भीमा कोरेगांव हिंसा: कोरोना पर रिसर्च करने वाले प्रो. पार्थो सारथी को NIA का समन

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- Author, कीर्ति दुबे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भीमा कोरेगांव- एल्गार परिषद केस में एनआईए ने भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान, कोलकाता के असोसिएट प्रोफ़ेसर पार्थो सारथी रॉय को समन किया है. उन्हें एनआईए के सामने 10 सितंबर को हाज़िर होने को कहा गया था, लेकिन वे हाज़िर नहीं हो सके.
पार्थो सारथी वॉयरोलॉजी वैज्ञानिक (विषाणुओं पर शोध करने वाले) हैं. उन्होंने मॉलिक्यूलर बॉयोलॉजी में पीएचडी की है. वह उन वैज्ञानिकों में शमिल थे जो वुहान में कोरोना वायरस के केस सामने आने पर विश्व स्वास्थ्य संगठन के साथ इस वायरस के बारे में शोध कर रहे थे.
बीबीसी से बात करते हुए पार्थो सारथी रॉय ने बताया, ''मुझे एनआईए की ओर से एक मेल मिला जिसमें कहा गया कि ऐसा लगता है कि एल्गार परिषद केस में जो कुछ हुआ आप उससे परिचित हैं और इसलिए आपको पूछताछ के लिए बुलाया जा रहा है.''
''मैंने जवाब दे दिया है कि मैं इस कोरोना महामारी से जुड़ी एक ट्रायल का हिस्सा हूं ऐसे में मैं अभी मुंबई नहीं आ सकता लेकिन मैंने ये कहा है कि वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग के लिए मैं तैयार हूं. इसका मुझे कोई जवाब नहीं मिला है. ''
इस समन को लेकर 1000 से ज्यादा वैज्ञानिकों, शिक्षाविदों और बुद्धिजीवियों ने एक बयान जारी करते हुए इसे सरकार की आलोचना करने वालों की आवाज़ दबाने की निरंतर कोशिश बताया है.
बयान में कहा गया है कि ज़्यादातर लोग जिन्हें गिरफ़्तार किया गया है वो एल्गार परिषद के आयोजन में उपस्थित भी नहीं थे. यह लगभग असंभव है कि सरकार इस मामले में उन्हें दोषी ठहरा पाएगी.
बयान के मुताबिक़ जो लोग भीमा कोरेगांव में हुई हिस्सा के लिए मुख्य रूप ज़िम्मेदार हैं वो उनके ख़िलाफ़ जांच करने के बजाय एनआईए एल्गार परिषद के आयोजन पर फ़ोकस कर रही है जो कि एक सांस्कृतिक और राजनितिक आयोजन था.
मानवाधिकारों और लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए काम करने वाली पश्चिम बंगाल की संस्था एसोसिएशन फ़ॉर प्रोटेक्शन ऑफ़ डेमोक्रेटिक राइट ने 10 सितंबर को एनआईए के इस समन के खिलाफ़ कोलकाता में प्रदर्शन रैली निकाली.
इस संस्था के सदस्य रंजीत सुर ने बीबीसी से बातचीत में बताया, ''हमने पार्थो सारथी रॉय के पक्ष में रैली निकाली थी. उन्हें मुंबई बुलाया गया है, वह एक वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग के लिए उपलब्ध हैं लेकिन अभी मुंबई नहीं जा सकते क्योंकि वह अभी कोविड-19 से जुड़े एक शोध क हिस्सा हैं. ''
उन्होंने कहा, ''प्रोफ़ेसर रॉय हमेशा ही सरकार की नीतियों के आलोचक रहे हैं, वह खुल के अपनी बात सीएए, एनआरसी, ल़कडाउन पर रखते रहे हैं. वह सरकारों की कोरोना वायरस की कम टेस्टिंग पर भी लगातार सवाल उठाते रहे हैं. अब जब बंगाल में चुनाव होने वाले हैं तो केंद्र सरकार अपनी एजेंसियों से आचोलकों को डरा रही है, ताकि हम अपनी बात कहने से डरें. ''
पार्थो सारथी रॉय हैं कौन?
पार्थो सारथी रॉय भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान, कोलकाता के एसोसिएट प्रोफ़ेसर हैं. वो कोरोना वैक्सीन के ट्रायल का हिस्सा हैं. वैज्ञानिक होने के साथ-साथ पार्थो मानवाधिकार, आदिवासियों के अधिकार और राजनितिक बंदियों को न्याय दिलाने के लिए भी काम करते हैं.
पार्थो सारथी ने हाल ही में केंद्र सरकार के लॉकडाउन की आलोचना करते हुए कहा था कि इस देश को लॉकडाउन नहीं बल्कि ज़्यादा टेस्टिंग की ज़रूरत है.
साल 2012 में पार्थो सारथी रॉय को पश्चिम बंगाल सरकार ने कोलकाता की झुग्गियों से बेदखल किए जा रहे लोगों के लिए प्रदर्शन करने के आरोप में गिरफ्तार किया था हालांकि उन्हें 12 दिनों बाद ही रिहा कर दिया गया.

