स्कूल फिर से खोले जाने पर क्या बोले शिक्षा मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक

रमेश पोखरियाल निशंक

केंद्र सरकार ने राज्यों को 21 सितंबर से आंशिक तौर पर स्कूल खोलने की इजाज़त दे दी है.

लेकिन स्कूल खोलने का आख़िरी फ़ैसला राज्यों पर छोड़ दिया गया है.

दिल्ली, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों ने अभी स्कूल खोलने से इनकार कर दिया है.

कर्नाटक, असम और हरियाणा लॉकडाउन के बाद आंशिक तौर पर स्कूल खोलने जा रहे हैं.

वहीं, कोरोना महामारी के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार नई शिक्षा नीति लेकर आई है.

बीबीसी संवाददाता सारिका सिंह ने इन सभी विषयों पर शिक्षा मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक से सवाल पूछे. उनसे बातचीत का एक अंश-

वीडियो कैप्शन, नीट, शिक्षा नीति और स्कूल-कॉलेज खोलने पर क्या बोले शिक्षा मंत्री?

सवाल- जेईई नीट के लेकर इतना विरोध हुआ, आंदोलन हुए, सोशल मीडिया पर इसके लिए हैशटैग चले. लेकिन सरकार क्यों नहीं मानी?

जवाब- कहा जा रहा था कि फ़ाइनल परीक्षा नहीं होनी चाहिए. क्यों नहीं होनी चाहिए? फ़ाइनल परीक्षा नहीं होगी तो जो डिग्री लेकर जाएगा तो भविष्य में उस पर ऐसा ठप्पा लगेगा कि वो कोरोना काल की डिग्री है. ये बिना परीक्षा की डिग्री है. अब बात जेईई और नीट की, एक वर्ष क्यों ख़राब करें हम बच्चों का. ये परिस्थितियां तो बहुत लंबी चलेंगी. हां, कुछ लोगों ने इसे लेकर राजनीति करने की कोशिश की. हम लोगों ने उनसे भी अनुरोध किया. कुछ लोग सुप्रीम कोर्ट तक भी गए. एक बार गए तो सुप्रीम कोर्ट ने उनकी याचिका को ख़ारिज कर दिया. दोबारा फिर रिव्यू में गए और कोर्ट ने साफ़-साफ़ कहा कि ये ठीक है कि ये संकट का समय है लेकिन ज़िंदगी ठहर तो नहीं जाएगी.

एक रिपोर्ट हमारे सामने आई जिसमें बिहार के ही छात्र है संतोष कुमार जो 24 घंटे का सफ़र करके परीक्षा केंद्र पहुंचे लेकिन 10 मिनट लेट पहुंचे. ऐसे छात्रों का भविष्य क्या होगा? एक और बात कही गई कि इन परीक्षाओं मे एक तबक़े का ही ध्यान रखा गया. बिहार असम जैसे राज्य को बच्चों का ध्यान नहीं रखा गया.

जवाब- ग़लत है. मैं सिरे से ख़ारिज कर रहा हूं आपकी इस बात को. ध्यान रखा गया और ये राज्यों का काम था. इसलिए मैं राज्यों के मुख्यमंत्रियों से निरंतर निवेदन कर रहा था. बच्चे तो उन्हीं के राज्यों के हैं. उदाहरण के लिए छुटपुट कोई हो सकता है लेकिन 99.99 फीसदी देश के अंदर अच्छा हुआ.

लेकिन शिक्षा मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक़ 8 लाख 58 हज़ार छात्र थे जिन्होंने एडमिट कार्ड डाउनलोड किया था लेकिन सिर्फ़ साढ़े 6 लाख के क़रीब आए परीक्षा देने. उन छात्रों का क्या होगा, संतोष कुमार जैसे छात्रों का क्या होगा?

जवाब- ये आपको समझना पड़ेगा कि जिन्होंने उस समय निवेदन किया होगा, इस बीच राज्यों की बहुत सारी परीक्षाएं हुईं जहां बच्चा निकल गया. तो बच्चा जो पढ़ रहा था, उसने देनी ही थी परीक्षाएं और जिस घटना की बात कर रही हैं आप, अगर इससे पीछे जाएं तो इससे ज़्यादा ही हुई होंगी ऐसी परिस्थितियां.

