चीन से तनाव पीएम मोदी के एक सपने पर पड़ रहा भारी

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    • Author, निखिल इनामदार
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, मुंबई

वैश्विक महामारी के असर से जूझ रहे भारतीय स्टार्टअप्स को एक नई चुनौती से दो-चार होना पड़ रहा है. प्रधानमंत्री मोदी स्टार्टअप्स को लेकर बहुत मुखर रहे हैं और इसके लिए स्टार्टअप इंडिया जैसा अभियान भी लॉन्च किया था.

यह चुनौती भारत और चीन के बीच जारी गतिरोध के रूप में सामने आई है.

जून से ही भारत आर्थिक रूप से हमलावर की मुद्रा में रहा है. उस वक़्त लद्दाख इलाक़े में चीन और भारतीय सेना के बीच हुए टकराव में 20 भारतीय सैनिकों की मौत हो गई थी.

तब से दोनों ही पक्ष सीमाई समझौतों को तोड़ने के लिए एक-दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं. दोनों देशों के बीच तनाव लगातार बढ़ रहा है.

चीन की कंपनियां भारत की 30 यूनिकॉर्न्स में से 18 में पहले ही निवेश कर चुकी हैं. यूनिकॉर्न ऐसी टेक्नोलॉजी कंपनियों को कहते हैं जिनकी वैल्यूएशन एक अरब डॉलर से ज्यादा है.

चीन के निवेश वाली इन कंपनियों में फूड डिलिवरी एप्स, एक टैक्सी एग्रीगेटर, एक होटल चेन और ई-लर्निंग प्रोग्राम बनाने वाली एक कंपनी शामिल है.

लेकिन, अब इन कंपनियों और आगे चलकर चीनी कंपनियों से पैसा हासिल करने की उम्मीद कर रहे स्टार्टअप्स का भविष्य अनिश्चित हो गया है.

एक प्राइवेट इक्विटी फर्म ट्रू नॉर्थ के पार्टनर हरीश चावला कहते हैं, "निश्चित तौर पर पूंजी का एक बड़ा जरिया ख़त्म हो गया है."

"अब यहां वैल्यूएशन में ग्रोथ थमने और डील्स की रफ्तार सुस्त पड़ने के आसार हैं क्योंकि चीनी कंपनियां ख़ासतौर पर मोबाइल और कंज्यूमर सेगमेंट में काफ़ी सक्रिय थीं."

भारत पहले ही 200 से ज्यादा चीनी ऐप्स पर बैन लगा चुका है. इनमें बेहद लोकप्रिय टिकटॉक और पबजी जैसे ऐप्स भी शामिल हैं. इसके अलावा भारत सरकार ने हाइवे प्रोजेक्ट्स और छोटी, मंझोली कंपनियों में चीनी निवेश को भी रोक दिया है. चीन के बहिष्कार का नारा ज़ोर पकड़ रहा है.

अप्रैल में भारत ने महामारी के दौरान जबरदस्ती कंपनियों के टेकओवर को रोकने के लिए एक सख्त फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट (एफडीआई) नीति पेश की थी.

इसका तगड़ा असर पूंजी हासिल करने के लिए कोशिशें कर रहे भारत के स्टार्टअप्स पर पड़ा है.

एक दशक पहले चीनी कंपनियों का भारत में निवेश ना के बराबर था. लेकिन, स्टार्टअप रिसर्च फर्म ट्रैक्सन के आँकड़े बताते हैं कि 35 चीनी कंपनियों और 85 वेंचर कैपिटल (वीसी) और प्राइवेट इक्विटी (पीई) फर्मों ने 2010 से पेटीएम, स्नैपडील और स्विगी समेत कई बड़े स्टार्टअप्स में 4 अरब डॉलर से ज्यादा का निवेश किया है.

इस दौरान प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) में हिस्सेदारी के तौर पर भारत में चीन का निवेश पाँच फ़ीसदी से बढ़कर 11 फ़ीसदी पर पहुंच गया है.

चीन की कई कंपनियों ने भारतीय स्टार्टअप कंपनियों में निवेश कर रखा है

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भारत ने भले ही चीन की बेल्ट एंड रोड मुहिम में शामिल होने से इनकार कर दिया है, लेकिन भारत ने बेइरादा ही वर्चुअल कॉरिडोर पर दस्तखत कर दिए हैं.

चावला कहते हैं, "अर्ली-स्टेज इनवेस्टमेंट्स पर इसका कोई बड़ा असर होने की आशंका कम ही है."

चावला के मुताबिक़, असली दिक्क़त उन कंपनियों को होगी जो पहले ही अलीबाबा, टेनसेंट और बाइडू जैसी कंपनियों से पैसा जुटा चुके हैं. साथ ही ऐसी कंपनियों को भी मुश्किल होगी जो कि चीनी कंपनियों से और ज्यादा पैसा जुटाने की कोशिश कर रही थीं.

माना जा रहा है कि अलीबाबा ने भारतीय कंपनियों में निवेश की सभी योजनाओं को होल्ड पर डाल दिया है.

अलीबाबा के निवेश वाली एक यूनिकॉर्न के फाउंडर ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, "वे निश्चित तौर पर भारत के उठाए गए क़दम से आश्चर्य में हैं, लेकिन उनके पास ज्यादा विकल्प नहीं हैं."

