दिल्ली दंगे: पुलिस ने दाख़िल की चार्जशीट, 15 लोग अभियुक्त

दिल्ली दंगें (2020)

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दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने इस साल फ़रवरी में दिल्ली के उत्तर-पूर्वी इलाक़े में हुए दंगों के मामले में अदालत में चार्जशीट दाख़िल कर दी है.

फ़रवरी के आख़िरी हफ़्ते में हुए दंगों में दिल्ली पुलिस के अनुसार आधिकारिक तौर पर 53 लोग मारे गए थे.

13 जुलाई को दिल्ली हाईकोर्ट में दायर दिल्ली पुलिस के हलफ़नामे के मुताबिक़, मारे गए लोगों में से 40 मुसलमान और 12 हिंदू थे. एक व्यक्ति की पहचान नहीं हो पाई थी.

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समाचार एजेंसी एएनआई के अनुसार बुधवार को पुलिस ने कड़कड़डूमा कोर्ट में तक़रीबन 10 हज़ार से ज़्यादा पन्नों की चार्जशीट दाख़िल की है.

इस मामले में पुलिस ने 15 लोगों को अभियुक्त बनाया है. उनपर यूएपीए, आईपीसी और आर्म्स एक्ट के तहत कई धारा लगाए गए थे.

एएनआई के मुताबिक़ जिन 15 लोगों के ख़िलाफ़ फ़िलहाल चार्जशीट दाख़िल की गई है उसमें जेएनयू के पूर्व छात्र उमर ख़ालिद और मौजूदा छात्र शरजील इमाम के नाम शामिल नहीं हैं.

दिल्ली दंगें (2020)

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दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने रविवार रात को उमर ख़ालिद को गिरफ़्तार किया था. पुलिस के अनुसार उमर ख़ालिद पर दिल्ली दंगों के लिए साज़िश रचने का आरोप है.

दिल्ली की एक अदालत ने उमर ख़ालिद को 10 दिनों की पुलिस रिमांड पर भेज दिया है.

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शरजील इमाम को पहले भड़काऊ भाषण देने के आरोप में गिरफ़्तार किया गया था. लेकिन बाद में दिल्ली पुलिस ने दिल्ली दंगों के साज़िशकर्ताओं में उनका नाम भी जोड़ दिया.

दिल्ली दंगें (2020)

अब तक दिल्ली पुलिस ने दंगों से जुड़ी कुल 751 प्राथमिकियाँ दर्ज की हैं. पुलिस ने दिल्ली दंगों से जुड़े दस्तावेज़ों को सार्वजनिक करने से इनकार कर दिया है.

पुलिस का तर्क है कि कई जानकारियां 'संवेदनशील' हैं इसलिए उन्हें वेबसाइट पर अपलोड नहीं किया जा सकता है. दिल्ली पुलिस ने सीपीआई (एम) की नेता वृंदा करात की हाईकोर्ट में दायर याचिका के जवाब में 16 जून को ये बात कही थी.

इनमें से सबसे अहम हैं एफ़आईआर 59, एफ़आईआर 65, एफ़आईआर 101 और एफ़आईआर 60. इनके साथ ही दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने जून महीने की शुरूआत में दंगों के पीछे की 'क्रोनोलॉजी' भी कड़कड़डूमा कोर्ट में पेश की है.

एफ़आईआर 59 में ग़ैर-कानूनी गतिविधि नियंत्रण कानून (यूएपीए) की धाराएँ लगाई गई हैं जो मोटे तौर पर आतंकवाद के मामलों में लगाई जाती हैं.

यूएपीए के प्रावधानों के तहत जाँच एजेंसियाँ लोगों को बिना मुक़दमा चलाए लंबे समय तक हिरासत में रख सकती हैं.

FIR-59: छात्र नेताओं पर UAPA

इस मामले में दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच का कहना है कि दंगों के पीछे एक गहरी साज़िश थी. ये एफ़आईआर इसी कथित साज़िश के बारे में है.

दंगों की ये ऐसी एफ़आईआर है जिसमें अनलॉफ़ुल एक्टिविटी प्रिवेंशन एक्ट (UAPA) की धाराएं लगाई गई हैं. इस एफ़आईआर में उन छात्र नेताओं के नाम शामिल हैं जो दिल्ली में सीएए के खिलाफ़ प्रदर्शनों में आगे-आगे दिख रहे थे.

