जस्टिस अरुण मिश्रा: मोदी की सराहना से लेकर प्रशांत भूषण पर जुर्माने तक

इमेज स्रोत, Supreme Court Of India
- Author, सलमान रावी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
सुप्रीम कोर्ट की एक खंडपीठ ने जाने-माने वकील प्रशांत भूषण को न्यायालय की अवमानना मामले में दोषी ठहराते हुए उन पर एक रुपए का जुर्माना लगाया है.
इस तीन सदस्यीय खंडपीठ की अध्यक्षता जस्टिस अरुण कुमार मिश्रा कर रहे थे, जबकि इसमें जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस कृष्ण मुरारी भी शामिल थे. जस्टिस मिश्रा 2 सितंबर को रिटायर हो रहे हैं.
मध्य प्रदेश के जबलपुर के रहने वाले जस्टिस अरुण कुमार मिश्रा ने विज्ञान में एमए की डिग्री लेने के बाद क़ानून की पढ़ाई इसलिए की, क्योंकि उनकी स्वाभाविक रुचि इसमें थी.
उनके पिता हरगोविंद मिश्रा जबलपुर हाई कोर्ट के जज थे, जबकि उनके परिवार में कई रिश्तेदार नामी वकील हैं.
ख़ुद उनकी बेटी भी दिल्ली हाई कोर्ट की वकील हैं. लगभग 21 सालों तक वकालत करते रहने के बावजूद उन्होंने क़ानून पढ़ाने का काम भी किया और मध्य प्रदेश में ग्वालियर के जीवाजी विश्वविद्यालय से जुड़े रहे.
कब बने जज

इमेज स्रोत, STR
सबसे पहले वर्ष 1999 में उन्हें मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के अतिरिक्त जज के रूप में नियुक्त किया गया. फिर जब उनकी नियुक्ति परमानेंट हुई, तो वर्ष 2010 में उनका तबादला राजस्थान हाई कोर्ट में कर दिया गया.
उसी साल वो राजस्थान हाई कोर्ट के कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश भी बने और उसी वर्ष उन्हें पूर्णकालिक मुख्य न्यायाधीश भी नियुक्त कर दिया गया.
वर्ष 2012 में वो कोलकाता हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बन गए थे. लेकिन सुप्रीम कोर्ट में उनकी नियुक्ति लंबित रही, क्योंकि तीन बार ऐसे मौक़े आए, जब उन्हें नियुक्त किया जाना था. लेकिन ऐसा नहीं हो पाया और आख़िरकार वर्ष 2014 में उन्हें सुप्रीम कोर्ट का जज बनाया गया.
ये भी पढ़ें: प्रशांत भूषण ने कहा, मैं एक रुपये का जुर्माना भरूँगा
वर्ष 2018 की है, जब सुप्रीम कोर्ट के चार जजों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर सुप्रीम कोर्ट में चल रही व्यवस्था की आलोचना की थी.
इनमें पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रंजन गोगोई के अलावा, जस्टिस मदन बी लोकुर, जस्टिस कुरियन जोज़फ़ और जस्टिस चेलमेश्वर शामिल थे, जिन्होंने आरोप लगाया था कि अहम मामलों को ख़ास जजों की बेंच में लिस्ट किया जा रहा है.
न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा इस प्रेस कॉन्फ्रेंस से इतना आहत हुए थे कि तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा को उन्हें समझाने में काफ़ी मशक्क़त करनी पड़ी थी. हालांकि न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा का नाम उन जजों ने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में नहीं लिया था, लेकिन उन्होंने सार्वजनिक तौर पर इस तरह से जजों के प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाने को ग़लत बताया था.
विवादों में घिरे रहे

इमेज स्रोत, The India Today Group
राजनीतिक महत्व या दूसरे महत्वपूर्ण मामलों को 'कनिष्ठ जजों' को सौंपा जा रहा है, सुप्रीम कोर्ट के कई जजों के इन आरोपों के बाद जस्टिस अरुण मिश्रा ने अपनी अदालत में मौजूद लोगों को कहा था कि वो 'कनिष्ठ जज हैं इसलिए कम ही लोग उनकी अदालत में आएँ.' इसको लेकर भी काफ़ी विवाद हुआ.
ये विवाद तब हुआ, जब वरीयता की सूची में 10वें स्थान पर मौजूद जस्टिस अरुण कुमार मिश्रा की खंडपीठ के सामने सबसे संवेदनशील न्यायमूर्ति बीएच लोया की हत्या का मामला 'लिस्ट' किया गया.
जस्टिस लोया गुजरात के सोहराबुद्दीन 'एनकाउंटर' केस की सुनवाई कर रहे थे. विरोध कर रहे इन चारों वरीय जजों का भी यही आरोप था कि संवेदनशील मामलों को वरिष्ठ जजों की खंडपीठ को नहीं देकर चुनिंदा जजों को दिया जाता है.
हालांकि बाद में जस्टिस अरुण कुमार मिश्रा ने ख़ुद को जस्टिस लोया मामले से 'रेक्युज़' यानी अलग कर लिया था.
ये भी पढ़ें: प्रशांत भूषण: किन मामलों के लिए जाने जाते हैं
सुप्रीम कोर्ट से जुड़ा एक और मामला काफ़ी सुर्ख़ियों में रहा और वो था पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई पर सुप्रीम कोर्ट की एक महिला कर्मी की ओर से यौन उत्पीड़न का आरोप.
जिस खंडपीठ ने इस मामले की सुनवाई की थी, उसमें ख़ुद मुख्य न्यायाधीश तो थे ही, साथ ही तीन सदस्यों वाली इस खंडपीठ में सुप्रीम कोर्ट के 27 जजों में से जस्टिस अरुण कुमार मिश्रा और जस्टिस दीपक गुप्ता को शामिल किया गया था.
वो तब भी विवाद में आए, जब ज़मीन अधिग्रहण के एक मामले में उन्होंनेफ़ैसला सुनाया था. बाद में ये मामला उसी संविधान पीठ को सौंप दिया गया, जिसके वो भी सदस्य थे.
न्यायमूर्ति अरुण कुमार मिश्रा ने ख़ुद को उस संविधान पीठ से 'रेक्युज़' यानी अलग करने से इनकार कर दिया था. मतलब ये कि ख़ुद के दिए गए फ़ैसले को चुनौती देने वाली याचिका की सुनवाई में वे ख़ुद भी शामिल थे.
पीएम मोदी की प्रशंसा