जैक मा

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बीबीसी ने कई यूनिकॉर्न से इस बाबत संपर्क साधने की कोशिश की. इनमें पेटीएम, बिगबास्केट और स्नैपडील जैसी कंपनियां शामिल हैं, लेकिन मामले की गंभीरता को देखते हुए इनमें से किसी ने भी ऑन-रिकॉर्ड बात करने से इनकार कर दिया.

इंडस्ट्री से जुड़े हुए लोगों का कहना है कि सरकार का मकसद चीन से आने वाली फंडिंग को रोकना नहीं है. इसकी बजाय सरकार चीनी कंपनियों के लिए भारत के टेक स्पेस में इक्विटी लेने या अपनी मौजूदगी को मजबूत करने को आसान नहीं रखना चाहती है.

शिव नादर यूनिवर्सिटी के इंटरनेशनल रिलेशंस के प्रोफेसर जैबिन टी जैकब कहते हैं, "सरकार पूरी तरह से बैन नहीं लगाएगी. सरकार रेगुलेशंस को लेकर अनिश्चितता का एक माहौल पैदा करेगी ताकि स्टार्टअप्स के लिए एक बिंदु के आगे चीनी निवेश को लेना बेहद मुश्किल हो जाए."

एक्सपर्ट्स का यह भी कहना है कि मौजूदा निवेश से बाहर निकलने की बजाय सरकार का फोकस भारत के 5जी ट्रायल्स के वक्त पर ख़्वावे जैसे टेलीकॉम दिग्गजों को इससे दूर रखने पर होगा.

यह स्पष्ट नहीं है कि चीनी कंपनियों के निवेश की अधिकतम सीमा क्या होगी, लेकिन बिना सरकारी मंजूरी के किसी एक समूह का स्वामित्व 10 फ़ीसदी से ज़्यादा होना और किसी वेंचर कैपिटल फर्म का मालिकाना हक 25 फ़ीसदी से ज्यादा होना शायद ही मुमकिन हो.

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तो भारतीय स्टार्टअप्स को पूंजी कहां से मिलेगी?

चीनी इन्वेस्टर्स का भारत में प्रतिनिधित्व करने वाली एक लॉ फर्म के पार्टनर अतुल पांडेय कहते हैं, "चीनी कंपनियों की बड़े पैमाने पर मौजूदगी को देखते हुए दूसरी जगहों से वैकल्पिक फंड्स के तत्काल इंतजाम के आसार कम ही हैं."

वे कहते हैं कि उनके पास चीनी निवेशकों के 12 से 14 आवेदन हैं, जो वैसे ऑटोमैटिक रूप से स्वीकृत हो जाते, मगर अब एप्रूवल के लिए लंबित पड़े हैं.

वे कहते हैं, "सरकार इन प्रस्तावों पर क्या फैसला करती है इससे नए निवेश को लेकर उनकी एप्रोच साफ हो जाएगी."

दोनों देशों के बीच जारी तनाव से पहले ही अनिश्चितता बढ़ गई है. निवेश समझौते कराने वालों का कहना है कि जहां चीनी निवेशक होते हैं वहां पश्चिमी देशों के मुकाबले फंडिंग जल्दी पूरी हो जाती है.

भारत चीन सीमा विवाद

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भारतीय स्टार्टअप्स चीनी बाजार के मोबाइल फर्स्ट ट्रेंड से सबक लेने की कोशिश कर रहे हैं ताकि वे भी इसी रास्ते पर आगे बढ़ सकें.

ऐसे में चीन की टेक्नोलॉजी सेक्टर की दिग्गज कंपनियों को अचानक से हटा देने से कई कंपनियां सकते में आ गई हैं.

एक्सपर्ट्स का कहना है कि भले ही चीनी निवेश न रहे, लेकिन दुनिया के दूसरे हिस्सों के स्ट्रैटेजिक इनवेस्टर्स कोविड-19 के दौर के बाद वापस लौटेंगे.

इनका कहना है कि भारत अभी भी इंटरनेट कंपनियों के लिए सबसे बड़ा बाजार है.

कोरोना वायरस लॉकडाउन के दौर में भारत ने गूगल और फेसबुक जैसी सिलिकॉन वैली कंपनियों और एआईडीए, केकेआर और जनरल अटलांटिक जैसी ग्लोबल प्राइवेट इक्विटी फर्मों से करीब 20 अरब डॉलर की विदेशी पूंजी जुटाई है.

लेकिन, इसमें से ज्यादातर पैसा मुकेश अंबानी के जियो प्लेटफॉर्म्स में लगाया गया है.

ऐसे में भारत को चीन के खाली छोड़े गए स्थान को भरने के लिए डोमेस्टिक कैपिटल तैयार करने की जरूरत पड़ सकती है.

भारत में बढ़ता टेक मार्केट

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एक प्राइवेट इक्विटी फर्म के मैनेजिंग डायरेक्टर गोपाल जैन ने एक स्थानीय टीवी चैनल को बताया कि अनुमानों से पता चल रहा है कि भारतीय प्राइवेट इक्विटी और वेंचर कैपिटल फर्में चिंताजनक स्तर तक विदेशी पूंजी पर निर्भर हैं. इनके फंड्स में भारतीय पूंजी की हिस्सेदारी महज 5 फीसदी है.

वे कहते हैं कि कोविड-19 के दौर में जब पूंजी की कमी होगी, यह हिस्सेदारी बढ़ाकर 30 से 40 फीसदी करनी होगी.

इससे तय होगा कि क्या भारत चीनी निवेश के बिना अगली 30 यूनिकॉर्न खड़ी कर पाएगा या नहीं.

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