6 मार्च 2020 को दर्ज हुई इस मूल एफ़आईआर में सिर्फ़ दो लोगों- जेएनयू के पूर्व छात्र नेता उमर ख़ालिद और पॉपुलर फ़्रंट ऑफ़ इंडिया (पीएफ़आई) से जुड़े दानिश के नाम हैं.

पीएफ़आई खुद को समाजसेवी संस्था बताती है लेकिन उस पर केरल में जबरन धर्म परिवर्तन और मुसलमानों के बीच कट्टरपंथ को बढ़ावा देने का आरोप लगता रहा है.

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एफ़आईआर-59 के आधार पर अब तक 15 लोगों को गिरफ़्तार किया गया है. जिनमें से सफ़ूरा ज़रगर, मोहम्मद दानिश, परवेज़ और इलियास इस समय ज़मानत पर रिहा हैं. बाक़ी 10 लोग अब भी न्यायिक हिरासत में हैं.

ख़ास बात ये है कि इनमें से ज़्यादातर लोगों को शुरूआत में दिल्ली दंगों से जुड़ी अलग-अलग एफ़आईआर में गिरफ़्तार किया गया लेकिन जैसे ही उन मामलों में उन्हें ज़मानत मिली या मिलने की संभावना बनी, इनका नाम एफ़आईआर संख्या 59 में जोड़ दिया गया और इस तरह इन लोगों पर यूएपीए की धाराएँ लग गईं.

मूल एफ़आईआर 59 में सबसे पहला नाम जेएनयू के छात्र रहे 'यूनाइटेड अगेंस्ट हेट' के सह-संस्थापक उमर ख़ालिद का है.

मूल एफ़आईआर की कॉपी में आईपीसी की धाराएँ---147 (दंगे भड़काने), 148 (दंगे में घातक हथियारों का इस्तेमाल), 149 (ग़ैर-कानूनी तरीक़े से सभा करना) 120B (आपराधिक षड्यंत्र)--लगाई गई थीं. ये सभी धाराएँ ज़मानती हैं.

इस मामले में मोहम्मद दानिश सहित तीन पीएफ़आई सदस्यों की गिरफ़्तारी हुई थी जिन्हें 13 मार्च को मेट्रोपॉलिटन मस्जिट्रेट की अदालत से ज़मानत इस शर्त के साथ मिली कि वे देश से बाहर नहीं जाएँगे. इस केस को क्राइम ब्रांच ने दर्ज किया था लेकिन कुछ दिन बाद ही साज़िश के केस की जांच दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल को ट्रांसफ़र कर दी गई.

स्पेशल सेल

दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल साज़िश, आतंकवादी गतिविधि जैसे जटिल मामलों की जाँच करती है. दिल्ली पुलिस केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन काम करती है.

15 मार्च को इस केस में 302 (हत्या), 307 (हत्या की कोशिश), 124A (राजद्रोह) जैसी ग़ैर-ज़मानती धाराएं जोड़ी गईं. इसके अलावा 154A (गैर कानूनी सभा), 186 (किसी सरकारी कर्मचारी के काम में बाधा डालना), 353, 395 (डकैती), 435 (आगज़नी या धमाके से नुकसान पहुंचाना), सार्वजनिक संपत्ति नुक़सान निवारण अधिनियम के सेक्शन 3, 4 और आर्म्स एक्ट के सेक्शन 25 और 27 भी एफ़आईआर में जोड़ी गईं.

19 अप्रैल को इस केस में बेहद सख़्त एक्ट यूएपीए का सेक्शन 13 (ग़ैर-क़ानूनी गतिविधि की सज़ा), 16 (आतंकवादी गतिविधि की सज़ा), 17 (आतंकवादी गतिविधि के लिए फ़ंड जुटाने की सज़ा) और 18 (साज़िश रचने की सज़ा) जोड़ा गया.

आम तौर पर किसी भी एफ़आईआर में 90 दिनों की अवधि में आरोपपत्र दाख़िल करना होता है लेकिन एफ़आईआर 59 में स्पेशल सेल ने यूएपीए 43D (2) का इस्तेमाल करके 17 सितंबर तक का वक़्त माँगा था.

लेकिन सेशन जज धर्मेंद्र राणा की कोर्ट ने 14 अगस्त तक का ही समय दिया यानी पुलिस को इस मामले में आरोप पत्र तैयार करने के लिए 120 दिन का वक़्त दिया गया था.

लेकिन फिर 13 अगस्त को कोर्ट ने चार्जशीट दायर करने की अवधि बढ़ाकर 17 सितंबर कर दी थी.

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