इंदौर: लगातार चौथे साल कैसे बना देश का सबसे साफ़ शहर

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    • Author, शुभम किशोर
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

भारत सरकार के स्वच्छ सर्वेक्षण 2020 के परिणामों के मुताबिक़ इंदौर देश का सबसे साफ़ शहर चुना गया. गुरुवार को जारी किए गए लिस्ट में गुजरात का सूरत शहर दूसरे स्थान पर रहा. तीसरा नंबर महाराष्ट्र के नवी मुंबई का है.

ये लगातार चौथा साल है जब इंदौर को देश का सबसे साफ़ शहर चुना गया है.

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने ट्विटर पर लिखा, "आज मध्य प्रदेश के लिए गर्व और प्रसन्नता का क्षण हैं. स्वच्छ सर्वेक्षण 2020 में देश के सबसे स्वच्छ शहर में प्रथम स्थान के सम्मान के लिए इंदौरवासियों, अधिकारियों एवं स्वच्छता योद्धाओं को बधाई. इस प्रोत्साहन और सम्मान के लिए यशस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी का हृदय से आभार".

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कुछ लोग इंदौर के नंबर वन पायदान पर पहुंचने के लिए उठाए गए क़दम पर सवाल भी उठा रहे हैं.

इंदौर के लगातार पहले पायदान पर आने की वजह क्या है, इसे समझने के लिए स्वच्छ सर्वेक्षण के नियमों को समझना ज़रुरी है.

सर्वेक्षण के तहत शहरों को अलग-अलग कैटेगरी में नंबर दिए जाते हैं.

हर शहर को 6000 नंबर के स्केल पर रेट किया जाता है. इंदौर को 6000 में से 5647 नंबर मिले हैं.

एक शहर को सफ़ाई से जुड़े अलग-अलग मापदंड पर नंबर दिए जाते हैं, जैसे कि:

· कूड़ा इकट्ठा और ट्रांसपोर्ट करना

· कूड़े को प्रोसेस और नष्ट करना

· सस्टेनेबल सैनिटेशन

· नई और बेहतर प्रैक्टिस

· फल सब्जियों के मार्केट की हालत

· रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड की हालत

· शहर के इलाक़ों का सौंदर्यीकरण

· अतिक्रमण और नाली के पानी का ट्रीटमेंट

· लोगों की राय और स्वच्छता एप

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सही तरीक़े से कूड़ा इकट्ठा करने के मिले पूरे नंबर

इंदौर शहर को कूड़ा इकट्ठा करने के लिए 500 में से 500 नंबर मिले हैं. इसके अलावा कूड़े को प्रोसेस और नष्ट करने के लिए 700 में से 679 नंबर मिले.

शहर ने गीला और सूखा कचरा अलग-अलग इकट्ठा किया जाता है. हर घर में गीला और सूखा कचरा के लिए अलग डस्टबिन होता है. हर घर में कचरा इकट्ठा करने के लिए गाड़ियां आती हैं, इन गाड़ियों में अलग-अलग तरह के कचरे को डालने के लिए अलग-अलग चैंबर बने होते हैं.

इसके बाद इन्हें प्रोसेसिंग के लिए अलग-अलग यूनिट में ले जाया जाता है, गीला और सूखा कचरा अलग-अलग मशीनों में प्रोसेस किया जाता है.

सूखा कचरा प्रोसेस करने के लिए शहर में आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस तकनीक वाली एक मशीन भी लगाई गई है. ये मशीन बिना इंसानी मदद के प्लास्टिक, काग़ज़ और दूसरी तरह के कूड़े को अलग कर देती है, इस अलग हुए कचरे को रिसाइकल होने के लिए भेज दिया जाता है.

इंदौर नगर निगम के कंस्लटेंट असद वारसी बताते हैं, "हम हर दिन 1150 मेंट्रिक टन कचरा प्रोसेस कर लेते हैं यानी कि शहर से निकलने वाला पूरा कचरा. हमने आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल किया है, ये पूरे देश के लिए एक रोल मॉडल हैं."

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प्रोसेसिंग और डिस्पोज़ल कैटेगरी में शहर को 700 में से 679 नंबर दिए गए.

कचरा प्रोसेस करना तभी मुमकिन होता है जब घरों से निकलने वाला कचरा अलग-अलग कर दिया जाए. इंदौर के रहने वाले लोगों का इसमें बहुत बड़ा योगदान रहा है.

