूर इस बात का संकेत थे कि देश के लोग इस प्रतिबंध के लिए तैयार नहीं थे.

बेतहाशा मज़दूर पैदल ही घरों को कूच कर गए
भूखे, प्यासे प्रवासी मज़दूर मुंबई, चेन्नई और बेंगलुरु जैसे बड़े शहरों से अपने घरों को पैदल ही निकल पड़े. साथ में बच्चे और बुज़ुर्ग अपने सिर पर अपना सामान उठाए सड़कों पर निकले तो उन्हें प्रशासन ने राज्य की सीमाओं पर रोकने की कोशिश की.
विपक्ष ने इस पर कहा कि मोदी सरकार ने ग़रीबों और प्रवासी मज़दूरों के बारे में सोचे बग़ैर ही अचानक से लॉकडाउन लगा दिया. अंतरराष्ट्रीय मीडिया में बेहाल प्रवासी मज़दूरों की तस्वीरें देख कर लोग दंग रह गए.
उस समय मोदी सरकार ने अपने बचाव में कहा कि प्रधानमंत्री ने सभी नागरिकों से आग्रह किया था कि वो जहाँ हैं 21 दिनों के लिए वहीं रहें.
केंद्र और राज्य सरकारों ने बाद में प्रवासी मज़दूरों के लिए खाने और रहने के साथ ही उन्हें उनके घरों तक ले जाने के लिए विशेष रेल और बस सेवाओं का इंतज़ाम किया.
तब तक कई प्रवासी मज़दूरों की मौत हो चुकी थी, कुछ की थकान से और कुछ की दुर्घटनाओं में. लेकिन, केंद्र सरकार के मुताबिक़ उसके पास इन मौतों के आंकड़ें नहीं हैं.

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स्वास्थ्य सेवाओं की कलई खुली
उधर सरकारी अस्पतालों का भी हाल बुरा था. मुंबई और दूसरे शहरों कई अस्पतालों में कोरोना संक्रमित मरीज़ बिस्तरों के नीचे लेटे देखे गए. प्राथमिक स्वास्थ्य प्रणाली ढहती दिखाई दी.
महामारी ने भारत की कमज़ोर प्राथमिक स्वास्थ्य प्रणाली की पोल पूरी तरह से खोल दी. डॉक्टर प्रीती कुमार स्वास्थ्य से संबंधित नीतियों की विशेषज्ञ हैं और ग़ैर-सरकारी संस्था पब्लिक हेल्थ फ़ाउंडेशन ऑफ इंडिया से जुड़ी हैं.
वो कहती हैं, "प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा पर पिछले 70 सालों से ध्यान नहीं दिया गया है. हमें उसकी कमी आज महामारी में महसूस हुई, ख़ास तौर से उत्तर भारत के राज्यों में."
लॉकडाउन के पहले दिन देश भर में कोरोना संक्रमण के 618 मामले थे और 13 लोगों की इस बीमारी से मौत हो चुकी थी. लॉकडाउन के छह महीने बाद यानी 24 सितंबर तक देश में 57,30,184 लोग कोरोना से संक्रमित हो चुके हैं जबकि 91,173 लोगों की इससे मृत्यु हो चुकी है.
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"लॉकडाउन सिस्टम को मजबूत बनाने के लिए था"
लॉकडाउन कोरोना संक्रमण को फ़ैलने से रोकने के लिए लागू किया गया था. जब लॉकडाउन था तो मामले कम थे. अब जबकि भारत संक्रमण के मामलों में अमरीका के बाद दुनिया का सबसे बड़ा देश बन गया है तो इसके फैलाव को रोकने के लिए लॉकडाउन क्यों नहीं है?
डॉक्टर प्रीति कुमार कहती हैं, "लॉकडाउन आपने जब भी लगाया या नहीं लगाया, इसका महामारी पर बहुत ज़्यादा असर नहीं हुआ."
डॉक्टर प्रीति कुमार के अनुसार, लॉकडाउन का मक़सद ये कभी भी नहीं था कि आप महामारी के विस्तार को रोक सकें. लॉकडाउन का ख़ास मक़सद ये था कि आप अपने सिस्टम को कितनी जल्दी मज़बूत कर सकते हैं.