इमेज स्रोत, Hindustan Times
लेकिन सबसे ज़्यादा उनके जिस बयान ने लोगों का ध्यान खींचा, वो था इस साल फ़रवरी महीने में दिया उनका बयान, जिसमें उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सार्वजनिक रूप से प्रशंसा की थी.
उन्होंने मोदी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत दार्शनिक की संज्ञा देते हुए कहा था कि प्रधानमंत्री मोदी सदाबहार ज्ञानी भी हैं.
मिश्रा के बयान की ना सिर्फ़ न्यायिक हलकों में आलोचना हुई, बल्कि राजनीतिक हलकों में भी इसको लेकर बहस शुरू हो गई थी. न्यायिक हलकों में ये मांग उठने लगी कि जस्टिस मिश्रा सरकार के ख़िलाफ़ अपनी अदालत में चल रहे मामलों से ख़ुद को अलग कर लें.
पिछले साल अगस्त महीने में जाने-माने वकील दुष्यंत दवे ने सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर जस्टिस अरुण मिश्रा के ख़िलाफ़ एक उद्योग समूह के कई मामलों को अपनी अदालत में सुनने का आरोप लगाया था.
उनका आरोप था कि एक विशेष औद्योगिक समूह के मामले जस्टिस अरुण मिश्रा की खंडपीठ को ही सुपुर्द किए जाते रहे हैं. हालाँकि उस उद्योग समूह ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि सबकुछ तय नियमों के हिसाब से हुआ था. समूह का ये भी कहना था कि दुष्यंत दवे भी उनके वकील रह चुके हैं.
वरिष्ठ पत्रकार प्रेमशंकर झा ने गुजरात के चर्चित हरेन पांड्या हत्याकांड का ज़िक्र करते हुए न्यायमूर्ति अरुण कुमार मिश्रा के उस जजमेंट में कई ख़ामियाँ निकालीं, जिसके तहत खंडपीठ ने गुजरात उच्च न्यायालाल के फ़ैसले को ख़ारिज कर दिया था.
न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा उस खंडपीठ के भी सदस्य थे, जो बहुचर्चित 'सहारा बिरला दस्तावेज़' मामले की सुनवाई कर रही थी. इस बहुचर्चित मामले में भी राजनेताओं, नौकरशाहों और जजों पर भी आरोप लगे थे, लेकिन ये मामला ख़ारिज हो गया था.
और भी हैं कई मामले

इमेज स्रोत, CARAVAN MAGAZINE
मेडिकल कॉलेज घूस कांड का मामला भी जस्टिस अरुण मिश्रा की खंडपीठ के सामने आया, जिससे तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने ख़ुद को अलग कर लिया था. जिस याचिका में पूरे मामले की जाँच करने का अनुरोध किया गया था, उसे आख़िरकार ख़ारिज कर दिया गया.
न्यायिक हलकों में कहा जाता है कि अपने कार्यकाल में न्यायमूर्ति अरुण कुमार मिश्रा ने लगभग एक लाख मामलों का निपटारा भी किया है.
एडवोकेट्स एक्ट 1961 के तहत विदेश से हासिल की गई क़ानून की डिग्री को भारत में मान्यता के दिशानिर्देश बनाने का श्रेय भी जस्टिस मिश्रा को जाता है.
साथ ही वर्ष 2000 में क़ानून के सांध्यकालीन कॉलेजों को बंद करने का प्रस्ताव भी उन्होंने ही बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया के सामने रखा था. अखिल भारतीय अधिवक्ता कल्याण योजना की शुरुआत का श्रेय भी न्यायमूर्ति अरुण कुमार मिश्रा को ही जाता है.
इन सबके बीच राजस्थान उच्च न्यायलय में एक विधि संग्रहालय की शुरुआत के कारण उनकी ख़ूब सराहना भी हुई.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)