भीमा-कोरेगांव में कौन-कौन जेल में हैं?
31 दिसंबर,2017 को पुणे के शनिवारवाड़ा में एल्गार परिषद की बैठक हुई थी, जिसमें प्रकाश आंबेडकर, जिगेनेश मेवाणी, उमर ख़ालिद, सोनी सोरी जैसे लोगों ने हिस्सा लिया. इसके बाद 1 जनवरी 2018 को पुणे के भीमा कोरगाँव में हिंसा हुई.
ईस्ट इंडिया कंपनी और मराठाओं के बीच हुई लड़ाई में कंपनी की तरफ़ से दलितों ने ये लड़ाई लड़ी थी और इस दिन को दलित शौर्य दिवस की तरह मनाते हैं. लेकिन जब समारोह का आयोजन किया गया थो तो हिंसा भड़क गई.
पुलिस ने भीमा कोरेगांव की हिंसा के मामले में दो चार्जशीट दाखिल की है क्योंकि गिरफ़्तारियाँ दो अलग-अलग समय पर हुई थीं. पुलिस का कहना है कि उसने गिरफ़्तार लोगों से बरामद हुई हार्डडिस्क, पेन ड्राइव, मेमोरी कार्ड और मोबाइल फोन से मिली जानकारियों के आधार पर चार्जशीट बनाई है.

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इस वक़्त सुधीर धावले, सुरेंद्र गाडलिंग, रोना विल्सन, शोमा सेन, महेश राउत, वरवर राव, वरनॉन गोंज़ाल्विस, अरूण फरेरा, सुधा भारद्वाज, गौतम नवलखा, आनंद तेलतुंबडे और हनी बाबू एमटी जेल में हैं.
इसके बाद एनआईए ने आठ सितंबर को कबीर कला मंच से जुड़े तीन लोगों 32 साल के सागर तात्याराम गोरखे, 36 साल के रमेश गायचोर और 33 साल की ज्योति जगतप को इस केस में गिरफ़्तार किया है.
ये सभी लोग सामाजिक कार्यकर्ता, दलित-आदिवासी अधिकारों के लिए काम करने वाले और केंद्र सरकार के आलोचक हैं.
इन पर आरोप है कि इन लोगों ने 'सीपीआई माओवादी' के कहने पर एक कार्यक्रम का आयोजन किया. इस कार्यक्रम का उद्देश्य भीमा कोरेगांव की लड़ाई की 200वीं वर्षगांठ के मौके पर दलित संगठनों को एकजुट करके सरकार के ख़िलाफ़ जनता के गुस्से को भड़काना था.
इन लोगों पर राजद्रोह और यूएपीए की धाराएं लगाई गई हैं. यूएपीए एक एक कानून है जिसमें ज़मानत मिलने की गुंजाइश लगभग ना के बराबर होती है.
महाराष्ट्र में सरकार बदलते ही केस में NIA की एंट्री
पुणे के विश्रामबाग पुलिस स्टेशन में एफ़आईआर दर्ज होने के बाद अगले कुछ महीनों में पुणे पुलिस ने 23 में से 9 अभियुक्तों को गिरफ़्तार किया. पुणे पुलिस ने इस मामले में चार्जशीट भी दायर कर दी, उसके बाद 21 फ़रवरी 2019 को एक पूरक चार्जशीट भी फ़ाइल की गई.
एनआईए ने 24 जनवरी, 2020 को इस मामले में एफ़आईआर दर्ज की है जिसमें आईपीसी की धारा- 153A, 505(1)(B), 117 और 34 लगाई गई है. इसके साथ ही यूएपीए का 13,16,18,18B, 20, 39 सेक्शन भी जोड़ा गया है.
जब केस एनआईए को सौंपा गया तो इस दौरान महाराष्ट्र में बीजेपी और शिवसेना की साझा सरकार थी. अक्तूबर 2019 में बीजेपी राज्य की सत्ता से बाहर हो गई. शिव सेना, कांग्रेस और एनसीपी की गठबंधन सरकार सत्ता में आई.
22 दिसंबर 2019 को नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद पवार ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि पुणे पुलिस की 'एल्गार परिषद' मामले की जाँच संदेहास्पद है.
उन्होंने कहा, "कार्यकर्ताओं को राजद्रोह के आरोप में जेल में डालना गलत है. लोकतंत्र में हर तरह के विचारों को अभिव्यक्त करने की स्वतंत्रता है. पुणे पुलिस की कार्रवाई गलत और प्रतिशोध की भावना से प्रेरित है. कुछ अफ़सरों ने अधिकारों का दुरुपयोग किया है." इस बयान के बाद विवाद छिड़ गया.
इसके कुछ ही दिनों के बाद जनवरी 2020 में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने मामला पुणे पुलिस से लेकर नेशनल इन्वेस्टिगेटिव एजेंसी (एनाईए) को सौंपने का निर्देश दिया.
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