इंदौर के रहने वाले दिवाकर चौधरी कहते हैं, "गीले और सूखे कचरे को अलग करने का कॉन्सेप्ट बहुत अच्छा है. पिछले चार सालों से अमूमन अच्छे तरीक़े से ही काम करता रहा है. सैनिटरी पैड और डायपर्स के लिए एक तीसरे बॉक्स की व्यवस्था भी की गई थी, लेकिन पिछले कुछ दिनों से वो इन्हें दूसरे कचरे के साथ मिक्स कर दे रहे हैं. हां, जिस वक़्त सर्वेक्षण हो रहा होता है, हर नियम का कड़ाई से पालन होता है, ख़त्म होने के बाद कभी-कभी रवैया ढीला पड़ जाता है."

बिना ट्रेंचिंग ग्राउंड वाला शहर

इंदौर शहर के बाहर देवगुरड़िया इलाक़े में एक बड़ा ट्रेंचिंग ग्राउंड था जहां शहर का पूरा कचरा फेंका जाता था. इंदौर नगर निगम का दावा है कि पूरे कचरे का निपटारा कर दिया गया और अब वहां पर ट्रेंचिंग ग्राउंड की जगह एक मैदान है जिसपर पेड़ पौधे लगाए गए हैं.

कचरे के पहाड़ वाली इस जगह पर हमेशा आग लगी रहती थी. आसपास रहने वाले लोगों के लिए सांस लेना भी मुश्किल था. लेकिन पिछले साल कुछ ही महीनों के अंदर इसे एक मैदान में तब्दील कर दिया गया.

मेयर मालिनी गौड़ के मुताबिक़, "ये इस साल हमारी सबसे बड़ी उपलब्धी में से एक है."

नगर निगम का दावा है कि पूरे कचरे को ट्रीट कर नष्ट कर दिया गया है. हालांकि कई लोग मानते हैं कि काफ़ी मात्रा में कचरे को मिट्टी से ढक दिया गया है.

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सामाजिक कार्यकर्ता आंनद लाखन कहते हैं, "कचरे को सही तरीक़े से ट्रीट नहीं किया गया, वहीं दबा दिया गया है, सर्वेक्षण करने वाली टीमों के लिए यह महज़ एक व्हाइट वॉश है,"

इलाक़े के रहने वाले समीर कंब्रेलकर कहते हैं, "प्रदूषण से तो हमें बहुत राहत मिली है, लेकिन इस इलाक़े का पानी अब भी प्रदूषित है, पानी में टीडीएस का लेवल 700 से भी ज़्यादा है."

लाखन का कहना है कि शहर के कई काम सिर्फ़ सर्वेक्षण की टीम के आने के ठीक पहले किए जाते हैं ताकि चीज़ों के बेहतर तरीक़े से पेश किया जा सके.

नगर निगम के अधिकारी इन आरोपों से इनकार करते हैं. कंसल्टेंट असद वारसी कहते हैं, "हम सिर्फ़ नंबर के लिए काम नहीं करते, ट्रेंचिंग ग्राउंड में हमने पूरे कचरे को ट्रीट किया है, अगर कचरा दबा होता तो उसमें से मीथेन गैस निकल रही होती, पिछले साल हमने पेड़ लगाए जो कि अब बड़े हो गए हैं, ये उनके लिए दूसरा मॉनसून है, ये दिखाता है कि हमने काम सही तरीक़े से किया है."

शहरी इलाक़ों की सफ़ाई में भी अव्वल

शहर के अलग-अलग इलाक़े जैसे रिहायशी इलाक़ों, व्यावसायिक इलाक़ों और फल और सब्जी मंडियों की सफ़ाई, हवा की क्वालिटी सुधारने के प्रयास पर भी नंबर दिए जाते हैं. ये काम डायरेक्ट ऑब्ज़र्वेशन के तहत आते हैं. इसमें भी इंदौर को पूरे यानी 1500 में से 1500 नंबर मिले हैं.

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स्थानीय पत्रकार अशोक यादव बताते हैं, "पिछले 4 सालों में शहर में बहुत काम हुआ है, शहर की सफ़ाई से लेकर वेस्ट मैनेजमेंट तक, अलग-अलग स्तर पर काम किए गए, अगर आप चार साल पहले से तुलना करें, तो बहुत बड़ा फ़र्क़ आया है, सड़कों पर कचरे का ढेर नहीं दिखता, शौचालय बनाए गए हैं, लोगों में जागरूकता पैदा की गई है, खुले में शौच पर लगाम लगा है, कई ऐसे काम हैं जिनकी बदौलत शहर नंबर वन बनने में कामयाब हुआ है."