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संसद में महामारी की रोकथाम के लिए उठाये क़दमों पर चर्चा
30 जनवरी को केरल में भारत का पहला कोरोना संक्रमण केस सामने आया. उस समय भारत में कोरोना वायरस की जांच के लिए केवल एक लैब थी.
केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर हर्षवर्धन के मुताब़िक अब देश के पास 1,700 से अधिक टेस्टिंग लैब हैं. कोरोना वायरस उपचार सुविधाएँ जनवरी में एक भी नहीं थीं लेकिन अब 15,204 हैं. आज क्वॉरंटीन केंद्रों की संख्या 12826 है, जो जनवरी में एक भी नहीं थीं.
महामारी के छह महीनों बाद, पहली बार सरकार ने संसद का सत्र बुलाया है, जहां उसने अपनी नीतियों का बचाव किया. केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर हर्षवर्धन ने राज्यसभा में कहा, "सभी मुख्यमंत्रियों ने प्रधानमंत्री जी के साथ मिल कर सारे देश में इस लड़ाई को पूरी ईमानदारी और कर्तव्य परायणता के साथ लड़ा है."
लेकिन, विपक्ष का आरोप है कि लॉकडाउन बिना किसी योजना के लगाया गया था औक मोदी सरकार महामारी को रोकने में बुरी तरह से नाकाम रही है.
तृणमूल कांग्रेस के सांसद डेरेक ओब्रायन ने संसद में बहस के दौरान कहा, "ये दूसरी नोटबंदी थी. ये (लॉकडाउन) एक झटका था. चार घंटे के नोटिस पर 21 दिनों का लॉकडाउन. मेरा सरकार से ये सवाल है कि आपने 43 वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग की, कृपया उनकी तारीख़ें बताइए. क्या 26 मार्च से पहले एक भी वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग हुई थी?"
कांग्रेस पार्टी के सांसद आनंद शर्मा ने भी सरकार को इस बात के लिए आड़े हाथों लिया कि इसने अचानक लॉकडाउन लगाया जिसका बुरा असर प्रवासी मज़दूरों पर पड़ा. उन्होंने इस बात पर हैरानी जताई कि सरकार के पास प्रवासी मज़दूरों की हुई मौत के आंकड़ें नहीं हैं.
वहीं, सरकार ने अर्थव्यवस्था को एक नई ज़िंदगी देने और ग़रीबों की मदद के लिए दिए गए 20 लाख करोड़ रुपये के पैकेज की ओर विपक्ष का ध्यान दिलाया और कहा कि सरकार ने कई बड़े फ़ैसले लिए हैं जिनसे लोगों को राहत मिली है.

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वैक्सीन कब तक?
डॉ. हर्षवर्धन का कहना था कि कोरोना वायरस से बचाव का टीका अगले साल जनवरी तक उपलब्ध कराया जाएगा. स्वास्थ्य मंत्री का कहना था कि महामारी के ख़िलाफ़ जंग में सरकार की नीतियां सही हैं और उसमें कोई बदलाव की ज़रूरत नहीं है.
क्या महामारी के ख़िलाफ़ लड़ाई अलग तरीके से लड़ी जा सकती थी? क्या भारत को अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करने की ज़रूरत है? और यदि ऐसा है तो क्या होना चाहिए?
हेल्थ केयर की नीतियों की विशेषज्ञ डॉ. प्रीति कुमार का कहना है कि जब कोरोना महामारी ख़त्म हो जाएगी तब ही ये बताया जा सकता है कि सरकार को 24 मार्च की रात से पहले लॉकडाउन करना चाहिए था या इसे जिस समय लागू किया गया, वो सही था.
लेकिन, बढ़ते संक्रमण को लेकर कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि वो दिन दूर नहीं जब भारत अमरीका को पीछे छोड़, संक्रमण के मामले में पहले नंबर पर पहुंच जाएगा.
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