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एक सवाल ये भी उठ रहा है कि परीक्षाएं जल्दी करवाने से प्राइवेट प्लेयर्स को इससे फ़ायदा पहुंचा है.

जवाब- मुझे मालूम नहीं कि कौन क्या सोच रहा है. मैं सिर्फ़ ये सोचता हूं, मैं अपने बच्चे को देखता हूं, अपने देश को देखता हूं. और उनको ये जवाब मिला. 90 फीसदी बच्चे बैठे और उन्होंने परीक्षा दी.

बात कर लेते हैं शिक्षा नीति की. कई लोग कह रहे हैं कि नई शिक्षा नीति से शिक्षा का भारतीयकरण हो रहा है. एक बात ये उठ रही है कि इसका आरएसएस-करण होगा. क्या आरएसएस का एजेंडा लागू किया जा रहा है?

जवाब- कहां पर लागू है, वो बताइए ना. ये नैशनल व्यू है, इंटरनैशनल व्यू है. ये प्रभावी भी होगी और ये समावेशी भी होगी. किसी को कम समझ आ रहा होगा तो उसे दोबारा पढ़ना चाहिए. ये मेरा सुझाव है. ये शिक्षा नीति निश्चित रूप से भारत केंद्रित होगी लेकिन ये अंतरराष्ट्रीय स्तर के फ़लक तक पहुंचने वाली नीति है.

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लेकिन इसमें इंफ्रास्ट्रक्चर पर बात क्यों नहीं हुई? आज भी देश में कई ऐसे स्कूल हैं जहां बच्चे टिन की छत के नीचे पढ़ते हैं, पेड़ों के नीचे पढ़ते हैं. उसमें कई बीजेपी शासित राज्य भी हैं.

अपने अपने राज्यों में उनको भी चिंता है लेकिन आप पीछे के समय से देखें और आज के समय में देखें तो ज़मीन-आसमान का अंतर आपको नज़र आएगा. तो इसलिए राज्य और केंद्र मिलकर कहीं भी कोई खाई है, उसे तेज़ी से पाटेंगे. ये इस शिक्षा नीति में है.

एक सवाल ये भी हो रहा है कि राज्य कह रहे हैं कि उन पर हिंदी थोपी जा रही है.

किस राज्य ने बोला, मेरे सामने तो आप पहली हैं जो ऐसा बोल रही हैं. हां, ज़रूर पहले कुछ लोगों का था कि भाषा को थोपा नहीं जाना चाहिए. हमने थोपा ही नहीं. जो प्रारंभिक शिक्षा है, उसकी मातृ भाषा में हो और ऊपर तक जो राज्य लेकर जाना चाहता है, वो लेकर जाए. इसलिए हम 22 और भाषाओं को सशक्त करने के पक्षधर रहे हैं. कौन नहीं चाहेगा कि उसके प्रदेश की भाषा ज़िंदा रहे.

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मां-बाप ही चाहते हैं कि उनके बच्चे छोटे से ही अंग्रेज़ी बोलें, तो बहुत सारे मां-बाप ये नहीं चाहते होंगे कि उनके बच्चे शुरू से अंग्रेज़ी ना पढ़े.

आप लोगों ने हम लोगों ने एक परिवेश बना दिया ना. ऐसा माहौल बना दिया कि अंग्रेज़ी के बिना..अंग्रेज़ी का तो कहीं विरोध है ही नहीं. तो ये जो बोल रहे हैं, ज़रा दुनिया को देख कर बोलें तो ज़्यादा अच्छा है.

लेकिन ग्लोबल सिटिज़न बनेंगे क्या बच्चे?

क्यों नहीं बनेंगे!

कैसे बनेंगे?

मैं कह रहा हूं कि कौन रोक रहा है आपको? दो-तीन भाषा में मत रोको, उसको पूरा मैदान दिया है. पूरी दुनिया की भाषा सीखो ना.

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एक विवाद ये भी हो रहा है कि नई शिक्षा नीति के ज़रिए शिक्षा का कंट्रोल केंद्र सरकार अपने हाथों में लेने की कोशिश कर रही है.