हालांकि अशोक कहते हैं कि नदियों की सफ़ाई और गंदे पानी के ट्रीटमेंट को लेकर अभी कई सुधारों की ज़रूरत है.

शहर के कई और लोगों का भी कहना है कि सफ़ाई हुई है लेकिन ऐसा मान लेना कि शहर में कहीं भी गंदगी नहीं है, ग़लत है, कुछ इलाक़ों में अभी भी गंदगी दिख जाती है.

अतिक्रमण हटाने के पूरे नंबर, लेकिन लोगों में ग़ुस्सा भी

शहर से अतिक्रमण हटाने के मामले में भी इंदौर को पूरे नंबर दिए गए हैं. स्वच्छ सर्वेक्षण के तहत अतिक्रमण हटाने की कैटगरी में 120 नंबर रखे जाते हैं, लेकिन शहर के कुछ लोग इसपर सवाल भी उठा रहे हैं.

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शहर के सामाजिक कार्यकर्ता आनंद लाखन बताते हैं, "शहर में फुटपाथ पर दुकान लगाने वाले लोगों को हटा दिया गया, सफ़ाई के नाम पर कई झुग्गियां रातोंरात हटा दी गई."

हालांकि इंदौर की मेयर मालिनी गौड़ इन आरोपों को ग़लत बताती हैं. वो कहती हैं, "जिन लोगों को भी झुग्गीयों से हटाया गया है, उन्हें आवास योजना के तहत घर दिए, सड़कें चौड़ी करने के लिए हटाए गए घरों को भी नियम के अनुसार मुआवज़ा और रहने की जगह दी गई, फुटपाथ पर काम करने वालों के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं की गई है."

सफ़ाई की मुहिम के कारण छिने रोज़गार?

शहर की सफ़ाई से जुड़े कई टेंडर प्राइवेट कंपनियों को दिए गए हैं. सुबह से रात तक शहर में आधुनिक मशीनें सफ़ाई करती दिख जाएंगी. दूसरे शहरों की तरह हाथ से कचरा इकट्ठा करते लोग नहीं दिखते हैं.

नगर निगम की सख्ती के कारण सड़क पर कचरा नहीं फेंका जा सकता, इसके साथ ही हाथ से कचरा बीनने वाले लोग भी इस सिस्टम से बाहर हो चुके हैं.

लाखन बताते हैं, "ये लोग सालों से सफ़ाई का काम करते आए हैं, इन लोगों के आमदनी का ज़रिया छिन गया, इनके लिए कोई ठोस क़दम नहीं उठाए गए."

हालांकि नगर निगम के अधिकारियों का कहना कि इन कामों से जुड़े सभी लोगों को रोज़गार दिया जा चुका है.

क्या कहते हैं लोग?

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ज़्यादातर कैटेगरी में पूरे नंबर लाने वाले इंदौर को सिटीज़न फ़ीडबैक में नंबर कम मिले हैं. 1500 में से शहर को इस कैटेगरी में 1416 नंबर मिले.

शहर के अंकित गोयल बताते हैं, "आमतौर पर दूसरे शहरों की तुलना में सफ़ाई पर बहुत ज़्यादा ध्यान दिया जाता है, कोरोना के समय में थोड़ी दिक़्क़तें ज़रूर हुई थीं, लेकिन ये बात समझी जा सकती है,ये एक मुश्किल दौर है,"

लोगों के फ़ीडबैक के नंबर दूसरी कैटगरी के मुक़ाबले थोड़े कम हैं, लेकिन नगर निगम इसे बुरा नहीं मान रहा. इंदौर की मेयर मालिनी गौड़ के मुताबिक़ सफ़ाई की पूरी प्रक्रिया में लोगों की बहुत बड़ी भूमिका रही है. गौड़ कहती हैं, "लोगों ने हमें हर क़दम पर साथ दिया है, यहां तक कि पिछले कुछ समय से हम होम कंपोसटिंग को बढ़ावा दे रहे हैं ताकि घर का कचरा घर में ही रह जाए, उसमें भी लोग बढ़ चढ़ कर हिस्सा ले रहे हैं."

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