अगर उच्चतर शिक्षा आयोग बनाया है, हमारा यूजीसी है, अलग-अलग शैक्षणिक आयोग है, उनको इकट्ठा करके हम एक छतरी के नीचे ला रहे हैं. लेकिन हमने इस शिक्षा नीति पर पूरी दुनिया की किसी भी शिक्षा नीति से बड़ा परामर्श हुआ है. तो कोई कह ही नहीं सकता कि उनको नहीं पूछा, उनके सुझाव नहीं हैं या राज़्यों की सहभागिता नहीं है.

नई शिक्षा नीति में कई बातें कही गई हैं, पौष्टिक खाने की, छात्रों की सुरक्षा की, यूनिवर्सल एक्सेस की, शिक्षकों की संख्या बढ़ाना, शिक्षा की गुणवत्ता की. जीडीपी का 6 फीसदी जो शिक्षा को बजट से मिलता है, क्या उसमें पूरा हो जाएगा?

देखिए, ये राज्य और केंद्र मिलकर करेंगे और अभी तो विभिन्न राज्यों का काफ़ी पीछे भी है. तो जब केंद्र और राज्य मिलकर के करेंगे तो अपने आप ही उठेगा ये.

छात्रों के ओवरऑल वैल बींग की बात हो रही है लेकिन उनकी बौद्धिक आज़ादी, बोलने की आज़ादी इसका अधिकार कैसे मिलेगा, इसको बढ़ोतरी कैसे मिलेगी?

मैदान तो खाली दे दिया उनको. उससे ज़्यादा क्या फ्रीडम चाहिए? आप किसी भी विषय को ले सकते हैं.

लेकिन अभिव्यक्ति की आज़ादी का क्या होगा?

आप छात्र से क्या अपेक्षा कर रहे हैं कि वो अच्छा पढ़े ना? अच्छा शोध करे ना. वो अच्छा शोध-अनुसंधान कर रहा है तो बताए दुनिया के लोगों को. उसके लिए ही तो ये सब कुछ हो रहा है कि वो पढ़ें और बताएं, दिखाएं. वो भाषण ना दें.

क्या भाषण का अधिकार उन्हें नहीं मिलेगा?

भाषण की बात नहीं कर रहा हूं...विषय पर...आप वहां पर मत लेकर जाइए इस बात को. जहां तक शिक्षा की बात आप कर रही हैं. क्यों नहीं देते, हम तो प्रतियोगिता करवाते हैं भाषणों की अपने बच्चों को.

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सबसे बड़ा सवाल जो लोगों का है, स्कूलों को लेकर. उस पर क्या हो रहा है? क्या तैयारी हो रही है स्कूलों को खोलने की?

जैसा मैंने कहा कि पहली प्राथमिकता बच्चों की सुरक्षा है.

लेकिन इन 25 करोड़ बच्चों को स्कूल में ले आना, क्या तैयार है भारत का शिक्षा मंत्रालय?

जैसी-जैसी स्थितियां होंगी, वैसी-वैसी स्थितियों में हम लोग निर्णय ले भी रहे हैं. हमारा गृह मंत्रालय, स्वास्थ्य मंत्रालय दोनों की मदद से हम लोग धीरे-धीरे करके जैसे-जैसे स्थितियां सामान्य होंगी वैसे-वैसे निर्णय लेगी सरकार.

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लेकिन चीन जैसे देश में, जहां वुहान में कोरोना शुरू हुआ, वहां लाखों छात्रों को वे वापस स्कूल ले आएं हैं. भारत में ये कब मुमकिन हो पाएगा?

बताया ना कि बच्चों की सुरक्षा हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण है. अभी हम परीक्षाओं से निकल रहे हैं. जो लोग ये कहते थे कि हो ही नहीं सकता है, उन्होंने देखा ना कि हमने किया है. ऐसा भी नहीं है कि बच्चे घर में बैठे हैं, उनको पढ़ा रहे हैं हम. जैसे-जैसे स्थितियां सामान्य होंगी..हम निर्णय लेंगे.

अगर स्थिति सामान्य नहीं हुई तो क्या ये आश्वासन दिया जाएगा कि बच्चों का साल बर्बाद नहीं होगा?

बच्चे का साल तो हम बर्बाद कर ही नहीं रहे हैं. हमने तो ताक़त के साथ किया ना, उसका प्रमाण भी दिया. हम बच्चे के भविष्य को प्राथमिकता देते हैं और उसकी सुरक्षा को. हमने साल कहां बर्बाद होने दिया?

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